1 कुरिन्थियों की पत्री: कलीसिया की समस्याएँ और मसीही जीवन का समाधान
परिचय
कल्पना कीजिए कि आपको एक कलीसिया की सदस्य-सभा की पूरी कार्यवाही पढ़ने को मिल जाए, वह भी बिना किसी सजावट के। गुटबाज़ी, मुकदमेबाज़ी, एक शर्मनाक यौन कांड, प्रभु भोज पर अमीरों का गरीबों को नीचा दिखाना, आराधना में अव्यवस्था, और कुछ लोग तो यह तक कह रहे हैं कि मरे हुओं का जी उठना होता ही नहीं। ऐसी कलीसिया को आप क्या लिखते? शायद एक कड़ी चिट्ठी, या इस्तीफ़ा।
पौलुस ने कुछ और किया। उन्होंने कलम उठाई और लिखा, "क्योंकि मैंने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूँ" (1 कुरिन्थियों 2:2)। बारह अलग-अलग बीमारियाँ, और डॉक्टर के बैग में एक ही दवा।
इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पत्री किसने, कब और किन हालातों में लिखी, इसका ढाँचा क्या है, इसके मुख्य विषय और पद कौन से हैं, और सबसे बढ़कर यह कि आज आपकी अपनी कलीसिया और आपके अपने घर में इसका क्या मतलब बनता है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर परिचय 1 कुरिन्थियों को "समस्याओं की सूची और उनके समाधान" की तरह पढ़ाते हैं, मानो यह कोई कलीसियाई समस्या-निवारण पुस्तिका हो। हम इसे दूसरी तरह पढ़ेंगे। पौलुस के पास बारह अलग-अलग नुस्खे नहीं थे; उनके पास एक ही मापदंड था, क्रूस पर चढ़ाया हुआ और जी उठा हुआ मसीह, जिसे उन्होंने हर समस्या पर रखकर नापा। गुटबाज़ी, मुकदमे, विवाह, मूर्तियों का भोजन, प्रभु भोज, वरदान, पुनरुत्थान; हर बार वही सवाल, "क्या यह क्रूस के अनुरूप है?"
यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि कुरिन्थुस की असली बीमारी अनैतिकता नहीं थी। असली बीमारी यह थी कि उन्होंने क्रूस को छोड़कर महिमा को पकड़ लिया था, और बाकी सब कुछ वहीं से बिगड़ा।
बाइबल 1 कुरिन्थियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?
पत्री अपने लेखक के बारे में खुद साफ़ बोलती है। पहली ही आयत में पौलुस अपने आप को "यीशु मसीह का प्रेरित" कहते हैं और सोस्थिनेस नाम के भाई को साथ जोड़ते हैं। कलीसिया के इतिहास में शायद ही किसी ने इस पत्री के पौलुस-रचित होने पर संदेह किया हो; पहली सदी के अंत तक रोम के क्लेमेंत इसे पौलुस की पत्री के रूप में कुरिन्थियों को याद दिला रहे थे।
लेकिन पौलुस इस कलीसिया के लिए कोई दूर बैठा सलाहकार नहीं थे। प्रेरितों के काम 18 बताता है कि उन्होंने कुरिन्थुस में डेढ़ साल बिताए, अक्विला और प्रिस्किल्ला के साथ तम्बू बनाने का काम किया, आराधनालय में वाद-विवाद किया, और जब विरोध बढ़ा तो अन्यजातियों की ओर मुड़ गए। ये उनके अपने आत्मिक बच्चे थे। इसीलिए यह पत्री इतनी तीखी भी है और इतनी कोमल भी।
पत्री की नींव पहले दो अध्यायों में रखी जाती है, और वही नींव बाकी पूरी इमारत को सँभालती है: "क्योंकि क्रूस की कथा नाश होनेवालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पानेवालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ्य है" (1 कुरिन्थियों 1:18)। ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि क्रूस का संदेश परमेश्वर की सामर्थ्य के बारे में बताता है। वे कहते हैं कि वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ्य है। एक सलीब पर लटका, निर्वस्त्र, शापित, हारा हुआ आदमी; यूनानी दर्शन के लिए यह बेतुका था और यहूदी अपेक्षाओं के लिए यह ठोकर थी। पौलुस इसी बेतुकेपन को कलीसिया के बीचोंबीच खड़ा कर देते हैं और कहते हैं, यहीं से नापो, सब कुछ यहीं से नापो।
