बाइबल पुस्तक

सभोपदेशक की पुस्तक: जीवन की व्यर्थता में सच्चा अर्थ खोजना

परिचय

एक आदमी पैंतीस साल एक ही कंपनी में काम करता है। रिटायरमेंट के दिन उसे एक गुलदस्ता, एक प्रमाण पत्र और एक छोटा सा भाषण मिलता है। घर लौटकर वह सोफे पर बैठता है और अचानक उसके मन में एक सवाल उठता है जिसे वह वर्षों से टालता आया था: "इन सब का क्या फ़ायदा हुआ?" कोई पादरी उसे यह सवाल पूछने की अनुमति नहीं देता। लेकिन बाइबल देती है। बाइबल के ठीक बीच में एक पुस्तक रखी है जो इसी सवाल को पूरी ईमानदारी से, बिना सजावट के, बिना जल्दबाज़ी वाले धार्मिक जवाबों के पूछती है।

सभोपदेशक की पुस्तक उन लोगों के लिए लिखी गई है जो थक चुके हैं, जो सब कुछ पा चुके हैं और फिर भी खाली हैं, और जो रात में छत की ओर देखते हुए सोचते हैं कि यह सब किसलिए है। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पुस्तक निराशा का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि विश्वास का सबसे साहसी स्कूल है, और यह आपको जीवन को फिर से परमेश्वर के हाथ से लेना सिखाती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

इस पुस्तक का मुख्य शब्द इब्रानी में "हेवेल" है, जिसका अनुवाद हमारी बाइबल में "व्यर्थ" हुआ है। लेकिन इसका मूल चित्र है भाप, धुआँ, ठंड में मुँह से निकलने वाली साँस। भाप बुरी नहीं होती; वह केवल पकड़ में नहीं आती। इसलिए हम इस पूरे पृष्ठ पर सभोपदेशक को एक ही कोण से पढ़ेंगे: यह पुस्तक हमें जीवन को मुट्ठी में जकड़ने से रोकती है और हथेली खोलकर परमेश्वर के हाथ से ग्रहण करना सिखाती है। जो पकड़ना चाहता है, वह टूटता है। जो ग्रहण करता है, वह जीता है। यही सभोपदेशक का कड़वा-मीठा उपहार है।

बाइबल सभोपदेशक की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?

पुस्तक अपनी पूरी थीसिस पहले ही वाक्यों में रख देती है। सभोपदेशक 1:2 कहता है: "उपदेशक यह कहता है, व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है।" यह किसी नास्तिक की शिकायत नहीं है, यह एक विश्वासी की स्वीकारोक्ति है। और अगर हम "हेवेल" को भाप के रूप में सुनें, तो वाक्य का स्वर बदल जाता है: सब कुछ भाप है, सब कुछ हाथ से निकल जाने वाला है। आपका करियर, आपकी सुंदरता, आपका बैंक बैलेंस, आपकी याददाश्त, आपका नाम जो अगली पीढ़ी भूल जाएगी। पुस्तक हमारे जीवन को बेकार नहीं कहती; वह उसे क्षणभंगुर कहती है। और यही सबसे ईमानदार बात है जो कोई धर्मग्रंथ कह सकता है।

फिर उपदेशक प्रयोग करता है। वह एक वैज्ञानिक की तरह जीवन के हर विकल्प को आज़माता है: ज्ञान, हँसी, शराब, निर्माण कार्य, बाग़, संपत्ति, संगीत, दास-दासियाँ, सोना-चाँदी। और अध्याय दो के अंत में वह अपनी प्रयोगशाला की रिपोर्ट लिखता है। सभोपदेशक 2:11 कहता है: "तब मैंने अपने हाथों के सब कामों पर, और अपने सब परिश्रम पर दृष्टि की जो मैंने किया था, और क्या देखा, कि सब कुछ व्यर्थ और वायु से खेलना है, और संसार में कोई लाभ नहीं।" ध्यान दीजिए, यह किसी हारे हुए आदमी का बयान नहीं है। यह उस व्यक्ति का बयान है जिसने सब कुछ पा लिया। असफलता हमें खाली नहीं करती; सफलता खाली करती है, क्योंकि सफलता के बाद भी भीतर का गड्ढा वहीं रहता है।

"वायु से खेलना" वाला वाक्यांश ही इस पुस्तक की आत्मा है। हवा को पकड़ने की कोशिश करके देखिए। आप हाथ बंद कर सकते हैं, लेकिन खोलते ही हथेली खाली मिलेगी। हम अपने जीवन के साथ यही करते हैं। हम समय को पकड़ना चाहते हैं, इसलिए कैलेंडर भर लेते हैं। हम सुरक्षा पकड़ना चाहते हैं, इसलिए पैसा जोड़ते हैं। हम अर्थ पकड़ना चाहते हैं, इसलिए उपलब्धियाँ इकट्ठी करते हैं। सभोपदेशक हमारी मुट्ठी पर धीरे से थपकी देता है और कहता है, खोलो।

