प्रार्थना कैसे करें: बाइबल के अनुसार प्रभावी प्रार्थना का तरीका
परिचय
रात के दो बजे हैं। बिस्तर पर करवटें बदलते हुए आप छत को घूर रहे हैं। मन में एक बोझ है, कोई ऐसी बात जो किसी इंसान को नहीं बताई जा सकती। आप हाथ जोड़ते हैं, आँखें बंद करते हैं, और फिर रुक जाते हैं। क्या कहें? कैसे शुरू करें? क्या परमेश्वर सचमुच सुन रहे हैं? क्या "सही" शब्द न आने पर प्रार्थना बेकार हो जाती है?
अगर यह सवाल आपके भीतर कभी उठा है, तो आप अकेले नहीं हैं। यीशु के अपने चेलों ने भी यही पूछा था, "हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।" यह पन्ना उसी पुरानी, ईमानदार भूख को शांत करने के लिए है। आप यहाँ से यह जानकर उठेंगे कि प्रार्थना कोई धार्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जीवित संबंध की साँस है, और परमेश्वर आपकी टूटी-फूटी शब्दावली से भी नहीं डरते।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकांश लेख प्रार्थना को एक "तकनीक" की तरह सिखाते हैं, मानो सही फार्मूला मिल जाए तो स्वर्ग का दरवाज़ा खुल जाएगा। यह पन्ना उस दृष्टिकोण को छोड़ देता है। यहाँ हम प्रार्थना को एक तकनीक नहीं, बल्कि एक संबंध की भाषा के रूप में देखेंगे, जो पिता और उनकी संतान के बीच बहती है। इसलिए हमारा ज़ोर "क्या बोलें" पर उतना नहीं होगा जितना "किसके सामने खड़े हैं" पर होगा। जब आप जान लेते हैं कि आप किसके सामने बोल रहे हैं, तो शब्द अपने आप सही जगह गिरने लगते हैं। यही वह कोण है जो इस पूरे पन्ने को बाँधेगा।
बाइबल प्रार्थना के बारे में क्या कहती है?
बाइबल प्रार्थना को कहीं भी "एक धार्मिक कर्तव्य" के रूप में परिभाषित नहीं करती। वह इसे साँस लेने जैसा दिखाती है, स्वाभाविक, ज़रूरी, और लगातार चलने वाला। पुराने नियम में हनोक "परमेश्वर के साथ-साथ चलता था", मूसा "मुँह पर मुँह लगाकर" बात करता था, और दाऊद अपनी सारी नाराज़गी, डर, पश्चाताप और आनंद भजन संहिता में उँडेल देता है। प्रार्थना वहाँ कोई फिल्टर की गई भाषा नहीं है, वह हृदय है जो अपने बनाने वाले के सामने खुल गया है।
यीशु ने चेलों को जो नमूना दिया, वह इस संबंध की जड़ को उघाड़ देता है। मत्ती 6:9 में वे कहते हैं, "अतः तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो, कि हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए।" ध्यान दीजिए, प्रार्थना "हे सर्वशक्तिमान न्यायाधीश" से नहीं, "हे हमारे पिता" से शुरू होती है। यीशु ने एक ही शब्द में डर को दूर कर दिया और रिश्ते को सामने रख दिया। जो पिता हैं, उनसे बच्चा माँगने में हिचकिचाता नहीं।
प्रार्थना पहले पहचान है, फिर याचना।
इसी पहचान से माँगने का साहस आता है। मत्ती 7:7 में यीशु कहते हैं, "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।" यहाँ तीन क्रियाएँ हैं, और तीनों वर्तमान काल में लगातार चलती हैं। एक बार माँगकर छोड़ देना नहीं, बार-बार माँगते रहना। यह हठ नहीं, यह भरोसा है, क्योंकि सामने कोई अजनबी नहीं, पिता खड़े हैं।
पौलुस इसी बात को व्यावहारिक बना देता है। फिलिप्पियों 4:6 कहता है, "किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारा निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किया जाए।" चिंता का इलाज सूचना नहीं, प्रार्थना है, और वह भी "धन्यवाद के साथ"। जब आप चिंता को धन्यवाद के साथ मिलाते हैं, तो आपकी नज़र समस्या से हटकर उस पर टिकती है जो समस्या से बड़े हैं।