यही कसौटी वे कलीसिया की पहचान पर लगाते हैं: "क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है?" (1 कुरिन्थियों 3:16)। यहाँ "तुम" बहुवचन है। पौलुस किसी अकेले विश्वासी की नहीं, पूरी मंडली की बात कर रहे हैं। जो समुदाय गुटों में बँटकर "मैं पौलुस का हूँ", "मैं अपुल्लोस का हूँ" कह रहा था, उसे बताया जा रहा है कि वह ईंट-पत्थर से बड़ा एक मंदिर है, और उस मंदिर को तोड़ना कोई छोटी बात नहीं।
वही कसौटी मेज़ पर भी लगती है: "क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो" (1 कुरिन्थियों 11:26)। प्रभु भोज कोई निजी भक्ति का क्षण नहीं, एक सार्वजनिक घोषणा है। और एक कलीसिया जो मेज़ पर अमीर-गरीब का भेद दिखाती है, वह अपने ही उपदेश को झुठला देती है।
वही कसौटी शरीर पर लगती है: "क्योंकि जिस प्रकार देह तो एक है और उसके अंग बहुत से हैं, और उस एक देह के सब अंग, बहुत होने पर भी सब मिलकर एक ही देह हैं, उसी प्रकार मसीह भी है" (1 कुरिन्थियों 12:12)। रोमी दुनिया में "शरीर" का यह रूपक आमतौर पर यह समझाने के लिए इस्तेमाल होता था कि नीचे वालों को अपनी जगह पर रहना चाहिए। पौलुस उसे उलट देते हैं और कहते हैं कि जो अंग कमज़ोर दिखते हैं, वही ज़रूरी हैं।
और अंत में वही कसौटी इतिहास पर लगती है: "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उनमें पहला फल हुआ" (1 कुरिन्थियों 15:20)। क्रूस अकेला नहीं खड़ा; खाली कब्र उसकी गवाही है। पौलुस की पूरी नैतिकता इसी एक तथ्य पर टिकी है कि देह का भविष्य है, इसलिए देह का आज मायने रखता है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
पौलुस अन्यजातियों के इस शहर को यूनानी तर्क से नहीं, इस्राएल के पवित्रशास्त्र से समझाते हैं। उनके लिए कलीसिया कोई नई-नवेली संस्था नहीं, बल्कि वही कहानी है जो अब्राहम से शुरू हुई और मसीह में अपने शिखर पर पहुँची।
पुराने नियम में परमेश्वर की बुद्धि और मनुष्य की बुद्धि का टकराव बार-बार दिखता है। यशायाह ने चेतावनी दी थी कि परमेश्वर ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करेंगे, और पौलुस 1 कुरिन्थियों 1:19 में ठीक वही वचन उद्धृत करते हैं। यिर्मयाह ने कहा था कि घमंड करनेवाला प्रभु पर ही घमंड करे, और पौलुस उसे 1 कुरिन्थियों 1:31 में दोहराते हैं। यानी क्रूस कोई अचानक आया झटका नहीं है; परमेश्वर हमेशा से इसी तरह काम करते आए हैं, छोटे को चुनकर, कमज़ोर को उठाकर, मिस्र के विरुद्ध एक हकलाते चरवाहे को खड़ा करके, गोलियत के सामने एक लड़के को भेजकर।
