रोमियों की पत्री: सुसमाचार और धर्मी ठहराए जाने का सार
परिचय
कुरिन्थुस के एक घर में, संभवतः सन् 57 के किसी सर्दियों की शाम को, एक थका हुआ आदमी बोल रहा है और तिरतियुस नाम का लेखक उसके शब्द चर्मपत्र पर उतार रहा है। बोलने वाला जल्द ही यरूशलेम जाने वाला है, और उसे अंदेशा है कि वहाँ जंजीरें उसका इंतज़ार कर रही हैं। उसका सपना कहीं और है, रोम से भी आगे, स्पेन तक। लेकिन रोम की कलीसिया उसे जानती नहीं। उसके बारे में अफ़वाहें ज़रूर सुनी हैं: कि यह आदमी व्यवस्था के विरुद्ध सिखाता है, कि यह पाप को छूट देता है। तो वह कलम उठवाता है और अपने जीवन का सबसे व्यवस्थित पत्र लिखवाता है।
यह पत्र दो हज़ार साल तक कलीसिया की सबसे गहरी नींव बना रहा। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि रोमियों केवल सिद्धांतों की सूची नहीं है, बल्कि एक ऐसे मिशनरी का दिल है जो चाहता था कि रोम की बँटी हुई कलीसिया एक ही मेज़ पर बैठे, और उसी अनुग्रह पर टिके जिस पर आप और मैं आज भी टिके हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
हम रोमियों को धर्मशास्त्र की पाठ्यपुस्तक की तरह नहीं, बल्कि एक मिशन-पत्र की तरह पढ़ेंगे। पौलुस ने "धर्मी ठहराए जाने" का सबसे स्पष्ट विवरण किसी विश्वविद्यालय के लिए नहीं लिखा, बल्कि इसलिए लिखा कि रोम में यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी एक-दूसरे को ग्रहण करें, और उनकी कलीसिया उसे स्पेन तक भेजने के लिए तैयार हो जाए। इसका अर्थ यह है कि धर्मी ठहराया जाना केवल एक व्यक्तिगत अदालती राहत नहीं है; यह एक नए परिवार का जन्म-प्रमाण है। जहाँ अनुग्रह समझा जाता है, वहाँ दीवारें गिरती हैं और मेज़ें बड़ी होती हैं। यही सूत्र इस पूरे पृष्ठ में लौटकर आएगा।
बाइबल रोमियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?
पौलुस अपना विषय शुरू में ही मेज़ पर रख देता है। पहले अध्याय में, तीन बार अपने आने की इच्छा बताने के बाद, वह लिखता है: "क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिये कि वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिये, चाहे वह यहूदी हो, चाहे यूनानी, उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ है" (रोमियों 1:16)। ध्यान दीजिए, यह पद केवल आत्मविश्वास की घोषणा नहीं है। "चाहे यहूदी हो, चाहे यूनानी" वाला वाक्यांश ही रोम की उस कलीसिया का असली मुद्दा था। दो समुदाय, दो पृष्ठभूमियाँ, दो तरह के खान-पान और त्योहार, और बीच में यह सवाल: परमेश्वर के सामने कौन ज़्यादा स्वीकार्य है? पौलुस का उत्तर है, कोई नहीं और दोनों, क्योंकि उद्धार की सामर्थ हमारी पृष्ठभूमि में नहीं, सुसमाचार में है।
इसके बाद वह कुल्हाड़ी की तरह उतरता है। पहले गैर-यहूदी संसार की मूर्तिपूजा और नैतिक टूटन का चित्र, फिर उन धार्मिक लोगों की परतें खोलना जो दूसरों को दोषी ठहराते हुए वही काम करते हैं। इस लंबे अभियोग का निष्कर्ष एक ही वाक्य में आता है: "इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं" (रोमियों 3:23)। यह पद अकेले नहीं खड़ा; अगला पद इसे पूरा करता है: "परन्तु सेंतमेंत उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, धर्मी ठहराए जाते हैं" (रोमियों 3:24)। "सेंतमेंत" यानी बिना किसी कीमत के, मुफ़्त में। यही रोमियों का हृदय है।
