बाइबल पुस्तक

न्यायियों की पुस्तक: पाप, दण्ड और छुड़ानेवालों का चक्र

परिचय

एक आदमी अंगूर के कुंड में छिपकर गेहूँ झाड़ रहा है। सोचिए कि यह दृश्य कितना बेतुका है: गेहूँ खुले खलिहान में झाड़ा जाता है, जहाँ हवा भूसी उड़ा ले जाती है। पर यह आदमी एक गड्ढेनुमा कुंड में, पसीने में नहाया हुआ, डर के मारे अपनी फसल बचा रहा है, क्योंकि मिद्यानी टिड्डियों की तरह देश पर टूट पड़ते हैं। और ठीक उसी क्षण स्वर्ग से एक दूत आकर उसे कहता है, "हे शूरवीर।"

न्यायियों की पुस्तक ऐसे ही विरोधाभासों से भरी है। यह बाइबल का सबसे गंदा, सबसे हिंसक और शायद सबसे ईमानदार हिस्सा है। यहाँ नायक टूटे हुए हैं, विश्वासी मूरतें गढ़ते हैं, और परमेश्वर बार बार उन लोगों के पास लौटते हैं जो उन्हें बार बार छोड़ देते हैं। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पुस्तक किसने, कब और क्यों लिखी, इसकी बुनावट कैसी है, इसके मुख्य पद क्या सिखाते हैं, और सबसे बढ़कर यह कि इसका असली नायक कौन है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

ज़्यादातर लोग न्यायियों की पुस्तक को एक "चक्र" कहकर समझाते हैं: पाप, दण्ड, दोहाई, छुटकारा, और फिर वही पाप। बात सच है, पर अधूरी है। ध्यान से पढ़िए तो यह गोल घूमता पहिया नहीं, नीचे की ओर उतरता सर्पिल है। हर मोड़ पर इस्राएल पहले से नीचे गिरता है, और हर न्यायी पिछले से कमज़ोर निकलता है, ओत्नीएल से लेकर शिमशोन तक। इस पुस्तक में एक ही चीज़ है जो कभी नीचे नहीं गिरती: परमेश्वर का अनुग्रह, जो हर बार उनके पीछे नीचे उतरता चला आता है। इसलिए हम न्यायियों को नायकों की गाथा नहीं, बल्कि एक सच्चे छुड़ानेवाले की बढ़ती हुई ज़रूरत के रूप में पढ़ेंगे।

बाइबल न्यायियों की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?

पुस्तक का नाम ही पहली गलतफहमी पैदा करता है। हिब्रू शब्द "शोफ़ेट" का अर्थ केवल अदालत में बैठकर फैसला सुनाने वाला नहीं है। इसमें शासन करना, व्यवस्था बहाल करना और सबसे बढ़कर छुड़ाना शामिल है। इसीलिए पुस्तक इन लोगों को बार बार "छुड़ानेवाला" कहती है। ये बारह लोग इस्राएल के राष्ट्रीय नेता नहीं थे, न ही इनका कोई सिंहासन था। ये स्थानीय, आपातकालीन, आत्मा से भरे हुए औज़ार थे जिन्हें परमेश्वर ने संकट की घड़ी में उठाया।

पुस्तक का दिल दूसरे अध्याय में खुलता है, जहाँ लेखक पूरी किताब का नक्शा एक साथ सामने रख देता है। पहले वह बताता है कि गिरावट शुरू कैसे हुई: "और उस पीढ़ी के सब लोग अपने अपने पितरों में जा मिले; और उनके बाद दूसरी पीढ़ी उत्पन्न हुई जो न तो यहोवा को जानती थी और न उस काम को जो उसने इस्राएल के लिये किया था" (न्यायियों 2:10)। एक पीढ़ी ने लाल समुद्र देखा, यरीहो की दीवारें गिरते देखीं। अगली पीढ़ी ने केवल कहानियाँ सुनीं, और फिर वे कहानियाँ भी सुनानी बंद हो गईं। विश्वास एक पीढ़ी में बनता है और एक ही पीढ़ी में खो भी सकता है।

फिर आता है वह पद जो पूरी पुस्तक की धड़कन है: "तौभी यहोवा उनके लिये न्यायी ठहराता था, और वे उन्हें लूटनेवालों के हाथ से छुड़ाते थे" (न्यायियों 2:16)। इस पद का पहला शब्द ही सुसमाचार है। "तौभी।" इससे पहले की पंक्तियों में इस्राएल बाल और अशतोरेत की पूजा कर रहा है, परमेश्वर का क्रोध भड़क उठा है, वे शत्रुओं के हाथ बेच दिए गए हैं। और तब, जब कहानी का अंत होना चाहिए था, परमेश्वर एक छुड़ानेवाला खड़ा करते हैं। इस्राएल ने उसे माँगा नहीं था; उन्होंने केवल कराहना शुरू किया था।

यही बात पहले न्यायी के साथ ठोस रूप में दिखाई देती है: "तब इस्राएलियों ने यहोवा की दोहाई दी, और उसने इस्राएलियों के लिये एक छुड़ानेवाला ठहराया, अर्थात् कालेब के छोटे भाई कनज के पुत्र ओत्नीएल को, और उसी ने उनको छुड़ाया" (न्यायियों 3:9)। ध्यान दीजिए कि पद में इस्राएल के पश्चाताप का कोई वर्णन नहीं है। वहाँ केवल दर्द की चीख है। परमेश्वर एक सुधरी हुई प्रजा का इंतज़ार नहीं करते; वे एक कराहती हुई प्रजा की सुनते हैं।