फिर 1 थिस्सलुनीकियों 5:17 आता है और तीन शब्दों में सारी बात कह देता है, "निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।" यह वचन डराने के लिए नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप घुटनों पर चौबीस घंटे बैठे रहें। इसका अर्थ है कि आपका हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर खुला रहे, जैसे रेडियो का सिग्नल हमेशा जुड़ा रहता है। बर्तन धोते हुए, गाड़ी चलाते हुए, दफ़्तर में बैठे हुए, आप भीतर से पिता के साथ बातचीत में रह सकते हैं।
याकूब 5:16 इस बातचीत की शक्ति उजागर करता है, "धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।" ध्यान दीजिए, "धर्मी जन" का मतलब पूर्ण जन नहीं। मसीह में जो धर्मी ठहराया गया है, उसकी टेढ़ी-मेढ़ी प्रार्थना भी स्वर्ग तक पहुँचती है और कुछ हिलाती है। और भजन संहिता 34:17 वचन देता है, "धर्मी दुहाई देते हैं, और यहोवा सुनता है, और उनको सब संकटों से छुड़ाता है।" यह सुनने वाला परमेश्वर है, दूर बैठा तमाशबीन नहीं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, प्रार्थना बाइबल के हर पन्ने में साँस लेती है। अदन की वाटिका में परमेश्वर आदम के साथ "दिन के ठंडे समय" चलते थे। यह पहली प्रार्थना थी, बिना शब्दों की संगति। पाप ने इस संगति को तोड़ा, और तब से पूरी बाइबल इस टूटे हुए संबंध को जोड़ने की कहानी है।
अब्राहम सदोम के लिए विनती करता है और परमेश्वर से मोल-भाव भी करता है। याकूब पूरी रात परमेश्वर के दूत से "कुश्ती" लड़ता है और आशीष लिए बिना नहीं छोड़ता। हन्ना गूँगे होंठों से रोती है, और एली सोचता है वह नशे में है, पर परमेश्वर उसका मौन सुन लेते हैं। दानिय्येल दिन में तीन बार यरूशलेम की ओर मुँह करके प्रार्थना करता है, यहाँ तक कि जब मौत की आज्ञा जारी हो जाती है। एलिय्याह एक छोटी सी प्रार्थना करता है और आकाश से आग गिरती है, फिर वही एलिय्याह झाड़ी के नीचे बैठकर मरने की प्रार्थना करता है। बाइबल प्रार्थना के "सफल" और "थके हुए" दोनों रूप हमें दिखाती है, क्योंकि परमेश्वर दोनों को स्वीकार करते हैं।
फिर यीशु आते हैं, और सब कुछ बदल जाता है। वे प्रार्थना करते-करते सारी रात पहाड़ पर बिताते थे। वे सुबह अंधेरे में उठकर सुनसान जगह चले जाते थे। गतसमनी में उन्होंने "लहू की बूँदों के समान पसीने" के साथ प्रार्थना की। और क्रूस पर उनकी अंतिम साँसें भी प्रार्थना ही थीं, "हे पिता, इन्हें क्षमा कर।" लूका 11:1 में एक चेला उनकी प्रार्थना देखकर कहता है, "हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया वैसे ही हमें भी सिखा।" चेलों ने चमत्कार देखकर यह नहीं माँगा कि "हमें चमत्कार करना सिखा", उन्होंने प्रार्थना देखकर यह माँगा। उन्हें समझ आ गया था कि यीशु की सारी सामर्थ्य की जड़ प्रार्थना में थी।
यीशु के क्रूस पर मरने के बाद मंदिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फट गया। यह प्रतीक था कि अब परम पवित्र स्थान का द्वार खुल गया है। हर विश्वासी अब सीधे पिता के पास आ सकता है। क्रूस ने प्रार्थना को लोकतांत्रिक कर दिया। इब्रानियों कहता है कि हम "अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर" आ सकते हैं।
प्रेरितों के काम में मंडली प्रार्थना के आग में जन्म लेती है, ऊपरी कोठरी में एक साथ प्रार्थना करते हुए पवित्र आत्मा उतरता है। पौलुस की पत्रियाँ प्रार्थनाओं से भरी हैं, वह अपनी सेवा में विश्वासियों की प्रार्थना पर टिका था। और अंत में, प्रकाशितवाक्य में हम देखते हैं कि "पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ" स्वर्ण कटोरों में धूप की तरह सिंहासन के सामने चढ़ती हैं। इतिहास प्रार्थना पर समाप्त होता है, "आमीन। हे प्रभु यीशु, आ!"
