1 यूहन्ना की पत्री: परमेश्वर प्रेम है और उद्धार का निश्चय
परिचय
कल्पना कीजिए कि एक रविवार की सुबह आप अपनी कलीसिया में पहुँचते हैं और पाते हैं कि आधी कुर्सियाँ खाली हैं। जो लोग सबसे ज़्यादा बोलते थे, जो सबसे अधिक "आत्मिक" लगते थे, जिनके पास हर प्रश्न का चमकीला उत्तर था, वे सब उठकर चले गए हैं। उन्होंने जाते-जाते कहा कि उन्हें एक गहरा ज्ञान मिल गया है, और जो पीछे रह गए हैं वे अभी बच्चे हैं। और अब आप वहाँ बैठे हैं, एक अधूरी मंडली में, और मन में एक काँपता हुआ सवाल है: कहीं वे सही तो नहीं थे? कहीं मैं ही तो धोखे में नहीं हूँ?
ठीक ऐसी ही टूटी हुई, हिली हुई मंडलियों के लिए एक बूढ़े प्रेरित ने यह पत्री लिखी। इस पन्ने पर आप जानेंगे कि 1 यूहन्ना की पत्री किसने, कब और किन हालातों में लिखी, इसकी बनावट कैसी है, इसके मुख्य विषय और मुख्य पद क्या हैं, पूरी बाइबल में इसका स्थान क्या है, और सबसे बढ़कर यह कि "परमेश्वर प्रेम है" का एलान डरे हुए दिल के लिए कोई नारा नहीं, बल्कि दवा है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
ज़्यादातर लेख 1 यूहन्ना को "प्रेम की पत्री" कहकर मीठे वाक्यों में समेट देते हैं। हम इसे दूसरी जगह से पढ़ेंगे: यह उन लोगों के लिए लिखा गया पत्र है जो कलीसिया के टूटने के बाद पीछे छूट गए थे और अपने ही विश्वास पर शक करने लगे थे। यूहन्ना यहाँ कोई रहस्यवादी ध्यान नहीं सिखा रहे; वे एक चरवाहे की तरह काँपती भेड़ों के हाथ में निश्चय थमा रहे हैं। इसलिए इस पत्री में प्रेम और उद्धार का निश्चय अलग-अलग विषय नहीं हैं। प्रेम ही वह गवाही है जिससे पता चलता है कि अनन्त जीवन सचमुच आपका है।
बाइबल 1 यूहन्ना की पत्री के बारे में क्या कहती है?
पत्री की शुरुआत ही असाधारण है। यूहन्ना किसी अभिवादन से नहीं, बल्कि एक गवाही से शुरू करते हैं: जो आदि से था, जिसे हमने सुना, अपनी आँखों से देखा, ध्यान से देखा और हाथों से छुआ। यह किसी विचार की नहीं, एक व्यक्ति की गवाही है। पहली सदी के अंत में जो शिक्षक कह रहे थे कि मसीह सचमुच देह में नहीं आया, उनके सामने यह बूढ़ा प्रेरित अपनी हथेलियाँ खोलकर कहता है कि मैंने उसे छुआ है।
इसके बाद वह समाचार आता है जिस पर पूरी पत्री टिकी है: "जो समाचार हम ने उससे सुना, और तुम्हें सुनाते हैं, वह यह है; कि परमेश्वर ज्योति है: और उसमें कुछ भी अन्धकार नहीं" (1 यूहन्ना 1:5)। ज्योति का अर्थ है पवित्रता और सच्चाई, वह उजाला जिसमें कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। और फिर तुरंत व्यावहारिक सवाल: ऐसे परमेश्वर के साथ पापी इंसान की संगति कैसे हो? उत्तर 1 यूहन्ना 1:7 में है: "पर यदि हम ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं और उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।"
ध्यान दीजिए, यूहन्ना यह नहीं कहते कि ज्योति में चलने का मतलब है पाप-रहित हो जाना। उल्टे, वे कहते हैं कि ज्योति में चलने वाले को लहू की ज़रूरत पड़ती रहती है। ज्योति में चलना यानी अपने जीवन को छिपाना बंद करना, परमेश्वर के सामने खुला रहना। इसीलिए अगला ही कदम स्वीकारोक्ति है: "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है" (1 यूहन्ना 1:9)। यहाँ क्षमा परमेश्वर की दया पर नहीं, उनकी विश्वासयोग्यता और धार्मिकता पर टिकी है। क्योंकि दाम चुकाया जा चुका है, इसलिए क्षमा देना अब उनके न्याय के अनुकूल है।
