विषय

परमेश्वर की इच्छा कैसे जानें: जीवन के फैसलों में अगुवाई पाने का मार्ग

परिचय

रात के दो बजे हैं। छत की ओर देखते हुए आपके दिमाग़ में वही सवाल घूम रहा है जो पिछले तीन हफ़्तों से चैन नहीं लेने देता। दो नौकरियाँ हैं, या एक रिश्ता है जिसका जवाब देना है, या एक शहर छोड़ने का फ़ैसला है, या बीमार माता-पिता और अपने बच्चों की पढ़ाई के बीच खींचतान है। आपने प्रार्थना की, उपवास किया, दो पास्टरों से बात की, और आसमान अब भी चुप लगता है। मन में एक डर बैठ गया है: अगर मैंने ग़लत चुन लिया तो क्या परमेश्वर की योजना से बाहर हो जाऊँगा?

यह पृष्ठ उसी डर के साथ बैठने के लिए लिखा गया है। आप यहाँ पाएँगे कि बाइबल परमेश्वर की इच्छा को किस तरह प्रस्तुत करती है, वह कहाँ खुलकर बता दी गई है और कहाँ उसे चलते-चलते पहचाना जाता है, कौन-सी लोकप्रिय बातें पवित्रशास्त्र से मेल नहीं खातीं, और कल सुबह आप व्यावहारिक रूप से क्या कर सकते हैं।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

हम इस विषय को एक ख़ास कोने से देखेंगे: परमेश्वर की इच्छा कोई गुप्त नक़्शा नहीं है जिसे ढूँढ़ने पर ही आप आगे बढ़ सकते हैं, बल्कि एक खुला निमंत्रण है, और उसकी आवाज़ अक्सर आगे से नहीं, पीछे से सुनाई देती है। यशायाह 30:21 में परमेश्वर कहते हैं कि चलनेवाले के पीछे से शब्द उसके कानों में पड़ेगा। इसका अर्थ यह है कि अगुवाई मिलती है चलने में, बैठे-बैठे अनुमान लगाने में नहीं। इसलिए यह पृष्ठ पहले यह नहीं पूछेगा कि "मैं क्या करूँ", बल्कि "परमेश्वर मुझे कैसा इंसान बनाना चाहते हैं"। यही क्रम बाइबल का क्रम है, और यही क्रम बेचैनी को शान्ति में बदलता है।

बाइबल परमेश्वर की इच्छा के बारे में क्या कहती है?

बाइबल में "परमेश्वर की इच्छा" दो अर्थों में आती है, और इन दोनों को अलग-अलग समझ लेना आधी उलझन ख़त्म कर देता है।

पहला अर्थ है परमेश्वर की सर्वसामर्थी इच्छा, वह जो निश्चित रूप से पूरी होती है। प्रकाशितवाक्य 4:11 में स्वर्ग में यह गीत गाया जाता है: "हे हमारे प्रभु, और परमेश्वर, तू ही महिमा, और आदर, और सामर्थ के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएँ सृजीं, और सारी वस्तुएँ तेरी ही इच्छा से थीं और सृजी गईं।" सृष्टि, इतिहास, राष्ट्रों का उठना और गिरना, मसीह का क्रूस, सब उसी इच्छा के भीतर है। इस इच्छा को हम "जानने" के लिए नहीं, भरोसा करने के लिए पाते हैं। वह हमें पहले से नहीं बताई जाती।

दूसरा अर्थ है परमेश्वर की प्रकट इच्छा, वह जो उन्होंने साफ़-साफ़ बता दी है, और जिसे मानने या न मानने का चुनाव हमारे हाथ में है। यहीं पर बाइबल आश्चर्यजनक रूप से मुखर है। इफिसियों 5:17 कहता है: "इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो कि प्रभु की इच्छा क्या है।" ध्यान दें, पौलुस यह मान ही नहीं रहा कि प्रभु की इच्छा अगम्य है; वह मानता है कि वह समझी जा सकती है, और उसे न समझना निर्बुद्धिता है। किसकी बात हो रही है? उसी अध्याय के आगे-पीछे: सच बोलना, चोरी छोड़कर मेहनत करना, कड़वाहट छोड़ना, शुद्ध जीवन, आत्मा से भरे रहना, पत्नी और पति का एक-दूसरे के प्रति व्यवहार। यानी परमेश्वर की इच्छा का बड़ा हिस्सा गोपनीय नहीं, नैतिक है।