पूरी बाइबल एक ही सूत्र दिखाती है, परमेश्वर हमेशा बोलने के लिए तैयार हैं; समस्या हमेशा हमारे कान की रही है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: "अच्छे शब्द ही प्रभावी प्रार्थना बनाते हैं।" कई लोग सोचते हैं कि जब तक भाषा सुंदर, गहरी, या शास्त्रीय न हो, प्रार्थना पहुँचती नहीं। रोमियों 8:26 इस झूठ को तोड़ देता है, "आत्मा आप ही ऐसी आहें भर-भरकर जो बयान नहीं हो सकतीं, हमारे लिये बिनती करता है।" अगर आपके पास शब्द ही नहीं हैं, तो पवित्र आत्मा आपकी आहों का अनुवाद कर देते हैं। परमेश्वर वाक्य नहीं, हृदय पढ़ते हैं। एक टूटी हुई फुसफुसाहट एक सुंदर भाषण से अधिक शक्तिशाली हो सकती है।
दूसरी भ्रांति: "अगर प्रार्थना का उत्तर तुरंत न मिले, तो परमेश्वर ने ठुकरा दिया।" यीशु ने मत्ती 7:7 में "माँगते रहो" कहा, एक बार माँगकर हार मानने के लिए नहीं। कभी परमेश्वर "हाँ" कहते हैं, कभी "नहीं", कभी "अभी नहीं", और कभी "कुछ बेहतर।" पौलुस ने तीन बार अपने "शरीर के काँटे" के लिए प्रार्थना की, और परमेश्वर ने काँटा नहीं हटाया, पर अनुग्रह दिया। "नहीं" भी उत्तर है, और अक्सर वह "हाँ" से अधिक प्रेमपूर्ण होता है।
तीसरी भ्रांति: "प्रार्थना केवल मुश्किल समय के लिए है।" कई लोग परमेश्वर को केवल आपातकालीन हेल्पलाइन बना देते हैं। पर 1 थिस्सलुनीकियों 5:17 कहता है, "निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।" प्रार्थना केवल संकट का दरवाज़ा नहीं, यह रोज़ की खिड़की है। जब आप केवल संकट में प्रार्थना करते हैं, तो प्रार्थना सौदेबाज़ी बन जाती है। जब आप हर दिन प्रार्थना करते हैं, तो वह संबंध बन जाती है।
चौथी भ्रांति: "मुझे पहले 'तैयार' होना है, तब प्रार्थना करूँगा।" लोग सोचते हैं कि जब तक वे कोई पाप छोड़ न दें, या अच्छा मूड न हो, तब तक प्रार्थना करना अनुचित है। पर तब तो कोई कभी प्रार्थना नहीं कर पाता। भजन संहिता 34:17 धर्मी जनों की "दुहाई" की बात करता है, यह पॉलिश की गई प्रार्थना नहीं, यह चीख है। यीशु ने कहा कि चुंगी लेने वाला जो केवल छाती पीटकर बोला, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर", वह न्यायी ठहराया गया, न कि सुंदर प्रार्थना करने वाला फरीसी। पहले आओ, फिर सुधरो; यही अनुग्रह का क्रम है।
आज इसे जीवन में उतारना
तो व्यवहार में यह कैसा दिखता है? सुबह जब आपकी आँख खुले, तो पहले फ़ोन नहीं, एक वाक्य पिता से बोलिए। बस, "पिता जी, आज का दिन आपका है।" यह छोटी शुरुआत आपके पूरे दिन का सुर बदल देती है। बहुत लोग इस एक आदत से बदले हैं।
