बाइबल पुस्तक

1 पतरस की पत्री: दुःख के बीच जीवित आशा

परिचय

कल्पना कीजिए कि आपके मोहल्ले में आपका नाम बदल गया है। पहले आप "अच्छे पड़ोसी" थे; अब लोग आपको "वह जो अपने लोगों से अलग हो गया" कहते हैं। रिश्तेदारों की शादी में आपको किनारे बिठाया जाता है, दुकान पर उधार बंद हो जाता है, बच्चों से स्कूल में सवाल पूछे जाते हैं। कुछ टूटा नहीं, कोई जेल में नहीं गया, पर जीवन की गरमाहट धीरे-धीरे ठंडी पड़ती जा रही है।

यही वह दुनिया है जिसमें पहली सदी के कुछ हज़ार विश्वासी जी रहे थे, जब एक बूढ़े मछुआरे का पत्र उन तक पहुँचा। उसने उन्हें यह नहीं बताया कि दुःख कब ख़त्म होगा। उसने उन्हें कुछ और दिया, कुछ ज़्यादा गहरा और ज़्यादा टिकाऊ।

इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि 1 पतरस की पत्री किसने, कब और किन हालातों में लिखी; यह कैसे बनी है; इसके मुख्य विषय और मुख्य पद क्या हैं; और सबसे बढ़कर, यह पत्री आपके अपने दुःख के बीच कौन सा नाम आपके हाथ में रख देती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

ज़्यादातर लेख 1 पतरस को "दुःख पर एक पुस्तक" कहकर पढ़ते हैं, और फिर "क्यों" का उत्तर खोजने लगते हैं। पर पतरस "क्यों" का उत्तर कहीं नहीं देता। वह "कौन" का उत्तर देता है। वह पीड़ित विश्वासियों को कारण नहीं, पहचान थमाता है: तुम परदेशी हो, चुने हुए हो, याजक हो, जीवित आशा के वारिस हो। इसलिए इस मार्गदर्शिका का सूत्र यह है: 1 पतरस दुःख की व्याख्या नहीं, पहचान का दस्तावेज़ है। जब आपको पता हो कि आप कौन हैं और किसके हैं, तो दुःख आपको तोड़ने के बजाय तराशने लगता है। इसी दृष्टि से हम पूरी पत्री को पढ़ेंगे।

बाइबल 1 पतरस की पत्री के बारे में क्या कहती है?

पत्री अपना परिचय खुद देती है: "पतरस की ओर से जो यीशु मसीह का प्रेरित है, उन परदेशियों के नाम, जो पुन्तुस, गलातिया, कप्पदूकिया, आसिया, और बितूनिया में तित्तर बित्तर होकर रहते हैं" (1 पतरस 1:1)। यह शमौन पतरस है, वही मछुआरा जिसे प्रभु यीशु ने गलील की झील के किनारे से बुलाया था, वही जिसने आँगन में तीन बार इनकार किया और फिर समुद्र-तट पर तीन बार प्रेम का इकरार किया। जो आदमी कभी एक दासी के सवाल से डर गया था, वही अब पूरे रोमी साम्राज्य में बिखरी कलीसिया को डर पर जय पाना सिखा रहा है। यह बात अपने आप में अनुग्रह की गवाही है।

पत्र का अंत हमें लिखने की परिस्थिति बताता है: "मैं ने सिलवानुस के हाथ, जिसे मैं विश्वासयोग्य भाई समझता हूँ, संक्षेप में लिखकर तुम्हें समझाया है, और यह गवाही दी है कि परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह यही है, इसी में स्थिर रहो" (1 पतरस 5:12)। सिलवानुस, यानी सीलास, लेखनी चलाने वाला साथी था; इसीलिए पत्री की यूनानी भाषा इतनी सधी हुई और सुंदर है। अभिवादन "बेबीलोन" से आता है (1 पतरस 5:13), जो सबसे अधिक संभावना में रोम के लिए एक सांकेतिक नाम है, उस नगर के लिए जो परमेश्वर के लोगों को निर्वासन में रखता है। मरकुस भी वहीं पतरस के साथ है। इन सब संकेतों से अधिकांश विद्वान पत्री की तिथि लगभग 62 से 64 ईस्वी के बीच रखते हैं, नीरो के अत्याचार के ठीक पहले या उसके आरंभिक दिनों में, पतरस की शहादत से कुछ ही समय पूर्व।