जो लोग मंडली छोड़कर गए थे, उनके बारे में यूहन्ना साफ़ लिखते हैं: "वे निकले तो हम ही में से, परन्तु हम में के थे नहीं" (1 यूहन्ना 2:19)। पीछे छूटे हुओं के लिए यह राहत की बात थी, पर साथ ही एक नया डर भी: अगर वे धोखे में थे, तो क्या मैं भी हो सकता हूँ? इसी डर का इलाज यूहन्ना तीन बार-बार लौटने वाली कसौटियों से करते हैं। पहली, आज्ञाओं के प्रति आज्ञाकारिता; दूसरी, भाई-बहनों से सच्चा प्रेम; तीसरी, यीशु मसीह के देहधारी पुत्र होने का विश्वास। ये कसौटियाँ उद्धार कमाने की शर्तें नहीं हैं, बल्कि जीवन के लक्षण हैं, ठीक वैसे जैसे साँस लेना जीवित होने का प्रमाण है, जीवित होने का कारण नहीं।
पत्री के बीचों-बीच एक चेतावनी खड़ी है: "तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो; यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है" (1 यूहन्ना 2:15)। और फिर वह वाक्य जो मसीही विश्वास का हृदय है: "जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है" (1 यूहन्ना 4:8)। यूहन्ना यह नहीं कह रहे कि जहाँ कहीं प्रेम है वहाँ परमेश्वर है; वे कह रहे हैं कि प्रेम का स्रोत और परिभाषा परमेश्वर स्वयं हैं, और उस प्रेम की तस्वीर क्रूस पर टँगी है। अंत में सारी बात एक मकसद में सिमटती है: "मैं ने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिये ये बातें लिखी हैं कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है" (1 यूहन्ना 5:13)। जानना, न कि आशा करना।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यूहन्ना जो कुछ लिखते हैं, वह शून्य से नहीं आता। "परमेश्वर ज्योति है" का विचार पुराने नियम की उस परंपरा से उठता है जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति आग और उजाले में प्रकट होती है: जलती हुई झाड़ी, आग का खंभा, मिलापवाले तम्बू पर उतरता तेज, और भजनकार की पुकार कि यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है। परमेश्वर की ज्योति इंसान के लिए एक साथ आकर्षण भी है और खतरा भी, क्योंकि उजाले में सब कुछ दिख जाता है।
इसलिए पुराने नियम में प्रायश्चित्त की व्यवस्था दी गई। लैव्यव्यवस्था 16 में साल में एक बार महायाजक लहू लेकर अति पवित्र स्थान में जाता था। वह लहू पाप ढाँक सकता था, मिटा नहीं सकता था, इसलिए हर साल वही रस्म दोहरानी पड़ती थी। जब यूहन्ना लिखते हैं कि यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है, तो वे सदियों पुरानी उस अधूरी व्यवस्था को पूरा हुआ घोषित कर रहे हैं। और जब वे मसीह को "प्रायश्चित्त" कहते हैं, तो उनकी नज़र उसी दया के आसन पर है जहाँ अब सदा के लिए लहू छिड़का जा चुका है।
प्रेम का सूत्र भी पुराना है। व्यवस्थाविवरण में परमेश्वर इस्राएल से कहते हैं कि उन्होंने इस जाति को इसलिए नहीं चुना कि वह बड़ी थी, बल्कि केवल इसलिए कि उन्होंने उससे प्रेम किया। यह बिना कारण का, चुनने वाला प्रेम ही बाइबल का "हेसेद" है, वाचा का अटल स्नेह। लैव्यव्यवस्था 19:18 में यही प्रेम पड़ोसी तक पहुँचता है, और होशे की पुस्तक में यह एक बेवफ़ा पत्नी को बार-बार वापस ले आने वाले पति की तड़प बन जाता है। यिर्मयाह 31 और यहेजकेल 36 में परमेश्वर वादा करते हैं कि वे नया मन देंगे, अपनी व्यवस्था हृदय पर लिखेंगे और अपना आत्मा भीतर रखेंगे। 1 यूहन्ना उसी वादे की रसीद है: परमेश्वर से जन्मे लोगों में उनका "बीज" बना रहता है, और आत्मा भीतर से गवाही देता है।