मंदिर का सूत्र भी यहीं से आता है। निर्गमन में परमेश्वर मिलापवाले तम्बू में उतरते हैं, 1 राजा 8 में महिमा भवन को भर देती है, यहेजकेल में वह महिमा दुख के साथ भवन छोड़ देती है। और फिर 1 कुरिन्थियों 3:16 में वह वास पत्थरों में नहीं, लोगों में है। जो कभी परदे के पीछे था, वह अब एक मंडली के बीच बैठा है जिसमें गुलाम भी हैं और बंदरगाह के मज़दूर भी।
फसह का सूत्र मेज़ तक पहुँचता है। "क्योंकि हमारा भी फसह जो मसीह है, बलिदान हुआ है" (1 कुरिन्थियों 5:7)। निर्गमन में मेम्ने का लहू दरवाज़े की चौखट पर था; अब वह लहू कटोरे में है और हर बार पीने पर इस्राएल की तरह कलीसिया भी अपनी मुक्ति की कहानी दोहराती है। जंगल की यात्रा का सूत्र 1 कुरिन्थियों 10 में आता है, जहाँ पौलुस कहते हैं कि इस्राएल के साथ जो हुआ वह हमारी चेतावनी के लिए लिखा गया; बपतिस्मा और भोजन पाकर भी वे जंगल में गिर पड़े, इसलिए आत्मिक अनुभव अपने आप सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
और सबसे गहरा सूत्र आदम और मसीह का है। उत्पत्ति 3 में एक मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; 1 कुरिन्थियों 15 में एक मनुष्य के द्वारा मृतकों का पुनरुत्थान आता है। पौलुस मसीह को "पहला फल" कहकर लैव्यव्यवस्था 23 के उस पर्व की ओर इशारा करते हैं, जहाँ फसल का पहला पूला परमेश्वर के सामने लहराया जाता था, इस भरोसे के साथ कि पूरी फसल आ रही है। यीशु का जी उठना अलग-थलग चमत्कार नहीं, पूरी फसल का पहला पूला है।
पुराना नियम वादा है; कुरिन्थुस की गलियों में वह वादा साँस लेता है।
रचना और मुख्य विषय
पत्री का ढाँचा समझने की कुंजी दो वाक्यांशों में छिपी है। 1 कुरिन्थियों 1:11 में पौलुस लिखते हैं कि खलोए के घराने के लोगों से उन्हें खबर मिली, और 1 कुरिन्थियों 7:1 में वे कहते हैं, "अब उन बातों के विषय में जो तुम ने लिखीं।" यानी पहले छह अध्याय उन समस्याओं पर हैं जिनकी शिकायत कुरिन्थियों ने नहीं की थी, और अध्याय 7 से आगे उन सवालों के जवाब हैं जो उन्होंने खुद पूछे थे। "अब उन बातों के विषय में" वाला वाक्यांश बार-बार लौटता है और पत्री को विषय-दर-विषय आगे बढ़ाता है।
पहला भाग, अध्याय 1 से 4, गुटबाज़ी और बुद्धि के घमंड पर है। कुरिन्थुस में वक्ताओं के प्रशंसक-मंडल बनाना आम बात थी, और कलीसिया ने उसी संस्कृति को अंदर ले लिया। पौलुस उनके नेता-पूजन को तोड़ते हैं यह कहकर कि अपुल्लोस और वे तो केवल सेवक हैं, एक रोपता है, दूसरा सींचता है, बढ़ाने वाले परमेश्वर हैं। फिर अध्याय 4 में वे खुद को तमाशे में सबसे पीछे चलने वाले कैदी की तरह दिखाते हैं, मानो कहते हों कि प्रेरिताई पद नहीं, प्रदर्शनी है।
दूसरा भाग, अध्याय 5 और 6, कलीसिया के अनुशासन, आपसी मुकदमों और यौन शुद्धता पर है। यहाँ पौलुस का तर्क फिर क्रूस से ही निकलता है: "क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो" (1 कुरिन्थियों 6:20)। शरीर के बारे में उनका मत न तो यूनानी तिरस्कार वाला है और न आधुनिक पूजा वाला; शरीर खरीदा हुआ है, इसलिए पवित्र है।
तीसरा भाग, अध्याय 7, विवाह, अविवाहित जीवन और वैवाहिक स्थिति पर बहुत ही संतुलित मार्गदर्शन देता है, और वह भी उस आसन्न समय के प्रकाश में जिसमें "इस संसार की रीति और व्यवहार बदलता जाता है।"
