प्रकाशितवाक्य की पुस्तक: अंत के दर्शन और मसीह की जय
परिचय
पत्मुस एक पथरीला, हवा से पिटा हुआ टापू था; एजियन सागर में रोमी साम्राज्य का एक कोना जहाँ परेशान करने वाले लोगों को फेंक दिया जाता था। वहाँ एक बूढ़ा आदमी है, जिसकी पीठ शायद खदान के काम से झुक चुकी है, और जिसके सारे साथी या तो मर चुके हैं या दूर हैं। उसी आदमी को, रविवार के दिन, स्वर्ग खुला हुआ दिखाई देता है। और जो कुछ वह देखता है, वह अपनी उन कलीसियाओं को लिख भेजता है जो एशिया माइनर के शहरों में डरी हुई, थकी हुई और कहीं-कहीं समझौता करती हुई जी रही हैं।
प्रकाशितवाक्य की पुस्तक वहीं से जन्मी है। यह किसी सनसनीखेज भविष्यवक्ता की कल्पना नहीं, बल्कि एक बंदी चरवाहे का पत्र है जो अपने झुंड से कहता है: परदे के पीछे देखो, सिंहासन खाली नहीं है।
इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पुस्तक किसने, कब और क्यों लिखी, इसकी बनावट कैसी है, इसके मुख्य विषय और पद क्या हैं, बाइबल के पूरे कथानक में यह कहाँ बैठती है, और इसे बिना डरे, भक्ति के साथ कैसे पढ़ा जाए।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकांश लेख प्रकाशितवाक्य को भविष्य का नक्शा मानकर पढ़ते हैं: कौन-सी घटना कब होगी, कौन-सा राष्ट्र कौन-सा पशु है। हम यहाँ दूसरा रास्ता लेते हैं। प्रकाशितवाक्य पहले-पहल एक कैलेंडर नहीं, बल्कि एक खुला हुआ स्वर्ग है, जो दबाव में जी रहे साधारण विश्वासियों को दिखाया गया कि वे जान लें कि असल में राज कौन कर रहा है। इसका केंद्र सिंहासन है, और सिंहासन पर बैठा हुआ वह मेम्ना है जो वध किया गया था। इसलिए इस पुस्तक की जय क्रूस के आकार की है: लहू, गवाही और धीरज से मिलने वाली जय। इसी दृष्टिकोण से हम पूरी पुस्तक को पढ़ेंगे।
बाइबल प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?
पुस्तक खुद अपना परिचय देती है, और यह परिचय बहुत कुछ तय कर देता है। पहला शब्द ही "यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य" है, यानी यह पहले किसी अंतिम समय की समय-सारिणी का उद्घाटन नहीं, बल्कि एक व्यक्ति का उद्घाटन है। जो परदा हटता है, उसके पीछे कोई तारीख नहीं, एक चेहरा है। और यूहन्ना उस चेहरे को देखकर मरे हुए के समान गिर पड़ता है, तब वह हाथ उसे छूकर कहता है कि मत डर, क्योंकि मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ उसी के पास हैं।
इसी शुरुआत में परमेश्वर स्वयं बोलते हैं। प्रकाशितवाक्य 1:8 कहता है, "प्रभु परमेश्वर, जो है, और जो था, और जो आनेवाला है; जो सर्वशक्तिमान है: यह कहता है, कि मैं ही अल्फा और ओमेगा हूँ।" ध्यान दीजिए, यहाँ यह नहीं कहा गया कि वे "जो होंगे", बल्कि "जो आनेवाला है"। परमेश्वर सिर्फ भविष्य में मौजूद नहीं हैं, वे भविष्य में से हमारी ओर चल कर आ रहे हैं। पूरी पुस्तक इसी वाक्य का विस्तार है: इतिहास का पहला अक्षर और अंतिम अक्षर एक ही हाथ ने लिखा है। जब आपकी दुनिया बीच के अध्यायों में उलझी हुई लगे, तो यह पद आपको याद दिलाता है कि कहानी का लेखक कौन है।
फिर पुस्तक हमें सीधे उन कलीसियाओं में ले जाती है जहाँ लोग असली दबाव में हैं। इफिसुस ने अपना पहला प्रेम छोड़ दिया है, स्मुरना गरीब और सताई हुई है, पिरगमुन में शहीद हुए हैं, थुआतीरा में समझौता है, सरदीस नाम का जीवित है पर मरा हुआ है, फिलदिलफिया के पास थोड़ा सा सामर्थ्य है, और लौदीकिया न ठंडी है न गर्म। इन्हीं में से सबसे नाजुक कलीसिया के दरवाजे पर प्रभु स्वयं खड़े हैं। प्रकाशितवाक्य 3:20 कहता है, "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ।" यह पद अक्सर सुसमाचार प्रचार में उद्धृत होता है, और वह गलत नहीं; पर इसका पहला निशाना एक आत्मसंतुष्ट कलीसिया थी जिसने मसीह को अपनी ही सभा से बाहर कर दिया था। जिस मसीह को हम मानते हैं, वही कभी-कभी हमारे दरवाजे के बाहर खड़ा रह जाता है।