जब दफ़्तर में आपका बॉस अनुचित बात कहे, तो जवाब देने से पहले एक साँस लीजिए और भीतर से बोलिए, "प्रभु, मुझे शब्द दीजिए।" यह "निरन्तर प्रार्थना" का व्यावहारिक रूप है। जब बच्चा ज़िद कर रहा हो और आपका धैर्य टूट रहा हो, तो रसोई की खिड़की से बाहर देखते हुए एक पंक्ति बोलिए, "पवित्र आत्मा, मुझे धीरजवान बनाइए।"
जब रात को नींद न आए, तो चादर के भीतर मत्ती 6:9 की "हमारे पिता" वाली प्रार्थना धीरे-धीरे दोहराइए। हर पंक्ति पर रुककर सोचिए। यह प्राचीन प्रार्थना दो हज़ार साल से लोगों को शांत करती आई है।
चिंता के हमले के समय फिलिप्पियों 4:6 को हथियार बनाइए। एक कागज़ पर वे तीन चीज़ें लिखिए जिनकी आप चिंता कर रहे हैं, और उनके सामने तीन चीज़ें लिखिए जिनके लिए आप धन्यवाद देना चाहते हैं। यह अभ्यास आपके तंत्रिका तंत्र को शांत करता है, क्योंकि यह आपकी नज़र बदलता है।
अपनी प्रार्थना का जीवन साझा कीजिए। याकूब 5:16 का पूरा वचन है, "एक-दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो और एक-दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ।" एक विश्वासयोग्य मित्र खोजिए जिसके सामने आप अपनी सच्ची लड़ाइयाँ रख सकें। अकेली प्रार्थना अच्छी है, साझा प्रार्थना चंगाई लाती है।
अंत में, एक "प्रार्थना नोटबुक" शुरू कीजिए। एक तरफ़ अपनी माँगें लिखिए, दूसरी तरफ़ जब उत्तर मिले तो तारीख के साथ नोट कीजिए। छह महीने बाद जब आप पीछे मुड़कर देखेंगे, तो आपका विश्वास अपने आप बढ़ेगा, क्योंकि आप देखेंगे कि पिता कितनी बार सुनते थे जब आपको लगता था वे चुप हैं।
दर्पण
रुकिए एक पल। आप इस पन्ने पर इसलिए नहीं आए कि आपको बाइबल की जानकारी चाहिए थी। आप इसलिए आए क्योंकि कहीं भीतर एक भूख है, एक थकान है, एक ऐसी दीवार है जिसे तोड़ने में आप नाकाम रहे हैं।
शायद आपने महीनों से ठीक से प्रार्थना नहीं की। हर बार जब आप बैठते हैं, तो मन इधर-उधर भागता है, अपराध बोध आता है, और आप उठ जाते हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूँ, यह विफलता नहीं है; यह मानवता है। पिता को आपकी परफ़ेक्ट एकाग्रता नहीं चाहिए, उन्हें आपकी उपस्थिति चाहिए। एक थका हुआ बच्चा भी गोद में बैठा रहता है, बात न करते हुए भी।
शायद आप उस दुख के भीतर हैं जिसका कोई नाम नहीं। किसी अपने की मृत्यु, टूटा हुआ रिश्ता, बीमारी की रिपोर्ट, या बस अस्तित्व का भारीपन। और आप सोच रहे हैं कि परमेश्वर सुन क्यों नहीं रहे। सुनिए, वे सुन रहे हैं। भजन संहिता 34:17 का "यहोवा सुनता है" वर्तमान काल में है, अभी, इसी क्षण।
शायद पैसे की तंगी है, नौकरी नहीं है, या बच्चा गलत रास्ते पर है। शायद शरीर धोखा दे रहा है, या अकेलापन इतना घना है कि आप रात को तकिए में मुँह छिपाकर रोते हैं। इन सब जगहों पर एक ही सत्य है: आपको अपनी प्रार्थना को "सुधारने" की ज़रूरत नहीं है, आपको बस उसे शुरू करने की ज़रूरत है। घुटनों पर मत आइए, बस अपने कमरे में बैठिए और बोलिए, "पिता, मैं यहाँ हूँ।"