और दुःख किस तरह का था? पत्री को ध्यान से पढ़िए तो यह ज़्यादातर सरकारी फाँसी नहीं, सामाजिक बहिष्कार है: बदनामी, ताने, झूठे इल्ज़ाम, पुराने यार-दोस्तों का अचरज और गाली (1 पतरस 4:4), मसीह के नाम के कारण निन्दा (1 पतरस 4:14)। यानी वही दुःख जो आज भी लाखों भारतीय विश्वासियों का रोज़मर्रा है: घर में अकेलापन, नौकरी में फ़र्क़, गाँव में फुसफुसाहट।

इस दुःख के बीच पतरस सबसे पहला काम क्या करता है? वह शिकायत नहीं सुनाता, वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिस ने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जी उठने के कारण अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया" (1 पतरस 1:3)। ध्यान दीजिए, आशा "जीवित" है क्योंकि वह जीवित व्यक्ति पर टिकी है। यह शुभ-चिंतन नहीं, पुनरुत्थान है।

फिर वह दुःख को आशा के भीतर रखकर नया अर्थ देता है: "और इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अब कुछ दिन तक नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो, कि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास, जो आग से ताए हुए नाशमान सोने से भी कहीं, अधिक बहुमूल्य है, यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा, और महिमा, और आदर का कारण ठहरे" (1 पतरस 1:6-7)। यहाँ दुःख अंधी दुर्घटना नहीं, सुनार की भट्ठी है। सोना जलाने के लिए नहीं, शुद्ध करने के लिए आग में डाला जाता है।

और इस पूरे ताने-बाने के बीचों-बीच वह घोषणा आती है जो पत्री का हृदय है: "पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो, इसलिये कि जिस ने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो" (1 पतरस 2:9)। समाज कहता है, तुम कोई नहीं हो। परमेश्वर कहते हैं, तुम मेरी निज प्रजा हो। इन दो आवाज़ों के बीच चुनाव करना ही विश्वास है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

1 पतरस को पढ़ते हुए अगर आपको लगे कि आप किसी पुरानी किताब की गूँज सुन रहे हैं, तो आप सही सुन रहे हैं। पतरस पुराने नियम में भीगा हुआ आदमी है, और वह इस्राएल की कहानी के सबसे बड़े शब्द उठाकर एशिया माइनर की छोटी-छोटी कलीसियाओं के हाथ में रख देता है।

"चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज" सीधे निर्गमन 19:5-6 से आता है, जहाँ परमेश्वर सीनै पर्वत पर छूटे हुए दासों के एक झुंड से कहते हैं कि वे उनका याजकीय राज्य होंगे। "तुम पहले तो कुछ भी नहीं थे, पर अब परमेश्वर की प्रजा हो; तुम पर दया नहीं हुई थी पर अब तुम पर दया हुई है" (1 पतरस 2:10) होशे की भविष्यवाणी की गूँज है, जहाँ "लो-अम्मी", मेरी प्रजा नहीं, फिर से "मेरी प्रजा" कहलाता है। "पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (1 पतरस 1:16) लैव्यव्यवस्था से उठाया गया है। 1 पतरस 3:10-12 में भजन संहिता 34 पूरा का पूरा उद्धृत है, वह भजन जो दाऊद ने तब लिखा जब वह शत्रु के दरबार में पागल बनकर जान बचाकर भागा था। परदेशी और यात्री होने का भाव अब्राहम से लेकर बाबुल के निर्वासितों तक फैला हुआ है, और नूह के जहाज़ की बात 1 पतरस 3:20-21 में बपतिस्मे के चित्र के रूप में लौट आती है।

पर सबसे गहरा सूत्र यशायाह 53 का है। जब पतरस लिखता है, "वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिस से हम पापों के लिये मर कर के धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँ; उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए" (1 पतरस 2:24), तो वह उस दुःख उठाने वाले दास का गीत गा रहा है जिसे उसने अपनी आँखों से क्रूस की ओर जाते देखा था। और यहीं पत्री का पुराना नियम मसीह में आकर पूरा होता है: भविष्यद्वक्ताओं ने पहले ही मसीह के दुःखों की और उनके बाद आने वाली महिमा की गवाही दी थी (1 पतरस 1:10-12)। दुःख फिर महिमा, यही परमेश्वर का क्रम है, पहले उनके पुत्र में, फिर उनके लोगों में।