पुस्तक का धड़कता हुआ हृदय अध्याय चार और पाँच में है। यूहन्ना स्वर्ग में एक सिंहासन देखता है और उस पर बैठे हुए के दाहिने हाथ में एक मुहरबंद पुस्तक, यानी इतिहास की योजना। कोई उसे खोलने योग्य नहीं मिलता और यूहन्ना फूट-फूट कर रोता है। तब उससे कहा जाता है कि यहूदा के गोत्र का सिंह जयवन्त हुआ है। पर जब वह मुड़कर देखता है, तो सिंह नहीं दिखता; एक मेम्ना दिखता है, मानो वध किया हुआ। यही प्रकाशितवाक्य की सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात है। सिंह की जय मेम्ने के घावों से होकर आई है। और स्वर्ग गाता है। प्रकाशितवाक्य 5:9 में यह नया गीत है: "तू ही इस पुस्तक के लेने, और उसकी मुहरें खोलने के योग्य है; क्योंकि तूने वध होकर अपने लहू से हर एक कुल, और भाषा, और लोग, और जाति में से परमेश्वर के लिये लोगों को मोल लिया है।"
यह पद पूरी पुस्तक का ताला खोलने वाली चाबी है। मसीह इसलिए इतिहास चलाने के योग्य हैं क्योंकि उन्होंने उसे खरीदा है, और उन्होंने जो खरीदा वह हर भाषा और हर जाति में से लोग हैं, जिनमें हमारी भाषा और हमारी जाति भी शामिल है। जो पुस्तक बाद में न्याय, तुरहियों और कटोरों की बात करेगी, वह पहले एक भजन गाती है। प्रकाशितवाक्य में उपासना कोई अंतराल नहीं, वही असली राजनीति है: यह घोषित करना कि सिंहासन कैसर का नहीं, मेम्ने का है।
लेखक, समय और वह दुनिया जिसमें यह लिखी गई
पुस्तक अपने लेखक का नाम चार बार बताती है: यूहन्ना। वह खुद को प्रेरित नहीं, बल्कि "तुम्हारा भाई और यीशु के क्लेश, और राज्य, और धीरज में तुम्हारा सहभागी" कहता है। दूसरी सदी के आरम्भिक गवाह, जैसे यूस्तीनुस और इरिनेयुस, इस यूहन्ना को जब्दी के पुत्र, प्रेरित यूहन्ना के रूप में पहचानते हैं, जो यूहन्ना का सुसमाचार और तीन पत्रियाँ भी लिखता है। कुछ प्राचीन आवाजें एक दूसरे "प्राचीन यूहन्ना" की बात करती हैं, और भाषा-शैली का अंतर सचमुच ध्यान देने योग्य है; पर कलीसिया की सामान्य परंपरा और पुस्तक का अधिकारपूर्ण स्वर मिलकर प्रेरित यूहन्ना की ओर ही इशारा करते हैं। ध्यान रखिए, लेखक का यह प्रश्न पुस्तक के संदेश को नहीं बदलता; यह पुस्तक अपने अधिकार का दावा किसी नाम पर नहीं, उस दर्शन पर करती है जो उठे हुए प्रभु ने दिया।
समय के बारे में दो मुख्य सुझाव हैं। अधिकांश विद्वान इसे सम्राट दोमिशियन के शासन के अंत, यानी लगभग 95 ईस्वी में रखते हैं; यह इरिनेयुस की गवाही से मेल खाता है और उन कलीसियाओं की स्थिति से भी, जो कुछ दशक पुरानी हो चुकी हैं और जिनमें ठंडापन आ गया है। कुछ लोग इसे 68 या 69 ईस्वी में, नीरो के बाद और यरूशलेम के मंदिर के विनाश से पहले रखते हैं। दोनों ही स्थितियों में पृष्ठभूमि एक जैसी है: सम्राट-पूजा, व्यापारी संघों के मूर्तिपूजक भोज, स्थानीय बहिष्कार, और कहीं-कहीं खुला खून। अन्तिपास का नाम पुस्तक में शहीद के रूप में आता है, और स्मुरना से कहा जाता है कि उनमें से कुछ बंदीगृह में डाले जाएँगे।
यही वह दुनिया है जिसमें यह पुस्तक पढ़ी जाती थी, ऊँची आवाज में, इकट्ठी हुई मंडली के सामने; इसीलिए इसकी शुरुआत में पढ़ने वाले और सुनने वालों दोनों पर आशीष कही गई है। और यही हमारे दृष्टिकोण को पुष्ट करता है: यह किताब लाइब्रेरी में शोध के लिए नहीं, बल्कि उपासना में हिम्मत बंधाने के लिए लिखी गई। इसका पहला सवाल यह नहीं था कि "दुनिया कब खत्म होगी", बल्कि यह कि "जब रोम इतना बड़ा लगता है, तब क्या परमेश्वर सचमुच राज कर रहे हैं?"