यही काफ़ी है, आज के लिए।
बाकी वे सम्भाल लेंगे।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को प्रार्थना समझाना बहुत आसान है, क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से किसी बड़े पर भरोसा करना जानते हैं। उन्हें बताइए कि प्रार्थना मतलब परमेश्वर से बात करना, ठीक वैसे ही जैसे वे अपने पापा-मम्मी से बात करते हैं। "जब तुम्हें कुछ चाहिए, तुम पापा से माँगते हो न? जब तुम खुश होते हो, तो दौड़कर बताते हो। जब डर लगता है, तो गोद में छुप जाते हो। परमेश्वर हमारे स्वर्गीय पिता हैं, और वे हमारी हर बात सुनते हैं, हर वक़्त।"
बच्चों को यह भी बताइए कि प्रार्थना के लिए किसी ख़ास जगह या ख़ास शब्दों की ज़रूरत नहीं है। साइकिल चलाते हुए, स्कूल जाते हुए, या रात को बिस्तर पर, कहीं भी बोल सकते हैं। परमेश्वर के कान हमेशा खुले हैं। मत्ती 6:9 की "हमारे पिता" वाली प्रार्थना उन्हें सिखाइए, वह उनके लिए एक सुंदर नक्शा बनेगी।
Faith.network पर अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। छोटे बच्चों (3-6 साल) के लिए कहानी और चित्रों के साथ सरल भाषा में, प्राथमिक स्कूल के बच्चों (7-12 साल) के लिए उनके अपने सवालों और उदाहरणों के साथ, और किशोरों (12+ साल) के लिए उनकी शंकाओं, दबावों और असली ज़िंदगी की स्थितियों के साथ जुड़कर। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वह पन्ना खोलिए और उनके साथ बैठकर पढ़िए। यह बीज बहुत गहरा उतरता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रार्थना शुरू कैसे करें अगर मैंने पहले कभी नहीं की?
बस बैठिए और बोलिए, "पिता, मैं यहाँ हूँ।" प्रार्थना कोई परीक्षा नहीं है जिसमें फेल होने का डर हो। परमेश्वर आपके पहले, टूटे-फूटे शब्दों को भी उसी प्रेम से सुनते हैं जैसे किसी संत की गहरी प्रार्थना को। मत्ती 6:9 की "हमारे पिता" वाली प्रार्थना एक अच्छी शुरुआत है, उसे धीरे-धीरे बोलिए और सोचिए। समय के साथ आपकी अपनी भाषा विकसित होगी, बिल्कुल वैसे ही जैसे एक बच्चा माँ से बात करना सीखता है।
क्या प्रार्थना करते वक़्त आँखें बंद करना ज़रूरी है?
नहीं, यह कोई नियम नहीं है। आँखें बंद करना एकाग्रता में मदद करता है, इसलिए यह परंपरा बनी। पर बाइबल में लोग खड़े होकर, हाथ उठाकर, ज़मीन पर लेटकर, और चलते-फिरते भी प्रार्थना करते थे। नहेमायाह ने राजा के सामने खड़े-खड़े मन में प्रार्थना की। यीशु ने आकाश की ओर देखकर प्रार्थना की। जो मुद्रा आपको पिता पर ध्यान देने में मदद करे, वही सही है। बाहरी रूप नहीं, भीतरी हृदय मायने रखता है।
प्रार्थना का उत्तर क्यों नहीं मिलता कभी-कभी?