इसलिए 1 पतरस को नए नियम के बीच में रखिए तो तस्वीर साफ़ हो जाती है। सुसमाचारों में हम उस चरवाहे को देखते हैं जिसने अपनी भेड़ों के लिए प्राण दिए। पौलुस की पत्रियों में हम सीखते हैं कि अनुग्रह से विश्वास के द्वारा कैसे उद्धार मिलता है। इब्रानियों में हम सीखते हैं कि कैसे धीरज धरकर दौड़ पूरी करें। और 1 पतरस में हम सीखते हैं कि जब दुनिया हमें पराया कर दे, तब हम कौन हैं। पहचान पहले, व्याख्या बाद में। यही पतरस की पादरी-दृष्टि है, और यही इस पत्री को पूरे सिद्धांत-शास्त्र में एक अनोखी जगह देता है।

कैनन में इस पत्री की जगह कभी विवाद में नहीं रही। दूसरी सदी के पोलीकार्प इसे खुलकर उद्धृत करते हैं, इरेनियस इसे प्रेरित पतरस की रचना मानते हैं, और यूसेबियस इसे उन पुस्तकों में गिनते हैं जिन पर कलीसिया एकमत थी। बिखरी हुई कलीसिया ने इस पत्र को तुरंत पहचान लिया, क्योंकि वह उसमें अपनी ही आवाज़ सुन रही थी।

रचना और मुख्य विषय

पत्री की बनावट बहुत साफ़ है, और वह हमारे दृष्टिकोण की पुष्टि करती है: पहले पहचान, फिर व्यवहार, फिर दुःख, फिर चरवाही।

अभिवादन (1 पतरस 1:1-2) में ही तीनों व्यक्ति, पिता, आत्मा और यीशु मसीह, एक साथ काम करते दिखते हैं: चुने जाना, पवित्र किया जाना, आज्ञा मानना और लहू से छिड़के जाना। बिखरे हुए लोगों को पहले वचन में ही बता दिया गया कि वे संयोग से नहीं, योजना से यहाँ हैं।

पहला खंड (1 पतरस 1:3 से 2:10) पहचान की नींव डालता है। यहाँ नया जन्म है, स्वर्ग में रखी हुई मीरास है, परखा हुआ विश्वास है, और फिर पवित्रता का बुलावा। छुटकारे का मोल बताया जाता है: "क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप-दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा किसी नाशमान वस्तु, अर्थात् चाँदी सोने से नहीं हुआ। पर निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने अर्थात् मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा हुआ" (1 पतरस 1:18-19)। खंड का शिखर है जीवित पत्थरों से बना आत्मिक घर और वह घोषणा जो 1 पतरस 2:9 में गूँजती है।

दूसरा खंड (1 पतरस 2:11 से 3:12) पूछता है: जो लोग परदेशी हैं, वे पराए देश में कैसे जिएँ? "हे प्रियो, मैं तुम से बिनती करता हूँ, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जानकर उन सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो" (1 पतरस 2:11)। फिर राज्य के अधिकारियों, मालिकों, पति-पत्नी और पूरी मण्डली के लिए व्यावहारिक शिक्षा आती है। इसका तर्क कहीं भी "शांति बनाए रखो" नहीं है, बल्कि गवाही है: सुंदर चाल-चलन ऐसा हो कि निंदा करने वाले भी परमेश्वर की महिमा करें। बीच में दास-सेवकों से कहा जाता है, और वहीं मसीह का आदर्श रखा जाता है: "और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दुख उठाकर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है कि तुम भी उसके चिन्ह पर चलो" (1 पतरस 2:21)।

तीसरा खंड (1 पतरस 3:13 से 4:19) सीधे दुःख पर आता है। यहाँ धार्मिकता के कारण दुःख उठाने का धन्य-वचन है, आशा का कारण बताने की तैयारी है, मसीह के एक बार के दुःख और विजय का ऐलान है, और अंत में अग्निपरीक्षा को सामान्य बात कहकर स्वीकार करना है। इस खंड का अंतिम वचन पूरे पत्र का सार है: "इसलिये जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार दुख उठाते हैं, वे भलाई करते हुए, अपने अपने प्राण विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथ में सौंप दें" (1 पतरस 4:19)।