बाइबल में चलने वाला सूत्र
प्रकाशितवाक्य में लगभग कोई सीधा उद्धरण नहीं है, फिर भी इसके तीन सौ से अधिक स्थान पुराने नियम की गूँज से भरे हैं। यह पुस्तक बाइबल के अंत में इसलिए नहीं है कि यह सबसे बाद में लिखी गई, बल्कि इसलिए कि यह हर उस धागे को समेटती है जो उत्पत्ति से चला आ रहा था।
शुरुआत में एक बगीचा था, एक नदी, जीवन का वृक्ष, और परमेश्वर की उपस्थिति में मनुष्य। पाप ने वह सब तोड़ दिया, और अदन के द्वार पर तलवार खड़ी हो गई। प्रकाशितवाक्य के अंतिम दो अध्यायों में वही नदी बहती है, वही जीवन का वृक्ष फल लाता है, पर अब बगीचा एक नगर बन चुका है, और अब कोई श्राप नहीं है। बाइबल की कहानी एक बगीचे से शुरू होकर एक नगर में पूरी होती है, और बीच में मेम्ना खड़ा है।
निर्गमन की गूँज तो और भी साफ है। मिस्र पर विपत्तियाँ आई थीं; प्रकाशितवाक्य में तुरहियों और कटोरों के न्याय उन्हीं का बड़ा रूप हैं। इस्राएल ने वध किए हुए मेम्ने के लहू से छुटकारा पाया और फिर लाल समुद्र के किनारे मूसा का गीत गाया; प्रकाशितवाक्य 15 में जयवन्त लोग "मूसा का गीत और मेम्ने का गीत" गाते हैं। जो जाति मिस्र से निकाली गई थी, वह अब हर जाति में से मोल ली गई भीड़ बन चुकी है, ठीक वैसे ही जैसे प्रकाशितवाक्य 5:9 कहता है।
भविष्यद्वक्ताओं का हिस्सा भी उतना ही गहरा है। दानिय्येल ने चार पशु समुद्र में से निकलते देखे थे और "मनुष्य के सन्तान सरीखे" एक जन को बादलों के साथ आते हुए; यूहन्ना उसी दृश्य को आगे बढ़ाता है। यहेजकेल का सिंहासन-दर्शन, उसका नापने वाला मंदिर, गोग और मागोग, ये सब यहाँ लौटते हैं। जकर्याह के घोड़े, यशायाह का नया आकाश और नई पृथ्वी, यिर्मयाह का गिरा हुआ बाबुल, सब मिलकर यूहन्ना की भाषा बनते हैं। जो पाठक पुराना नियम जानता है, उसके लिए प्रकाशितवाक्य अजनबी नहीं लगता; वह एक जानी-पहचानी धुन का अंतिम अंतरा लगता है।
और सब कुछ मसीह में पूरा होता है। जो मेम्ना पसह में मारा गया, वही सिंहासन के बीच खड़ा है। जो दाऊद का वंशज प्रतिज्ञा में था, वही "दाऊद का मूल और वंश" कहलाता है। जिस मंदिर में परमेश्वर की महिमा बसती थी, उसकी जगह नए यरूशलेम में कोई मंदिर नहीं, क्योंकि प्रभु परमेश्वर सर्वशक्तिमान और मेम्ना ही उसका मंदिर हैं। नए नियम की बाकी पुस्तकों ने जो आशा बोई थी, प्रकाशितवाक्य उसकी फसल दिखाता है: पौलुस ने लिखा था कि अंतिम शत्रु मृत्यु का नाश होगा, यूहन्ना उसे आग की झील में गिरते देखता है। बाइबल एक ही कहानी है, और उसका अंत रोना नहीं, विवाह-भोज है।
रचना और मुख्य विषय
प्रकाशितवाक्य को समझने में सबसे बड़ी मदद यह जानना है कि यह तीन साहित्यिक रूपों का मिश्रण है। यह एक पत्र है, जिसमें अभिवादन और अंतिम आशीष है और जो सात असली कलीसियाओं को संबोधित है। यह भविष्यद्वाणी है, जो भविष्य बताने से पहले वर्तमान को परमेश्वर की दृष्टि से पढ़ती है और पश्चाताप के लिए बुलाती है। और यह प्रकाशन-साहित्य है, वह शैली जिसमें दानिय्येल और यहेजकेल के हिस्से भी आते हैं, जहाँ सत्य चित्रों, संख्याओं और प्रतीकों में कहा जाता है। इसीलिए यह पूछना गलत सवाल है कि "क्या यह शाब्दिक है या प्रतीकात्मक"; सही सवाल यह है कि "यह चित्र क्या कह रहा है, और यह किस असली सच्चाई की ओर इशारा कर रहा है"।
बनावट में सात का अंक बार-बार लौटता है, क्योंकि सात पूर्णता का चिह्न है। सात कलीसियाओं के पत्र, सात मुहरें, सात तुरहियाँ, सात कटोरे, और बीच-बीच में सात दर्शन। पहला अध्याय मसीह के दर्शन से खुलता है। अध्याय दो और तीन में वे सात पत्र हैं जो नाम लेकर हर कलीसिया की बीमारी और दवा बताते हैं। अध्याय चार और पाँच सिंहासन-कक्ष हैं, पुस्तक का धुरी-बिंदु। इसके बाद अध्याय छह से सोलह तक न्याय की तीन शृंखलाएँ चलती हैं, जो एक के बाद एक घटने वाली घटनाओं की सूची से ज्यादा एक ही सच्चाई के तीन बढ़ते हुए चक्र लगती हैं, हर बार गहरा और अधिक अंतिम। बीच में विश्राम के दृश्य हैं: मुहर लगाए गए लोग, दो गवाह, आकाश में स्त्री और अजगर, मेम्ने के साथ सिय्योन पर्वत पर खड़े लोग।