दोहाई प्रार्थना नहीं थी, फिर भी परमेश्वर ने सुनी।

पुस्तक का अंतिम वाक्य इस पूरी कहानी का निदान है: "उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा न था; जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" (न्यायियों 21:25)। यह केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं है। यह एक आत्मिक निदान है। जब परमेश्वर की व्यवस्था की जगह "मुझे जो ठीक लगे" ले लेता है, तब धर्म बचा रह सकता है पर सत्य मर जाता है। इन्हीं अध्यायों में लोग याजक रखते हैं, मन्नतें मानते हैं, बलि चढ़ाते हैं और परमेश्वर का नाम लेते हैं; फिर भी सब कुछ सड़ चुका है। धार्मिक भाषा और आज्ञाकारिता एक चीज़ नहीं हैं।

तो बाइबल इस पुस्तक के बारे में क्या कहती है? यह कहती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या बाहरी शत्रु नहीं, भीतर का भटकता हुआ मन है; और परमेश्वर की सबसे बड़ी महिमा यह है कि वे ऐसे मन वाले लोगों के बीच बने रहते हैं।

लेखक, समय और पृष्ठभूमि

पुस्तक अपने लेखक का नाम नहीं बताती। यहूदी परंपरा, खासकर तल्मूद का बाबा बत्रा खंड, शमूएल नबी को लेखक मानती है, और यह अनुमान बेबुनियाद नहीं है। शमूएल वही कड़ी है जो न्यायियों के युग को राजाओं के युग से जोड़ती है; वह अंतिम न्यायी और पहला राजा-अभिषेक करनेवाला दोनों था। फिर भी पुस्तक के भीतर कुछ संकेत बताते हैं कि अंतिम रूप इसे बाद में मिला होगा। "उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा न था" ऐसा वही लिखेगा जिसके दिनों में राजा था। अध्याय एक में यबूसियों के यरूशलेम में बने रहने का ज़िक्र "आज के दिन तक" कहकर किया गया है, जो दाऊद द्वारा यरूशलेम जीतने से पहले की स्थिति दिखाता है। अध्याय अठारह में "देश की बँधुआई" का उल्लेख और भी बाद की ओर इशारा कर सकता है। ईमानदारी से कहें तो लेखक का नाम हमें नहीं पता, और यह कोई कमी नहीं है। पुस्तक की सत्ता उसके गुमनाम लेखक पर नहीं, उस पवित्र आत्मा पर टिकी है जिसने उसे प्रेरित किया।

समय की बात करें तो न्यायियों का युग यहोशू की मृत्यु से लेकर शमूएल और शाऊल के उदय तक फैला है। यिप्तह अम्मोनियों के राजा से कहता है कि इस्राएल को उस इलाके में बसे हुए तीन सौ वर्ष हो चुके हैं (न्यायियों 11:26), और यह संख्या हमें एक मोटा अंदाज़ा देती है। पुस्तक में दिए गए वर्षों को जोड़ने पर कुल लगभग चार सौ वर्ष बनते हैं, पर यह जोड़ सीधा नहीं है, क्योंकि कई न्यायी अलग अलग क्षेत्रों में एक ही समय काम कर रहे थे। विद्वान मुख्यतः दो तिथियों के बीच बँटे हैं: एक धारा मिस्र से निकास को लगभग 1446 ईसा पूर्व मानकर न्यायियों का युग लगभग 1375 से 1050 ईसा पूर्व तक रखती है; दूसरी धारा बाद के निकास को मानते हुए इसे लगभग 1200 से 1050 ईसा पूर्व तक सीमित करती है। दोनों ही स्थितियों में तस्वीर एक जैसी है: कई सदियों का एक लंबा, अस्थिर, बिखरा हुआ दौर।

पृष्ठभूमि समझे बिना यह पुस्तक निर्दयी लगती है। इस्राएल तब कोई राष्ट्र-राज्य नहीं था, बल्कि बारह गोत्रों का ढीला संघ था, जिनकी एकता का आधार केवल वाचा और मिलापवाला तम्बू था। कोई स्थायी सेना नहीं, कोई राजधानी नहीं, कोई कर व्यवस्था नहीं। चारों ओर कनानी नगर-राज्य थे, जिनके पास लोहे के रथ थे और जिनका धर्म खेती से जुड़ा था। बाल को वर्षा और उर्वरता का देवता माना जाता था, और अशेरा की पूजा में यौन अनुष्ठान शामिल थे। एक किसान परिवार के लिए यह प्रलोभन बहुत व्यावहारिक था: यहोवा ने हमें मिस्र से निकाला, यह ठीक है, पर अगले साल बारिश कौन देगा? यहीं से समन्वयवाद शुरू हुआ, यानी यहोवा को छोड़ना नहीं, बल्कि उनके साथ साथ बाल को भी रखना। परमेश्वर इसी बँटे हुए मन को व्यभिचार कहते हैं।