सब एक ही स्तर पर दोषी, सब एक ही द्वार से बचाए गए।
फिर पौलुस पाप की मज़दूरी और परमेश्वर के वरदान का वह प्रसिद्ध विरोधाभास रखता है: "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है" (रोमियों 6:23)। मज़दूरी कमाई जाती है, वरदान दिया जाता है। यह अंतर छोटा लगता है, पर यही धर्म और सुसमाचार के बीच की खाई है। धर्म कहता है, कमाओ; सुसमाचार कहता है, हाथ खोलो और लो।
और यह वरदान किस समय दिया गया? हमारे सुधरने के बाद नहीं। "परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम को इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" (रोमियों 5:8)। पौलुस यहाँ भावुक नहीं हो रहा, वह तर्क कर रहा है। अगर परमेश्वर ने हमें उस हालत में प्रेम किया जब हम शत्रु थे, तो अब जब हम उनके बच्चे हैं, वे हमें छोड़ेंगे कैसे? यही तर्क आठवें अध्याय की उस चट्टान तक ले जाता है जहाँ लिखा है, "अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं" (रोमियों 8:1)।
अंत में, यह सब कैसे मेरा हो जाता है? दसवें अध्याय में उत्तर बिल्कुल सरल शब्दों में आता है: "कि यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा" (रोमियों 10:9)। मुँह और मन, स्वीकारोक्ति और विश्वास, बाहर और भीतर। कोई तीर्थयात्रा नहीं, कोई सूची नहीं। और गौर करें कि यह पद उसी संदर्भ में है जहाँ पौलुस रो रहा है कि उसके अपने लोग यह संदेश ग्रहण नहीं कर रहे। सुसमाचार की सरलता उसके लिए कभी सूखा सिद्धांत नहीं थी, वह आँसुओं में भीगी हुई थी।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
रोमियों का सबसे बड़ा दावा यह है कि यह कोई नया धर्म नहीं गढ़ रहा। पहली आयतों में ही पौलुस कहता है कि यह सुसमाचार वही है जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में पहले से की थी। पूरी पत्री में पचास से ऊपर पुराने नियम के उद्धरण हैं। पौलुस मानो पुराने नियम को खोलकर मेज़ पर फैला देता है और कहता है, देखो, यह सब कहाँ जा रहा था।
उसका मुख्य गवाह अब्राहम है। चौथा अध्याय पूरी तरह उत्पत्ति 15 पर टिका है: "अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिये धार्मिकता गिना गया।" पौलुस का तर्क बहुत बारीक और बहुत निर्णायक है: यह वचन अब्राहम के खतना कराने से पहले कहा गया था, और मूसा की व्यवस्था मिलने से सदियों पहले। इसलिए विश्वास से धर्मी ठहरना कोई आपातकालीन योजना बी नहीं है; यही परमेश्वर का मूल तरीका है। और इसका सीधा परिणाम वह है जो पौलुस को सबसे प्रिय था: अब्राहम केवल खतना वालों का नहीं, विश्वास करने वाले हर जाति के लोगों का पिता है। मिशन-पत्र का सूत्र यहाँ फिर दिखता है, धर्मशास्त्र सीधे मेज़ की चौड़ाई तय कर रहा है।
दूसरा गवाह हबक्कूक है। रोमियों 1:17 में पौलुस उसका वाक्य उठाता है, "विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा।" हबक्कूक ने यह बात बेबीलोन के आक्रमण के अंधेरे में कही थी, जब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। पौलुस उसे एक बड़े सत्य के रूप में पढ़ता है: परमेश्वर के लोग हमेशा वैसे ही जीते आए हैं, दिखाई देने वाले सहारे पर नहीं, वादे पर भरोसा करके।