अध्याय सत्रह से बीस तक बड़ी बाबुल का पतन, मेम्ने का विवाह-भोज, श्वेत घोड़े पर सवार का आना, हजार वर्ष और अंतिम न्याय आता है। और फिर अध्याय इक्कीस और बाईस में नया आकाश, नई पृथ्वी और नया यरूशलेम, जहाँ परमेश्वर स्वयं अपने लोगों के साथ वास करते हैं।
विषयों की बात करें तो पाँच बार-बार लौटते हैं। पहला, परमेश्वर की सर्वोच्चता: सिंहासन शब्द इस पुस्तक में चालीस से अधिक बार आता है, जबकि साम्राज्य की गद्दी एक बार भी स्थिर नहीं दिखती। दूसरा, वध किए गए मेम्ने की जय, जो हमारे दृष्टिकोण का केंद्र है; बुराई तलवार से नहीं, बलिदान से हारी। तीसरा, गवाही और धीरज: संतों को दुनिया बदलने के लिए नहीं, विश्वासयोग्य बने रहने के लिए बुलाया गया है। चौथा, न्याय की सच्चाई; परमेश्वर इतिहास के अन्याय को अनदेखा नहीं करते, और यह पीड़ितों के लिए बुरी नहीं, बहुत अच्छी खबर है। और पाँचवाँ, उपासना, जो हर संकट के बीच में फूट पड़ती है, मानो स्वर्ग हमें गाना सिखा रहा हो जब तक कि हमारा डर धुन में न आ जाए।
इस पुस्तक के मुख्य पद
प्रकाशितवाक्य 12:11 पूरी पुस्तक की रणनीति एक वाक्य में रख देता है: "और वे मेम्ने के लहू के कारण, और अपनी गवाही के वचन के कारण, उस पर जयवन्त हुए, क्योंकि उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहाँ तक कि मृत्यु भी सह ली।" यहाँ तीन बातें जुड़ी हैं। जय का आधार मेम्ने का लहू है, यानी वह काम जो हमारे बिना, हमारे लिए पूरा हो चुका है। जय का माध्यम गवाही का वचन है, यानी वह सच जो हम कहते और जीते हैं। और जय की कीमत यह है कि हम अपनी जान से चिपके नहीं रहते। ध्यान दीजिए, संत जीतते हैं और फिर भी मारे जाते हैं; इस पुस्तक में हार जैसा दिखने वाला ही असली जय है। जो व्यक्ति अपनी नौकरी, अपनी इज्जत या अपनी सुरक्षा से ज्यादा मसीह को प्रिय जानता है, उस पर शैतान के पास कोई पकड़ नहीं बचती।
प्रकाशितवाक्य 19:11 उस क्षण को खोलता है जिसकी ओर पूरी पुस्तक बढ़ रही थी: "फिर मैंने स्वर्ग को खुला हुआ देखा, और देखता हूँ कि एक श्वेत घोड़ा है; और उस पर एक सवार है, जो विश्वासयोग्य, और सत्य कहलाता है; और वह धार्मिकता के साथ न्याय और लड़ाई करता है।" जो पहली बार बछेड़े पर बैठकर नम्रता से आए थे, वे अब श्वेत घोड़े पर राजा के रूप में आते हैं। पर उनका वस्त्र लड़ाई से पहले ही लहू में डूबा हुआ है, यानी वह लहू पहले उनका अपना है। और उनका हथियार उनके मुँह से निकलने वाली तलवार है, उनका वचन। जिस मुँह ने सृष्टि रची, वही बुराई को समाप्त करेगा। यह पद हमें दो झूठों से बचाता है: कि परमेश्वर हमेशा चुप रहेंगे, और कि उनका न्याय मनमाना होगा। वे विश्वासयोग्य हैं, और वे धार्मिकता के साथ न्याय करते हैं।
प्रकाशितवाक्य 21:4 पुस्तक का सबसे कोमल वाक्य है: "और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं।" गौर कीजिए कि परमेश्वर आँसू पोंछते हैं, यानी वे इतने पास आते हैं कि उनका हाथ हमारे चेहरे को छूता है। यह किसी ठंडी अनंतता का वादा नहीं, एक व्यक्तिगत सांत्वना है, उस पिता की तरह जो झुककर बच्चे का चेहरा साफ करता है। और वह सूची जो इसके बाद आती है, मृत्यु, शोक, विलाप, पीड़ा, ठीक वही सूची है जिसने हमारी दुनिया को थका रखा है। प्रकाशितवाक्य इन्हें छोटा नहीं बताता; यह उन्हें अस्थायी बताता है। यही अंतर आशा और आशावाद में है।
पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