चौथा भाग, अध्याय 8 से 10, मूर्तियों के सामने चढ़ाए भोजन का जटिल मामला उठाता है, और यहीं पत्री का नैतिक दिल धड़कता है। पौलुस कमज़ोर विवेक वाले भाई के लिए अपनी स्वतंत्रता छोड़ने को कहते हैं, और अध्याय 9 में अपनी मिसाल रखते हैं कि उन्होंने अपना हक लेने के बजाय छोड़ देना चुना। ज्ञान फुलाता है, प्रेम बनाता है।
पाँचवाँ भाग, अध्याय 11 से 14, आराधना पर है: सिर ढकने का मामला, प्रभु भोज की गड़बड़ी, आत्मिक वरदानों की होड़, और अन्यभाषा तथा भविष्यद्वाणी का क्रम। बीचोंबीच अध्याय 13 रखा है, प्रेम का अध्याय, जो कोई विवाह-गीत नहीं बल्कि वरदानों पर लड़ रही कलीसिया के लिए एक सर्जन की छुरी है।
छठा भाग, अध्याय 15, पुनरुत्थान पर पूरी पत्री का धर्मशास्त्रीय शिखर है, और अध्याय 16 में चंदे, यात्रा की योजनाओं और नामों के साथ पत्री ज़मीन पर उतर आती है। अंत में आरामी शब्द गूँजता है, "हे हमारे प्रभु, आ!"
जहाँ तक लिखे जाने का समय है, पौलुस इफिसुस से लिख रहे हैं (1 कुरिन्थियों 16:8), अपनी तीसरी यात्रा के दौरान, लगभग 54 से 55 ईस्वी में। गल्लियो के नाम वाले एक पत्थर के शिलालेख से प्रेरितों के काम 18 की घटनाओं को लगभग 51-52 ईस्वी में रखा जा सकता है, इसलिए यह पत्री कलीसिया की स्थापना के कोई तीन-चार साल बाद की है। इतनी जल्दी इतनी गड़बड़; यही इस पत्री की ईमानदारी है।
इस पुस्तक के मुख्य पद
तीन पद इस पूरी पत्री को अपने कंधों पर उठाए हुए हैं।
पहला, "क्योंकि क्रूस की कथा नाश होनेवालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पानेवालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ्य है" (1 कुरिन्थियों 1:18)। यूनानी में यहाँ दो वर्तमान कालिक रूप हैं, "नाश होते जा रहे" और "बचाए जा रहे"; यह एक चल रही प्रक्रिया है, कोई जमा हुआ लेबल नहीं। और ध्यान दीजिए कि लोग क्रूस के बारे में क्या सोचते हैं, यह उनके बारे में बताता है, क्रूस के बारे में नहीं। कुरिन्थुस में जहाँ हर कोई प्रभावशाली वक्ता की तलाश में था, पौलुस ने एक ऐसा संदेश सुनाया जो सुनने में हार जैसा लगता था, और उसी में परमेश्वर की सामर्थ्य खुल गई।
दूसरा, "पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है" (1 कुरिन्थियों 13:13)। यह पद अक्सर विवाह समारोहों में पढ़ा जाता है, पर इसका असली घर एक झगड़ालू कलीसिया है जहाँ लोग अपने वरदानों की रैंकिंग बना रहे थे। पौलुस कहते हैं कि अन्यभाषाएँ थम जाएँगी, ज्ञान मिट जाएगा, भविष्यद्वाणियाँ पूरी हो जाएँगी, क्योंकि ये सब इसी युग के औज़ार हैं। प्रेम अकेली ऐसी चीज़ है जो नए युग में भी वैसी ही चलती रहेगी। इसीलिए वह सबसे बड़ा है, इसलिए नहीं कि वह सबसे मीठा है, बल्कि इसलिए कि वह सबसे टिकाऊ है। और यह प्रेम भावना नहीं, व्यवहार है: धीरज, कृपा, अपनी बड़ाई न करना।
तीसरा, "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उनमें पहला फल हुआ" (1 कुरिन्थियों 15:20)। इससे पहले की आयतों में पौलुस बहुत साहस के साथ उल्टी बात मान लेते हैं: अगर मसीह नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार व्यर्थ, तुम्हारा विश्वास व्यर्थ, हम सब पर दया चाहिए। फिर इस पद में वे उस काल्पनिक अंधेरे को चीर देते हैं। "पहला फल" शब्द बहुत सोच-समझकर चुना गया है, क्योंकि पहला फल कभी अकेला नहीं आता। मसीह का जी उठा शरीर इस बात की रसीद है कि एक दिन कब्रें खुलेंगी।