भाप को मुट्ठी में नहीं, हथेली पर लिया जाता है।

लेकिन पुस्तक हमें खालीपन में छोड़कर नहीं जाती। उसी उपदेशक के मुँह से सबसे कोमल वाक्य निकलते हैं। सभोपदेशक 3:11 कहता है: "उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वह फबता है; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है, तौभी वे परमेश्वर के कार्य को आदि से अन्त तक समझ नहीं सकते।" यहाँ हमारी बेचैनी का निदान है। हम भाप जैसे क्षणों में जीते हैं, पर हमारे भीतर अनंतता की प्यास रखी गई है। हम समय के प्राणी हैं जिनके हृदय में सदाकाल का बीज बोया गया है। इसलिए कोई नौकरी, कोई रिश्ता, कोई अनुभव हमें पूरी तरह भर नहीं सकता। यह डिज़ाइन की गलती नहीं, डिज़ाइन का हिस्सा है।

और फिर वह पैसे की बात करता है, क्योंकि पैसा ही हमारी पकड़ने की इच्छा का सबसे साफ़ रूप है। सभोपदेशक 5:10 कहता है: "जो रुपये से प्रीति रखता है वह रुपये से तृप्त न होगा; और जो बहुत धन चाहता है, वह असंतुष्ट रहेगा; यह भी व्यर्थ है।" यह अर्थशास्त्र नहीं, हृदय का विज्ञान है। लालसा एक ऐसा पात्र है जिसका तल नहीं होता। आप उसमें जितना डालेंगे, वह उतना ही बड़ा हो जाएगा।

पुस्तक का अंत आदेश में नहीं, बल्कि आमंत्रण जैसे निष्कर्ष में होता है। सभोपदेशक 12:13 कहता है: "सब कुछ जो कहा गया उसका सारांश यह है: परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है।" बारह अध्यायों की सारी बेचैनी यहाँ आकर टिक जाती है। जब हाथ में कुछ नहीं बचता, तब भी परमेश्वर बचे रहते हैं। यही आधार है।

लेखक, समय और परिस्थिति

पुस्तक अपना परिचय इन शब्दों से देती है कि ये "उपदेशक" के वचन हैं, जो दाऊद का पुत्र और यरूशलेम का राजा था। इब्रानी में इस शब्द का रूप "कोहेलेत" है, जिसका अर्थ है सभा को इकट्ठा करने वाला या सभा में बोलने वाला, और इसी से हिन्दी नाम "सभोपदेशक" बना है। परंपरागत रूप से कलीसिया ने इसे राजा सुलैमान से जोड़ा है, और पुस्तक का भीतरी प्रमाण इसी ओर इशारा करता है: वह कहता है कि उसने यरूशलेम में सबसे अधिक बुद्धि पाई, उसने बड़े निर्माण किए, अपार धन इकट्ठा किया, और हर भोग को आज़मा कर देखा। ऐसा जीवन-वृत्तांत इस्राएल के इतिहास में सुलैमान के अलावा किसी पर ठीक नहीं बैठता।

कुछ विद्वान मानते हैं कि इब्रानी भाषा की शैली किसी बाद के संकलनकर्ता की ओर संकेत करती है, जिसने सुलैमान की परंपरा को सहेजकर, अंत में अपनी आवाज़ में अध्याय बारह की समाप्ति जोड़ी। ध्यान दीजिए कि पुस्तक के अंतिम पदों में उपदेशक के बारे में तीसरे पुरुष में बात होती है, मानो कोई संपादक श्रोताओं की ओर मुड़कर कह रहा हो, अब सारांश सुनो। यह विवाद हमारे विश्वास को नहीं हिलाता। चाहे कलम सुलैमान की हो या किसी ऐसे शिष्य की जिसने सुलैमान की आवाज़ को सहेजा, पवित्र आत्मा की प्रेरणा वही है और संदेश वही है। कलीसिया ने सदियों से इसी पुस्तक को परमेश्वर का वचन मानकर पढ़ा है।

समय की दृष्टि से, यदि हम सुलैमान को लेखक मानें तो यह दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व की रचना है, उसके शासन के उत्तरार्ध की, जब उसकी आँखें अपने ही साम्राज्य की चमक से थक चुकी थीं। यह बात महत्वपूर्ण है। सभोपदेशक किसी गरीब की डायरी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का आत्मनिरीक्षण है जिसके पास सब कुछ था। 1 राजा अध्याय ग्यारह हमें बताता है कि सुलैमान का हृदय कैसे बँट गया था, कैसे उसकी पत्नियाँ और उसकी संपत्ति उसे परमेश्वर से दूर खींच ले गईं। सभोपदेशक को उस पृष्ठभूमि में पढ़िए और यह पुस्तक और भी गहरी लगेगी: यह एक बूढ़े आदमी की आवाज़ है जो अपने जवान श्रोताओं से कह रहा है, मैंने हर दरवाज़ा खोलकर देख लिया है, तुम अपनी उम्र उसी भूलभुलैया में मत गँवाओ।

परिस्थिति यह थी कि इस्राएल समृद्धि के शिखर पर था। व्यापार, निर्माण, अंतरराष्ट्रीय संबंध, मंदिर की भव्यता। और ठीक उसी समृद्धि के बीच से यह चेतावनी उठती है कि समृद्धि अर्थ नहीं दे सकती। जो समाज आज खुद को नाप-तोल, सफलता और प्रदर्शन से आँकता है, उसे सभोपदेशक से अधिक ज़रूरी कोई पुस्तक नहीं मिलेगी।