1 थिस्सलुनीकियों 5:16-18 इसे और स्पष्ट करता है: "सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।" ज़रा सोचिए। हम जानना चाहते हैं कि कौन-सा शहर, कौन-सी नौकरी, कौन-सा जीवनसाथी; और परमेश्वर कहते हैं, मेरी इच्छा यह है कि तुम आनन्दित, प्रार्थना करनेवाले और धन्यवादी बनो। इसी पत्री में आगे 1 थिस्सलुनीकियों 4:3 कहता है, "क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो।" जहाँ हम भूगोल पूछते हैं, वहाँ परमेश्वर चरित्र की बात करते हैं

अब जुड़ती है रोमियों 12:2 वाली कड़ी: "और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से जानते रहो।" यहाँ जानने का साधन कोई तकनीक नहीं, बदला हुआ मन है। और "अनुभव से जानते रहो" का भाव है परखते रहना, चलते-चलते पहचानना। जिस व्यक्ति का मन पवित्र आत्मा के द्वारा नया किया जा रहा है, वह वैसे ही चुनाव करने लगता है जैसे स्वस्थ स्वाद-ग्रंथियाँ अच्छे भोजन को पहचान लेती हैं।

इसके साथ दो कोमल वादे हैं। भजन संहिता 32:8 में परमेश्वर कहते हैं: "मैं तुझे उपदेश दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूँगा; मैं तुझ पर कृपा दृष्टि रखते हुए तुझे सम्मति दूँगा।" यह पद उस भजन में है जो पाप के अंगीकार के बाद आता है, यानी अगुवाई का वादा उस दिल से जुड़ा है जो छिपाना छोड़ देता है। और नीतिवचन 3:5-6: "तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।" यहाँ शर्त बुद्धि का त्याग नहीं, बुद्धि का आत्म-निर्भर हो जाना छोड़ना है।

और जब बुद्धि कम पड़े? याकूब 1:5 का दरवाज़ा खुला है: "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना डांटे सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी।" ध्यान दीजिए, वादा यह नहीं है कि परमेश्वर आपके सवाल का जवाब लिफ़ाफ़े में भेज देंगे। वादा है बुद्धि का, यानी सही तरीक़े से सोचने और परखने की क्षमता का। परमेश्वर हमें बच्चे की तरह उत्तर थमाते नहीं, बेटे-बेटियों की तरह विवेक देते हैं।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

उत्पत्ति के शुरुआती अध्यायों में मनुष्य को कोई विस्तृत जीवन-योजना नहीं दी गई। दी गई एक सीमा और एक बुलावा: बाग़ की सेवा करो, उस एक वृक्ष का फल न खाओ। पतन का मूल यही था कि आदम और हव्वा ने परमेश्वर की प्रकट इच्छा को छोड़कर वह जानने की चाह की जो परमेश्वर ने अपने पास रखा था। मनुष्य की पुरानी बीमारी यही है: जो बताया गया है उसे टालना, और जो छिपाया गया है उसे खोदना।

अब्राहम की कहानी में सूत्र स्पष्ट हो जाता है। उसे नक़्शा नहीं मिला, एक दिशा मिली: अपने देश से निकलकर उस देश में जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। पूरा विवरण चलने के बाद खुला। मूसा को जलती झाड़ी पर पूरी चालीस साल की रूपरेखा नहीं मिली; उसे अगला कदम मिला। इस्राएल को जंगल में बादल और आग के खंभे के पीछे चलना था, दिन-प्रतिदिन, और उन्हें कभी पहले से नहीं बताया गया कि पड़ाव कितने दिन का होगा। आवाज़ पीछे से आती है, नक़्शा आगे नहीं मिलता।

फिर व्यवस्था दी गई, और यह बहुत महत्वपूर्ण मोड़ है। इस्राएल को यह जानने की ज़रूरत नहीं रही कि परमेश्वर उनसे क्या चाहते हैं; वह पत्थर की पटियाओं पर लिखा हुआ था। भजन संहिता 119:105 इसी को गाता है: "तेरा वचन मेरे पैरों के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।" दीपक पूरा रास्ता नहीं दिखाता, अगला कदम दिखाता है, और यह पर्याप्त है। भविष्यद्वक्ताओं के दिनों में जब लोग बलिदानों और अनुष्ठानों के पीछे छिपकर पूछते रहे कि परमेश्वर क्या चाहते हैं, मीका 6:8 ने उनका मुँह बंद कर दिया: "हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?" वह बता चुका है। समस्या जानकारी की नहीं थी, आज्ञाकारिता की थी।