क्रूस नींव है, प्रेम दीवारें, पुनरुत्थान छत।
दर्पण
अब कुछ देर के लिए कुरिन्थुस को छोड़िए और अपने जीवन को देखिए।
आप शायद कहेंगे कि आपकी कलीसिया में ऐसा घोटाला नहीं है जैसा अध्याय 5 में था। ठीक है। पर क्या आपके भीतर वह चुपचाप तुलना चलती है कि कौन ज़्यादा काम का है, किसकी प्रार्थना ज़्यादा असरदार है, किसे मंच मिलता है और किसे नहीं? कुरिन्थुस की गुटबाज़ी नारे लगाकर शुरू नहीं हुई थी, वह दिल के भीतर एक हल्की-सी श्रेष्ठता की भावना से शुरू हुई थी। आपने पिछले महीने किसी भाई या बहन की सेवा के बारे में जो टिप्पणी की थी, उसे फिर से सुनिए।
पैसे के बारे में सोचिए। अध्याय 11 की त्रासदी यह नहीं थी कि अमीर लोग खाना लाना भूल गए; त्रासदी यह थी कि वे खाना लाए और गरीबों के पहुँचने से पहले खा गए। आज वही बात तब होती है जब हमारी संगति उन्हीं लोगों तक सिमट जाती है जिनकी आमदनी और भाषा हमारे जैसी है। प्रभु भोज की मेज़ हर बार इस आदत पर सवाल उठाती है।
अपने शरीर के बारे में सोचिए। हो सकता है आप उसे शर्म की नज़र से देखते हों, या उसे छुपाते हों, या उससे थक चुके हों। हो सकता है आपने अकेलेपन में कुछ ऐसा किया हो जिसे आप किसी को बता नहीं सकते। पौलुस आपसे यह नहीं कह रहे कि अपने शरीर को और ज़्यादा काबू में करो। वे कह रहे हैं कि यह शरीर दाम देकर खरीदा गया है, और जो चीज़ इतनी महँगी कीमत पर खरीदी गई हो, उसे सस्ते में इस्तेमाल करना अपने ही साथ अन्याय है।
और समय के बारे में सोचिए। अगर 1 कुरिन्थियों 15:20 सच है, तो आपकी सबसे अनदेखी सेवा भी व्यर्थ नहीं है। वह बीमार माँ की देखभाल, वह बच्चों को दी गई प्रार्थना, वह दफ़्तर में बिना तारीफ़ के की गई ईमानदारी; कुछ भी मिट्टी में नहीं जाएगा, क्योंकि कब्र आखिरी शब्द नहीं बोलेगी। पौलुस इसी वजह से पत्री के अंत में लिखते हैं कि प्रभु में तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है। यह आयत आपके लिए भी लिखी गई है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को 1 कुरिन्थियों समझाने का सबसे अच्छा रास्ता किसी शिक्षा से नहीं, एक चित्र से होकर जाता है: शरीर का चित्र। उनसे पूछिए कि अगर हाथ कहे, "मुझे पैर की ज़रूरत नहीं," तो क्या होगा? या अगर आँख कहे, "कान बेकार है," तो? बच्चे तुरंत हँसेंगे, और हँसी के साथ ही बात उनके भीतर बैठ जाएगी। फिर बताइए कि यीशु के लोग मिलकर एक शरीर की तरह हैं, जहाँ हर किसी की ज़रूरत है, यहाँ तक कि उस बच्चे की भी जो सबसे छोटा है या सबसे चुपचाप बैठा रहता है।
इसके बाद दूसरी तस्वीर जोड़िए: कुरिन्थुस के लोग आपस में लड़ रहे थे कि कौन सबसे बड़ा है, और पौलुस ने उन्हें एक ऐसे राजा की याद दिलाई जो क्रूस पर सबसे नीचे चला गया। बड़ा बनने का रास्ता ऊपर नहीं, नीचे जाता है। यह बात छोटे बच्चे भी महसूस कर सकते हैं जब उन्हें खिलौना बाँटना पड़ता है।