तीसरा सूत्र आदम है। पाँचवें अध्याय में पौलुस मानव इतिहास को दो आदमियों के इर्द-गिर्द बाँधता है। एक के अवज्ञा से मृत्यु सब तक फैली, दूसरे की आज्ञाकारिता से जीवन उन सब तक पहुँचता है जो उसमें हैं। यह वही वादा है जो उत्पत्ति 3 में साँप के सिर को कुचलने के रूप में पहली बार सुनाई देता है। दास प्रथा से छुटकारा, मेल-बलि, प्रायश्चित का ढकना, ये सब चित्र पौलुस मसीह के क्रूस पर एक साथ रख देता है।
और नौवें से ग्यारहवें अध्याय में यह सूत्र सबसे दर्दभरा हो जाता है। यदि सुसमाचार पुराने नियम की पूर्ति है, तो इस्राएल का बड़ा हिस्सा उसे क्यों नहीं मान रहा? पौलुस न इतिहास को झुठलाता है, न परमेश्वर की सच्चाई को। वह जैतून के पेड़ का चित्र देता है जिसमें जंगली डालियाँ कलम की गई हैं, और चेतावनी देता है कि कलम की गई डाली घमंड न करे। सारी कहानी एक ही जगह पहुँचती है: यहूदी और गैर-यहूदी, दोनों केवल दया के कारण भीतर हैं। अनुग्रह किसी को श्रेष्ठ महसूस करने की जगह नहीं देता।
रचना और मुख्य विषय
रोमियों की बनावट को समझ लेने से आधी उलझन खत्म हो जाती है, क्योंकि पौलुस यहाँ भटकता नहीं, वह क्रम से चलता है।
पहला हिस्सा, 1:1 से 1:17, परिचय और विषय-वाक्य है। पौलुस अपना परिचय दास और प्रेरित के रूप में देता है, रोम के विश्वासियों के विश्वास की प्रशंसा करता है, और अपनी आने की लालसा बताता है। फिर आता है वह घोषणापत्र जिसे हमने ऊपर देखा, सुसमाचार परमेश्वर की सामर्थ है।
दूसरा हिस्सा, 1:18 से 3:20, अभियोग है। यहाँ पौलुस वकील की तरह गवाही जमा करता है। पहले मूर्तिपूजक संसार, फिर नैतिक आलोचक, फिर व्यवस्था वाला यहूदी। निष्कर्ष कठोर है: व्यवस्था से कोई भी धर्मी नहीं ठहरता, व्यवस्था केवल पाप की पहचान कराती है।
तीसरा हिस्सा, 3:21 से 4:25, समाधान है। "परन्तु अब" शब्द के साथ अंधेरे में दरवाज़ा खुलता है। मसीह के लहू के द्वारा प्रायश्चित, विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना, और अब्राहम के उदाहरण से प्रमाण।
चौथा हिस्सा, अध्याय 5 से 8, नए जीवन का हिस्सा है, और यह पत्री का सबसे ऊँचा पहाड़ है। धर्मी ठहराए जाने का फल मेल-मिलाप है, बपतिस्मा हमें मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान से जोड़ता है, पाप अब स्वामी नहीं रहा। सातवें अध्याय में भीतरी संघर्ष का वह ईमानदार चित्र है जिसमें हर विश्वासी अपना चेहरा देखता है, और आठवें अध्याय में पवित्र आत्मा, लेपालकपन, सृष्टि की कराह और अंत में वह विजय-गीत जिसमें कोई भी सामर्थ हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती।
पाँचवाँ हिस्सा, अध्याय 9 से 11, इस्राएल और परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर है। कई पाठक इसे छोड़ देते हैं, पर यह पत्री का दिल-दुखता हिस्सा है, और यह मिशन-पत्र वाले दृष्टिकोण से बिल्कुल तार्किक है: यदि परमेश्वर अपनी पहली प्रतिज्ञाओं से पीछे हट सकते हैं, तो हमारी सुरक्षा भी हवा में है।
छठा हिस्सा, 12:1 से 15:13, व्यवहार का हिस्सा है, और यह अलग विषय नहीं बल्कि पहले ग्यारह अध्यायों का सीधा नतीजा है। "परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर" वाला वाक्य दोनों हिस्सों को जोड़ने वाला टाँका है। शरीर को जीवित बलिदान करना, कलीसिया में वरदानों से सेवा, शत्रु से प्रेम, अधिकारियों के प्रति आदर, और फिर चौदहवें अध्याय में वह असली झगड़ा जिसके लिए यह सब लिखा गया था: कौन क्या खा सकता है, कौन कौन-सा दिन मानता है, और मज़बूत विश्वास वाला कमज़ोर विश्वास वाले को तुच्छ न जाने। पौलुस का समाधान सिद्धांत नहीं, व्यक्ति है: जैसे मसीह ने तुम्हें ग्रहण किया, तुम भी एक-दूसरे को ग्रहण करो।