पर सब कुछ एक जगह जाकर ठहरता है। पुराने नियम में प्रेम घोषित किया गया था; क्रूस पर वह मापा गया। "प्रेम इसमें नहीं कि हम ने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा" (1 यूहन्ना 4:10)। नया नियम इसी गवाही पर खड़ा है। पौलुस इसे धार्मिकता की भाषा में कहते हैं, इब्रानियों का लेखक इसे याजकीय भाषा में कहते हैं, और यूहन्ना इसे परिवार की भाषा में कहते हैं। उनके लिए उद्धार का सबसे गहरा नाम है गोद लिया जाना, पिता के घर में नाम लिखा जाना। और यही कारण है कि जो लोग किसी मंडली से निकाले गए या छोड़े गए महसूस करते हैं, उनके लिए यह पत्री इतनी कीमती है। उन्हें बताया जाता है कि उनका असली पता बदला नहीं है।
परमेश्वर का प्रेम भावना नहीं, नींव है।
रचना और मुख्य विषय
लेखक के बारे में कलीसिया की सबसे पुरानी गवाही एकमत है: यह ज़ब्दी का पुत्र यूहन्ना है, वही प्रेरित जो यीशु की छाती के सहारे बैठा था, वही जो चौथे सुसमाचार का लेखक है। पत्री में नाम नहीं लिखा, पर शैली, शब्दावली और विषय सुसमाचार से इतने मिलते हैं कि दोनों एक ही कलम से निकले लगते हैं: ज्योति और अंधकार, सत्य और झूठ, जीवन और मृत्यु, जानना और बने रहना। दूसरी सदी के लेखक इरिनेयुस बताते हैं कि यूहन्ना अपने अंतिम वर्षों में इफिसुस में रहे, और यह पत्री सम्भवतः वहीं से एशिया माइनर की उन मंडलियों के नाम लिखी गई जिन्हें वे व्यक्तिगत रूप से जानते थे। समय लगभग 85 से 95 ईस्वी के बीच माना जाता है, यानी पहली पीढ़ी के गवाह लगभग सब जा चुके थे और दूसरी-तीसरी पीढ़ी के विश्वासियों को सँभालना था।
हालात साफ़ हैं। कुछ शिक्षक दावा कर रहे थे कि उनके पास विशेष ज्ञान है, कि आत्मा शुद्ध है और देह से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसलिए शरीर से किया गया पाप आत्मिक जीवन को छूता नहीं। वे यह भी कहते थे कि मसीह सचमुच मानव देह में नहीं आया। इसी सोच के दो नतीजे निकले: नैतिकता के प्रति लापरवाही और भाई-बहनों के प्रति घमंडी ठंडापन। जब मंडली ने इसे स्वीकार नहीं किया, तो ये लोग अलग हो गए और पीछे छूटे हुओं को अपरिपक्व बताकर चले गए।
पत्री की बनावट सीधी-सादी नहीं है। यूहन्ना किसी तर्क की सीढ़ी नहीं चढ़ते, वे गोल-गोल घूमते हैं, जैसे कोई दादा एक ही बात को नए-नए कोण से दोहराता है जब तक वह दिल में बैठ न जाए। फिर भी एक ढाँचा दिखता है। 1:1 से 1:4 में प्रत्यक्षदर्शी की भूमिका, जहाँ उद्देश्य है पूरी संगति और भरपूर आनंद। 1:5 से 2:27 में ज्योति का विषय, जिसमें पाप, स्वीकारोक्ति, सहायक मसीह, आज्ञाकारिता, भाई से प्रेम, संसार से प्रेम का खतरा और मसीह-विरोधियों की चेतावनी आती है। 2:28 से 4:6 में धार्मिकता और सन्तान होने का विषय, जहाँ परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान की पहचान बताई जाती है और आत्माओं को परखने की शिक्षा दी जाती है। 4:7 से 5:12 में प्रेम और विश्वास एक साथ बुन दिए जाते हैं, और यहीं "परमेश्वर प्रेम है" दो बार गूँजता है। अंत में 5:13 से 5:21 में निश्चय, प्रार्थना में साहस, और मूरतों से बचने की आख़िरी हिदायत।