कैनन में इसका स्थान भी बोलता है। इब्रानी बाइबल में यह "लेखनों" में गिनी जाती है और अय्यूब तथा नीतिवचन के साथ बुद्धि-साहित्य का हिस्सा है। नीतिवचन कहता है कि जीवन में व्यवस्था है, बोओ और काटो। अय्यूब पूछता है कि जब धर्मी पर दुख आए तो व्यवस्था कहाँ गई। और सभोपदेशक तीसरी आवाज़ बनकर कहता है कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा हमारी समझ से बाहर है, और यही हमें परमेश्वर पर भरोसा करना सिखाता है। यहूदी परंपरा में यह पुस्तक झोपड़ियों के पर्व पर पढ़ी जाती थी, उस पर्व पर जब लोग कच्ची झोपड़ियों में रहकर याद करते थे कि जीवन अस्थायी है और परमेश्वर की देखरेख स्थायी है। इससे सुंदर मेल कुछ नहीं हो सकता।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

सभोपदेशक अचानक आकाश से नहीं गिरता। उसकी जड़ें उत्पत्ति अध्याय तीन में हैं। जब मनुष्य ने परमेश्वर के बजाय अपने आप पर भरोसा किया, तो भूमि पर शाप आया और परिश्रम में काँटे उग आए। तब से हर काम में एक अधूरापन है। सभोपदेशक बस उसी शापित मिट्टी पर खड़ा होकर ईमानदारी से रिपोर्ट देता है। जब वह सभोपदेशक 12:7 में कहता है कि "मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी और आत्मा परमेश्वर के पास जिसने उसे दिया लौट जाएगी," तो वह सीधे उत्पत्ति की उस घोषणा को दोहरा रहा है कि तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जाएगा।

भजन संहिता में भी यही सूत्र बहता है। भजनकार गिनता है कि मनुष्य के दिन घास के समान हैं, कि हमारा जीवन एक साँस है, और प्रार्थना करता है कि हम अपने दिनों को गिनना सीखें। अय्यूब अपनी पीड़ा में पूछता है कि जीवन क्यों इतना छोटा और इतना कड़वा है। भविष्यद्वक्ता यशायाह घोषणा करता है कि सब प्राणी घास हैं और घास सूख जाती है, परन्तु परमेश्वर का वचन सदा स्थिर रहता है। पूरे पुराने नियम में एक स्वर उठता है: तुम भाप हो, परमेश्वर चट्टान हैं।

नए नियम में यह सूत्र ख़त्म नहीं होता, वह मसीह में जाकर बदल जाता है। यीशु मसीह का धनी किसान का दृष्टांत सभोपदेशक का ही जीवित रूपांतरण है। वह आदमी कोठे बनाता है, आत्मा से कहता है कि अब आराम कर, और उसी रात उसकी माँग हो जाती है। दूसरों के हाथ में जाने वाली संपत्ति, यही सभोपदेशक का दुखता हुआ घाव था। याकूब हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन भाप के समान है जो थोड़ी देर दिखाई देती और फिर मिट जाती है। पौलुस रोमियों अध्याय आठ में लिखता है कि सारी सृष्टि व्यर्थता के अधीन कर दी गई, पर आशा के साथ, क्योंकि एक दिन वह छुटकारा पाएगी। यहीं सभोपदेशक का अँधेरा कमरा खुलता है और खिड़की से रोशनी आती है।

और सबसे गहरी बात यह है कि यीशु मसीह हमारी भाप में उतर आए। जो अनादि हैं, वे समय के भीतर आए। जो अनंत हैं, वे तीस-कुछ वर्ष जीकर मर गए। उन्होंने थकान, भूख, आँसू, विश्वासघात और कब्र को चखा। सभोपदेशक कहता है कि सब कुछ हाथ से निकल जाता है; क्रूस पर मसीह के हाथ भी कीलों से खुले रह गए। लेकिन तीसरे दिन कुछ ऐसा हुआ जिसकी उपदेशक कल्पना भी नहीं कर सकता था: एक ऐसा जीवन उठा जो भाप नहीं है। पुनरुत्थान वह उत्तर है जो सूर्य के नीचे नहीं मिलता, क्योंकि वह सूर्य के ऊपर से आता है।

इसलिए पौलुस 1 कुरिन्थियों 15:58 में उस शब्द का इस्तेमाल करता है जो सभोपदेशक में छप्पन बार आता है, पर उसे उलट देता है: "क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है।" यह वाक्य पुनरुत्थान के अध्याय के अंत में खड़ा है, संयोग से नहीं। मसीह से बाहर सब परिश्रम भाप है; मसीह में कोई परिश्रम भाप नहीं है।

रचना और मुख्य विषय

पुस्तक की बनावट को समझने में सबसे बड़ी मदद यह पहचानना है कि यह एक तर्क की सीधी सीढ़ी नहीं, बल्कि एक घूमता हुआ चक्कर है, ठीक उसी तरह जैसे अध्याय एक में सूर्य उठता और डूबता है, नदियाँ बहती हैं और समुद्र भरता नहीं। लेखक जानबूझकर हमें चक्कर में घुमाता है, क्योंकि जीवन ऐसा ही महसूस होता है।