आखिरी हिस्सा, 15:14 से 16:27, यात्रा की योजनाएँ और नामों की लंबी सूची है। यरूशलेम के गरीबों के लिए इकट्ठा किया गया चंदा, स्पेन जाने का सपना, फीबे की सिफ़ारिश, और छब्बीस से ज़्यादा नाम। यही अध्याय साबित करता है कि यह पत्र किसी मेज़ पर बैठे विद्वान का नहीं, सड़कों पर चलते चरवाहे का था।
इस पुस्तक के मुख्य पद
तीन पद इस पत्री के तीन दरवाज़े हैं।
पहला, रोमियों 5:8: "परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम को इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।" इस पद की ताकत उसके समय-निर्धारण में है। दुनिया का हर धर्म, और हमारा हर स्वाभाविक विचार, कहता है कि पहले सुधरो फिर स्वीकार किए जाओगे। यह पद उस क्रम को उलट देता है। क्रूस उस समय की घटना है जब हमारे पास पेश करने के लिए कुछ नहीं था। इसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर का प्रेम आपके अच्छे दिनों में बढ़ता नहीं और बुरे दिनों में घटता नहीं, क्योंकि वह आपकी हालत पर नहीं, मसीह के काम पर आधारित है।
दूसरा, रोमियों 8:28: "और हम जानते हैं, कि जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।" यह पद यह नहीं कहता कि सब बातें भली हैं। कैंसर भला नहीं है, विश्वासघात भला नहीं है। पद कहता है कि परमेश्वर उन्हें "मिलकर" काम में लगाते हैं, जैसे एक कुशल हाथ कड़वी जड़ों को भी दवा में बदल देता है। और अगला पद बताता है कि यहाँ "भलाई" का मतलब क्या है: कि हम उनके पुत्र के स्वरूप में बदल जाएँ। यह आराम की गारंटी नहीं, रूपांतरण का वादा है।
तीसरा, रोमियों 12:1-2: "इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर बिनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से जानते रहो।" पौलुस आज्ञा नहीं थोपता, वह "बिनती" करता है, और आधार बताता है, परमेश्वर की दया। भक्ति यहाँ मंदिर में नहीं, शरीर में होती है: हाथ, ज़ुबान, समय, पैसा, नींद। और "संसार के सदृश न बनो" का अर्थ रोम की कलीसिया के लिए बहुत ठोस था, वहाँ श्रेणी और सम्मान का ढाँचा सब कुछ तय करता था; अनुग्रह से जीने वाला समुदाय उस ढाँचे को तोड़ता है।
रोमियों को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
रोमियों को एक-एक पद चुनकर पढ़ने से उसका तर्क टूट जाता है। सबसे अच्छा तरीका है इसे चार हफ़्तों में, हिस्सों में पढ़ना, ठीक वैसे ही जैसे रोम की कलीसिया ने इसे एक बैठक में सुना होगा।
पहले हफ़्ते अध्याय 1 से 4 पढ़ें, और लक्ष्य रखें कि आप पौलुस के तर्क का ढाँचा समझें, हर विवरण नहीं। पढ़ते समय दो सवाल साथ रखें: मानव समस्या को पौलुस कैसे बताता है, और परमेश्वर का समाधान कहाँ से शुरू होता है। 3:21 के "परन्तु अब" पर रुकें और सचमुच एक मिनट चुप रहें।
दूसरे हफ़्ते अध्याय 5 से 8 पढ़ें, और यह हिस्सा एक ही बार में, ऊँची आवाज़ में पढ़ने की कोशिश करें। यहाँ विषय "पाप कैसे क्षमा होता है" से आगे बढ़कर "पाप की पकड़ कैसे टूटती है" पर आ जाता है। सातवें अध्याय की निराशा को जल्दी में पार न करें, और आठवें अध्याय के अंतिम पदों को याद कर लें; जीवन में कोई दिन आएगा जब आपको उनकी ज़रूरत पड़ेगी।