पूरी पत्री में एक शब्द बार-बार लौटता है: "हम जानते हैं।" यूहन्ना ज्ञान के दावेदारों का जवाब ज्ञान छीनकर नहीं, बल्कि सच्चा ज्ञान देकर देते हैं। जो गए थे उनके पास गुप्त जानकारी थी; जो रह गए उनके पास देहधारी मसीह की गवाही और आत्मा का साक्ष्य है। इसलिए यह पत्री जितनी कोमल है, उतनी ही दो-टूक भी। यूहन्ना बीच का रास्ता नहीं छोड़ते: या तो ज्योति या अंधकार, या तो जीवन या मृत्यु, या तो प्रेम या हत्या। यह सख़्ती क्रूरता नहीं, स्पष्टता है, और हिले हुए दिल को सबसे पहले स्पष्टता ही चाहिए।
इस पुस्तक के मुख्य पद
पहला पद उस दरवाज़े जैसा है जिससे सब भीतर आते हैं: "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है" (1 यूहन्ना 1:9)। यहाँ "मान लेना" का मूल अर्थ है वही कहना जो परमेश्वर कहते हैं, यानी अपने पाप को पाप मानना, उसे कमज़ोरी, परिस्थिति या किसी और का दोष कहकर हल्का न करना। और प्रतिज्ञा देखिए: क्षमा इसलिए निश्चित है क्योंकि परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं, उनकी भावनाएँ बदलती नहीं; और इसलिए भी क्योंकि वे धर्मी हैं, और धर्मी न्यायी उस कर्ज़ को दोबारा नहीं वसूलता जिसे किसी और ने चुका दिया हो। जो लोग सोचते हैं कि उन्होंने वह सीमा पार कर ली है जिसके आगे क्षमा नहीं मिलती, उनके लिए यह पद एक खुला दरवाज़ा है जिस पर ताला ही नहीं लगा।
दूसरा पद परिवार का है: "देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ, और हम हैं भी; इस कारण संसार हमें नहीं जानता, क्योंकि उसने उसे भी नहीं जाना" (1 यूहन्ना 3:1)। यूहन्ना यहाँ लगभग चीख पड़ते हैं, "देखो!", जैसे किसी अजूबे की ओर उँगली उठा रहे हों। और वे एक छोटा-सा वाक्य जोड़ते हैं जो सब कुछ बदल देता है: "और हम हैं भी।" यह केवल उपाधि नहीं, हैसियत है। फिर वे उन लोगों के ताने का जवाब देते हैं जिन्होंने मंडली छोड़ी थी: अगर दुनिया तुम्हें नहीं पहचानती, तो हैरानी क्यों? उसने तो पिता को भी नहीं पहचाना। गोद लिए हुए बच्चों की पहचान दुनिया की मंज़ूरी से नहीं, पिता के बुलाने से तय होती है।
तीसरा पद पूरी पत्री का मकसद खोल देता है: "मैं ने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिये ये बातें लिखी हैं कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है" (1 यूहन्ना 5:13)। यूहन्ना का सुसमाचार इसलिए लिखा गया कि लोग विश्वास करें; यह पत्री इसलिए लिखी गई कि विश्वास करने वाले जान जाएँ। और ध्यान दीजिए, जानने का आधार भावना नहीं है। उससे ठीक पहले वे गवाही की बात करते हैं: परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है और यह जीवन उनके पुत्र में है। यानी निश्चय मेरी अपनी आत्मिक नब्ज़ टटोलने से नहीं, बल्कि मसीह में दी गई परमेश्वर की गवाही पर भरोसा करने से आता है। जिनकी मंडली बिखर गई थी, उनके हाथ में यूहन्ना ने यही थमाया: भावना नहीं, गवाही।
दर्पण
आप शायद इसलिए यहाँ तक पढ़ते आए हैं क्योंकि आपके भीतर भी कोई खाली कुर्सी है। हो सकता है वह मंडली हो जो टूट गई, या वह दोस्त जो "सच्चा मसीही" बनकर आपको नीचा दिखाकर चला गया, या वह दिन जब आपने खुद से कहा कि शायद मैं कभी था ही नहीं। 1 यूहन्ना आपको सांत्वना के नाम पर झूठ नहीं देती। यह आपसे पूछती है: जब आप अपने पाप के सामने आते हैं, तो क्या आप उसे मानते हैं या सफ़ाई देते हैं? जब आपका भाई या बहन ज़रूरत में होते हैं और आपके पास देने को कुछ होता है, तो आपका दिल खुलता है या बंद हो जाता है?