इसी दौर में पश्चिमी तट पर पलिश्ती बस रहे थे, पूर्व में मोआबी और अम्मोनी दबाव डाल रहे थे, और दक्षिण-पूर्व से मिद्यानी ऊँटों पर सवार होकर छापे मार रहे थे। गिदोन का अंगूर के कुंड में छिपना इसी दुनिया का चित्र है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

न्यायियों की पुस्तक कैनन में अकेली खड़ी नहीं है। यहोशू की पुस्तक विजय के जयघोष पर समाप्त होती है; न्यायियों की पुस्तक दिखाती है कि वह विजय अधूरी छोड़ दी गई और अधूरी आज्ञाकारिता समय के साथ पूरी गुलामी बन जाती है। हिब्रू बाइबल में इसे "पूर्व नबियों" में गिना जाता है, क्योंकि यह इतिहास केवल घटनाएँ नहीं बताता, वह उपदेश देता है। इसके तुरंत बाद रूत की पुस्तक आती है, जो अपने पहले ही वाक्य में कहती है कि यह सब "न्यायियों के दिनों में" हुआ। यह जानबूझकर रखा गया विरोधाभास है: जिस युग में एक लेवीय अपनी रखैल के टुकड़े कर देता है, उसी युग में बोअज़ नाम का एक आदमी एक परदेशी स्त्री को छुड़ाता है, और उसी वंश से दाऊद और अंततः यीशु मसीह आते हैं। अंधकार के बीच परमेश्वर चुपचाप मसीह की वंशावली बुन रहे थे।

पुराने नियम में यह सूत्र बार बार लौटता है। भजन 106 पूरे चक्र को संक्षेप में दोहराता है और बताता है कि परमेश्वर ने उनके कराहने को सुनकर अपनी वाचा याद की। शमूएल अपने विदाई भाषण में इस्राएल को यरुब्बाल, यिप्तह और दूसरों की याद दिलाकर कहता है कि छुटकारा हमेशा ऊपर से आया, कभी उनकी ताकत से नहीं। नहेमायाह अध्याय नौ की लंबी प्रार्थना में यही ढाँचा दोहराया जाता है: वे बिगड़े, वे सौंपे गए, वे चिल्लाए, परमेश्वर ने छुड़ानेवाले भेजे। यह केवल इस्राएल का इतिहास नहीं, मानव हृदय का नक्शा है।

नया नियम इस पुस्तक को भूलता नहीं। पौलुस अन्ताकिया की सभा में इस्राएल के इतिहास का सारांश देते हुए न्यायियों के युग का उल्लेख करता है और शमूएल तक की रेखा खींचता है। और इब्रानियों का लेखक इन टूटे हुए लोगों को विश्वास के साक्षियों में गिनता है: "अब और क्या कहूँ? क्योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन और बाराक और शिमशोन और यिप्तह और दाऊद और शमूएल और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूँ" (इब्रानियों 11:32)। यह सूची चौंकाने वाली है। जिस गिदोन ने एफोद बनाकर इस्राएल को फँसाया, जिस यिप्तह ने मूर्खतापूर्ण मन्नत मानी, जिस शिमशोन ने अपनी हर शपथ तोड़ी, वे सब यहाँ विश्वास के लिए सराहे जाते हैं। क्यों? क्योंकि परमेश्वर उन्हें उनकी उपलब्धियों से नहीं, उस भरोसे से आँकते हैं जिसने उन्हें अपनी कमज़ोरी के बावजूद उनकी ओर मुड़ने पर मजबूर किया। अनुग्रह योग्यता का इनाम नहीं है।

और यहीं सर्पिल अपने अंत तक पहुँचता है। हर न्यायी ने थोड़े समय के लिए छुड़ाया और फिर मर गया, और उसके मरते ही लोग पहले से बदतर हो गए। पुस्तक अपनी ही विफलता की घोषणा करते हुए खत्म होती है, मानो चिल्लाकर कह रही हो कि हमें एक और ओत्नीएल नहीं चाहिए, हमें एक ऐसा राजा चाहिए जो मरे नहीं। यीशु मसीह वही राजा और वही न्यायी हैं। शिमशोन ने अपनी मृत्यु में शत्रुओं को मारा; मसीह ने अपनी मृत्यु में शत्रु को नाश किया और अपने लोगों को जीवित किया। और वे फिर कभी नहीं मरते।

रचना और मुख्य विषय

पुस्तक की बुनावट बेहद सोची समझी है और तीन हिस्सों में बँटी है। पहला हिस्सा, अध्याय एक से लेकर तीन के छठे पद तक, दोहरी भूमिका है। पहली भूमिका सैन्य है: गोत्र एक एक करके बताते हैं कि उन्होंने कनानियों को "नहीं निकाला।" यहूदा से शुरुआत सफलता के साथ होती है, फिर बिन्यामीन चूकता है, फिर मनश्शे, एप्रैम, जबूलून, आशेर, नप्ताली, और अंत में दान गोत्र इतना कमज़ोर पड़ता है कि एमोरी उसे पहाड़ों पर खदेड़ देते हैं। सूची का क्रम ही एक ढलान है। दूसरी भूमिका आत्मिक है: अध्याय दो में परमेश्वर का दूत बोखीम में आकर अभियोग लगाता है, पीढ़ी बदलती है, और पूरा चक्र पहले से बता दिया जाता है।