और अंत में 1 कुरिन्थियों 13 का प्रेम। उसे परिभाषा की तरह नहीं, रोज़मर्रा की भाषा में कहिए: प्रेम इंतज़ार करता है, प्रेम चिढ़ाता नहीं, प्रेम हार नहीं मानता।
अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए इस पत्री की अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष) के लिए सरल चित्रों और कहानी के रूप में, प्राथमिक कक्षा के बच्चों (7 से 12 वर्ष) के लिए कुरिन्थुस शहर और कलीसिया की कहानी के साथ, और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए पहचान, शरीर, दोस्ती के दबाव और पुनरुत्थान की आशा जैसे सवालों के साथ। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार उपयुक्त सामग्री चुनिए और साथ बैठकर पढ़िए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1 कुरिन्थियों की पत्री किसने लिखी थी?
पत्री की पहली आयत में लेखक अपना नाम स्वयं बताते हैं: प्रेरित पौलुस, और उनके साथ सोस्थिनेस नाम का एक भाई। संभव है यह वही सोस्थिनेस हो जिसका ज़िक्र प्रेरितों के काम 18:17 में कुरिन्थुस के आराधनालय के सरदार के रूप में हुआ है, जो बाद में विश्वास में आ गया। पौलुस के लेखक होने पर प्राचीन कलीसिया में कभी गंभीर विवाद नहीं रहा; पहली सदी के अंत में रोम के क्लेमेंत पहले ही कुरिन्थियों को याद दिला रहे थे कि "धन्य पौलुस" ने उन्हें क्या लिखा था।
1 कुरिन्थियों की पत्री कब लिखी गई थी?
पौलुस 1 कुरिन्थियों 16:8 में लिखते हैं कि वे पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहेंगे, इसलिए यह पत्री उनकी तीसरी मिशनरी यात्रा के दौरान इफिसुस से लिखी गई। डेल्फी में मिले एक रोमी शिलालेख से पता चलता है कि गल्लियो लगभग 51-52 ईस्वी में अखया का सूबेदार था, और प्रेरितों के काम 18 में पौलुस उसी के सामने पेश किए गए थे। इस आधार पर अधिकांश विद्वान इस पत्री की तिथि लगभग 54 से 55 ईस्वी रखते हैं, यानी कलीसिया की स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद।
पौलुस ने यह पत्री क्यों लिखी?
तीन कारण पत्री में ही दिखाई देते हैं। पहला, खलोए के घराने के लोगों ने पौलुस को कुरिन्थुस में चल रहे झगड़ों की खबर दी (1 कुरिन्थियों 1:11)। दूसरा, कलीसिया ने खुद एक पत्र लिखकर विवाह, मूर्तियों के भोजन और आत्मिक वरदानों जैसे कई व्यावहारिक सवाल पूछे थे, जिनका जवाब पौलुस अध्याय 7 से देना शुरू करते हैं। तीसरा, स्तिफनास, फूरतूनातुस और अखइकुस उनसे मिलने आए थे और उन्होंने स्थिति की और जानकारी दी। यह पत्री एक जीते-जागते संकट की प्रतिक्रिया है।
कुरिन्थुस शहर कैसा था?
कुरिन्थुस यूनान के उस संकरे भूभाग पर बसा था जो दो समुद्रों को जोड़ता है, और इसलिए वह व्यापार, नाविकों और पैसे का शहर था। 146 ईसा पूर्व में रोम ने उसे नष्ट किया और 44 ईसा पूर्व में यूलियुस कैसर ने उसे रोमी उपनिवेश के रूप में फिर बसाया, ज़्यादातर आज़ाद किए गए दासों और सैनिकों से। नतीजा था एक नया-नवेला, महत्वाकांक्षी, दिखावे का शहर, जहाँ सामाजिक सीढ़ी चढ़ना सबसे बड़ी चाह थी। कलीसिया इसी हवा में साँस ले रही थी, और उसकी कई समस्याएँ इसी महत्वाकांक्षा की छाया थीं।
1 कुरिन्थियों का मुख्य विषय क्या है?