यह पत्री आपकी जेब, आपके कैलेंडर और आपके मोबाइल पर हाथ रखती है। संसार से प्रेम न रखने का मतलब पहाड़ पर चले जाना नहीं है; इसका मतलब है यह पहचानना कि आपकी ज़्यादातर चाहतें आपको किसकी ओर खींच रही हैं। आँखों की अभिलाषा उस स्क्रीन पर जीती है जिसे आप रात को बंद नहीं कर पाते। जीवन का घमंड उस तुलना में जीता है जहाँ आप हर उपलब्धि को किसी और की उपलब्धि के बगल में रखकर तौलते हैं। और शरीर की अभिलाषा उन चुपचाप किए गए समझौतों में जीती है जिन्हें आप किसी को नहीं बताते।
पर यही पत्री आपसे एक और बात कहती है, और यह बात आपकी सबसे अँधेरी रात के लिए है। अगर आपका अपना मन आपको दोषी ठहराता है, तो याद रखिए कि परमेश्वर आपके मन से बड़े हैं और सब कुछ जानते हैं। वे आपके बारे में वह सब जानते हैं जो आपकी अंतरात्मा आपको याद दिलाकर डराती है, और उससे भी ज़्यादा; और फिर भी उन्होंने अपने पुत्र को भेजा। आपका उद्धार आपकी भावनाओं की गुणवत्ता पर नहीं, मसीह के लहू की कीमत पर टिका है। इसलिए आज रात अपने पाप को छिपाइए मत, उजाले में ले आइए। ज्योति जलाने के लिए नहीं, चंगा करने के लिए है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को 1 यूहन्ना समझाने का सबसे अच्छा रास्ता घर की भाषा है, क्योंकि यूहन्ना खुद यही भाषा बोलते हैं। वे अपने पाठकों को बार-बार "हे बालको" कहकर पुकारते हैं। बच्चों से कहिए कि यह चिट्ठी एक बहुत बूढ़े आदमी ने लिखी थी जिसने यीशु को अपनी आँखों से देखा था, उनकी आवाज़ सुनी थी और उनका हाथ पकड़ा था। और उसने यह चिट्ठी इसलिए लिखी ताकि डरे हुए लोग जान जाएँ कि वे परमेश्वर के परिवार के हैं।
दो चित्र बच्चों के मन में आसानी से बैठते हैं। पहला, बल्ब और अँधेरा कमरा: जब उजाला होता है तो गंदगी दिखती है, पर उजाला गंदगी देखकर भागता नहीं, वह सफ़ाई का मौका देता है। परमेश्वर ज्योति हैं, और जब हम अपनी गलती मानते हैं तो वे उसे साफ़ कर देते हैं। दूसरा, परिवार का नाम: एक बच्चा जो गिर जाए, कीचड़ में सन जाए या नाराज़ हो जाए, फिर भी उस घर का बच्चा रहता है। परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान कहा है, और यूहन्ना जोड़ते हैं कि हम सचमुच हैं भी।
बड़े बच्चों से यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम केवल "आई लव यू" कहना नहीं, बल्कि करके दिखाना है, जैसे यूहन्ना लिखते हैं कि हम वचन और जीभ से नहीं, काम और सत्य से प्रेम करें। खाना बाँटना, माफ़ी देना, अकेले बैठे बच्चे के पास जाकर बैठना, यही 1 यूहन्ना का व्यावहारिक अनुवाद है।
Faith.network पर इस पुस्तक की उम्र के हिसाब से अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह वर्ष) चित्रों और सरल कहानी के रूप में, प्राथमिक कक्षा के बच्चों के लिए (सात से बारह वर्ष) प्रश्न-उत्तर और गतिविधियों के साथ, और किशोरों के लिए (बारह वर्ष से ऊपर) पहचान, साथियों के दबाव और विश्वास के संदेह पर सीधी बातचीत के रूप में।
इस पत्री को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
यह पत्री छोटी है, कुल पाँच अध्याय, और इसे एक बैठक में पढ़ा जा सकता है। पहली बार इसे बिना रुके, शुरू से आख़िर तक, ज़ोर से पढ़िए। यह मूल रूप से सुनने के लिए लिखी गई थी, और ज़ोर से पढ़ने पर इसकी गूँज और दोहराव साफ़ सुनाई देते हैं।
दूसरी बार हाथ में पेंसिल लेकर पढ़िए और हर जगह "हम जानते हैं", "इसी से जानते हैं" और "बना रहता है" को निशान लगाइए। आप देखेंगे कि पत्री का कंकाल यही शब्द हैं। फिर तीन कसौटियों को अलग-अलग सूची में रखिए: सच्चाई के बारे में क्या कहा गया, प्रेम के बारे में क्या, और आज्ञाकारिता के बारे में क्या।
तीसरी बार धीरे-धीरे, एक सप्ताह में, छोटे हिस्सों में पढ़िए। एक सुझाया गया क्रम यह है: पहले दिन 1:1 से 1:4, दूसरे दिन 1:5 से 2:2, तीसरे दिन 2:3 से 2:17, चौथे दिन 2:18 से 2:29, पाँचवें दिन 3:1 से 3:10, छठे दिन 3:11 से 3:24, सातवें दिन 4:1 से 4:6, आठवें दिन 4:7 से 4:21, नौवें दिन 5:1 से 5:12, और दसवें दिन 5:13 से 5:21। हर दिन एक ही प्रश्न पूछिए: इस हिस्से में परमेश्वर कैसे दिखते हैं, और इसका मेरे आज के दिन से क्या लेना-देना है?