दूसरा और सबसे बड़ा हिस्सा, अध्याय तीन के सातवें पद से लेकर सोलहवें अध्याय तक, बारह न्यायियों की कहानियाँ सुनाता है। छह के बारे में विस्तार से लिखा गया है: ओत्नीएल, एहूद, दबोरा और बाराक, गिदोन, यिप्तह और शिमशोन। छह का ज़िक्र केवल कुछ पंक्तियों में है: शमगर, तोला, याईर, इबसान, एलोन और अब्दोन। बीच में अबीमेलेक की कहानी है, जो न्यायी नहीं बल्कि स्वयंभू राजा है, और जिसका खूनी अंत बताता है कि इस्राएल अपनी पसंद का राजा चुनेगा तो क्या होगा।

यहीं इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण सबसे साफ दिखता है। ओत्नीएल आदर्श है; उसके बारे में एक भी नकारात्मक बात नहीं लिखी गई। एहूद छल से काम लेता है। बाराक बिना दबोरा के जाने से इनकार करता है और महिमा खो देता है। गिदोन चिन्ह पर चिन्ह माँगता है, और जीत के बाद एक एफोद बनाता है जो इस्राएल के लिए फंदा बन जाता है; वह राजपद ठुकराते हुए कहता है, "मैं तुम्हारे ऊपर प्रभुता न करूँगा, और न मेरा पुत्र तुम्हारे ऊपर प्रभुता करेगा; यहोवा ही तुम पर प्रभुता करेगा" (न्यायियों 8:23), और फिर अपने बेटे का नाम अबीमेलेक रखता है, जिसका अर्थ है "मेरा पिता राजा है।" यिप्तह परमेश्वर से सौदेबाज़ी करता है और उसकी जल्दबाज़ी में मानी गई मन्नत उसकी इकलौती बेटी को निगल जाती है; उसके बाद वह अपने ही भाइयों, एप्रैमियों, का संहार करता है। और शिमशोन? वह कभी कोई सेना नहीं जुटाता, कभी राष्ट्र को नहीं बुलाता, केवल अपनी निजी रंजिशें लड़ता है और एक पलिश्ती स्त्री की गोद में अपना रहस्य गँवा देता है। लोगों की प्रतिक्रिया भी गिरती जाती है: शुरू में वे यहोवा की दोहाई देते हैं, पर शिमशोन के दिनों में यहूदा के लोग खुद उसे बाँधकर पलिश्तियों के हवाले कर देते हैं। वे अपनी गुलामी से इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि छुटकारा उन्हें असुविधा लगने लगा।

तीसरा हिस्सा, अध्याय सत्रह से इक्कीस तक, दोहरी उपसंहार है और इसमें कोई न्यायी नहीं है। पहले मीका की घरेलू मूरतें और दान गोत्र की लूटपाट, जहाँ मूसा का अपना वंशज मूर्तिपूजा का याजक बन जाता है। फिर गिबा की वह भयावह रात, जिसकी भाषा जानबूझकर सदोम की कहानी जैसी रखी गई है, और उसके बाद बिन्यामीन गोत्र का लगभग पूरा विनाश। इस्राएल कनानियों को निकालने आया था; अब वह खुद कनानी बन चुका था। दोनों उपसंहारों को एक ही टेक बाँधती है: इस्राएल में कोई राजा न था।

मुख्य विषय इसी ढाँचे से उभरते हैं: अधूरी आज्ञाकारिता का धीमा ज़हर, समन्वयवाद, परमेश्वर की आत्मा का अप्रत्याशित काम, स्त्रियों की स्थिति जो राष्ट्र के आत्मिक स्वास्थ्य का थर्मामीटर बन जाती है, और सबसे ऊपर, वह अनुग्रह जो चक्र दर चक्र नीचे उतरता चला आता है।

इस पुस्तक के मुख्य पद

"तौभी यहोवा उनके लिये न्यायी ठहराता था, और वे उन्हें लूटनेवालों के हाथ से छुड़ाते थे" (न्यायियों 2:16)। यह पुस्तक का धुरी-पद है। क्रिया पर ध्यान दीजिए: परमेश्वर "ठहराता था।" न्यायी चुनाव से नहीं आए, वंश से नहीं आए, योग्यता से नहीं आए। एक बाएँ हाथ वाला, एक स्त्री, एक डरा हुआ किसान, एक वेश्या का बेटा, एक ज़िद्दी पहलवान। परमेश्वर ने हर बार वह व्यक्ति चुना जिसे दुनिया ने पहले ही खारिज कर दिया था, ताकि छुटकारे का श्रेय किसी इंसान के खाते में न जाए। और यह सब तब हुआ जब इस्राएल ने अभी अपना जीवन सुधारा भी नहीं था। यह पद हमें सिखाता है कि छुटकारा हमेशा ऊपर से नीचे की ओर बहता है।