सबसे पहले, इसे एक ही बैठक में, शुरू से अंत तक, ऊँची आवाज में पढ़ने की कोशिश कीजिए। इसमें लगभग सवा घंटा लगता है, और यह ठीक वैसा ही अनुभव है जैसा पहली सदी की उन मंडलियों का था। जब आप टुकड़ों में पढ़ते हैं, तो चित्र डरावने लगते हैं; जब आप पूरा पढ़ते हैं, तो आप देखते हैं कि हर अंधेरे दृश्य के बाद स्वर्ग गाने लगता है।
दूसरा, चार अध्यायों को अपना लंगर बनाइए: पहला, पाँचवाँ, इक्कीसवाँ और बाईसवाँ। पहला अध्याय आपको दिखाता है कि यह किसके बारे में है, पाँचवाँ बताता है कि जय कैसे मिली, और अंतिम दो बताते हैं कि कहानी कहाँ पहुँचेगी। बीच के कठिन अध्याय इन चार खंभों के बीच तने हुए कपड़े की तरह हैं। जो समझ में न आए, उसे नोट कर लीजिए और आगे बढ़िए; पहली बार सब कुछ समझने की कोशिश मत कीजिए।
तीसरा, पुराने नियम के साथ पढ़िए। दानिय्येल के अध्याय सात से बारह, यहेजकेल के अध्याय एक से तीन और सैंतीस से अड़तालीस, निर्गमन के अध्याय सात से पंद्रह, और जकर्याह की पूरी पुस्तक; इन्हें पास रखकर पढ़ने से आधे प्रतीक अपने आप खुलने लगते हैं।
चौथा, हर अध्याय के बाद तीन सवाल पूछिए: यहाँ परमेश्वर या मेम्ने के बारे में क्या कहा गया है, यहाँ परमेश्वर के लोगों से क्या माँगा गया है, और यहाँ किस बात की आशा दी गई है। इन तीन सवालों से आप कभी भी षड्यंत्र-सिद्धांतों की गली में नहीं भटकेंगे।
पाँचवाँ, इसे प्रार्थना में बदलिए। हर दर्शन के साथ जुड़े गीत, जैसे अध्याय चार, पाँच, ग्यारह और पंद्रह के भजन, उन्हें अपनी आवाज में पढ़िए। और अंत में पुस्तक की अपनी प्रार्थना अपनाइए। प्रकाशितवाक्य 22:20 कहता है, "जो इन बातों की गवाही देता है, वह यह कहता है, 'हाँ, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ।' आमीन। हे प्रभु यीशु आ!" यह पुस्तक तब सही पढ़ी गई है जब वह आपको बहस करने वाला नहीं, बल्कि प्रतीक्षा करने वाला और प्रेम करने वाला बना दे।
अंत में एक चेतावनी। अगर पढ़ते समय आपके भीतर डर, संदेह या दूसरों के बारे में कठोर निर्णय बढ़ रहे हैं, तो रुकिए और अध्याय पाँच पर लौट जाइए। जो पुस्तक मेम्ने की उपासना से शुरू होती है, वह हमें कड़वा नहीं, नम्र बनाती है।
दर्पण
अब सीधे आपसे। आप शायद इस पुस्तक से इसलिए बचते रहे हैं कि यह डरावनी लगती है, या इसलिए पढ़ते रहे हैं कि यह रोमांचक लगती है। दोनों ही में एक खतरा है: आप सिंहासन को छोड़कर समाचारों में उलझ जाएँ।
सोचिए कि आपके सोमवार की सुबह क्या तय करती है। किसकी नाराजगी से आप सबसे ज्यादा डरते हैं, बॉस की या परमेश्वर की? किस चीज को खोने के डर से आपने पिछली बार सच बोलना टाल दिया, प्रमोशन, रिश्ता, या घर में शांति? प्रकाशितवाक्य 12:11 उन लोगों की बात करता है जिन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना। हममें से ज्यादातर को खून नहीं देना पड़ेगा, पर हमें रोज छोटी-छोटी मौतें चुननी होंगी: वह सौदा ठुकराना जिसमें रिश्वत छिपी है, वह चुप्पी तोड़ना जो सुविधाजनक थी, उस रिश्तेदार के सामने मसीह का नाम लेना जिसके ताने चुभते हैं।
और लौदीकिया वाली बात। प्रकाशितवाक्य 3:20 का दरवाजा किसी नास्तिक का नहीं, कलीसिया का दरवाजा था। हो सकता है आप हर रविवार जाते हों, चंदा देते हों, गीत गाते हों, और फिर भी मसीह आपके भीतरी जीवन के बाहर खड़े हों, खटखटाते हुए, जबकि भीतर टीवी चल रहा है, फोन जल रहा है, और थकान बिस्तर पर बैठी है।
अगर आपके जीवन में इस समय कुछ टूटा हुआ है, बीमारी, बाँझपन, अकेलापन, कर्ज, या कोई कब्र जिस पर आप अब भी जाते हैं, तो प्रकाशितवाक्य 21:4 आपसे कहता है कि आपके आँसू परमेश्वर की गिनती में हैं, और एक दिन वे उन्हें अपने हाथ से पोंछेंगे। यह पद आपको आपके दुख से भागने नहीं देता; यह उसे एक तारीख दे देता है।
तो एक सवाल लेकर आगे बढ़िए: अगर सचमुच सिंहासन पर मेम्ना बैठा है, तो इस हफ्ते मेरे किस फैसले को बदलना होगा?