तीसरे हफ़्ते अध्याय 9 से 11 पढ़ें, धीरे और नम्रता से। इन अध्यायों में हर सवाल का जवाब आपको नहीं मिलेगा, और यह ठीक है। पौलुस स्वयं अंत में उत्तर देने के बजाय आराधना में फूट पड़ता है। ध्यान दें कि वह चुनाव के सिद्धांत को घमंड के लिए नहीं, मिशन और आँसुओं के लिए इस्तेमाल करता है।
चौथे हफ़्ते अध्याय 12 से 16 पढ़ें, और इस बार कागज़ पर लिखें कि कौन-सी आज्ञा आपके इस हफ़्ते के किसी असली रिश्ते पर उतरती है। सोलहवें अध्याय के नामों को जल्दी में न छोड़ें; उन्हें ज़ोर से पढ़ें और सोचें कि आपकी कलीसिया की सूची में कौन-कौन है।
पूरे पाठ में एक अभ्यास बहुत मदद करता है: जहाँ भी "इसलिये" या "क्योंकि" या "परन्तु" शब्द आए, उसे रेखांकित करें। रोमियों इन्हीं जोड़ों पर खड़ी है। और हर बैठक की शुरुआत एक छोटी प्रार्थना से करें कि परमेश्वर केवल आपकी समझ नहीं, आपका हृदय भी खोलें। यह पत्री बहस जीतने के लिए नहीं, घुटने झुकाने के लिए लिखी गई थी।
दर्पण
अब सीधी बात। आप जानते हैं कि यह पत्री आपको कहाँ चुभती है।
अगर आप उन लोगों में हैं जो हर रविवार के बाद यह हिसाब लगाते हैं कि इस हफ़्ते परमेश्वर मुझसे कितने प्रसन्न रहे होंगे, तो रोमियों 5:8 आपके उस पूरे बहीखाते को फाड़ देता है। मसीह तब मरे जब आप पापी थे, आपके सुधरने के बाद नहीं। आपकी स्वीकार्यता का आधार आपका अनुशासन नहीं है। यह सुनने में मीठा लगता है, पर सच कहिए, इसे छोड़ना कठिन है, क्योंकि अपनी योग्यता पर टिका होना अहंकार को खुराक देता है।
अगर आप उस दफ़्तर में काम करते हैं जहाँ आपकी कीमत आपके प्रदर्शन से नापी जाती है, तो सोचिए कि आप वही तराज़ू घर और प्रार्थना में भी उठा ले जाते हैं या नहीं। रोमियों 6:23 कहता है कि जीवन वरदान है, मज़दूरी नहीं। वरदान लेने के लिए हाथ खाली करने पड़ते हैं।
और अगर आपको लगता है कि आपने पिछले कुछ सालों में इतना गँवा दिया है कि अब कुछ भी सँवारने लायक नहीं बचा, तो रोमियों 8:28 आपसे यह नहीं कहता कि जो हुआ वह अच्छा था। यह कहता है कि उस मलबे में भी एक हाथ काम कर रहा है, और उसका लक्ष्य आपकी सुविधा नहीं, आपका मसीह जैसा बनना है।
अब सबसे असहज सवाल। रोमियों चौदहवें अध्याय के हिसाब से आपकी कलीसिया में वह कौन है जिसे आप भीतर से थोड़ा कम आत्मिक समझते हैं? वह जो कम पढ़ा है, या ज़्यादा भावुक है, या जिसका परिवार टूटा हुआ है, या जो दूसरी जाति या भाषा से है? पौलुस ने ग्यारह अध्याय धर्मशास्त्र लिखा और उसका पहला व्यावहारिक निशाना यही रवैया था। अनुग्रह जिसने आपको भीतर लिया, वही किसी और के लिए दरवाज़ा खोल रहा है, और उस दरवाज़े पर आप चौकीदार नहीं हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को रोमियों समझाने का सबसे सरल रास्ता एक तस्वीर है: एक गहरा गड्ढा और एक सीढ़ी। बच्चों से पूछिए कि अगर सब लोग एक गहरे गड्ढे में गिर गए हों, तो कोई कितना ऊँचा कूदे, बाहर निकल पाएगा? कुछ लोग थोड़ा ऊपर कूद सकते हैं, कुछ कम, पर कोई भी बाहर नहीं निकलता। पौलुस यही कहता है कि सब ने पाप किया है। फिर बताइए कि यीशु मसीह ऊपर से गड्ढे में उतरे, हमें उठाया, और खुद हमारी जगह ले ली। यह सीढ़ी हमने नहीं बनाई, यह हमें दी गई है। यही "वरदान" का अर्थ है, जन्मदिन के उपहार की तरह, जिसे कमाया नहीं जाता, केवल खुशी से लिया जाता है।