फिर भी एक साफ़ ढाँचा है। पहला अध्याय एक शीर्षक और थीसिस देता है, कि सब कुछ भाप है, और प्रकृति के चक्रों से यह बात दिखाता है। अध्याय एक के अंत से अध्याय दो के अंत तक "शलोमोनी प्रयोग" चलता है, जिसमें राजा बुद्धि, भोग, कार्य और संपत्ति को आज़माकर हर बार वही निष्कर्ष लिखता है। अध्याय तीन से पाँच तक विषय बदल जाता है: अब समय, न्याय, अकेलापन, भक्ति और धन पर चिंतन है। यहीं वह प्रसिद्ध कविता आती है जो सभोपदेशक 3:1 से शुरू होती है और जो मनुष्य के जीवन के अवसरों को जोड़ों में रखती है, जन्म और मृत्यु, रोना और हँसना, चुप रहना और बोलना।

अध्याय छह से आठ तक उपदेशक व्यावहारिक बुद्धि की ओर मुड़ता है। वह कहता है कि शोक के घर जाना दावत के घर जाने से अच्छा है, क्योंकि वहाँ मन को सच्चाई मिलती है। वह अति-धार्मिकता और अति-दुष्टता दोनों से चेतावनी देता है। वह मानता है कि दुष्ट फलते हैं और धर्मी दुख उठाते हैं, और वह इस विरोधाभास को झूठे तर्कों से नहीं ढँकता। अध्याय नौ से ग्यारह तक मृत्यु की निश्चितता और भविष्य की अनिश्चितता के सामने जोखिम उठाकर जीने का बुलावा है: अपनी रोटी पानी पर डाल, सुबह बीज बो, क्योंकि तू नहीं जानता कि कल क्या होगा। और अध्याय बारह एक अद्भुत काव्य में बुढ़ापे का चित्र खींचता है, काँपते हाथ, झुकी कमर, धुँधली आँखें, टूटा कटोरा, और फिर पूरी पुस्तक को उस निष्कर्ष पर बाँध देता है कि परमेश्वर का भय मानना और उनकी आज्ञा पालन करना ही मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य है।

मुख्य विषय पाँच हैं, और सब हमारे दृष्टिकोण से जुड़े हैं। पहला, "हेवेल", यानी जीवन की क्षणभंगुरता और पकड़ में न आना। दूसरा, "सूर्य के नीचे", जो लगभग तीस बार आता है और उस दायरे की ओर इशारा करता है जिसमें हम देख सकते हैं; सूर्य के नीचे कोई अंतिम उत्तर नहीं मिलता। तीसरा, मृत्यु, जो हर नाप-तोल को बराबर कर देती है, बुद्धिमान और मूर्ख दोनों को एक ही मिट्टी में लिटा देती है। चौथा, परमेश्वर की संप्रभुता और हमारी सीमित समझ, क्योंकि समय उनके हाथ में है और हम आदि से अन्त तक नहीं देख सकते।

और पाँचवाँ विषय वह है जिसे लोग सबसे ज़्यादा भूल जाते हैं: आनन्द। सात बार यह पुस्तक हमें खाने, पीने और अपने परिश्रम में सुख भोगने के लिए बुलाती है, और हर बार यह कहकर कि यह परमेश्वर का दान है। सभोपदेशक 9:7 में लिखा है: "तू जाकर अपनी रोटी आनन्द से खा, और मन में सुख मानकर अपना दाखमधु पी; क्योंकि परमेश्वर तेरे कामों से प्रसन्न हो चुका है।" यह पुस्तक हमें भोग से नहीं, कब्ज़े से रोकती है। भाप को मुट्ठी में बाँधना असंभव है, पर उसे हथेली पर रखकर परमेश्वर को धन्यवाद देना पूरी तरह संभव है।

इस पुस्तक के मुख्य पद

पहला पद है सभोपदेशक 1:2: "उपदेशक यह कहता है, व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है।" इब्रानी में यह दोहराव सबसे ऊँची मात्रा को दर्शाने का तरीका है, जैसे "पवित्र, पवित्र, पवित्र" कहकर यशायाह परमेश्वर की परम पवित्रता बताता है। यहाँ उसी शैली में जीवन की परम क्षणभंगुरता बताई गई है। यह पद हमारी सारी योजनाओं पर ठंडा पानी नहीं डालता, बल्कि उन्हें उनकी सही जगह पर रख देता है। जब आप स्वीकार कर लेते हैं कि आप भाप हैं, तो आप दूसरों से, अपने जीवनसाथी से, अपने बच्चों से, अपनी नौकरी से वह माँगना बंद कर देते हैं जो केवल परमेश्वर दे सकते हैं। इस पद को गले लगाने वाला व्यक्ति हल्का हो जाता है।

दूसरा पद है सभोपदेशक 3:11: "उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वह फबता है; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है, तौभी वे परमेश्वर के कार्य को आदि से अन्त तक समझ नहीं सकते।" यह पुस्तक का सबसे सुंदर वाक्य है और सबसे बड़ी सांत्वना भी। पहले भाग में परमेश्वर की कारीगरी है: हर चीज़ अपने समय पर सुंदर है, यानी जीवन में अराजकता नहीं, समय-सारिणी है, जिसे हम नहीं देख पाते। दूसरे भाग में हमारी बनावट है: भीतर अनंतता की प्यास। तीसरे भाग में हमारी सीमा है: हम पूरी तस्वीर नहीं देख सकते। इन तीनों को जोड़िए और आपको मसीही जीवन का नक्शा मिल जाएगा। हम अनंत के लिए बने हैं, इसलिए अस्थायी चीज़ें हमें भर नहीं सकतीं; और हम सीमित हैं, इसलिए हमें भरोसा करना होगा, समझना काफ़ी नहीं होगा।