उत्तर हमेशा मिलता है, पर हमेशा "हाँ" नहीं होता। कभी परमेश्वर "नहीं" कहते हैं क्योंकि वे कुछ बेहतर देखते हैं जो हम नहीं देख पाते, कभी "अभी नहीं" कहते हैं क्योंकि समय पक्का नहीं है, और कभी हमारा अपना पाप या अविश्वास बाधा बनता है। याकूब कहता है कि कभी हम इसलिए नहीं पाते क्योंकि हम गलत नीयत से माँगते हैं। पर एक बात पक्की है, हर सच्ची प्रार्थना सुनी जाती है, चाहे उत्तर हमारी मनचाही आकृति में न आए।
क्या मुझे "हे प्रभु" या "हे परमेश्वर" जैसे शब्दों से ही शुरू करना चाहिए?
कोई निश्चित सूत्र नहीं है। यीशु ने "हे पिता" कहकर सिखाया, जो सबसे गहरा संबोधन है क्योंकि यह रिश्ते को उजागर करता है। आप "हे पिता", "हे प्रभु यीशु", "हे परमेश्वर", किसी भी सम्मानजनक संबोधन से शुरू कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आपके भीतर यह भाव हो कि आप किसी दूर बैठे तानाशाह से नहीं, अपने प्रेमी पिता से बात कर रहे हैं। शब्द बदल सकते हैं, पर पहचान वही रहती है।
क्या मुझे रोज़ प्रार्थना करनी चाहिए, और कितनी देर?
1 थिस्सलुनीकियों 5:17 कहता है "निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो", जो हृदय के एक बहते हुए संबंध की बात है। एक निश्चित समय (सुबह या रात) ज़रूर बनाइए, चाहे पाँच मिनट का हो। पर उसे कठोर नियम मत बनाइए। दस मिनट की ईमानदार प्रार्थना एक घंटे की मशीनी प्रार्थना से बेहतर है। धीरे-धीरे यह समय बढ़ता जाएगा, क्योंकि जब संबंध गहरा होता है, तो बातचीत का समय अपने आप लंबा होता है।
क्या पवित्र आत्मा हमारी प्रार्थना में मदद करते हैं?
हाँ, यह प्रार्थना का सबसे सुंदर रहस्य है। रोमियों 8:26 कहता है कि जब हम नहीं जानते कि क्या माँगें, तो पवित्र आत्मा हमारे भीतर "आहें भर-भरकर" हमारे लिए बिनती करते हैं। इसका मतलब है कि आपकी अधूरी, बिखरी हुई प्रार्थना भी परमेश्वर के सामने पूर्ण होकर पहुँचती है, क्योंकि आत्मा उसका अनुवाद करते हैं। यह बहुत बड़ी राहत है, आपको सही शब्दों का बोझ अकेले नहीं उठाना है।
क्या मैं गुस्से या शिकायत में परमेश्वर से बात कर सकता हूँ?
बिल्कुल। भजन संहिता आधे से ज़्यादा शिकायतों और आँसुओं की भरी हुई हैं। दाऊद पूछते हैं, "हे यहोवा, तू क्यों दूर खड़ा रहता है?" यिर्मयाह अपने जन्म के दिन को कोसते हैं। ईमानदार गुस्सा नकली भक्ति से बेहतर है। परमेश्वर आपकी शिकायत सुन सकते हैं; उन्हें आपकी नकाबदार शराफ़त नहीं, आपकी कच्ची सच्चाई चाहिए। बस अपनी शिकायत में भी उन्हें छोड़िए मत, उन्हीं से बहस करते रहिए, वैसे ही जैसे याकूब ने पूरी रात कुश्ती लड़ी।
क्या पाप में रहते हुए प्रार्थना सुनी जाती है?
भजन संहिता 66:18 कहता है, "यदि मैं मन में अनर्थ की बात सोचता, तो प्रभु मेरी न सुनता।" जानबूझकर पाप को पकड़े रहना प्रार्थना में बाधा डालता है, क्योंकि यह रिश्ते को अवरुद्ध करता है। पर पश्चाताप की प्रार्थना हमेशा सुनी जाती है। 1 यूहन्ना 1:9 कहता है कि यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वे हमें क्षमा करते हैं। इसलिए प्रार्थना छोड़िए मत, बल्कि पाप को ईमानदारी से पिता के सामने रख दीजिए, और फिर आगे बढ़िए।
क्या दूसरों के लिए प्रार्थना करने का कोई मतलब है?