साथ में यूहन्ना का सुसमाचार पढ़ना बहुत मददगार है, खासकर अध्याय 13 से 17, क्योंकि पत्री के कई विषय वहीं ऊपरी कमरे में पहली बार बोले गए थे। और अगर आप संदेह से जूझ रहे हैं, तो 1 यूहन्ना 5:13 को इस पत्री का अंतिम शब्द मानकर पढ़िए, क्योंकि यूहन्ना ने उसे वहीं रखा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1 यूहन्ना की पत्री किसने लिखी थी?
पत्री में लेखक अपना नाम नहीं देता, पर दूसरी सदी से ही कलीसिया की एकमत गवाही यह रही है कि यह प्रेरित यूहन्ना की रचना है, ज़ब्दी का पुत्र, जो यीशु के बारह चेलों में से एक था। पत्री की शैली, शब्दावली और विषय चौथे सुसमाचार से इतने मिलते हैं कि दोनों एक ही लेखक की कलम से लगते हैं। पहले चार पदों में लेखक खुद को प्रत्यक्षदर्शी बताता है, जिसने यीशु को सुना, देखा और छुआ, जो किसी बाद की पीढ़ी के लेखक के लिए सम्भव नहीं था।
1 यूहन्ना की पत्री कब और कहाँ लिखी गई?
अधिकांश विद्वान इसे लगभग 85 से 95 ईस्वी के बीच रखते हैं, यानी यूहन्ना के जीवन के अंतिम वर्षों में। प्राचीन गवाही के अनुसार यूहन्ना उस समय इफिसुस में रहते थे और वहीं से एशिया माइनर की उन मंडलियों की देखरेख करते थे जिन्हें यह पत्री भेजी गई। उस समय तक पहली पीढ़ी के प्रत्यक्षदर्शी लगभग जा चुके थे और कलीसिया में झूठी शिक्षाएँ पनपने लगी थीं, जिसका असर पत्री के हर अध्याय में साफ़ दिखाई देता है।
"परमेश्वर प्रेम है" का सही अर्थ क्या है?
1 यूहन्ना 4:8 यह नहीं कहता कि जहाँ कहीं कोई प्रेम जैसी भावना है वहाँ परमेश्वर हैं। यह कहता है कि प्रेम परमेश्वर का स्वभाव है, उनके व्यक्तित्व का हिस्सा, कोई मूड नहीं। इसी पत्री में इसकी परिभाषा भी दी गई है: प्रेम इसमें है कि उन्होंने हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिए अपने पुत्र को भेजा। इसलिए इस वाक्य को क्रूस से अलग करके पढ़ना इसे खोखला कर देता है। परमेश्वर का प्रेम कीमत चुकाने वाला, पवित्र और वाचा में बँधा हुआ प्रेम है।
क्या 1 यूहन्ना 1:9 के अनुसार हर पाप का नाम लेकर मानना ज़रूरी है?
इस पद में क्रिया ऐसी है जो लगातार चलने वाले अभ्यास को दिखाती है, न कि एक सूची पूरी करने की शर्त को। परमेश्वर यह नहीं माँगते कि आप हर भूला हुआ पाप याद करें, वरना क्षमा आपकी याददाश्त पर निर्भर हो जाती। वे यह माँगते हैं कि आप छिपाना बंद करें और जो पाप आपके सामने आता है उसे पाप कहकर उनके सामने रखें। क्षमा का आधार आपकी स्वीकारोक्ति की पूर्णता नहीं, मसीह के लहू की पूर्णता है।
1 यूहन्ना 1:8 और 3:9 एक दूसरे का खंडन क्यों करते दिखते हैं?