तीसरा पद है सभोपदेशक 12:13: "सब कुछ जो कहा गया उसका सारांश यह है: परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है।" कुछ लोग कहते हैं कि यह निष्कर्ष व्यवस्था का बोझ है। पर ध्यान दीजिए, उपदेशक ने बारह अध्यायों में यही साबित किया है कि कोई भी उपलब्धि हमें तृप्त नहीं कर सकती। इसलिए यह पद कहता है कि तेरा जीवन तेरे हाथ में आने वाली चीज़ों से नहीं, परमेश्वर के साथ तेरे संबंध से अर्थ पाता है। "भय" यहाँ डर नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण है, वह मुद्रा जिसमें हाथ खुले रहते हैं। और नए नियम की रोशनी में यह आज्ञा और भी मीठी हो जाती है, क्योंकि यीशु मसीह ने हमारे लिए वह पूरी आज्ञाकारिता जी ली जो हम नहीं जी सके, और अब हम डरकर नहीं, धन्यवाद से आज्ञा मानते हैं।

दर्पण

अब मैं आपसे सीधे बात करना चाहता हूँ। आप सभोपदेशक को नहीं पढ़ रहे; सभोपदेशक आपको पढ़ रहा है।

आपकी मुट्ठी किस चीज़ पर बंद है? कुछ लोगों की मुट्ठी पैसों पर बंद है। आप बताते नहीं, पर आप हर महीने हिसाब लगाते हैं और सोचते हैं कि जब इतना हो जाएगा, तब चैन मिलेगा। सभोपदेशक 5:10 आपके सामने आकर खड़ा हो जाता है और कहता है कि वह "तब" कभी नहीं आएगा। कुछ लोगों की मुट्ठी अपने शरीर पर बंद है, आप जिम, आहार और आईने से लड़ रहे हैं, क्योंकि उम्र चुपचाप आगे बढ़ रही है। अध्याय बारह की वह कविता आपके लिए लिखी गई है, और वह आपको डराने के लिए नहीं, आज़ाद करने के लिए है। कुछ की मुट्ठी अपने बच्चों पर बंद है। आप उनके भविष्य को इतनी मज़बूती से पकड़े हैं कि उनके पास साँस लेने की जगह नहीं बची। उपदेशक कहता है कि तू यह भी नहीं जानता कि तेरे बाद तेरी मेहनत के हाथ में क्या आएगा; तो पकड़ ढीली कर और प्रार्थना मज़बूत कर।

और कुछ लोगों की मुट्ठी अपने अकेलेपन पर बंद है। आपने खुद को समझा लिया है कि किसी की ज़रूरत नहीं। सभोपदेशक अध्याय चार में वह वाक्य है कि दो का एक होना अच्छा है, क्योंकि गिरने पर एक दूसरे को उठा सकता है। आपके अकेलेपन को पवित्र मत बनाइए।

ईमानदारी विश्वास की दुश्मन नहीं, उसकी नींव है।

अगर आप आज थके हुए हैं, अगर रविवार की आराधना के बाद भी भीतर खोखलापन रहता है, अगर आप ऊपर से मुस्कुराते हैं और भीतर पूछते हैं कि इन सब का क्या फ़ायदा, तो सुनिए: परमेश्वर ने अपनी बाइबल में इस सवाल के लिए पूरी एक पुस्तक रखी है। वे आपके संदेह से घबराते नहीं। वे केवल चाहते हैं कि आप उस सवाल को उनके सामने लाएँ, न कि उससे भागें। मुट्ठी खोलिए। जो भाप बह जाएगी, उसे जाने दीजिए। और जो हाथ आपकी हथेली को थामने के लिए बढ़े हैं, उन हाथों में अब भी कीलों के निशान हैं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को सभोपदेशक समझाना मुश्किल लगता है, पर असल में वे इसे बड़ों से जल्दी समझ लेते हैं। एक साबुन का बुलबुला उड़ाइए। बच्चा उसे पकड़ने दौड़ेगा और जैसे ही उँगली छुएगी, बुलबुला फूट जाएगा। अब उससे कहिए कि बाइबल में एक बहुत पुरानी पुस्तक है जिसमें एक समझदार राजा कहता है कि हमारी बहुत सारी चीज़ें इसी बुलबुले जैसी हैं, सुंदर तो हैं, लेकिन हमेशा नहीं रहतीं। खिलौने टूट जाते हैं, छुट्टियाँ ख़त्म हो जाती हैं, बड़े लोग बूढ़े हो जाते हैं। पर परमेश्वर कभी नहीं टूटते और कभी नहीं जाते।

इसके बाद दूसरी बात बताइए, और यही सबसे ज़रूरी है: यह राजा उदास होकर नहीं बैठता। वह कहता है कि खाना मज़े से खाओ, काम खुशी से करो, और परमेश्वर को धन्यवाद दो, क्योंकि हर अच्छी चीज़ उनका तोहफ़ा है। बच्चों को यह सीखना है कि हाथ खोलकर तोहफ़ा लेना ज़्यादा आनंद देता है, बजाय मुट्ठी भींचकर चीज़ें बचाने की कोशिश के।