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को प्रकाशितवाक्य से दूर रखने की जरूरत नहीं है, बस सही दरवाजे से भीतर ले जाने की जरूरत है। उन्हें पशुओं और कटोरों से शुरू मत कराइए; उन्हें सिंहासन-कक्ष दिखाइए। सबसे आसान तरीका यह है कि आप उन्हें कहानी के आखिरी पन्ने पर ले जाएँ और कहें: बाइबल एक बहुत लंबी कहानी है, और उसका अंत बहुत खुश करने वाला है। एक दिन यीशु फिर आएँगे, सारी बुरी चीजें खत्म हो जाएँगी, और परमेश्वर हमारे साथ रहने आएँगे। कोई नहीं रोएगा, कोई बीमार नहीं पड़ेगा, कोई नहीं मरेगा।
बच्चों को यह भी बताइए कि आसमान में यूहन्ना ने एक सिंह के बारे में सुना, पर जब उसने देखा तो वहाँ एक मेम्ना खड़ा था। यीशु ताकतवर हैं, पर उनकी ताकत लड़ाई-झगड़े वाली नहीं; उन्होंने हमारे लिए अपनी जान देकर जीत हासिल की। छोटे बच्चों के लिए यह चित्र काफी है, और यह उन्हें डराता नहीं, दिलासा देता है।
अगर घर में बड़े बच्चे हैं जो समाचार देखते हैं और डरते हैं, तो उनके साथ प्रकाशितवाक्य 21:4 पढ़िए और उनसे पूछिए कि वे किस चीज के खत्म होने का सबसे ज्यादा इंतजार करते हैं। यह बातचीत आपको आश्चर्यचकित कर सकती है।
Faith.network पर अलग-अलग उम्र के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए सरल चित्र-कथा वाली शैली में, सात से बारह साल के बच्चों के लिए कहानी और प्रश्नों के साथ, और बारह साल से बड़े किशोरों के लिए उन कठिन सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं। परिवार की उपासना में इन्हें साथ पढ़ना बच्चों के मन में डर की जगह आशा बोता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रकाशितवाक्य की पुस्तक किसने लिखी?
पुस्तक अपने लेखक का नाम चार बार यूहन्ना बताती है, जो पत्मुस टापू पर परमेश्वर के वचन और यीशु की गवाही के कारण था। कलीसिया की आरम्भिक परंपरा, विशेषकर इरिनेयुस की गवाही, इसे प्रेरित यूहन्ना, जब्दी के पुत्र से जोड़ती है, जिसने यूहन्ना का सुसमाचार और तीन पत्रियाँ भी लिखीं। कुछ प्राचीन आवाजों ने भाषा-शैली के अंतर के कारण किसी दूसरे "प्राचीन यूहन्ना" की संभावना जताई, पर पुस्तक का अधिकार उसके लेखक के नाम पर नहीं, उस प्रकाशन पर टिका है जो उठे हुए मसीह ने दिया।
प्रकाशितवाक्य कब लिखा गया था?
सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत तिथि लगभग 95 ईस्वी है, सम्राट दोमिशियन के शासन के अंतिम वर्षों में, जब सम्राट-पूजा का दबाव बढ़ रहा था। यह तिथि इरिनेयुस की गवाही से मेल खाती है और सात कलीसियाओं की आत्मिक स्थिति से भी, जो कुछ दशकों पुरानी हो चुकी थीं। कुछ विद्वान इसे 68 या 69 ईस्वी में, नीरो के बाद और यरूशलेम के मंदिर के विनाश से पहले रखते हैं। दोनों ही स्थितियों में परिस्थिति एक जैसी है: दबाव में जी रही कलीसियाओं को धीरज और आशा की जरूरत थी।
666 का असली मतलब क्या है?