पत्री का मुख्य विषय है क्रूस पर चढ़ाए गए और जी उठे मसीह का सुसमाचार, जिसे पौलुस कलीसियाई जीवन के हर व्यावहारिक सवाल पर लागू करते हैं। बाहर से देखने पर यह अलग-अलग मुद्दों का संग्रह लगता है, पर भीतर से यह एक ही तर्क है: अगर परमेश्वर ने कमज़ोरी के द्वारा बचाया है, तो उनके लोग सामर्थ्य और प्रतिष्ठा की होड़ में नहीं जी सकते। पवित्रता, एकता, स्वतंत्रता, आराधना और भविष्य की आशा, सब कुछ इसी एक केंद्र से निकलता है।
1 कुरिन्थियों 13 क्या सचमुच विवाह के बारे में है?
यह अध्याय विवाह समारोहों में बहुत पढ़ा जाता है, और उसका प्रयोग विवाह पर करना गलत नहीं है, पर मूल संदर्भ बिल्कुल अलग है। पौलुस यह आत्मिक वरदानों पर चल रही खींचतान के बीचोंबीच लिख रहे हैं, अध्याय 12 और 14 के ठीक बीच में। वे कह रहे हैं कि अन्यभाषा, भविष्यद्वाणी, ज्ञान और दान, सब कुछ प्रेम के बिना शून्य है। इसीलिए अध्याय का अंत होता है, "पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है" (1 कुरिन्थियों 13:13)।
1 कुरिन्थियों 3:16 में "परमेश्वर का मन्दिर" किसे कहा गया है?
इस आयत में "तुम" बहुवचन है, इसलिए पौलुस पहले अर्थ में पूरी मंडली को परमेश्वर का मंदिर कह रहे हैं, किसी अकेले विश्वासी को नहीं। संदर्भ गुटबाज़ी का है, और चेतावनी यह है कि कलीसिया को बाँटकर नष्ट करना परमेश्वर के भवन को नष्ट करने जैसा है। आगे चलकर 1 कुरिन्थियों 6:19 में पौलुस वही भाषा व्यक्तिगत शरीर पर भी लगाते हैं। दोनों सच हैं, पर 3:16 का ज़ोर समुदाय पर है, और यही उसे आज और भी चुनौतीपूर्ण बनाता है।
क्या आज भी आत्मिक वरदान, जैसे अन्यभाषा, जारी हैं?
मसीही कलीसिया में इस पर ईमानदार मतभेद रहा है। कुछ विश्वासी मानते हैं कि चिह्न वाले वरदान प्रेरितों के युग के साथ अपना विशेष उद्देश्य पूरा कर चुके, जबकि अन्य मानते हैं कि पवित्र आत्मा आज भी वैसे ही वरदान बाँटते हैं। जो बात पौलुस के पाठ से निर्विवाद है वह यह है कि हर वरदान का एकमात्र मापदंड कलीसिया की उन्नति और प्रेम है, और आराधना में सब कुछ शालीनता और क्रम से होना चाहिए। जो वरदान दूसरों को नहीं बनाता, पौलुस की नज़र में वह मंच की शोभा मात्र है।
1 कुरिन्थियों 11:26 प्रभु भोज के बारे में क्या सिखाता है?
यह आयत कहती है, "क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।" यानी प्रभु भोज एक घोषित सुसमाचार है, शब्दों से नहीं बल्कि कर्म से। इसमें तीन समय एक साथ जुड़ते हैं: अतीत में मसीह की मृत्यु, वर्तमान में संगति, और भविष्य में उनका आगमन। कुरिन्थुस की गलती यह थी कि उनकी मेज़ पर वर्ग-भेद दिखता था, जिससे उनका "प्रचार" झूठा पड़ जाता था।
1 कुरिन्थियों 15 में पुनरुत्थान का तर्क क्या है?