तोहफ़ा लेने के लिए हाथ खुला चाहिए, बंद नहीं।

हर उम्र के लिए भाषा अलग होनी चाहिए। तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए बुलबुले, समय और धन्यवाद की सरल कहानी काफ़ी है। सात से बारह साल के बच्चों के साथ आप सभोपदेशक 3:1 की कविता पढ़कर बात कर सकते हैं कि हँसने का भी समय है और रोने का भी, और दोनों में परमेश्वर साथ रहते हैं। बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए यह पुस्तक सोने की खान है, क्योंकि वे ठीक उसी उम्र में हैं जहाँ तुलना, प्रदर्शन और पहचान के सवाल सबसे तेज़ चुभते हैं; उनके साथ अध्याय दो का प्रयोग और अध्याय बारह का बुलावा पढ़िए। हमारी वेबसाइट पर इन तीनों उम्र-वर्गों के लिए अलग-अलग सरल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, जिन्हें आप परिवार की आराधना या रविवार की कक्षा में सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सभोपदेशक की पुस्तक किसने लिखी है?

पुस्तक अपना लेखक "उपदेशक" बताती है, जो दाऊद का पुत्र और यरूशलेम का राजा था, और परंपरागत रूप से कलीसिया इसे राजा सुलैमान से जोड़ती है। भीतरी संकेत भी उसी ओर इशारा करते हैं, क्योंकि लेखक अपार बुद्धि, विशाल निर्माण कार्य और बेशुमार धन का वर्णन करता है, जो सुलैमान के जीवन से मेल खाता है। कुछ विद्वान भाषा-शैली के आधार पर मानते हैं कि किसी बाद के संकलनकर्ता ने सुलैमान की परंपरा को सहेजकर अंतिम पद जोड़े। किसी भी हालत में यह पुस्तक प्रेरित वचन है और इसका संदेश अपरिवर्तित रहता है।

"व्यर्थ ही व्यर्थ" का असली अर्थ क्या है?

इब्रानी शब्द "हेवेल" का मूल चित्र भाप, धुआँ या ठंड में दिखने वाली साँस है। इसका अर्थ केवल "बेकार" नहीं, बल्कि "क्षणभंगुर, हाथ में न आने वाला, पकड़ से बाहर" है। सभोपदेशक 1:2 यह नहीं कह रहा कि जीवन बेकार है, बल्कि यह कि जीवन को नियंत्रण में लेने या उससे स्थायी सुरक्षा पाने की हमारी कोशिश बेकार है। इसलिए यह पुस्तक निराशा नहीं सिखाती; वह हमें चीज़ों को जकड़ने के बजाय परमेश्वर के हाथ से ग्रहण करना सिखाती है।

क्या सभोपदेशक की पुस्तक निराशावादी है?

पहली नज़र में ऐसा लगता है, पर ध्यान से पढ़िए तो यह पुस्तक सात बार आनन्द का बुलावा देती है। सभोपदेशक 9:7 कहता है कि रोटी आनन्द से खा और मन में सुख मानकर दाखमधु पी। यह निराशावाद नहीं, यथार्थवाद है जो कृतज्ञता में बदल जाता है। पुस्तक हमारे झूठे सहारों को गिराती है ताकि हम सच्चे सहारे पर खड़े हों। जो व्यक्ति स्वीकार कर लेता है कि वह भाप है, वही हर सामान्य दिन को परमेश्वर का तोहफ़ा मानकर जीना शुरू करता है।

सभोपदेशक 3:1 का क्या अर्थ है कि हर बात का एक समय है?

सभोपदेशक 3:1 कहता है, "हर एक बात का एक अवसर और प्रत्येक काम का जो आकाश के नीचे होता है एक समय है।" इसके बाद आने वाली जोड़ियों वाली कविता यह नहीं सिखाती कि सब कुछ संयोग से होता है, बल्कि यह कि समय परमेश्वर के हाथ में है और हम उसके मालिक नहीं हैं। इसमें रोना भी है और हँसना भी, बोना भी और उखाड़ना भी। यह पद हमें अपनी सीमाओं को स्वीकार करके वर्तमान क्षण को आज्ञाकारिता और भरोसे के साथ जीने का न्योता देता है।

सभोपदेशक और नीतिवचन में क्या अंतर है?

दोनों बुद्धि-साहित्य हैं, पर उनके स्वर अलग हैं। नीतिवचन जीवन के सामान्य नियम सिखाता है, कि परिश्रम से समृद्धि आती है और आलस्य से अभाव। सभोपदेशक उन अपवादों को उठाता है जहाँ नियम टूटते दिखते हैं, जहाँ बुद्धिमान और मूर्ख एक ही कब्र में जाते हैं और दुष्ट फलता है। नीतिवचन युवा शिष्य के लिए नक्शा है; सभोपदेशक अनुभवी यात्री के लिए वह आवाज़ है जो कहती है कि नक्शा सच है, पर रास्ता तुम्हारी समझ से बड़ा है।

क्या सभोपदेशक कहता है कि मरने के बाद कुछ नहीं है?