चौथा खंड (1 पतरस 5:1-11) चरवाहों और झुंड के लिए है। प्राचीनों से कहा जाता है कि वे दबाव से नहीं, मन से, लालच से नहीं, मन लगाकर चरवाही करें; जवानों से कहा जाता है कि वे अधीन रहें; और सबसे कहा जाता है कि नम्रता पहन लें, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का सामना करते हैं पर नम्र लोगों पर अनुग्रह करते हैं। यहीं चिंता डालने और सचेत रहने के दोनों वचन आते हैं, और फिर वह आशीष जो थके हुए मन पर मरहम की तरह लगती है: "अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिस ने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दुख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा" (1 पतरस 5:10)।

अंतिम वचनों (1 पतरस 5:12-14) में पतरस पूरे पत्र का नाम रख देता है: यह "परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह" है, और उनसे कहा जाता है कि इसी में स्थिर रहें। यानी दुःख पर लिखी यह पुस्तक असल में अनुग्रह पर लिखी पुस्तक है।

इस पुस्तक के मुख्य पद

1 पतरस 1:3 पत्री का द्वार है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिस ने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जी उठने के कारण अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया।" तीन बातें यहाँ जुड़ी हैं। पहली, स्रोत परमेश्वर की "बड़ी दया" है, हमारी योग्यता नहीं। दूसरी, कार्य "नया जन्म" है, सुधार नहीं; जो व्यक्ति दुःख में है वह केवल सांत्वना नहीं, नया जीवन पाया हुआ व्यक्ति है। तीसरी, आधार पुनरुत्थान है। दुनिया की आशाएँ कब्र पर आकर दम तोड़ देती हैं; यह आशा कब्र से निकलकर शुरू होती है। इसीलिए वह "जीवित" है, वह साँस लेती है, वह आपके साथ चलती है।

1 पतरस 2:9 पत्री का हृदय है: "पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो, इसलिये कि जिस ने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो।" जिन लोगों को समाज ने बेनाम कर दिया था, उन्हें चार नाम एक साथ मिलते हैं। और ध्यान दीजिए कि यह पहचान भीतर की ओर नहीं, बाहर की ओर खुलती है: "उसके गुण प्रगट करो।" याजक वह होता है जो दूसरों के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है। इसलिए सताया जाना आपके बुलावे का अंत नहीं, उसका मंच है। जहाँ आपको किनारे किया गया है, वहीं आप याजक की तरह खड़े हैं।

1 पतरस 5:7 पत्री का सबसे कोमल वचन है: "अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।" यह अलग आदेश नहीं, पिछले वचन की नम्रता से जुड़ा हुआ है। चिंता ओढ़े रखना अक्सर एक छिपा हुआ अभिमान होता है, मानो सब कुछ मुझे ही सँभालना है। "डाल दो" शब्द में वही भाव है जैसे पीठ से बोझ उतारकर किसी और के कंधे पर रख देना। और कारण तर्क नहीं, रिश्ता है: उन्हें आपका ध्यान है। जिस परमेश्वर के हाथ में आकाशगंगाएँ हैं, उनके मन में आपकी रात की चिंता भी दर्ज है। आपकी चिंता उनके लिए बोझ नहीं, निमंत्रण है।

दर्पण

अब इसे अपने ऊपर लगाकर देखिए। आप शायद किसी जेल में नहीं हैं, पर क्या आपने कभी दफ़्तर की चाय के वक्त यह महसूस किया है कि बातचीत आपके आने पर बदल जाती है? क्या आपने कभी परिवार के किसी समारोह में खड़े-खड़े सोचा है कि मैं यहाँ का होकर भी यहाँ का नहीं रहा? क्या आपने कभी अपने विश्वास की बात इसलिए दबा ली क्योंकि प्रमोशन का मौसम था?