पौलुस पहले उस सुसमाचार को दोहराते हैं जो उन्हें सौंपा गया था और जिसके चश्मदीद गवाह अब भी जीवित थे। फिर वे बहुत साहस के साथ कहते हैं कि यदि मसीह नहीं जी उठा तो विश्वास व्यर्थ है और हम अब भी अपने पापों में हैं। इसके बाद वह मोड़ आता है, "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उनमें पहला फल हुआ" (1 कुरिन्थियों 15:20)। पहला फल का अर्थ है कि उनका जी उठना अकेली घटना नहीं, पूरी फसल की शुरुआत है।
1 कुरिन्थियों और 2 कुरिन्थियों में क्या अंतर है?
पहली पत्री मुख्यतः कलीसिया की समस्याओं और सवालों का जवाब है, और उसका स्वर शिक्षक जैसा है, व्यवस्थित और विषय-दर-विषय। दूसरी पत्री कहीं अधिक व्यक्तिगत और भावुक है; वहाँ पौलुस अपनी प्रेरिताई का बचाव करते हैं, अपने दुखों और कमज़ोरियों को खोलकर रख देते हैं और टूटे रिश्ते की मरम्मत करते हैं। बीच में एक कठिन यात्रा और एक "आँसुओं भरी पत्री" की घटनाएँ हैं। पहली पत्री सिखाती है कि कलीसिया कैसे जिए; दूसरी दिखाती है कि एक सेवक कैसे टूटकर भी सेवा करता है।
1 कुरिन्थियों पढ़ना कहाँ से शुरू करूँ?
अध्याय 1 और 2 से शुरू कीजिए, क्योंकि वहीं वह चश्मा मिलता है जिससे बाकी पूरी पत्री दिखती है। उसके बाद अध्याय 13 और 15 पढ़िए, ताकि प्रेम और पुनरुत्थान का क्षितिज सामने आ जाए। फिर शुरू से अंत तक धीरे-धीरे पढ़िए, हर अध्याय में यह सवाल लेकर कि पौलुस यहाँ क्रूस को कैसे लागू कर रहे हैं। प्रेरितों के काम 18 साथ में पढ़ना बहुत मदद करता है, क्योंकि वहाँ उस कलीसिया के जन्म की कहानी दर्ज है।
अंत में
कुरिन्थुस की कलीसिया को पढ़कर राहत मिलती है, और थोड़ी शर्म भी। राहत इसलिए कि यह आदर्श कलीसिया नहीं थी, फिर भी पौलुस ने उन्हें "पवित्र किए हुए" कहकर संबोधित किया और उनके लिए परमेश्वर का धन्यवाद किया। शर्म इसलिए कि उनकी बीमारियाँ हमारी भी हैं, बस हमारे कपड़े ज़्यादा सलीकेदार हैं।
और इसीलिए इस पत्री का इलाज आज भी वही है। पौलुस ने उन्हें बेहतर रणनीति, बेहतर नेतृत्व या बेहतर नियमावली नहीं दी। उन्होंने उन्हें एक क्रूस दिया और कहा, इसी के सामने खड़े होकर अपनी हर बहस, हर महत्वाकांक्षा और हर अधिकार को मापो। जो राजा अपने हक छोड़कर मरा, उसके लोग अपने हक पकड़कर नहीं जी सकते।
आगे के अध्ययन के लिए एक सुझाव: इस पत्री को अगले सोलह दिनों में एक-एक अध्याय करके पढ़िए और हर दिन सिर्फ़ एक सवाल लिखिए, "आज के अध्याय में क्रूस किस चीज़ को काट रहा है?" आप हैरान होंगे कि कितनी बार वह आपकी अपनी किसी आदत पर आकर रुकता है। और जब सोलहवें दिन आप "हे हमारे प्रभु, आ!" तक पहुँचेंगे, तो वह प्रार्थना केवल पौलुस की नहीं, आपकी अपनी हो चुकी होगी।