कुछ पद, जैसे अध्याय नौ में यह कहना कि मरे हुए कुछ नहीं जानते, इस दिशा में पढ़े जा सकते हैं। पर याद रखिए कि उपदेशक जानबूझकर "सूर्य के नीचे" के दायरे से बोलता है, यानी उस दृष्टि से जो कब्र के इस पार से दिखती है। वही पुस्तक सभोपदेशक 12:7 में कहती है कि आत्मा परमेश्वर के पास लौट जाएगी, और अध्याय बारह न्याय की भी बात करता है। पूर्ण उत्तर तब आता है जब मसीह पुनरुत्थान के द्वारा जीवन और अमरता को प्रकाशित करते हैं।

सभोपदेशक की पुस्तक कब लिखी गई थी?

यदि हम पारंपरिक दृष्टि अपनाएँ कि यह सुलैमान की रचना है, तो इसका समय लगभग दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व है, उसके शासन के आख़िरी वर्षों में, जब उसने समृद्धि और भोग की सीमाएँ देख ली थीं। जो विद्वान भाषा-शैली के कारण बाद की तारीख़ मानते हैं, वे इसे निर्वासन के बाद के काल में रखते हैं, जब इस्राएल अपनी टूटी उम्मीदों के बीच अर्थ खोज रहा था। दोनों स्थितियों में परिस्थिति समान है: एक समुदाय जो सीख रहा है कि सुरक्षा चीज़ों में नहीं, परमेश्वर में है।

"सूर्य के नीचे" वाक्यांश का क्या मतलब है?

यह पुस्तक का एक मुख्य वाक्यांश है, जो लगभग तीस बार दोहराया गया है। इसका अर्थ है वह दायरा जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं, यानी इस टूटी दुनिया का जीवन, जन्म से कब्र तक। जब उपदेशक कहता है कि सूर्य के नीचे कोई लाभ नहीं, तो वह जान-बूझकर हमें उस सीमा तक ले जाता है जहाँ हमारे सारे उत्तर ख़त्म हो जाते हैं। इसका उद्देश्य हमें ऊपर देखने पर मजबूर करना है, क्योंकि जो अर्थ सूर्य के नीचे नहीं मिलता, वह स्वर्ग से आता है।

सभोपदेशक की पुस्तक बाइबल में क्यों शामिल की गई है?

क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को केवल भजन और आज्ञाएँ नहीं, ईमानदारी भी देना चाहते थे। कलीसिया और यहूदी समुदाय ने इसे कैनन में रखा क्योंकि इसका अंत परमेश्वर के भय और आज्ञा-पालन के आधार पर होता है, जैसा सभोपदेशक 12:13 दिखाता है। यह पुस्तक हमारे विश्वास को उस सतहीपन से बचाती है जो दुख और संदेह को ढँक देता है। बाइबल में इसकी उपस्थिति ही इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर कठिन सवालों से नहीं डरते।

क्या मसीही विश्वासी के लिए पैसा कमाना गलत है?

नहीं, सभोपदेशक धन को बुरा नहीं कहता; वह धन-प्रेम को घातक कहता है। सभोपदेशक 5:10 दिखाता है कि जो रुपये से प्रीति रखता है वह कभी तृप्त नहीं होगा, क्योंकि लालसा का पात्र तलहीन है। वही पुस्तक परिश्रम और उसके फल में आनन्द लेने को परमेश्वर का दान कहती है। फ़र्क़ मुद्रा में है, मात्रा में नहीं: क्या पैसा आपके हाथ में उपहार है या आपके हृदय में मालिक? खुली हथेली से कमाया और बाँटा गया धन आशीष बनता है, जकड़ा हुआ धन बंधन।

सभोपदेशक में यीशु मसीह कहाँ दिखाई देते हैं?

सीधे नाम से कहीं नहीं, पर छाया की तरह हर पृष्ठ पर। यह पुस्तक एक खाली जगह बनाती है जिसे केवल मसीह भर सकते हैं: हमें अनंतता की प्यास है पर उत्तर सूर्य के नीचे नहीं मिलता, और मसीह सूर्य के ऊपर से आते हैं। वे हमारी क्षणभंगुरता में उतरे, मृत्यु को चखा, और पुनरुत्थान से उसे तोड़ दिया। इसीलिए पौलुस 1 कुरिन्थियों 15:58 में लिख सकता है कि प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है, जो सभोपदेशक के सबसे भारी शब्द को उलट देता है।

सभोपदेशक 2:11 हमें क्या सिखाता है?