छोटे बच्चों के साथ इस पर ज़ोर दीजिए कि परमेश्वर का प्रेम उनके अच्छे व्यवहार पर टिका नहीं है, और बड़े बच्चों के साथ इस पर कि यह प्रेम हमें आलसी नहीं, कृतज्ञ बनाता है, इसलिए हम दूसरों को भी अपनाते हैं।
फेथ नेटवर्क पर रोमियों की पत्री और अनुग्रह के इस संदेश के लिए उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए कहानी और चित्र वाली सरल भाषा में, सात से बारह साल के बच्चों के लिए सवाल-जवाब और गतिविधियों के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए उन कठिन प्रश्नों के साथ जो वे स्कूल और दोस्तों के बीच सचमुच सुनते हैं। माता-पिता के लिए सुझाव यही है कि पहले वह पृष्ठ स्वयं पढ़ें, फिर बच्चे के साथ बैठें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रोमियों की पत्री किसने और कब लिखी?
इसे प्रेरित पौलुस ने लिखवाया, और लिखने वाला तिरतियुस नाम का लेखक था, जो सोलहवें अध्याय में अपना नाम खुद जोड़ता है। समय लगभग सन् 56 से 57 का माना जाता है, पौलुस की तीसरी मिशनरी यात्रा के अंत में, जब वह कुरिन्थुस के आसपास था और यरूशलेम की गरीब कलीसिया के लिए इकट्ठा किया गया चंदा पहुँचाने जाने वाला था। पत्र संभवतः किंख्रिया की सेवक फीबे के हाथों रोम भेजा गया, जिसकी सिफ़ारिश पौलुस अंतिम अध्याय में करता है।
रोमियों की पत्री का मुख्य विषय क्या है?
मुख्य विषय सुसमाचार ही है, और उसके भीतर यह प्रश्न कि पापी मनुष्य पवित्र परमेश्वर के सामने कैसे धर्मी ठहराया जाता है। पौलुस दिखाता है कि यहूदी और गैर-यहूदी, दोनों समान रूप से दोषी हैं, और दोनों केवल विश्वास के द्वारा, मसीह के काम के आधार पर, अनुग्रह से धर्मी ठहराए जाते हैं। लेकिन यह विषय अकेले व्यक्ति पर रुकता नहीं; पत्री का लक्ष्य यह है कि इस सच्चाई से एक ऐसा समुदाय बने जो एक-दूसरे को ग्रहण करे और सुसमाचार को आगे भेजे।
"धर्मी ठहराया जाना" का असल मतलब क्या है?
यह अदालत की भाषा है। इसका अर्थ है कि न्यायी परमेश्वर आपको दोषमुक्त घोषित करते हैं और मसीह की धार्मिकता आपके खाते में गिनते हैं। ध्यान रखने की बात यह है कि यह आपको धीरे-धीरे अच्छा बनाने की प्रक्रिया नहीं, एक घोषणा है जो एक ही बार में होती है। इसीलिए रोमियों 8:1 कह सकता है कि मसीह में रहने वालों पर दण्ड की आज्ञा नहीं। भीतर से बदलते जाने की प्रक्रिया इससे अलग है और उसके बाद आती है, उसे पवित्रीकरण कहा जाता है।
रोमियों 3:23 में "सब ने पाप किया है" का क्या अर्थ है, क्या अच्छे लोग भी इसमें आते हैं?
हाँ, और यही पौलुस का बिंदु है। वह जानबूझकर पहले खुले पाप में डूबे संसार का चित्र देता है, ताकि धार्मिक पाठक सहमति में सिर हिलाए, और फिर तीर उसी पाठक की ओर मोड़ देता है। पद कहता है कि सब परमेश्वर की महिमा से रहित हैं, यानी सवाल यह नहीं कि आप औसत इंसान से बेहतर हैं या नहीं, सवाल यह है कि आप परमेश्वर के स्तर तक पहुँचते हैं या नहीं। इस पद का उद्देश्य निराश करना नहीं, अगले पद के अनुग्रह के लिए जगह बनाना है।
रोमियों 8:28 का क्या अर्थ है, क्या हर बुरी बात भी असल में भली है?