"यहोवा के दूत ने उसे दर्शन देकर कहा, हे शूरवीर, यहोवा तेरे संग है" (न्यायियों 6:12)। बाइबल में शायद ही कोई अभिवादन इतना असंगत लगता हो। गिदोन उस समय शूरवीर नहीं था; वह छिपा हुआ, शिकायत करता हुआ, अपने गोत्र को सबसे कंगाल और खुद को सबसे छोटा कहता हुआ आदमी था। परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जो वह अभी नहीं था, पर जो वह उनके वचन के कारण बन जाएगा। यही परमेश्वर का तरीका है: वे पहले घोषणा करते हैं, फिर उस घोषणा को पूरा करते हैं। और वाक्य का असली वज़न उसके दूसरे हिस्से में है, "यहोवा तेरे संग है।" गिदोन की वीरता कभी उसके भीतर नहीं थी; वह उस उपस्थिति में थी जो उसके साथ चल रही थी। इसीलिए परमेश्वर ने उसकी सेना बत्तीस हज़ार से घटाकर तीन सौ कर दी। परमेश्वर संख्या घटाते हैं ताकि महिमा न बँटे।

"उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा न था; जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" (न्यायियों 21:25)। पुस्तक किसी हल पर नहीं, एक खुली चोट पर समाप्त होती है। यह अंत असफल नहीं, जानबूझकर अधूरा है। लेखक चाहता है कि पाठक किताब बंद करते समय बेचैन हो और पूछे, तो फिर आगे क्या? उत्तर अगली पुस्तकों में आता है, पहले दाऊद के रूप में और अंततः उस राजा के रूप में जिसका राज्य कभी खत्म नहीं होता। जब तक हृदय पर कोई सच्चा राजा नहीं बैठता, "मुझे जो ठीक लगता है" ही हमारा एकमात्र नियम बना रहेगा, और वह नियम हमेशा गिबा की ओर ले जाता है।

दर्पण

आप शायद न्यायियों की पुस्तक को इसलिए टालते हैं कि वह बहुत खूनी लगती है। पर सच यह है कि वह बहुत परिचित लगती है, और यही असहज करता है। आपने भी वह प्रार्थना की है जो संकट में की जाती है और राहत मिलते ही भुला दी जाती है। वह कर्ज़, वह जाँच रिपोर्ट, वह टूटता रिश्ता, जब सब ठीक हो गया तो बाइबल फिर उसी अलमारी में चली गई। यही इस्राएल ने किया। चक्र हर बार बाहरी शत्रु से नहीं, भीतर की सुविधा से शुरू होता है।

अपने जीवन के उन कोनों के बारे में सोचिए जहाँ आपने कनानियों को "निकाला नहीं," बस उनके साथ रहना सीख लिया। वह आदत जिसे आप प्रबंधित करते हैं पर छोड़ते नहीं। वह गुस्सा जिसे परिवार झेलना सीख गया है। वह फ़ोन जो रात के दो बजे आपके विवेक को खा जाता है। वह बेईमानी जो दफ़्तर में सब करते हैं इसलिए अब पाप नहीं लगती। न्यायियों की पुस्तक कहती है कि जिसे आप खत्म नहीं करते, वह अंततः आपको खत्म करता है। जो छोड़ा गया शत्रु है, वह कुछ सालों में मालिक बन जाता है।

और फिर गिदोन का वह अंगूर का कुंड है। आप भी शायद किसी कुंड में छिपकर काम कर रहे हैं, यह सोचते हुए कि आपका परिवार मामूली है, आपकी शिक्षा कम है, आपका अतीत गंदा है, आपकी उम्र निकल चुकी है। परमेश्वर उस कुंड में उतरकर आपको वह नाम देते हैं जो आपने खुद को कभी नहीं दिया। वे आपकी आत्म-छवि से बहस नहीं करते; वे उसे बदल देते हैं।

पर सबसे गहरी बात यह है: इस पुस्तक में कोई भी इंसान बचाने लायक नहीं था, और सब बचाए गए। अगर आप आज यह सोचकर परमेश्वर से दूर खड़े हैं कि इस बार आपने हद पार कर दी है, तो न्यायियों की पुस्तक आपके लिए लिखी गई है। कराहना शुरू कीजिए। वे पहले से सुन रहे हैं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को न्यायियों की पुस्तक समझाना कठिन लगता है, क्योंकि इसमें बहुत खून, बहुत धोखा और कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जो किसी भी उम्र में भारी पड़ती हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि यह पुस्तक बच्चों से छिपा दी जाए। इसका मतलब यह है कि हम सही कहानी, सही शब्दों में, सही उम्र पर सुनाएँ।

सबसे आसान रास्ता पुस्तक का बड़ा ढाँचा है, जिसे बच्चे चार कदमों में आसानी से पकड़ लेते हैं: परमेश्वर के लोग उन्हें भूल गए, मुसीबत आई, उन्होंने मदद के लिए पुकारा, और परमेश्वर ने किसी को भेजकर उन्हें बचाया। फिर यही बात दोबारा हुई, और फिर दोबारा। छोटे बच्चों से आप पूछ सकते हैं, "क्या तुम्हें लगता है परमेश्वर थक गए होंगे?" और फिर बता सकते हैं कि वे कभी नहीं थके, और आखिर में उन्होंने सबसे बड़ा बचानेवाला भेजा, यीशु मसीह, जो कभी नहीं मरते और हमें हमेशा के लिए बचाते हैं।

गिदोन की कहानी छोटे बच्चों के लिए सबसे अच्छी शुरुआत है, क्योंकि उसमें डर, भरोसा और परमेश्वर की ताकत साफ दिखती है। दबोरा की कहानी साहस सिखाती है। शिमशोन की कहानी थोड़े बड़े बच्चों के लिए रखें, क्योंकि वह असल में ताकत की नहीं, गलत चुनावों की कहानी है।

हमारी वेबसाइट पर इस पुस्तक की अलग अलग उम्र के अनुसार तैयार की गई व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह वर्ष), प्राथमिक स्कूल के बच्चों के लिए (सात से बारह वर्ष), और किशोरों के लिए (बारह वर्ष से ऊपर), जहाँ कठिन अध्यायों को भी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ समझाया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

न्यायियों की पुस्तक किसने लिखी?