सभोपदेशक 2:11 उस आदमी का निष्कर्ष है जिसने सब कुछ पा लिया था और फिर मुड़कर अपनी उपलब्धियों को देखा। उसने पाया कि सब वायु से खेलना है और सूर्य के नीचे कोई स्थायी लाभ नहीं। इसका पाठ यह है कि खालीपन का इलाज अधिक सफलता नहीं है, क्योंकि सफलता भीतर के गड्ढे को चौड़ा कर देती है, भरती नहीं। यह पद हमें अपने काम से नफ़रत करना नहीं सिखाता, बल्कि काम से अपनी पहचान और तृप्ति माँगना छोड़ना सिखाता है।

इस पुस्तक को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

सभोपदेशक को पढ़ने का सबसे बुरा तरीक़ा है उसमें से मनपसंद पद चुनकर बाक़ी छोड़ देना, और सबसे अच्छा तरीक़ा है उसे एक साथ, एक बैठक में, धीरे-धीरे पढ़ना। बारह अध्याय लगभग चालीस मिनट में पढ़े जा सकते हैं। पहली बार पढ़ते समय कुछ भी हल करने की कोशिश न कीजिए, बस लेखक के साथ चलिए, जैसे कोई मित्र अपनी डायरी पढ़कर सुना रहा हो।

दूसरी बार पढ़ते समय पेंसिल लीजिए और दो चीज़ें चिह्नित कीजिए: हर बार जहाँ "व्यर्थ" शब्द आता है और हर बार जहाँ "सूर्य के नीचे" आता है। इससे पुस्तक की धड़कन आपके सामने खुल जाएगी। तीसरी बार पढ़ते समय आनन्द के बुलावों को खोजिए, जो अध्याय दो, तीन, पाँच, आठ, नौ और ग्यारह में बिखरे हुए हैं। जब आप देखेंगे कि हर अँधेरे खंड के बाद एक खिड़की खुलती है, तो पुस्तक का संतुलन समझ आएगा।

पढ़ते समय एक नियम याद रखिए: उपदेशक के कुछ वाक्य निरीक्षण हैं, निर्देश नहीं। जब वह कहता है कि कुछ भी लाभ नहीं, तो वह बता रहा है कि सूर्य के नीचे से क्या दिखता है, न कि यह आज्ञा दे रहा है कि आप ऐसा ही मान लें। पुस्तक का अधिकारिक निष्कर्ष अंत में है, अध्याय बारह में, और वहीं से पूरी पुस्तक को पढ़ना चाहिए।

एक चार सप्ताह की सरल योजना इस तरह काम करती है। पहला सप्ताह अध्याय एक और दो, विषय: जब सब कुछ पाना भी काफ़ी न हो। दूसरा सप्ताह अध्याय तीन से पाँच, विषय: समय, आराधना और पैसा परमेश्वर के हाथ में। तीसरा सप्ताह अध्याय छह से नौ, विषय: मृत्यु के सामने बुद्धिमानी से जीना। चौथा सप्ताह अध्याय दस से बारह, विषय: जवानी में सृजनहार को स्मरण रखना और जोखिम उठाकर बोना। हर सप्ताह के अंत में एक सवाल अपने आप से पूछिए: इस हफ़्ते मेरी मुट्ठी किस चीज़ पर बंद थी?

साथ में पढ़ने के लिए भजन संहिता नब्बे, याकूब का पत्र, और 1 कुरिन्थियों अध्याय पन्द्रह चुनिए। भजन नब्बे आपको सिखाएगा कि क्षणभंगुरता की प्रार्थना कैसे की जाती है, याकूब आपको दिखाएगा कि भाप जैसी ज़िंदगी में योजनाएँ कैसे बनाई जाती हैं, और 1 कुरिन्थियों पन्द्रह आपको वह अंतिम उत्तर देगा जो उपदेशक तरसता रहा। और सभोपदेशक 12:1 को याद कर लीजिए, कि अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख, क्योंकि यही एक वाक्य किसी भी उम्र में सही समय पर की गई सही शुरुआत है।

अंत में, इसे अकेले न पढ़िए। यह पुस्तक बातचीत के लिए बनी है। किसी छोटे समूह में, या पति-पत्नी के रूप में, या किसी ऐसे दोस्त के साथ पढ़िए जो थका हुआ है। आप पाएँगे कि ईमानदार सवाल, जब साथ में पूछे जाएँ, विश्वास को कमज़ोर नहीं करते, गहरा करते हैं।

अंत में

सभोपदेशक हमें यह नहीं सिखाता कि जीवन अर्थहीन है। वह यह सिखाता है कि जीवन हमारी मुट्ठी में नहीं समाता, और यह जानना ही पहली सच्ची आज़ादी है। जब आप स्वीकार कर लेते हैं कि आप भाप हैं, तो आप चीज़ों से वह माँगना बंद कर देते हैं जो केवल परमेश्वर दे सकते हैं, और तब पहली बार एक साधारण रोटी, एक साधारण दिन, एक साधारण काम आपके लिए तोहफ़ा बन जाता है। सभोपदेशक 3:11 हमें बताता है कि हमारे भीतर अनंतता की प्यास रखी गई है, और सभोपदेशक 12:13 हमें दिखाता है कि उस प्यास का उत्तर परमेश्वर के साथ जीवन में है, न कि उपलब्धियों के ढेर में।

आगे की खोज के लिए इन तीन कदमों का सुझाव है: पूरी पुस्तक एक बैठक में पढ़िए, अध्याय तीन की कविता कंठस्थ कीजिए, और फिर 1 कुरिन्थियों अध्याय पन्द्रह खोलकर पढ़िए कि जो सूर्य के नीचे नहीं मिला, वह खाली कब्र में कैसे मिल गया। मुट्ठी खोलिए। जो बह जाए, उसे जाने दीजिए। और जो हाथ आपको थामने के लिए बढ़े हैं, उन पर भरोसा कीजिए, क्योंकि वे हाथ भाप के नहीं हैं।

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