पतरस आपसे कहेगा कि यह बेगानापन आपकी असफलता नहीं है। यह आपके पते का हिस्सा है। आप "परदेशी" हैं, और परदेशी होना अभिशाप नहीं, बुलाहट है।

पर यही पत्री एक और जगह चुभती भी है। वह आपकी चिंता को नम्रता के साथ जोड़ देती है। आप रात को दो बजे जागकर बजट, बच्चों के नंबर, रिपोर्ट, और बीमारी की जाँच के बारे में सोचते रहते हैं, और प्रार्थना में भी असल में परमेश्वर को अपना प्लान सुनाते हैं। 1 पतरस 5:7 आपकी इस आदत पर हाथ रखकर कहता है: उतार दीजिए। और 1 पतरस 5:8-9 आपको झटका देकर जगाता है: "सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए। विश्वास में दृढ़ होकर, और यह जानकर उसका सामना करो, कि तुम्हारे भाई जो संसार में हैं, ऐसे ही दुख भुगत रहे हैं।" यानी आपके अकेलेपन में एक झूठ बोलने वाला काम कर रहा है, और उसका सबसे बड़ा झूठ यही है कि "सिर्फ़ तुम्हारे साथ ऐसा हो रहा है"।

तो आज आप किस आवाज़ को अपनी पहचान सौंप रहे हैं? उस रिश्तेदार को जिसने आपको बाहरी कह दिया? उस बॉस को जिसने आपको नज़रअंदाज़ कर दिया? उस आईने को जिसमें आप अपनी थकी हुई देह देखते हैं? या उस परमेश्वर को जिन्होंने आपको अंधकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है और अपनी निज प्रजा कहा है? इस सवाल का जवाब आपके अगले हफ़्ते की दिशा तय करेगा।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को 1 पतरस समझाने का सबसे आसान रास्ता "घर से दूर" की तस्वीर है। बच्चे जानते हैं कि नई जगह, नए स्कूल, नए मोहल्ले में कैसा लगता है जब सब आपको अजनबी की तरह देखते हैं। पतरस ऐसे ही लोगों को चिट्ठी लिख रहा था, जो यीशु पर भरोसा करने के कारण अपने ही शहर में अजनबी बन गए थे।

फिर दो सरल बातें बताइए। पहली, यीशु मसीह मरकर जी उठे, इसलिए उन पर भरोसा करने वालों के पास एक ऐसी आशा है जो कभी मुरझाती नहीं; पतरस इसे "जीवित आशा" कहता है। दूसरी, परमेश्वर उन्हें अपना ख़ास परिवार कहते हैं, इसलिए जब लोग हँसें तब भी वे भूल न जाएँ कि वे किसके हैं। छोटे बच्चों के लिए 1 पतरस 5:7 बहुत अच्छा पद है: अपनी सारी चिंता परमेश्वर पर डाल दो, क्योंकि उन्हें आपका ध्यान है। इसे पीठ पर लदे बस्ते को उतारकर पापा के हाथ में देने जैसा समझाया जा सकता है।

यह भी याद रखें कि डर और सताव की बातें बच्चों के सामने कितनी और कैसे रखी जाएँ, यह उनकी उम्र पर निर्भर करता है। इसीलिए Faith.network पर इस पुस्तक की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (3 से 6 वर्ष) बहुत सरल चित्रों और एक ही सच्चाई के साथ, प्राथमिक कक्षा के बच्चों के लिए (7 से 12 वर्ष) कहानी और प्रश्नोत्तर के साथ, और किशोरों के लिए (12 वर्ष से ऊपर) पहचान, साथियों के दबाव और गवाही के सवालों के साथ। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वही संस्करण चुनिए और परिवार के साथ पढ़िए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1 पतरस की पत्री किसने लिखी?

पत्री स्वयं कहती है कि इसे यीशु मसीह के प्रेरित पतरस ने लिखा (1 पतरस 1:1), और प्राचीन कलीसिया ने इसे हमेशा उसी की रचना माना। जिस सधी हुई यूनानी भाषा पर कुछ लोग सवाल उठाते हैं, उसका उत्तर पत्री के भीतर ही है: पतरस ने सिलवानुस के हाथ लिखवाया (1 पतरस 5:12), और उस ज़माने में लेखक अक्सर कुशल सचिव की मदद लेते थे। इसलिए शब्द सिलवानुस के हो सकते हैं, पर अधिकार और अनुभव उस प्रेरित का है जिसने प्रभु के दुःख अपनी आँखों से देखे थे (1 पतरस 5:1)।

1 पतरस की पत्री कब लिखी गई?

