परमेश्वर बुलाता है, अनुग्रह से भरता है
बुलाहट और अनुग्रह
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए निर्गमन 3:10, यूहन्ना 1:29, 1 राजा 3:5 and रोमियों 11:24.
☀ सुबह का पल
इसलिए आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए।” (प्रेरि. 7:34)
निर्गमन 3:10
मूसा के पैरों तले रेत अब भी गरम है; उसने जूते उतार दिए हैं, और सामने की झाड़ी जल रही है पर जलकर राख नहीं होती। कहीं दूर भेड़ें मिमिया रही हैं, वही भेड़ें जिन्हें वह अब चालीस साल से मिद्यान के रेगिस्तान में चराता आया है।
यह वही मूसा है जो कभी महल में पला, फिर एक मिस्री को मारकर भाग निकला, और अब अपने ससुर की भेड़ें चराने वाला एक वृद्ध चरवाहा है। मिस्र की याद उसके भीतर अब भी कड़वी होगी, असफलता की, भागने की। और ठीक इसी आदमी से परमेश्वर कहते हैं, जा, फिरौन के पास जा, और मेरी प्रजा को निकाल ला।
तब मूसा के मुँह से वह प्रश्न निकलता है जो हर पीढ़ी में कभी न कभी गूँजता है, मैं कौन हूँ, कि जाऊँ? यह विनम्रता का दिखावा नहीं है; यह उसका अपना हिसाब है, अपनी उम्र, अपनी असफलता, अपने डर का। वह जानता है कि वह इस काम के योग्य नहीं है, और वह सही है।
आज सुबह भी शायद यही प्रश्न किसी के भीतर उठता है, काम पर जाने से पहले, किसी ज़िम्मेदारी के सामने, किसी कठिन बातचीत से पहले। मैं कौन हूँ। यह प्रश्न बुरा नहीं है। परमेश्वर इसे रोकते नहीं, इसका सामना करते हैं, और अपने नाम से उत्तर देना शुरू करते हैं, न मूसा की योग्यता से।
आज
आज सुबह जब तैयार होते समय यह सवाल मन में उठे, तो उसे दबाओ मत। घर से निकलने से पहले ज़ोर से कहो, मैं कौन हूँ, कि जाऊँ, और फिर रुककर यह भी जोड़ो, पर तू मेरे साथ होगा।
✦ दोपहर का पल
दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप हरता है। (1 पत. 1:19, यशा. 53:7)
यूहन्ना 1:29
12:40 बज रहे हैं। कैंटीन की मेज पर आधा खाया हुआ सैंडविच पड़ा है, फोन पर पाँच अनपढ़े संदेश चमक रहे हैं, और सामने वाली कुर्सी पर बैठा सहकर्मी जल्दी-जल्दी शाम की मीटिंग के बारे में बता रहा है। मन अभी भी सुबह के काम में अटका है।
निर्गमन में परमेश्वर ने इस्राएल से कहा कि वे दसवें दिन एक मेमना चुन लें, पर उसे चौदहवें दिन तक अपने घर में ही रखें। चार दिन तक वह परिवार के बीच रहता, और हर दिन उसे ध्यान से देखा जाता कि उसमें कोई दोष तो नहीं। यह मेमना अजनबी नहीं था, वह घर का हिस्सा बन चुका था, फिर भी निर्दोष पाया गया।
जब यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने यीशु को आते देखा, उसने उसी भाषा का इस्तेमाल किया, 'देखो, परमेश्वर का मेम्ना।' एक ऐसा मेमना जो हमारे बीच आकर रहा, हमें जानते हुए, और फिर भी बिना दोष पाया गया, और अपने आप को चढ़ा दिया।
दोपहर का यह ब्रेक भी एक तरह की जाँच का पल बन सकता है, अपने मन को, अपने काम को ध्यान से देखने का, बिना डरे, क्योंकि निर्दोषता का भार अब यीशु पर है।
आज
अभी एक कागज़ पर लिखें, 'परमेश्वर का मेम्ना, जो मेरा पाप उठा ले गया', और उसे अपनी डेस्क पर, स्क्रीन के पास रख दें ताकि दोपहर बाद के काम में आपकी नज़र उस पर पड़े।
◐ दोपहर का पल
In Gibeon Yahweh appeared to Solomon in a dream by night; and God said, "Ask what I shall give you."