पुस्तक गुमनाम है और अपने लेखक का नाम कहीं नहीं बताती। प्राचीन यहूदी परंपरा शमूएल नबी को लेखक मानती है, क्योंकि वे ही न्यायियों के युग और राजाओं के युग के बीच की कड़ी थे। पुस्तक के भीतर कुछ टिप्पणियाँ, जैसे बार बार दोहराया गया वाक्य कि उन दिनों इस्राएल में कोई राजा न था, बताती हैं कि अंतिम रूप राजतंत्र के आरंभ के बाद दिया गया। इसलिए कई विद्वान मानते हैं कि इसमें पुरानी सामग्री है जिसे बाद में एक प्रेरित संपादक ने संकलित किया। नाम का न पता होना पुस्तक की विश्वसनीयता को कम नहीं करता।

"न्यायी" शब्द का असली अर्थ क्या है?

हिब्रू शब्द "शोफ़ेट" का अर्थ केवल अदालत में फैसला सुनाने वाला नहीं है। इसमें शासन करना, न्याय बहाल करना और खासकर दमन से छुड़ाना शामिल है। इसीलिए न्यायियों 3:9 जैसे पदों में इन्हें सीधे "छुड़ानेवाला" कहा गया है। ये लोग स्थायी पदाधिकारी नहीं थे, न ही इनका कोई सिंहासन या उत्तराधिकारी था। परमेश्वर संकट के समय इन्हें उठाते थे, वे अपने क्षेत्र को छुड़ाते थे, और उनके जीवनकाल में देश में शान्ति बनी रहती थी। दबोरा अपवाद थीं, जो सचमुच न्याय भी करती थीं और लोग अपने विवाद लेकर उनके पास आते थे।

न्यायियों की पुस्तक कितने समय का इतिहास बताती है?

यह युग यहोशू की मृत्यु से शुरू होकर शमूएल और राजतंत्र की शुरुआत तक चलता है। यिप्तह स्वयं कहता है कि इस्राएल को उस क्षेत्र में तीन सौ वर्ष हो चुके हैं (न्यायियों 11:26)। पुस्तक में दिए गए सभी वर्षों को जोड़ने पर लगभग चार सौ वर्ष बनते हैं, पर यह सीधा जोड़ भ्रामक हो सकता है, क्योंकि कई न्यायी अलग अलग गोत्रों के बीच एक ही समय में सेवा कर रहे थे। तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है, पर अधिकांश इसे लगभग 1375 से 1050 ईसा पूर्व या लगभग 1200 से 1050 ईसा पूर्व के बीच रखते हैं।

न्यायियों की पुस्तक में कुल कितने न्यायी हैं?

आमतौर पर बारह न्यायी गिने जाते हैं: ओत्नीएल, एहूद, शमगर, दबोरा, गिदोन, तोला, याईर, यिप्तह, इबसान, एलोन, अब्दोन और शिमशोन। इनमें से छह की कहानियाँ विस्तार से दी गई हैं और छह का उल्लेख केवल कुछ पंक्तियों में है। अबीमेलेक को आमतौर पर न्यायियों में नहीं गिना जाता, क्योंकि उसे परमेश्वर ने नहीं उठाया था; उसने खुद को राजा बनाया और अपने सत्तर भाइयों की हत्या की। शमूएल को भी अक्सर अंतिम न्यायी माना जाता है, हालाँकि उनकी कहानी शमूएल की पहली पुस्तक में आती है।

क्या यिप्तह ने सचमुच अपनी बेटी की बलि चढ़ा दी?

यह बाइबल के सबसे दर्दनाक और विवादित प्रश्नों में से एक है। कुछ व्याख्याकार मानते हैं कि उसने बेटी को स्थायी कुँवारेपन और मंदिर सेवा के लिए समर्पित किया, क्योंकि पाठ बार बार उसके कुँवारी रहने पर ज़ोर देता है। दूसरे, और शायद अधिक, व्याख्याकार मानते हैं कि पाठ का सीधा अर्थ वही है जो वह कहता है। ध्यान रखिए कि पुस्तक इस कार्य को कहीं स्वीकृति नहीं देती। यह उस युग की गिरावट का चित्र है, जहाँ एक अगुवा कनानी तरीके से परमेश्वर के साथ सौदा करने लगा था।

क्या शिमशोन की ताकत सचमुच उसके बालों में थी?