नये नियम में सब कुछ एक व्यक्ति में सिमट आता है। यीशु मसीह ने अपने जीवन का सार इन शब्दों में कहा, यूहन्ना 4:34: "मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजनेवाले की इच्छा के अनुसार चलूँ और उसका काम पूरा करूँ।" और गतसमनी में, जहाँ परमेश्वर की इच्छा सबसे भारी लगी, उन्होंने प्रार्थना की, मत्ती 26:39: "हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" यहाँ ध्यान दीजिए, मसीह को यह "पता करने" की समस्या नहीं थी; उन्हें उसे "स्वीकारने" की लड़ाई लड़नी पड़ी, पसीने और लहू के साथ। हमारी अधिकतर उलझनें भी असल में जानकारी की कमी नहीं, समर्पण की हिचक होती हैं।

इसीलिए प्रेरितों के काम में मंडली के फ़ैसले किसी रहस्यमय संकेत से नहीं, आत्मा की अगुवाई में मिलकर विचार करने से होते हैं। यरूशलेम की सभा का निष्कर्ष इन शब्दों में आया, प्रेरितों के काम 15:28: "क्योंकि पवित्र आत्मा को, और हमको भी ठीक जान पड़ा।" आत्मा और समुदाय, प्रार्थना और विवेक, साथ चलते हैं। और पौलुस की प्रार्थना कुलुस्सियों 1:9 में यही है, कि विश्वासी "सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहिचान में परिपूर्ण" हो जाएँ। पुराने नियम में मार्ग दिखाया गया; नये नियम में मार्ग एक व्यक्ति बन गया, और आत्मा भीतर से चलाना शुरू कर देता है।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति: परमेश्वर की इच्छा एक छिपा हुआ नक़्शा है जिसे न पाने पर पूरी ज़िंदगी बरबाद हो जाएगी। यह सोच बाइबल से नहीं, हमारे डर से आती है। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर अपने बच्चों को कभी लुका-छिपी खिलानेवाले पिता की तरह नहीं दिखाए गए। भजन संहिता 32:8 में वे कहते हैं कि वे कृपा दृष्टि रखते हुए सम्मति देंगे। जिस पिता की आँखें आप पर टिकी हैं, वह आपको जानबूझकर भटकने नहीं देगा। जो प्रकट किया गया है वह हमारे चलने के लिए काफ़ी है, और जो प्रकट नहीं किया गया वह परमेश्वर के अपने हाथ में सुरक्षित है।

दूसरी भ्रांति: अगुवाई का प्रमाण भावनाओं की शान्ति है। शान्ति एक अच्छा साथी है, पर विश्वसनीय कम्पास नहीं। योना जब परमेश्वर की आज्ञा से भागकर जहाज़ में बैठा, तो उसे नींद इतनी गहरी आई कि तूफ़ान में भी न टूटी। दूसरी तरफ़ गतसमनी में मसीह पूर्ण आज्ञाकारिता में थे और भीतर घोर व्याकुलता थी। पौलुस को यरूशलेम जाने से पहले चेतावनियाँ मिलीं और बेचैनी थी, फिर भी वह गया। इसलिए भावना को परखिए वचन से, वचन को भावना से नहीं। इफिसियों 5:17 हमें "ध्यान से समझने" के लिए कहता है, यानी सोचने का काम भी विश्वास का हिस्सा है।

तीसरी भ्रांति: अगर परमेश्वर मुझे बुला रहे हैं तो रास्ता आसान होगा, और अगर मुश्किल आ रही है तो मैं ग़लत जगह हूँ। यह मान्यता क्रूस के सामने टिक नहीं पाती। परमेश्वर की इच्छा के केंद्र में खड़ा व्यक्ति गतसमनी और गुलगुता से गुज़रा। पौलुस आत्मा की अगुवाई में जहाँ गया, वहाँ जेल, कोड़े और जहाज़ का टूटना भी मिला। कठिनाई इस बात का संकेत नहीं है कि आप ग़लत मुड़ गए; कई बार वह इस बात का संकेत है कि आप सही मुड़े हैं और शत्रु को यह पसंद नहीं आया।