अधिकांश विद्वान इसे लगभग 62 से 64 ईस्वी के बीच रखते हैं। पत्री में सताव अभी राज्य-स्तर का व्यवस्थित वध नहीं, बल्कि बदनामी, ताने और सामाजिक बहिष्कार है, और राज्य के अधिकारियों के बारे में पतरस का रुख अब भी आदर का है (1 पतरस 2:13-17)। यह उस समय से मेल खाता है जो नीरो के बड़े अत्याचार से ठीक पहले का था। पतरस की शहादत परंपरा के अनुसार 64 से 68 ईस्वी के बीच रोम में हुई, इसलिए यह पत्री उसके जीवन के आख़िरी वर्षों की रचना है।

1 पतरस की पत्री किसके नाम लिखी गई थी?

यह पत्र आज के तुर्की के पाँच रोमी प्रांतों, पुन्तुस, गलातिया, कप्पदूकिया, आसिया और बितूनिया, में बिखरे विश्वासियों के नाम लिखा गया (1 पतरस 1:1)। ये ज़्यादातर गैर-यहूदी पृष्ठभूमि से आए लोग थे, क्योंकि पतरस उनके "बाप-दादों से चला आता" निकम्मे चाल-चलन और पुरानी अन्यजातियों जैसी जीवनशैली की बात करता है (1 पतरस 1:18; 4:3)। फिर भी वह उन्हें इस्राएल के नामों से पुकारता है, क्योंकि मसीह में वे परमेश्वर की निज प्रजा बन चुके हैं।

"जीवित आशा" का क्या अर्थ है?

1 पतरस 1:3 में आशा को "जीवित" इसलिए कहा गया है क्योंकि वह किसी इच्छा या संभावना पर नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति पर टिकी है, यीशु मसीह जो मरे हुओं में से जी उठे। हिंदी में हम अक्सर "आशा" का प्रयोग अनिश्चितता के लिए करते हैं, जैसे "आशा है कि बारिश हो"; बाइबल की आशा उससे उलट है, वह भविष्य की निश्चित सच्चाई पर भरोसा है। यह आशा मुरझाती नहीं, क्योंकि उसकी मीरास स्वर्ग में सुरक्षित रखी है (1 पतरस 1:4)।

1 पतरस और 2 पतरस में क्या अंतर है?

दोनों पत्रियाँ एक ही प्रेरित से आती हैं, पर उनका ख़तरा अलग है। 1 पतरस बाहर से आने वाले दबाव, यानी सताव और बदनामी, का सामना करना सिखाती है और विश्वासियों को उनकी पहचान और जीवित आशा याद दिलाती है। 2 पतरस भीतर से आने वाले ख़तरे, यानी झूठे शिक्षकों और प्रभु के आगमन पर उठने वाले संदेहों, से निपटती है और सच्चे ज्ञान में बढ़ने पर ज़ोर देती है। मोटे तौर पर कहें तो पहली पत्री धीरज की है, दूसरी सतर्कता की।

क्या 1 पतरस 3:21 कहता है कि बपतिस्मे से उद्धार मिलता है?

वह पद बपतिस्मे को नूह के जहाज़ से बचाव का प्रतिरूप कहता है, पर साथ ही साफ़ करता है कि यह "शरीर के मैल" का उतारना नहीं, बल्कि परमेश्वर से अच्छे विवेक का वाचा है, और यह सब "यीशु मसीह के जी उठने" के द्वारा होता है। यानी बचाने वाला पानी नहीं, पुनरुत्थित मसीह है; बपतिस्मा उस विश्वास का सार्वजनिक चिह्न और वाचा है जो मसीह से जुड़ता है। पूरी पत्री इसी बात पर खड़ी है कि छुटकारा मसीह के बहुमूल्य लहू से हुआ (1 पतरस 1:18-19)।

"राज-पदधारी याजकों का समाज" का क्या मतलब है?

1 पतरस 2:9 में यह वाक्यांश निर्गमन 19:6 से आता है, जहाँ परमेश्वर इस्राएल को याजकीय राज्य कहते हैं। पतरस इसे कलीसिया पर लागू करता है, इसलिए हर विश्वासी को परमेश्वर तक सीधी पहुँच है और साथ ही दूसरों के लिए परमेश्वर के सामने खड़े होने की ज़िम्मेदारी भी। इसका अर्थ यह नहीं कि कलीसिया में अगुवाई या चरवाही की ज़रूरत नहीं; पतरस स्वयं प्राचीनों को निर्देश देता है (1 पतरस 5:1-4)। अर्थ यह है कि कोई भी विश्वासी परमेश्वर की सेवा में दूसरे दर्जे का नहीं।

1 पतरस 5:8 में शैतान को गर्जनेवाला सिंह क्यों कहा गया है?