हाँ, और बाइबल इसे बहुत महत्व देती है। अब्राहम ने सदोम के लिए विनती की, मूसा ने इस्राएल के लिए, यीशु ने चेलों और अपने क्रूस पर चढ़ाने वालों के लिए भी प्रार्थना की। पौलुस लगातार विश्वासियों के लिए प्रार्थना करते थे। याकूब 5:16 कहता है, "एक-दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ।" जब आप किसी के लिए प्रार्थना करते हैं, तो आप उन्हें परमेश्वर की उपस्थिति में ले आते हैं, और यह प्रेम का सबसे शक्तिशाली रूप है।
क्या "प्रभु की प्रार्थना" (हे हमारे पिता) रोज़ दोहरानी चाहिए?
यीशु ने इसे "इस रीति से" प्रार्थना करने के लिए दिया, यानी यह एक नमूना है और साथ ही एक असली प्रार्थना भी। आप इसे रोज़ दोहरा सकते हैं, बशर्ते हर पंक्ति के अर्थ पर सोचें, न कि मशीनी रूप से बोलें। लाखों विश्वासियों ने दो हज़ार साल से इसी प्रार्थना में गहरा सांत्वना पाई है। इसे अपनी बाकी प्रार्थना का ढाँचा बनाइए, "पिता की महिमा, उनकी इच्छा, हमारी रोज़ की ज़रूरतें, क्षमा, और परीक्षा से बचाव।"
क्या उपवास के साथ प्रार्थना अधिक शक्तिशाली होती है?
बाइबल में उपवास और प्रार्थना अक्सर साथ आते हैं, पर उपवास परमेश्वर पर दबाव डालने का साधन नहीं है। यह अपने शरीर को अनुशासित करने और आत्मा को केंद्रित करने का तरीका है। जब आप भूख को नज़रअंदाज़ करना सीखते हैं, तो आप आत्मा की बातों को सुनना सीखते हैं। यीशु ने कहा कि कुछ प्रकार की आत्मिक लड़ाइयाँ "उपवास और प्रार्थना" से ही जीती जाती हैं। पर उपवास स्वास्थ्य और परिस्थिति के अनुसार समझदारी से करें, दिखावे के लिए नहीं।
अंत में
अगर इस पूरे पन्ने से एक ही बात याद रखनी हो, तो यह हो: प्रार्थना तकनीक नहीं, संबंध की भाषा है। आप जिस पिता के सामने खड़े हैं, वे आपकी हर आह गिनते हैं, आपकी हर टूटी हुई फुसफुसाहट को स्वर्ण कटोरों में रखते हैं। मत्ती 7:7 का दरवाज़ा आज भी खुला है, फिलिप्पियों 4:6 की शांति आज भी उपलब्ध है, और भजन संहिता 34:17 का सुनने वाला परमेश्वर आज भी अपने सिंहासन पर हैं।
आगे बढ़ने के लिए, यीशु की अपनी प्रार्थनाओं का अध्ययन कीजिए, यूहन्ना 17 अध्याय से शुरुआत करें। भजन संहिता को अपनी प्रार्थना की पाठशाला बनाइए, वहाँ आप हर भावना की भाषा सीखेंगे। और सबसे बड़ी बात, आज ही, इस पन्ने से उठने से पहले, एक छोटी सी प्रार्थना कीजिए। कोई भव्य नहीं, बस एक पंक्ति, "पिता, मुझे प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे यीशु ने अपने चेलों को सिखाया।" वे इस प्रार्थना का उत्तर देंगे, क्योंकि यह उनकी अपनी इच्छा के अनुरूप है। और जिस दिन आप यह प्रार्थना करते हैं, आप उस यात्रा पर निकल पड़ते हैं जो कभी समाप्त नहीं होती, जिसका अंत उसी दिन होगा जब आप उन्हें आमने-सामने देखेंगे।