चौथी भ्रांति: बड़े फ़ैसलों में परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए किसी अलौकिक चिन्ह का इंतज़ार करना चाहिए। परमेश्वर चिन्ह दे सकते हैं और उन्होंने दिए हैं, पर बाइबल में यह सामान्य तरीक़ा नहीं है। गिदोन ने ऊन का चिन्ह माँगा, मगर पाठ यह भी दिखाता है कि वह पहले ही स्पष्ट बुलावा सुन चुका था और डर के कारण पुष्टि माँग रहा था। सामान्य क्रम है: वचन, प्रार्थना, आत्मा का काम, विवेक, और परिपक्व विश्वासियों की सम्मति। नीतिवचन 15:22 कहता है, "बिना सम्मति के कल्पनाएँ निष्फल होती हैं, परन्तु बहुत से मंत्रियों की सम्मति से बात ठहरती है।" चिन्ह ढूँढ़ते रहना अक्सर आज्ञाकारिता को टालने का धार्मिक बहाना बन जाता है।

आज इसे जीवन में उतारना

व्यावहारिक शुरुआत वहाँ से करें जहाँ अंधेरा नहीं है। एक काग़ज़ पर लिखिए कि इस समय आपके जीवन में परमेश्वर की कौन-सी इच्छा आपको पहले से पता है और आप उसे टाल रहे हैं। वह क्षमा जो आपको अपने भाई को देनी है। वह हिसाब जो दफ़्तर में सीधा करना है। वह आदत जो मोबाइल की स्क्रीन पर रात के अंधेरे में पलती है। वह रिश्ता जो आपको मसीह से दूर खींच रहा है। अनुभव यह कहता है कि जो व्यक्ति ज्ञात आज्ञाकारिता में कदम उठाता है, उसके सामने अज्ञात रास्ते अक्सर खुलने लगते हैं। आज्ञाकारिता में उठाया कदम कल का उजाला बनता है।

दूसरा, फ़ैसले को उसकी असली श्रेणी में रखिए। कुछ बातें साफ़ पाप हैं, वहाँ प्रार्थना करने की ज़रूरत नहीं, तौबा करने की ज़रूरत है। कुछ बातें साफ़ आज्ञा हैं, वहाँ मानना है। और बहुत सारी बातें बुद्धि की श्रेणी में आती हैं, जहाँ दो अच्छे विकल्प हैं और परमेश्वर आपको वयस्क होकर चुनने का सम्मान देते हैं। ऐसे मौक़ों पर याकूब 1:5 को प्रार्थना बनाइए, फिर काग़ज़ पर दोनों विकल्पों की जाँच कीजिए: कौन-सा विकल्प मुझे मसीह के प्रति, मेरे परिवार के प्रति और मंडली के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में मदद करेगा, और कौन-सा मुझे उनसे काटेगा।

तीसरा, अकेले फ़ैसला न कीजिए। दो-तीन ऐसे परिपक्व विश्वासियों को चुनिए जो आपकी हाँ में हाँ न मिलाएँ। उन्हें पूरा सच बताइए, आधा नहीं। अपने पास्टर से समय लीजिए। परमेश्वर बहुत बार अपनी अगुवाई मंडली के ज़रिए पहुँचाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे यरूशलेम की सभा में हुआ।

चौथा, चलिए। नौकरी के लिए आवेदन कीजिए, बातचीत शुरू कीजिए, कोर्स की जानकारी लीजिए, सेवा में हाथ लगाइए। यशायाह 30:21 की आवाज़ खड़े हुए व्यक्ति को नहीं, दाहिने या बाएँ मुड़नेवाले चलते हुए व्यक्ति को सुनाई देती है। दरवाज़ा खुलता है या बंद होता है, दोनों जानकारी हैं।

और पाँचवाँ, हर दिन की शुरुआत 1 थिस्सलुनीकियों 5:16-18 से कीजिए। आनन्द, प्रार्थना, धन्यवाद। जिस दिन आपने यह तीन बातें जीं, उस दिन आप परमेश्वर की इच्छा में थे, चाहे बड़ा सवाल अभी अनुत्तरित हो।