नहीं। पद यह नहीं कहता कि सब बातें भली हैं, बल्कि यह कि सब बातें "मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं" उनके लिए जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं। दुख दुख ही रहता है, पर वह अंतिम शब्द नहीं होता। अगला पद यह भी स्पष्ट करता है कि इस भलाई का लक्ष्य क्या है: कि हम परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप में बदल जाएँ। इसलिए यह पद शोक में जल्दबाज़ी से बोला जाने वाला वाक्य नहीं, बल्कि लंबे अंधेरे में थामने वाली रस्सी है।
रोमियों 10:9 के अनुसार उद्धार पाने के लिए क्या करना है?
पद दो बातें साथ रखता है: मुँह से यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करना, और मन से विश्वास करना कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया। यह कोई जादुई सूत्र नहीं है जिसे दोहराने से काम बन जाए; यह पूरे व्यक्ति का समर्पण है, भीतरी भरोसा और बाहरी स्वीकारोक्ति। "प्रभु" कहने का मतलब है कि जीवन की बागडोर अब मेरी नहीं। और पुनरुत्थान पर विश्वास इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वही प्रमाण है कि उनका बलिदान परमेश्वर ने स्वीकार किया।
"रोमियों का मार्ग" क्या है और क्या वह भरोसेमंद है?
यह सुसमाचार सुनाने का एक साधारण तरीका है जिसमें रोमियों के कुछ पद क्रम से पढ़े जाते हैं: रोमियों 3:23 से समस्या, रोमियों 6:23 से परिणाम, रोमियों 5:8 से परमेश्वर का प्रेम, और रोमियों 10:9 से उत्तर। ये पद सचमुच सुसमाचार का सार पकड़ते हैं, इसलिए यह तरीका उपयोगी है। बस ध्यान रहे कि यह पत्री का पूरा संदेश नहीं है; अध्याय 8 का आश्वासन और अध्याय 12 से 15 का व्यावहारिक जीवन भी उसी सुसमाचार का हिस्सा हैं।
रोमियों 7 में पौलुस किसकी बात कर रहा है, विश्वासी की या अविश्वासी की?
व्याख्याकारों में इस पर सदियों से चर्चा है। कुछ मानते हैं कि पौलुस अपने विश्वास से पहले के जीवन का वर्णन कर रहा है, कुछ मानते हैं कि यह हर विश्वासी का चलता हुआ संघर्ष है, और कुछ इसे उस व्यक्ति का अनुभव कहते हैं जो व्यवस्था के द्वारा पवित्र बनने की कोशिश कर रहा है। जो बात निर्विवाद है वह यह है कि अध्याय अपने आप में समाधान नहीं देता; समाधान अगले अध्याय में पवित्र आत्मा के आने से आता है। इसलिए सातवें अध्याय को आठवें से अलग करके पढ़ना ही असली गलती है।
रोमियों 9 से 11 अध्याय क्यों हैं, क्या परमेश्वर ने इस्राएल को त्याग दिया?
पौलुस साफ़ कहता है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को त्यागा नहीं। ये तीन अध्याय इसलिए हैं क्योंकि पूरी पत्री का दावा यही है कि सुसमाचार पुराने वादों की पूर्ति है, और तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि इस्राएल का बड़ा हिस्सा उसे क्यों नहीं मान रहा। पौलुस उत्तर में परमेश्वर की चुनने की स्वतंत्रता, मानव अविश्वास की ज़िम्मेदारी, और गैर-यहूदियों के भीतर आने का उद्देश्य समझाता है, और गैर-यहूदी विश्वासियों को घमंड के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देता है।
क्या रोमियों सिखाती है कि व्यवस्था बेकार है?