यह चित्र ख़तरे और शोर, दोनों को दिखाता है। सिंह की गर्जन शिकार को डराकर झुंड से अलग करती है, और पतरस का संदर्भ भी यही है: सताव के समय डर विश्वासी को अकेला कर देता है। इसीलिए अगला वचन उपाय बताता है, "विश्वास में दृढ़ होकर" सामना करो और याद रखो कि दुनिया भर में भाई-बहन ऐसे ही दुःख भुगत रहे हैं (1 पतरस 5:9)। ध्यान दीजिए, शैतान यहाँ सिंह "के समान" है; असली सिंह यहूदा के गोत्र का है, और वह जय पा चुका है।

1 पतरस में "बेबीलोन" कौन सा शहर है?

1 पतरस 5:13 में पतरस "बेबीलोन" से अभिवादन भेजता है। उस समय मूल बेबीलोन लगभग उजाड़ था, और पतरस के साथ मरकुस का होना रोम की परंपरा से मेल खाता है, इसलिए अधिकांश व्याख्याकार इसे रोम के लिए सांकेतिक नाम मानते हैं, जैसा प्रकाशितवाक्य में भी मिलता है। यह नाम संयोग से नहीं चुना गया: जैसे इस्राएल बाबुल में परदेशी था, वैसे ही कलीसिया इस संसार में परदेशी है। पत्री का पहला शब्द "परदेशियों" और आख़िरी अभिवादन "बेबीलोन", दोनों एक ही सच्चाई कहते हैं।

क्या 1 पतरस दासों से कहता है कि वे अन्याय चुपचाप सहें?

1 पतरस 2:18-25 घरेलू सेवकों से कहता है कि वे कठोर मालिकों के अधीन भी भलाई करते रहें, पर यह अन्याय को सही ठहराना नहीं है। पतरस उसी सांस में अन्याय को अन्याय कहता है और मसीह का उदाहरण देता है, जिसने गाली सहकर बदले में गाली नहीं दी बल्कि "अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंप दिया"। यानी बदला लेने के बजाय न्याय परमेश्वर के हाथ में छोड़ना सिखाया जा रहा है। यह उस गुलाम को गरिमा देता है जिसे समाज ने चीज़ समझा था।

1 पतरस 3:15 को व्यवहार में कैसे जिया जाए?

पद कहता है, "पर मसीह को प्रभु जानकर अपने अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ।" इसका मतलब बहस जीतना नहीं, बल्कि अपनी आशा का कारण सरल शब्दों में बता पाना है। व्यवहार में इसका अर्थ है कि आप दो या तीन मिनट में बता सकें कि यीशु मसीह ने आपके जीवन में क्या किया, और यह बात नम्रता से कहें, तानाकशी या घमंड के बिना। ध्यान दीजिए, यह पद मानता है कि लोग पूछेंगे, क्योंकि आपका जीवन सवाल खड़ा करेगा।

क्या परमेश्वर ही दुःख भेजते हैं?

1 पतरस दुःख का कारण सुलझाने की कोशिश नहीं करता, पर वह दो बातें दृढ़ता से कहता है। पहली, दुःख परमेश्वर के नियंत्रण से बाहर नहीं; विश्वासी "परमेश्वर की इच्छा के अनुसार" भी दुःख उठा सकते हैं और तब वे अपने प्राण "विश्वासयोग्य सृजनहार" के हाथ में सौंप देते हैं (1 पतरस 4:19)। दूसरी, दुःख का उद्देश्य नाश नहीं, शुद्धिकरण है, जैसे आग सोने को निखारती है (1 पतरस 1:6-7)। इसलिए सही सवाल "क्यों" से बढ़कर "किसके हाथ में" बन जाता है।

इस पत्री को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

सबसे पहले पूरी पत्री एक ही बैठक में पढ़िए, अगर हो सके तो ऊँची आवाज़ में। इसमें बीस मिनट से ज़्यादा नहीं लगते, और यही इसका मूल रूप है; पहली सदी की कलीसियाओं में यह पत्र मण्डली के सामने पढ़कर सुनाया जाता था। बीच में टिप्पणियाँ पढ़ने की जल्दी मत कीजिए। पहले आवाज़ को सुनिए, फिर सवाल पूछिए।