नहीं। उसके लंबे बाल उसके नाज़ीर समर्पण का बाहरी चिन्ह थे, ताकत का स्रोत नहीं। ताकत हमेशा यहोवा के आत्मा से आती थी, जो समय समय पर उस पर उतरता था। बाल कटने का असली अर्थ यह था कि शिमशोन ने अपने समर्पण का अंतिम अवशेष भी बेच दिया; उसने पहले ही अंगूर, शवों और शुद्धता से जुड़ी हर शपथ तोड़ दी थी। इसीलिए पाठ कहता है कि उसे पता ही नहीं था कि यहोवा उससे अलग हो चुके हैं। यही इस कहानी की सबसे डरावनी पंक्ति है।

न्यायियों 16:30 का क्या अर्थ है?

यह शिमशोन के जीवन का अंतिम दृश्य है: "और शिमशोन ने कहा, मेरा प्राण पलिश्तियों के संग जाए। तब उसने अपना सारा बल लगाकर यह बात कही; और घर उन सरदारों और उसमें के सब लोगों पर गिर पड़ा। इस प्रकार जिनको उसने मरते समय मार डाला वे उन से भी अधिक थे जिन्हें उसने अपने जीवन में मार डाला था" (न्यायियों 16:30)। यह विजय और त्रासदी दोनों है। अंधा, कैद और अपमानित शिमशोन अंततः परमेश्वर से प्रार्थना करता है और मरते समय वह काम करता है जो वह जीवन भर नहीं कर पाया। यह मसीह की ओर एक धुँधला संकेत है, जिनकी मृत्यु ही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।

न्यायियों की पुस्तक में इतनी हिंसा और क्रूरता क्यों है?

क्योंकि बाइबल मानव पाप को सजाकर नहीं दिखाती। न्यायियों की पुस्तक वर्णन करती है, अनुमोदन नहीं करती। लेवीय की रखैल, गिबा की रात, बिन्यामीन का नरसंहार, ये सब इसलिए दर्ज हैं ताकि हम देख सकें कि "जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" का नतीजा क्या होता है। लेखक इन घटनाओं पर नैतिक टिप्पणी नहीं करता, पर पूरी पुस्तक का ढाँचा स्वयं उसका फैसला है। अगर ये अध्याय पढ़कर आपको घृणा होती है, तो आपने उन्हें ठीक वैसे ही पढ़ा है जैसे पढ़ा जाना चाहिए।

न्यायियों 21:25 हमें आज क्या सिखाता है?

"उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा न था; जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" (न्यायियों 21:25)। यह वाक्य केवल राजनीतिक अराजकता की नहीं, नैतिक आत्मनिर्णय की आलोचना है। जब हर व्यक्ति अपनी भावनाओं और सुविधा को अंतिम मानक बना लेता है, तो समाज अनिवार्य रूप से टूटता है, चाहे वह धार्मिक भाषा बोलता रहे। आज की संस्कृति जिस "अपने सच को जियो" का नारा लगाती है, वह इसी पद की आधुनिक गूँज है। उत्तर यह नहीं कि कोई इंसान हम पर शासन करे, बल्कि यह कि मसीह हमारे हृदय के राजा बनें।

इब्रानियों 11:32 में गिदोन और शिमशोन जैसे लोग विश्वास के नायकों में क्यों गिने गए?

"अब और क्या कहूँ? क्योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन और बाराक और शिमशोन और यिप्तह और दाऊद और शमूएल और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूँ" (इब्रानियों 11:32)। यह सूची हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर लोगों को उनके सबसे बुरे क्षण से नहीं आँकते। इनमें से कोई भी आदर्श चरित्र नहीं था, पर हर एक ने किसी निर्णायक घड़ी में परमेश्वर के वचन पर भरोसा किया और आगे बढ़ा। नया नियम इनकी गलतियाँ छिपाता नहीं, पर उन्हें परिभाषित भी नहीं करता। यही अनुग्रह का तरीका है, और यही हमारी एकमात्र आशा भी।

न्यायियों और रूत की पुस्तक का क्या संबंध है?

रूत की पुस्तक अपने पहले ही वाक्य में कहती है कि यह घटनाएँ न्यायियों के दिनों में हुईं। यह जानबूझकर रखा गया विपरीत चित्र है। न्यायियों में हम एक लेवीय देखते हैं जो अपनी रखैल को भीड़ के हवाले कर देता है; रूत में हम बोअज़ देखते हैं, जो एक असहाय परदेशी स्त्री की रक्षा करता है और उसका छुड़ानेवाला बनता है। एक ही अंधकारमय युग में परमेश्वर चुपचाप एक वंशावली बुन रहे थे जो दाऊद तक और अंततः यीशु मसीह तक पहुँची। अंधकार कभी परमेश्वर के काम को रोक नहीं पाता।

न्यायियों की पुस्तक पढ़ना कहाँ से शुरू करें?