नहीं। पौलुस साफ़ कहता है कि व्यवस्था पवित्र है, पर उसका काम बचाना नहीं है। व्यवस्था आइने की तरह हमें दिखाती है कि हम कैसे हैं, और डॉक्टर की जाँच की तरह रोग की पहचान कराती है, पर दवा नहीं देती। मसीह में विश्वासी व्यवस्था के दोष-सिद्ध करने वाले अधिकार के नीचे नहीं रहता, फिर भी बारहवें अध्याय से आगे पौलुस दिखाता है कि आत्मा के द्वारा जीने वाला जीवन व्यवस्था की असली मंशा, यानी प्रेम, को पूरा करता है।
रोमियों 13 में अधिकारियों के अधीन रहने का क्या मतलब है?
पौलुस यह लिख रहा था जब रोम में नीरो का शासन शुरू हो चुका था, इसलिए यह किसी आदर्श सरकार की बात नहीं है। वह यह सिखाता है कि व्यवस्था और शासन परमेश्वर के प्रबंध का हिस्सा हैं, और विश्वासी अराजकता से नहीं, अच्छे नागरिक जीवन और कर चुकाने से पहचाने जाएँ। यह आज्ञा असीम नहीं है; जब सरकार परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा के विरुद्ध कुछ करने को कहे, तो प्रेरितों का उदाहरण यही है कि परमेश्वर की आज्ञा पहले आती है।
रोमियों और गलातियों में क्या अंतर है?
दोनों पत्रियाँ विश्वास से धर्मी ठहराए जाने पर केंद्रित हैं, पर उनका मिज़ाज अलग है। गलातियों तुरंत लिखा गया आपातकालीन पत्र है, तीखा और गरम, क्योंकि वहाँ झूठी शिक्षा कलीसिया को खा रही थी। रोमियों शांत मन से, क्रम से रखा गया विवरण है, एक ऐसी कलीसिया के लिए जिसे पौलुस ने स्थापित नहीं किया था और जिसका सहयोग वह आगे की सेवा के लिए चाहता था। इसलिए रोमियों में इस्राएल, आत्मा के द्वारा जीवन और कलीसियाई एकता पर बहुत अधिक विस्तार मिलता है।
रोमियों पहली बार पढ़ने वाले को कहाँ से शुरू करना चाहिए?
पहली बार पढ़ने वाले के लिए सबसे अच्छा रास्ता है पूरी पत्री को एक ही बैठक में, शायद डेढ़ घंटे में, बहते हुए पढ़ जाना, बिना हर पद पर रुके। इससे पौलुस के तर्क की दिशा साफ़ हो जाती है। इसके बाद दूसरी बार अध्याय 5 से 8 पर धीमे-धीमे लौटें, क्योंकि वहाँ पत्री का हृदय है। और तीसरे चरण में अध्याय 12 से 16 को हाथ में कागज़ लेकर पढ़ें, यह पूछते हुए कि यह मेरे असली रिश्तों में क्या बदलेगा।
अंत में
रोमियों की पत्री हमारे हाथ में इसलिए है कि एक आदमी स्पेन जाना चाहता था और उसके पास ऐसी कलीसिया नहीं थी जो उसे भेजे। इसलिए उसने अपने जीवन का सबसे गहरा धर्मशास्त्र लिखवाया, ताकि रोम के यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी एक-दूसरे को तुच्छ जानना छोड़ें, एक ही मेज़ पर बैठें, और मिलकर उसे आगे भेजें। यही इस पत्री की सुंदरता है: सबसे ऊँचा सिद्धांत सबसे ज़मीनी उद्देश्य के लिए दिया गया।
अगर आपने अब तक इसे केवल अपने उद्धार के प्रमाणपत्र की तरह पढ़ा है, तो इस बार आगे बढ़िए। पूछिए कि जो अनुग्रह आपको मुफ़्त में मिला, वह आपके घर में, आपके पैसों में, आपकी कलीसिया की बैठकों में और आपके उन पड़ोसियों के प्रति, जिनका विश्वास अलग है, किस रूप में दिखता है। अध्याय 5 से 8 को कई बार पढ़िए, आठवें अध्याय के अंतिम पदों को याद कर लीजिए, और बारहवें अध्याय की पहली दो आयतों को अपनी रोज़ की प्रार्थना बना लीजिए।
धर्मी ठहराया जाना अंत नहीं है, यह एक नए परिवार में आपका जन्म-प्रमाण है। अब उस परिवार की तरह जीना बाकी है।