1 राजा 3:5
गिबोन के ऊंचे स्थान पर रात घनी थी। युवा राजा अभी-अभी हज़ार होम-बलियां चढ़ा चुका था, थका हुआ, और शायद भीतर से डरा हुआ भी। एक पूरा राज्य उसके कंधों पर आ गया था, और वह जानता था कि यह बोझ उसकी उम्र से बड़ा है।
जब परमेश्वर ने पूछा, 'माँग, मैं तुझे क्या दूं', तो सुलैमान ने वह नहीं माँगा जो हर राजा माँगता। लंबी उम्र नहीं, धन नहीं, शत्रुओं पर विजय नहीं। उसने माँगा सुनने वाला हृदय। मूल भाषा में यह शब्द केवल बुद्धि नहीं बल्कि खुला कान बताता है, वह कान जो अपनी राय से पहले दूसरे की बात को जगह देता है।
यह माँगना आसान नहीं था। सुलैमान खुद कहता है कि वह नहीं जानता कि कैसे बाहर जाना या भीतर आना है, कि उसके सामने एक प्रजा है जिसे गिनना भी कठिन है। यह स्वीकार करना कि तुम्हारी भूमिका तुमसे बड़ी है, हर दिन का काम नहीं है।
आज भी हम ऐसी जगहों पर खड़े होते हैं जहाँ हमारा निर्णय हमसे बड़ा लगता है, एक बैठक, एक घर का फैसला, किसी के दर्द का जवाब। वहाँ पहली इच्छा होती है तेज़ दिमाग माँगने की, एक चाल, एक तर्क जो जीत दिलाए। सुलैमान ने उससे अलग कुछ माँगा, एक कान जो बंद न हो।
आज
वह निर्णय लिख लो जो आज तुम्हें लेना है, और उसके नीचे यह वाक्य लिख दो, 'प्रभु, मुझे सुनने वाला हृदय दे।' इस कागज़ को वहाँ रखो जहाँ निर्णय लेते समय तुम्हारी नज़र उस पर पड़े।
☾ संध्या का क्षण
क्योंकि यदि तू उस जैतून से, जो स्वभाव से जंगली है, काटा गया और स्वभाव के विरुद्ध अच्छी जैतून में साटा गया, तो ये जो स्वाभाविक डालियाँ हैं, अपने ही जैतून में साटे क्यों न जाएँगे।
रोमियों 11:24
एक पेड़ अपनी जड़ों से पहचाना जाता है, यह मान लिया जाता है कि जिस डाली का जन्म जिस तने पर हुआ, वह उम्र भर वहीं की रहेगी। पौलुस की तस्वीर में यह सीधा नियम ही पलट दिया जाता है।
उस समय के किसान जैतून के पेड़ों को अच्छी तरह जानते थे। खेती किया हुआ जैतून का पेड़ वर्षों तक फल देता, जबकि जंगली जैतून छोटे, कड़वे फल देता था पर उसकी जड़ें मज़बूत होती थीं। इसलिए आम चलन यही था कि खेती वाली डाली को जंगली जड़ पर जोड़ा जाए, ताकि वह जड़ की ताकत पा सके। पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने इसके ठीक उल्टा किया, जंगली डाली को खेती वाले पेड़ में जोड़ दिया। यह प्रकृति के विरुद्ध था, और इसीलिए यह अनुग्रह था।
शाम के इस क्षण में यही बात थम कर सुनने लायक है। जिस जड़ ने आज दिन भर मुझे थामे रखा, वह मेरी अपनी जड़ नहीं थी। मैं वहाँ जोड़ा गया, कलम की तरह, ऐसी शाख जो अपने बल पर वहाँ नहीं पहुँची।
दिन के काम, थकान, छोटी-छोटी असफलताएँ, सब कुछ उस जड़ पर टिककर ही सहा गया, न कि अपने बल पर।
आज
आज रात एक कागज़ पर अपना नाम लिखें और उसके नीचे लिखें, मैं जड़ पर खड़ा हूँ, जड़ मुझ पर नहीं। उस कागज़ को अपनी बाइबल में रख दें और सोकर विश्राम करें।
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10इसलिए आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए।” (प्रेरि. 7:34)
29दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप हरता है। (1 पत. 1:19, यशा. 53:7)
24क्योंकि यदि तू उस जैतून से, जो स्वभाव से जंगली है, काटा गया और स्वभाव के विरुद्ध अच्छी जैतून में साटा गया, तो ये जो स्वाभाविक डालियाँ हैं, अपने ही जैतून में साटे क्यों न जाएँगे।
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