दर्पण

अब सच्चाई से एक सवाल का सामना कीजिए। जब आप कहते हैं, "मुझे परमेश्वर की इच्छा नहीं पता", तो क्या वाक़ई जानकारी की कमी है, या हिम्मत की? आप जानते हैं कि उस पैसे का हिसाब साफ़ नहीं है। आप जानते हैं कि आपकी पत्नी हफ़्तों से आपकी आँखों में नहीं देख पाई है क्योंकि आपका मन कहीं और है। आप जानते हैं कि माता-पिता का फ़ोन आपने जानबूझकर नहीं उठाया। आप जानते हैं कि जिस रिश्ते के लिए आप "परमेश्वर की मरज़ी" खोज रहे हैं, वह पहले दिन से ही आपको मसीह से दूर ले जा रहा है, और आप चाहते हैं कि परमेश्वर उस पर मुहर लगा दें।

परमेश्वर की इच्छा हमें वहाँ चुभती है जहाँ हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे फ़ैसलों के सलाहकार बनें, मालिक नहीं। यह सबसे ज़्यादा तीन जगहों पर तकलीफ़ देती है: बटुए में, कैलेंडर में और शरीर में। हम आत्मिक अगुवाई माँगते हैं, पर अपने पैसे, अपने समय और अपनी देह पर पूरा अधिकार अपने हाथ में रखते हैं। जब समर्पण इन तीनों में से निकल जाता है, तब बड़े फ़ैसलों में परमेश्वर की आवाज़ धुँधली लगने लगती है, और हम इसे परमेश्वर की चुप्पी समझ लेते हैं।

पर यही विषय आज़ाद भी करता है, और गहराई से करता है। अगर परमेश्वर की इच्छा एक गुप्त कोड होती, तो आपकी पूरी ज़िंदगी एक इम्तिहान होती जिसमें एक ग़लत जवाब सब बरबाद कर देता। वह एक व्यक्ति है जो आपको थामे हुए हैं। इसका मतलब है कि आप ग़लती कर सकते हैं और मसीह में बने रह सकते हैं। आपका बीता हुआ ग़लत फ़ैसला आपको परमेश्वर की पहुँच से बाहर नहीं ले गया; कृपा वहाँ भी काम कर रही है। आज आप बिना डर के चुन सकते हैं, क्योंकि जो आपके साथ चल रहे हैं वे उस मार्ग से बड़े हैं जिस पर आप चलेंगे।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों के लिए यह विषय डरावना नहीं, गर्म और अपनापन भरा होना चाहिए। एक सरल तस्वीर काम करती है: कल्पना कीजिए कि पिता बच्चे को कंधे पर हाथ रखकर भीड़ भरे बाज़ार में ले जा रहे हैं। बच्चा पूरा नक़्शा नहीं जानता, उसे बस पिता की आवाज़ और उनका हाथ पहचानना है। परमेश्वर की इच्छा जानना ऐसे ही है, कोई पहेली सुलझाना नहीं, बल्कि उन आवाज़ों को पहचानना सीखना जो हमें सच बोलने, दया करने और डरने के बजाय भरोसा करने के लिए बुलाती हैं।

छोटे बच्चों से कहिए कि परमेश्वर हमें दो तरह की बातें बताते हैं। कुछ बातें वे साफ़-साफ़ बता देते हैं, जैसे सच बोलना, माँ-पापा की बात मानना, अपने से छोटे के साथ अच्छा व्यवहार करना; ये हमें ढूँढ़नी नहीं पड़तीं, बस माननी पड़ती हैं। और कुछ बातें, जैसे बड़े होकर क्या बनना है, वे धीरे-धीरे साथ चलते हुए दिखाते हैं। बच्चों को याकूब 1:5 सिखाना यहाँ बहुत मददगार है, क्योंकि उन्हें यह जानकर सुरक्षा मिलती है कि उलझन में परमेश्वर से बुद्धि माँगी जा सकती है और वे डाँटते नहीं हैं।

घर पर एक छोटी आदत बनाइए: सोने से पहले एक सवाल, "आज परमेश्वर ने तुम्हें किस अच्छी बात के लिए बुलाया और तुमने क्या किया?" यह अभ्यास बचपन में ही आज्ञाकारिता और अगुवाई को जोड़ देता है।

हमारे पास इस विषय पर उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों के लिए तीन से छह साल, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए सात से बारह साल, और किशोरों के लिए बारह वर्ष से ऊपर। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार उन्हें चुनिए और परिवार की प्रार्थना में शामिल कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

परमेश्वर की इच्छा कैसे जानें, इसका सबसे पहला कदम क्या है?