1 यूहन्ना 1:8 कहता है कि जो कहे कि उसमें पाप नहीं, वह अपने आपको धोखा देता है, जबकि 1 यूहन्ना 3:9 कहता है कि जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता। यूनानी भाषा में दूसरा वाक्य लगातार, आदतन, बेपरवाह पाप में जीने की बात कर रहा है, एक जीवनशैली की, न कि हर व्यक्तिगत गिरावट की। विश्वासी गिरता है, पर पाप में बसता नहीं; वह गिरकर वापस ज्योति की ओर लौटता है। यही अंतर दोनों पदों को आपस में जोड़ देता है।
1 यूहन्ना और यूहन्ना के सुसमाचार में क्या अंतर है?
दोनों की भाषा और विषय बहुत मिलते-जुलते हैं, पर उनका मकसद अलग है। सुसमाचार इसलिए लिखा गया कि लोग विश्वास करें कि यीशु ही परमेश्वर के पुत्र मसीह हैं और विश्वास करके जीवन पाएँ। पत्री इसलिए लिखी गई कि जो पहले से विश्वास करते हैं वे जान लें कि अनन्त जीवन उनका है। एक आमंत्रण है, दूसरी पुष्टि। सुसमाचार यीशु के कामों और वचनों की कहानी है, जबकि पत्री एक चरवाहे का पत्र है जो झूठी शिक्षा से हिली हुई मंडली को सँभाल रहा है।
मैं कैसे जान सकता हूँ कि मेरा उद्धार निश्चित है?
1 यूहन्ना 5:13 के अनुसार निश्चय जानने के लिए दिया गया है, महसूस करने के लिए नहीं। यूहन्ना निश्चय की नींव परमेश्वर की गवाही में रखते हैं कि अनन्त जीवन उनके पुत्र में है और जिसके पास पुत्र है उसके पास जीवन है। इसके साथ वे तीन लक्षण देते हैं: देहधारी मसीह पर विश्वास, विश्वासियों से सच्चा प्रेम, और आज्ञाओं के प्रति दिल का झुकाव। ये लक्षण उद्धार कमाते नहीं, उसकी पुष्टि करते हैं, जैसे नब्ज़ जीवन का प्रमाण है, कारण नहीं।
"संसार से प्रेम न रखो" का क्या मतलब है, क्या सुंदर चीज़ों का आनंद लेना पाप है?
1 यूहन्ना 2:15 में "संसार" का अर्थ परमेश्वर की सृष्टि नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो परमेश्वर के बिना जीना चाहती है। यूहन्ना इसे तीन धाराओं में बाँटते हैं: शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाषा और जीवन का घमंड। भोजन, संगीत, काम, परिवार और सौंदर्य परमेश्वर के वरदान हैं और उनके लिए धन्यवाद देना भक्ति है। पाप तब शुरू होता है जब वरदान वरदाता की जगह ले लेता है और जो चीज़ मिटने वाली है वही हमारे दिल की मालिक बन जाती है।
1 यूहन्ना के अनुसार मसीह-विरोधी कौन है?
यूहन्ना इकलौते बाइबल लेखक हैं जो यह शब्द इस्तेमाल करते हैं, और वे कहते हैं कि "मसीह-विरोधी" कोई एक आने वाली शख़्सियत भर नहीं, बल्कि एक आत्मा है जो पहले ही काम कर रही है और जिसके कई प्रतिनिधि हैं। उनकी पहचान सींग या चमत्कार नहीं, बल्कि शिक्षा है: वे पिता और पुत्र के संबंध से इनकार करते हैं और यह मानने से मना करते हैं कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया। इसलिए यूहन्ना के लिए सबसे बड़ा खतरा राजनीति नहीं, बल्कि मसीह के विषय में झूठ है।
"आत्माओं को परखो" का क्या अर्थ है?
1 यूहन्ना 4:1 में हर आत्मा पर विश्वास न करने की चेतावनी है, क्योंकि बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता संसार में निकल खड़े हुए हैं। परखने की कसौटी भावनात्मक नहीं, सैद्धांतिक है: जो आत्मा यह मान लेती है कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है, वह परमेश्वर की ओर से है। यानी किसी शिक्षा या सेवकाई की जाँच उसकी लोकप्रियता, चमत्कारों या वक्ता के आत्मविश्वास से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह देहधारी, क्रूस पर चढ़े और जी उठे मसीह के बारे में क्या कहती है।
1 यूहन्ना 5:16 में "मृत्यु का पाप" क्या है?