दूसरे चरण में इसे चार हफ़्तों में बाँटिए। पहला हफ़्ता 1 पतरस 1:1 से 2:10 तक, जिसमें आप अपनी पहचान की नींव पढ़ेंगे। दूसरा हफ़्ता 1 पतरस 2:11 से 3:12 तक, जहाँ यह पहचान घर, काम और समाज में उतरती है। तीसरा हफ़्ता 1 पतरस 3:13 से 4:19 तक, जो दुःख और गवाही का खंड है। चौथा हफ़्ता 1 पतरस 5 पूरा, चरवाहे, नम्रता, चिंता और विरोधी के बारे में। हर हफ़्ते एक ही खंड को कई बार पढ़िए, नया खंड जल्दी मत लीजिए।

तीसरा सुझाव पेंसिल का है। पढ़ते हुए चार शब्दों को हर बार चिह्नित कीजिए: आशा, दुःख, महिमा और अनुग्रह। जब आप देखेंगे कि दुःख और महिमा लगभग हमेशा साथ-साथ आते हैं, तो पतरस का पूरा तर्क अपने आप खुल जाएगा। साथ में भजन संहिता 34 और यशायाह 53 भी पढ़िए, क्योंकि पतरस की सोच इन्हीं अध्यायों के पानी से सींची गई है।

चौथा, दो पद याद कर लीजिए: 1 पतरस 1:3 सुबह के लिए और 1 पतरस 5:7 रात के लिए। याद किया हुआ वचन उस समय काम आता है जब किताब हाथ में नहीं होती, और दुःख अक्सर ऐसे ही वक़्त पर आता है।

पाँचवाँ, इसे अकेले मत पढ़िए। 1 पतरस 5:9 की दवा ही यह जानना है कि दूसरे भी यही सह रहे हैं। किसी एक मित्र, जीवनसाथी या छोटे समूह के साथ पढ़िए और हर हफ़्ते एक सवाल पर बात कीजिए: इस खंड में परमेश्वर मेरे बारे में क्या कहते हैं, और इस हफ़्ते मुझे किस एक जगह पर नम्रता या भलाई चुननी है?

अंत में, प्रार्थना में पढ़िए। हर बैठक के बाद अपनी एक ठोस चिंता नाम लेकर परमेश्वर के हाथ में सौंप दीजिए, और उन लोगों के लिए प्रार्थना कीजिए जिनकी वजह से आपको अपने विश्वास की क़ीमत चुकानी पड़ रही है। पत्री पढ़ने का सबसे सही तरीक़ा घुटनों पर है।

अंत में

1 पतरस दुःख का गणित नहीं समझाती। वह यह नहीं बताती कि आपकी बीमारी कब ठीक होगी, आपका परिवार कब समझेगा, या वह दरवाज़ा कब फिर से खुलेगा जो आपके विश्वास के कारण बंद हुआ। वह इससे कहीं ज़्यादा गहरा काम करती है: वह आपके हाथ में एक नया नाम रख देती है। चुना हुआ। याजक। परदेशी और यात्री। परमेश्वर की निज प्रजा। जीवित आशा का वारिस। और जब आपको पता हो कि आप कौन हैं, तब वह आग जो आपको निगलने आई थी, आपको निखारने लगती है।

इसीलिए पतरस अपने पत्र के अंत में यह नहीं कहता कि "धीरज रखो, हालात सुधर जाएँगे"। वह कहता है कि परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह यही है, इसी में स्थिर रहो (1 पतरस 5:12)। दुःख पर लिखी यह चिट्ठी असल में अनुग्रह की चिट्ठी निकली।

अब आगे क्या? इस पत्री के पाँचों अध्यायों को उस चार-हफ़्ते की योजना से पढ़िए, 1 पतरस 2:9 को कागज़ पर लिखकर वहाँ चिपकाइए जहाँ आप हर सुबह देखते हैं, और जिन पदों की चर्चा यहाँ हुई, उन पर अलग-अलग विस्तार से पढ़िए। और एक प्रार्थना से शुरुआत कीजिए: प्रभु, मेरी पहचान मेरे हालात से नहीं, आपके वचन से तय हो।

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