पहला कदम कोई विशेष प्रार्थना विधि नहीं, बल्कि उस बात को मानना है जो परमेश्वर ने पहले से साफ़ बता दी है। इफिसियों 5:17 कहता है, "इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो कि प्रभु की इच्छा क्या है", और उसका संदर्भ नैतिक जीवन है। जो व्यक्ति जानी हुई आज्ञा को टाल रहा है, उसे नई अगुवाई सुनने में कठिनाई होगी। इसलिए शुरुआत अंगीकार और आज्ञाकारिता से कीजिए, फिर बड़े प्रश्न पर आइए। भजन संहिता 32:8 का अगुवाई का वादा भी अंगीकार के भजन में ही दिया गया है।

क्या परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की योजना में कोई अंतर है?

बाइबल दो पहलुओं की बात करती है। एक है परमेश्वर की सर्वसामर्थी योजना, जो निश्चित रूप से पूरी होती है और हमें पहले से नहीं बताई जाती; प्रकाशितवाक्य 4:11 उसी की महिमा गाता है। दूसरी है परमेश्वर की प्रकट इच्छा, यानी वे आज्ञाएँ और मूल्य जो पवित्रशास्त्र में खुले हैं और जिन्हें हम मान भी सकते हैं और ठुकरा भी सकते हैं। पहली पर हम भरोसा करते हैं, दूसरी को हम मानते हैं। उलझन तब होती है जब हम पहली को जानने की कोशिश करते हैं और दूसरी को नज़रअंदाज़ करते हैं।

अगर मैंने ग़लत फ़ैसला ले लिया तो क्या मैं परमेश्वर की इच्छा से बाहर हो गया?

नहीं। मसीह में आपकी सुरक्षा आपके फ़ैसलों की सटीकता पर नहीं, उनकी कृपा पर टिकी है। बाइबल ऐसे लोगों से भरी है जिन्होंने गंभीर ग़लतियाँ कीं और परमेश्वर ने उन्हें फिर उठाया, दाऊद से लेकर पतरस तक। ग़लत फ़ैसला परिणाम लाता है और उन परिणामों को ईमानदारी से भोगना पड़ता है, पर वह आपको परमेश्वर की पहुँच से बाहर नहीं करता। नीतिवचन 3:5-6 का वादा आज भी लागू है, आज ही उसे स्मरण कर के अगला कदम उठाइए।

क्या परमेश्वर आज भी सपनों और दर्शनों के द्वारा बोलते हैं?

परमेश्वर स्वतंत्र हैं और उन्होंने इतिहास में सपनों का उपयोग किया है, इसलिए हम उनके हाथ बाँध नहीं सकते। पर बाइबल इसे अगुवाई का सामान्य साधन नहीं बताती, और किसी भी अनुभव को पवित्रशास्त्र से परखा जाना चाहिए। कोई सपना अगर बाइबल के विरुद्ध कुछ कहे, तो वह परमेश्वर से नहीं है। सामान्य क्रम यही रहता है: वचन, प्रार्थना, आत्मा का भीतरी काम, विवेक और मंडली की सम्मति। जो अनुभव आपको आज्ञाकारिता, नम्रता और मसीह की ओर ले जाता है, वह भरोसेमंद दिशा में है।

मन की शान्ति को अगुवाई का चिन्ह मानना कितना सही है?

शान्ति महत्वपूर्ण है, मगर अकेली गवाही नहीं। योना परमेश्वर से भागते हुए भी गहरी नींद सोया, और यीशु मसीह पूर्ण आज्ञाकारिता में गतसमनी में अत्यंत व्याकुल हुए। इसलिए भावना को वचन के अधीन रखिए। एक अच्छा तरीक़ा यह पूछना है कि यह शान्ति कहाँ से आ रही है, परमेश्वर पर भरोसे से या इस बात से कि मुझे मेरी मनचाही चीज़ मिल रही है। रोमियों 12:2 के अनुसार नया किया गया मन ही सही परखने का साधन है।

बाइबल यूँ ही खोलकर कोई पद निकाल लेना अगुवाई पाने का सही तरीक़ा है?