यह पत्री का सबसे कठिन हिस्सा है और यहाँ विनम्रता ज़रूरी है। संदर्भ को देखते हुए सबसे सम्भावित अर्थ यह है कि यूहन्ना उन लोगों की बात कर रहे हैं जो मंडली छोड़कर गए और जिन्होंने जानबूझकर, पूरी जानकारी के साथ मसीह के विषय में सत्य को ठुकरा दिया। ऐसा जान-बूझकर किया गया अंतिम इनकार मृत्यु की ओर ले जाता है। यूहन्ना यह नहीं कहते कि ऐसे लोगों के लिए प्रार्थना मना है; वे केवल इतना कहते हैं कि वे उस विषय में प्रार्थना करने का आदेश नहीं दे रहे।
क्या 1 यूहन्ना 5:7 में त्रिएकत्व का प्रमाण है?
हिंदी की कुछ पुरानी बाइबलों में इस पद में स्वर्ग में गवाही देने वाले तीन का उल्लेख मिलता है। प्राचीनतम यूनानी हस्तलिपियों में यह वाक्य नहीं है और यह बहुत बाद में लैटिन परंपरा से आया, इसलिए अधिकांश आधुनिक अनुवाद इसे पाद-टिप्पणी में रखते हैं। इससे त्रिएकत्व की शिक्षा को कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि वह शिक्षा इस एक पद पर नहीं, बल्कि पूरे नए नियम की गवाही पर टिकी है, जिसमें स्वयं यह पत्री पिता, पुत्र और आत्मा तीनों के काम का साफ़ वर्णन करती है।
क्या 1 यूहन्ना की तीन कसौटियाँ उद्धार कमाने का तरीका हैं?
बिलकुल नहीं, और यह पत्री को समझने की कुंजी है। यूहन्ना हर बार क्रम उलटकर रखते हैं: पहले परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया, इसलिए हम प्रेम करते हैं; पहले हम परमेश्वर से जन्मे, इसलिए उनका बीज हममें बना रहता है। कसौटियाँ प्रवेश-परीक्षा नहीं, जीवन के लक्षण हैं। जो व्यक्ति इन्हें अपने भीतर कमज़ोर पाकर घबराता है, उसके लिए पत्री का उत्तर दोगुनी कोशिश नहीं, बल्कि उस सहायक की ओर लौटना है जो पिता के पास हमारे लिए खड़ा है।
अंत में
1 यूहन्ना की पत्री हमें एक सुंदर विचार नहीं थमाती, यह हमारे हाथ में एक नींव का पत्थर रखती है। इसे उन लोगों के लिए लिखा गया था जिनकी मंडली टूट चुकी थी, जिनके भरोसेमंद साथी चले गए थे, और जिन्हें कहा गया था कि वे पीछे छूटे हुए दूसरे दर्जे के विश्वासी हैं। यूहन्ना उन्हें गुप्त ज्ञान नहीं देते, वे उन्हें देहधारी मसीह दिखाते हैं, उसका लहू, उसकी ज्योति और पिता का वह प्रेम जिसने हमें सन्तान कहा। और वे जोड़ते हैं, हम हैं भी।
अगर आप संदेह से थके हैं, तो इस पत्री को अपनी अदालत की तरह नहीं, अपने चरवाहे की तरह पढ़िए। 1 यूहन्ना 1:7 आपको उजाले में बुलाता है, 1 यूहन्ना 1:9 वहाँ सफ़ाई देता है, 1 यूहन्ना 3:1 आपको परिवार का नाम देता है, 1 यूहन्ना 4:8 उस परिवार के मुखिया का स्वभाव बताता है, और 1 यूहन्ना 5:13 आपके हाथ में निश्चय थमा देता है।
अब एक सप्ताह लेकर इसे ऊपर दी गई योजना से पढ़िए, साथ में यूहन्ना का सुसमाचार खोलिए, और हर दिन यही प्रश्न पूछिए कि परमेश्वर यहाँ कैसे दिख रहे हैं। जो प्रेम क्रूस पर मापा गया, वही आज आपके डर से बड़ा है।