प्रकाशितवाक्य 13:18 इसे "मनुष्य का अंक" कहता है और बुद्धि की माँग करता है। सात पूर्णता का अंक है, इसलिए छह बार-बार दोहराया गया अपूर्णता का चिह्न है: वह शक्ति जो परमेश्वर होने का दावा करती है पर कभी वहाँ पहुँच नहीं पाती। पहली सदी के पाठक इसे अक्षरों की संख्या-गणना के जरिए नीरो कैसर से जोड़ते थे, और यह संभव है। पर पुस्तक का उद्देश्य किसी आधुनिक व्यक्ति की पहचान करवाना नहीं है, बल्कि हर उस व्यवस्था को पहचानने में मदद करना है जो उपासना की माँग करती है।
क्या प्रकाशितवाक्य की भविष्यवाणियाँ आज पूरी हो रही हैं?
पुस्तक की व्याख्या के चार मुख्य तरीके हैं: कुछ इसे मुख्यतः पहली सदी की घटनाओं से जोड़ते हैं, कुछ पूरे कलीसियाई इतिहास से, कुछ भविष्य के अंतिम काल से, और कुछ इसे हर युग में दोहराए जाने वाले आत्मिक संघर्ष का चित्र मानते हैं। इनमें सच्चाई के अंश हैं और प्रामाणिक मसीही इन पर असहमत रहे हैं। सुरक्षित रास्ता यह है कि हम समाचारों से पद न मिलाएँ, बल्कि पुस्तक के साफ संदेश पर टिकें: मेम्ना राज कर रहा है, और वह निश्चय आ रहा है।
प्रकाशितवाक्य 3:20 का सही अर्थ क्या है?
यह पद मूल रूप से लौदीकिया की उस कलीसिया से कहा गया था जो धनी और आत्मसंतुष्ट थी, और जिसने अनजाने में मसीह को अपनी सभा से बाहर कर दिया था। इसलिए इसका पहला अर्थ पश्चाताप का बुलावा है: मसीह अपनी ही कलीसिया के दरवाजे पर खड़े होकर भीतर आने और संगति करने की माँग करते हैं। इसे व्यक्तिगत विश्वास के निमंत्रण के रूप में लागू करना भी उचित है, क्योंकि "यदि कोई" कहा गया है। दोनों अर्थों में केंद्र भोजन है, यानी घनिष्ठ, बहाल हुई संगति।
हजार वर्ष के राज्य का क्या अर्थ है?
प्रकाशितवाक्य 20 में हजार वर्ष का उल्लेख छह बार होता है। कुछ इसे मसीह के लौटने के बाद पृथ्वी पर उनके शाब्दिक हजार वर्षीय राज्य के रूप में समझते हैं, कुछ इसे मसीह के पहले और दूसरे आगमन के बीच के पूरे समय का प्रतीकात्मक वर्णन मानते हैं जिसमें वे स्वर्ग से राज करते हैं, और कुछ इसे सुसमाचार की विजय के युग के रूप में देखते हैं। यह अंतर मसीही विश्वास का मूल नहीं है। सभी दृष्टिकोण इस पर सहमत हैं कि मसीह लौटेंगे, न्याय होगा, और शैतान का अंत निश्चित है।
क्या विश्वासी महाक्लेश में से होकर जाएँगे?
नया नियम विश्वासियों को क्लेश से चौंकने के लिए नहीं, धीरज रखने के लिए तैयार करता है। यूहन्ना खुद को "यीशु के क्लेश, और राज्य, और धीरज में तुम्हारा सहभागी" कहता है, और सात कलीसियाओं से बचाव का नहीं, विश्वासयोग्यता का वादा माँगा जाता है। इस बारे में मसीहियों में ईमानदार मतभेद है कि कलीसिया अंतिम महाक्लेश से पहले उठा ली जाएगी या उसमें से होकर सुरक्षित रखी जाएगी। पर पुस्तक का जोर साफ है: सुरक्षा परिस्थितियों से बचने में नहीं, मेम्ने के लहू में है।
नया यरूशलेम क्या है, क्या यह कोई असली शहर है?
प्रकाशितवाक्य 21 में यह नगर दुल्हन के रूप में सजा हुआ स्वर्ग से उतरता है, और उसका नाप एक विशाल घन के आकार का है, ठीक वैसे ही जैसे मंदिर का परमपवित्र स्थान घन के आकार का था। इसका अर्थ है कि पूरा नगर ही परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान है। यह केवल रूपक नहीं, बल्कि एक असली, नई सृष्टि की वास्तविकता है जिसमें पुनरुत्थित शरीरों वाले लोग रहेंगे। पर उसकी असली महिमा सोने की गलियाँ नहीं, यह वाक्य है कि परमेश्वर स्वयं उनके साथ रहेंगे।
प्रकाशितवाक्य 22:18-19 की चेतावनी का क्या मतलब है?