यह तरीक़ा जोखिम भरा है, क्योंकि इसमें पद को उसके संदर्भ से काटकर अपने सवाल पर चिपका दिया जाता है। पवित्रशास्त्र हमें अगुवाई देता है, पर व्यवस्थित पढ़ाई के ज़रिए, जहाँ हम पूरे अध्याय और पूरी पुस्तक के अर्थ को समझते हैं। भजन संहिता 119:105 वचन को पैरों का दीपक कहता है, और दीपक तब काम करता है जब आप उसे उठाकर चलें, न कि आँख बंद करके एक चमक पकड़ लें। नियमित पढ़ाई से आपका मन धीरे-धीरे परमेश्वर की सोच के आकार में ढलता है।

जीवनसाथी चुनने में परमेश्वर की इच्छा कैसे जानें?

बाइबल किसी का नाम नहीं बताती, पर वह मापदंड साफ़ बताती है: विश्वास में एक होना, चरित्र, पवित्रता, और परिवार तथा मंडली के प्रति ज़िम्मेदारी। इसके बाद यह बुद्धि का प्रश्न है, और यहाँ याकूब 1:5 वाली प्रार्थना और परिपक्व लोगों की सम्मति निर्णायक होती है। ईमानदार सवाल पूछिए, केवल भावनाओं पर मत जाइए, और अपने माता-पिता तथा पास्टर को अंधेरे में मत रखिए। जो रिश्ता आपको मसीह के पीछे चलने में मदद नहीं करता, उसके लिए किसी विशेष चिन्ह की प्रतीक्षा करने की ज़रूरत नहीं है।

नौकरी या पढ़ाई के फ़ैसले में परमेश्वर की अगुवाई कैसे मिलती है?

अधिकतर मामलों में यह बुद्धि की श्रेणी में आता है, न कि गुप्त प्रकाशन की। अपने वरदान, ज़िम्मेदारियाँ, परिवार की ज़रूरतें, ईमानदारी की गुंजाइश और सेवा के अवसर, इन सब पर प्रार्थना सहित ठंडे दिमाग़ से विचार कीजिए। फिर कदम बढ़ाइए, क्योंकि यशायाह 30:21 की आवाज़ चलनेवाले को सुनाई देती है। खुले और बंद दरवाज़े भी अगुवाई का हिस्सा हैं। और याद रखिए, कोई भी नौकरी जो आपको बेईमानी या परिवार की उपेक्षा की ओर धकेलती है, वह इफिसियों 5:17 की रोशनी में सवालों के घेरे में है।

अगर दोनों विकल्प अच्छे हैं और किसी में पाप नहीं, तो क्या करें?

तो आप स्वतंत्रता की भूमि पर खड़े हैं, और यह डर की जगह नहीं, कृतज्ञता की जगह है। ऐसे मौक़ों पर पूछिए कि कौन-सा विकल्प मुझे मसीह के प्रति अधिक निष्ठा, दूसरों की अधिक सेवा और अपनी ज़िम्मेदारियों की बेहतर पूर्ति की ओर ले जाएगा। सम्मति लीजिए, नीतिवचन 15:22 इसी को बुद्धिमानी कहता है। फिर विश्वास के साथ चुनिए और उस चुनाव में वफ़ादार रहिए। परमेश्वर आपको दंडित करने के लिए ताक में नहीं बैठे हैं; वे आपको बड़ा करना चाहते हैं।

उपवास और प्रार्थना से क्या परमेश्वर की इच्छा जल्दी पता चलती है?

उपवास और प्रार्थना बहुत मूल्यवान हैं, पर वे परमेश्वर से जानकारी निकालने का उपाय नहीं हैं। उनका काम हमारे मन को साफ़ करना, हमारी भूख को परमेश्वर की ओर मोड़ना और हमारी ज़िद को नरम करना है। प्रेरितों के काम में मंडली ने उपवास और प्रार्थना के बीच फ़ैसले लिए, पर वहाँ आत्मा की अगुवाई और मिलकर विचार करना साथ-साथ था। सच्चा उपवास वह है जिसके बाद आप यह कह सकें कि जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, जैसा आप चाहते हैं वैसा ही हो।

परमेश्वर चुप क्यों लगते हैं जब मुझे उत्तर की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है?