अध्याय दो से शुरू कीजिए, क्योंकि वहीं पूरी पुस्तक का नक्शा दिया गया है, खासकर न्यायियों 2:16 में। उसके बाद ओत्नीएल, एहूद और दबोरा की कहानियाँ पढ़िए, फिर गिदोन के चार अध्याय, फिर यिप्तह और शिमशोन। अंत में अध्याय सत्रह से इक्कीस को एक साथ पढ़िए और ध्यान दीजिए कि वहाँ कोई न्यायी नहीं है। अगर आप केवल रोचक कहानियाँ चुनकर पढ़ेंगे तो पुस्तक का असली संदेश छूट जाएगा, क्योंकि उसका संदेश उसके क्रम में छिपा है।

पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

इस पुस्तक को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है इसे चार हफ़्तों में बाँट लेना, क्योंकि जल्दबाज़ी में पढ़ने पर यह बस खूनी किस्सों का संग्रह लगती है।

पहले हफ़्ते में अध्याय एक से तीन के छठे पद तक पढ़िए और एक कागज़ पर हर उस गोत्र का नाम लिखिए जो कनानियों को "नहीं निकाल सका।" फिर रुककर पूछिए कि आपके अपने जीवन में वे कौन सी चीज़ें हैं जिनके साथ आपने समझौता कर लिया है। न्यायियों 2:10 पर ठहरिए और सोचिए कि आपके घर में अगली पीढ़ी को परमेश्वर के कामों की कहानियाँ कौन सुना रहा है।

दूसरे हफ़्ते में अध्याय तीन से आठ तक पढ़िए, यानी ओत्नीएल से गिदोन तक। यहाँ हर कहानी में चार चीज़ें खोजिए: पाप का वर्णन, शत्रु का नाम, दोहाई, और छुड़ानेवाला। गिदोन के अध्यायों में धीरे चलिए। न्यायियों 6:12 को ज़ोर से पढ़िए और अपने नाम के साथ सुनिए। फिर देखिए कि वही गिदोन अध्याय आठ के अंत तक कैसे बदल जाता है, और यह सोचिए कि सफलता किसी व्यक्ति के साथ क्या करती है।

तीसरे हफ़्ते में अध्याय नौ से सोलह तक पढ़िए। अबीमेलेक की कहानी को "मनुष्य द्वारा चुना गया राजा" के रूप में पढ़िए। यिप्तह की कहानी पढ़ते समय ध्यान दीजिए कि वह परमेश्वर को कैसे संबोधित करता है, और उसकी भाषा कितनी सौदेबाज़ी भरी है। शिमशोन के चार अध्यायों को एक बैठक में पढ़िए, और हर बार नोट कीजिए जब वह कोई नाज़ीर शपथ तोड़ता है। न्यायियों 16:30 पर रुककर पूछिए कि क्या एक टूटा हुआ जीवन भी अंत में परमेश्वर के हाथ में आ सकता है।

चौथे हफ़्ते में अध्याय सत्रह से इक्कीस तक पढ़िए, और यह सबसे कठिन हिस्सा है। इन अध्यायों को अकेले रात में पढ़ने के बजाय दिन में, शायद किसी के साथ पढ़िए। हर बार जब वह वाक्य आए कि इस्राएल में कोई राजा न था, उसे रेखांकित कीजिए। पुस्तक खत्म करने के बाद तुरंत रूत की पुस्तक पढ़िए; यह अंधेरे के बाद खिड़की खोलने जैसा है। और फिर लूका 1 के अंत में ज़कर्याह के गीत पर जाइए, जहाँ वह उस सींग की बात करता है जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों के छुटकारे के लिए खड़ा किया।

पूरी पुस्तक के दौरान तीन प्रश्न अपने पास रखिए: परमेश्वर इस कहानी में क्या कर रहे हैं, मनुष्य क्या कर रहा है, और यह दोनों मिलकर मुझे यीशु मसीह के बारे में क्या दिखाते हैं। अगर आप समूह में पढ़ रहे हैं, तो हर बैठक का अंत प्रार्थना से कीजिए जिसमें आप अपने जीवन की "अधूरी विजयों" को नाम लेकर परमेश्वर के सामने रखें।

अंत में

न्यायियों की पुस्तक चक्र की किताब नहीं, उतरती सीढ़ी की किताब है। हर मोड़ पर इस्राएल थोड़ा और नीचे जाता है, हर छुड़ानेवाला पिछले से थोड़ा और कमज़ोर निकलता है, और अंत में कोई न्यायी बचता ही नहीं, केवल एक खुला घाव और एक अनकहा प्रश्न। पर इसी उतरती सीढ़ी पर एक और आकृति चलती दिखाई देती है, जो हर बार अपने लोगों के पीछे पीछे नीचे उतरती है। परमेश्वर कभी हार मानकर पीछे नहीं हटे।

वह सर्पिल नीचे गया, पर अनुग्रह साथ उतरता रहा।

इसीलिए यह पुस्तक निराशा में नहीं, एक लालसा में छोड़ती है। जब आप इसका अंतिम पद पढ़ते हैं, तो आपका मन उस राजा को पुकारने लगता है जो मरे नहीं, जिसका न्याय दयालु हो, और जिसकी जीत स्थायी हो। वह राजा आ चुके हैं। यीशु मसीह वह छुड़ानेवाला हैं जिनकी ओर ओत्नीएल, गिदोन और शिमशोन केवल अधूरी उँगलियाँ उठाते थे।

अब आगे क्या? रूत की पुस्तक पढ़िए और देखिए कि इसी अंधकार में परमेश्वर ने कैसे एक वंशावली बुनी। फिर शमूएल की पहली पुस्तक में जाइए, जहाँ यह लालसा अपने अगले उत्तर की ओर बढ़ती है। और जब भी आप खुद को किसी पुराने पाप के चक्र में फिर से पाएँ, न्यायियों 2:16 का पहला शब्द याद कीजिए। "तौभी।" आपकी कहानी का अगला अध्याय वहीं से शुरू होता है।

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