वहाँ कहा गया है कि जो कोई इन बातों में कुछ बढ़ाए या घटाए, उस पर विपत्तियाँ आएँगी और जीवन के वृक्ष में से उसका भाग निकाल लिया जाएगा। यह प्राचीन दुनिया में दस्तावेजों की रक्षा के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा है, और यह व्यवस्थाविवरण 4:2 की गूँज भी है। इसका मुख्य निशाना नकल करने वालों की लापरवाही से ज्यादा उन झूठे शिक्षकों की ओर है जो इस भविष्यद्वाणी के संदेश को तोड़-मरोड़ कर सुविधाजनक बना देते हैं। यह हमें विनम्रता से पढ़ने के लिए बुलाती है।
प्रकाशितवाक्य 1:8 में "अल्फा और ओमेगा" का क्या अर्थ है?
अल्फा यूनानी वर्णमाला का पहला और ओमेगा अंतिम अक्षर है, इसलिए यह कहने का तरीका है कि परमेश्वर आदि भी हैं और अंत भी। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि वे सबसे पहले थे और सबसे बाद तक रहेंगे, बल्कि यह कि इतिहास का पूरा वाक्य उन्हीं का लिखा हुआ है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पुस्तक के अंत में यही उपाधि यीशु मसीह अपने लिए प्रयोग करते हैं, जो उनकी पूर्ण ईश्वरत्व की स्पष्ट घोषणा है।
प्रकाशितवाक्य में मेम्ने और सिंह का चित्र एक साथ क्यों है?
अध्याय पाँच में यूहन्ना सुनता है कि यहूदा के गोत्र का सिंह जयवन्त हुआ है, पर जब वह देखता है तो एक मेम्ना खड़ा है, मानो वध किया हुआ। यह जानबूझकर किया गया विरोधाभास पूरी पुस्तक की व्याख्या की चाबी है: परमेश्वर की सामर्थ्य हिंसा से नहीं, आत्मबलिदान से प्रकट होती है। मसीह सचमुच राजा और न्यायी हैं, पर वे राज करने के योग्य इसलिए हैं क्योंकि वे मरे और जी उठे। इसलिए उनके लोग भी उसी तरीके से जीतते हैं, जैसा प्रकाशितवाक्य 12:11 बताता है।
प्रकाशितवाक्य पढ़ते समय डर क्यों लगता है, और इससे कैसे बचें?
डर अक्सर तब आता है जब हम पुस्तक को बीच से, टुकड़ों में और सनसनीखेज व्याख्याओं के साथ पढ़ते हैं। इसका इलाज यह है कि पहले अध्याय एक, चार, पाँच, इक्कीस और बाईस को अच्छी तरह पढ़ें, ताकि आपकी कल्पना में सबसे पहले सिंहासन और मेम्ना बैठ जाएँ। याद रखिए कि पुस्तक की पहली आवाज कहती है, "मत डर", और उसकी अंतिम आवाज एक प्रार्थना है। जो पाठक मेम्ने के हैं, उनके लिए यह पुस्तक धमकी नहीं, घर लौटने का निमंत्रण है।
अंत में
प्रकाशितवाक्य आपको भविष्य की समय-सारिणी थमाने नहीं आई। यह आपको वहाँ ले जाती है जहाँ यूहन्ना को ले जाया गया था: एक खुले हुए द्वार के भीतर, जहाँ सिंहासन है, जहाँ चौबीस प्राचीन झुकते हैं, और जहाँ बीच में वह मेम्ना खड़ा है जिस पर अब भी घाव के निशान हैं। जब यह दृश्य आपकी आँखों में बस जाता है, तो बाकी सब अपनी सही जगह पर आ जाता है: साम्राज्य छोटे लगने लगते हैं, दुख अस्थायी लगने लगता है, और विश्वासयोग्यता समझदारी लगने लगती है।
इसलिए इस पुस्तक को हल किए जाने वाली पहेली की तरह नहीं, सुनी जाने वाली आवाज की तरह लीजिए। अध्याय पाँच से शुरू कीजिए और गाने में शामिल हो जाइए, क्योंकि उसी गीत में आपकी भाषा और आपकी जाति का नाम भी है। फिर अध्याय इक्कीस पढ़िए और अपने आँसुओं को उस हाथ की प्रतीक्षा में रख दीजिए जो उन्हें पोंछेगा। और जब आप पुस्तक बंद करें, तो उसकी अपनी प्रार्थना अपने होंठों पर रहने दीजिए, वही जो हर पीढ़ी के थके हुए संतों ने दोहराई है: हे प्रभु यीशु, आइए।
आगे के अध्ययन के लिए दानिय्येल और यहेजकेल के दर्शनों को साथ पढ़िए, और सात कलीसियाओं के पत्रों को अपनी अपनी मंडली के लिए एक आत्म-परीक्षा की तरह प्रयोग कीजिए।