कई बार जो हमें चुप्पी लगती है, वह असल में परमेश्वर का धैर्य होता है, जो हमें पकने का समय दे रहे हैं। कई बार उत्तर पहले से वचन में मौजूद है और हम कोई दूसरा उत्तर चाहते हैं। और कई बार परमेश्वर उत्तर से भी बड़ी चीज़ दे रहे हैं, अपनी संगति में भरोसा करना सिखा रहे हैं। भजन संहिता 32:8 का वादा यह है कि उनकी कृपा दृष्टि आप पर बनी है, चाहे शब्द अभी सुनाई न दे। ऐसे समय में 1 थिस्सलुनीकियों 5:16-18 को अभ्यास में लाना संभालता है।

रोमियों 12:2 में "भली, भावती और सिद्ध इच्छा" का क्या अर्थ है?

पौलुस तीन शब्दों से एक ही सच्चाई के तीन पहलू दिखाता है। "भली" का अर्थ है वह आपके लिए वाक़ई अच्छी है, चाहे शुरू में कड़वी लगे। "भावती" का अर्थ है वह परमेश्वर को स्वीकार और प्रसन्न करनेवाली है। "सिद्ध" का अर्थ है उसमें कोई कमी नहीं, उसे सुधारने की ज़रूरत नहीं। और यह पूरा वाक्य एक शर्त के बाद आता है: संसार के सदृश न बनना और मन का नया होना। यानी परमेश्वर की इच्छा को अच्छी मानना उसी मन के लिए संभव है जिसे आत्मा बदल रहे हैं।

अंत में

अगर आप इस पृष्ठ से एक बात लेकर जाएँ, तो यह ले जाइए: परमेश्वर आपसे कुछ छिपा नहीं रहे। उन्होंने अपनी इच्छा का बड़ा हिस्सा खुलकर बता दिया है, पवित्रता, सच्चाई, दया, नम्रता, आनन्द, प्रार्थना और धन्यवाद; और छोटे हिस्से को वे आपके साथ चलते-चलते खोलते हैं। परमेश्वर पहले नक़्शा नहीं, चलनेवाले को बदलते हैं। इसलिए अगला कदम आँकड़ों की गणना नहीं, आज्ञाकारिता है। जो आप जानते हैं, उसे आज कीजिए। जो आप नहीं जानते, उसके लिए याकूब 1:5 के अनुसार बुद्धि माँगिए और भरोसे के साथ चुनिए।

आगे बढ़ने के लिए एक सुझाव है। इस हफ़्ते नीतिवचन 3:5-6, भजन संहिता 32:8 और रोमियों 12:2 को धीरे-धीरे, बार-बार पढ़िए और हर पद के बाद एक ही सवाल लिखिए: इसके मुताबिक़ आज मुझे क्या करना है। साथ ही यशायाह 30:21 और इफिसियों 5:17 पर हमारी अलग व्याख्याएँ पढ़िए, और 1 थिस्सलुनीकियों 5:16-18 को अपनी सुबह की प्रार्थना का ढाँचा बना लीजिए। जिस दिन आप आनन्द, प्रार्थना और धन्यवाद में जीते हैं, उस दिन आप परमेश्वर की इच्छा के बाहर नहीं, ठीक उसके भीतर खड़े हैं, चाहे बड़ा प्रश्न कल तक खुला रहे।

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर उत्पत्ति 34:28

दीना के लिए उठा गुस्सा आखिर में भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और गदहों पर जाकर रुक गया। "उन्होंने उनकी भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और…

धन्यवाद संपादकीय पर रूत 1:1

अकाल के उन कठिन दिनों के लिए भी धन्यवाद, पिता, क्योंकि जब बैतलहम में रोटी न रही, तब भी तेरी…

प्रार्थना संपादकीय पर यिर्मयाह 26:4

पिता, तेरी आवाज़ हर दिन मेरे पास आती है, पर कई बार मैं सुनकर भी अनसुना कर देता हूँ। मुझे…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर लूका 5:25

जो खाट सालों तक उसे उठाए फिरती थी, अब वह उसे उठाकर चल पड़ा। "वह तुरन्त उनके सामने उठा, और…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर निर्गमन 10:6

फ़िरौन सोचता था कि महल की दीवारें उसे हर चीज़ से बचा लेंगी। पर परमेश्वर कहते हैं, टिड्डियाँ तेरे घर…

प्रार्थना संपादकीय पर हाग्गै 2:6

पिता, जब मेरे आस पास सब कुछ हिलता हुआ लगता है, तो मुझे याद दिला कि हिलाने वाला भी तू…

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