विषय

शैतान कौन है: उसकी उत्पत्ति, चालें और उस पर जय पाने का मार्ग

परिचय

रात के दो बजे हैं। एक बहन अपने बिस्तर पर जागी हुई है और उसके मन में एक ही वाक्य घूम रहा है: "तू कभी नहीं बदलेगी। परमेश्वर ने तुझे कब का छोड़ दिया है।" वह आवाज़ किसी स्पीकर से नहीं आ रही, फिर भी इतनी साफ़ है जैसे कोई कमरे में बैठकर बोल रहा हो। वह प्रार्थना करना चाहती है, पर शब्द नहीं निकलते। सुबह वह सोचती है, "यह मेरा अवसाद था, मेरी थकान थी, या कोई और था जो बोल रहा था?"

यह सवाल नया नहीं है। बाइबल की पहली ही कहानी में एक आवाज़ है जो परमेश्वर के वचन के बारे में सवाल उठाती है, और आख़िरी पुस्तक में उसी आवाज़ का नाम, चेहरा और अंजाम खोल दिया जाता है। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि शैतान वास्तव में कौन है, वह कहाँ से आया, उसकी चालें कैसे काम करती हैं, कहाँ लोग उसके बारे में ज़रूरत से ज़्यादा या ज़रूरत से कम मान लेते हैं, और सबसे बढ़कर, मसीह में उस पर जय पाने का ठोस, व्यावहारिक मार्ग क्या है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

इस पृष्ठ का दृष्टिकोण एक वाक्य में यह है: शैतान के पास कोई नया हथियार नहीं है, और उसके पास कोई सिंहासन नहीं है। वह वही एक पुराना झूठ बोलता है जो उत्पत्ति 3:1 में बोला था, परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की भलाई पर संदेह; और प्रकाशितवाक्य 12:9 के अनुसार वह पहले ही "गिरा दिया गया" है। इसलिए हम इस विषय को डर से नहीं, बल्कि विजय के भीतर से देखेंगे। हम उसे न बहुत बड़ा बनाएँगे और न हँसी में उड़ाएँगे। आप एक गिराए हुए शत्रु को पहचानना सीखेंगे, जिसकी सारी ताक़त इस पर टिकी है कि आप उसका झूठ मान लें।

बाइबल शैतान के बारे में क्या कहती है?

बाइबल शैतान का परिचय किसी दार्शनिक व्याख्या से नहीं, बल्कि एक बातचीत से कराती है। उत्पत्ति 3:1 कहता है, "यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा, 'क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?'" ध्यान दीजिए, यहाँ कोई सींगवाला राक्षस तलवार लेकर नहीं आता। एक सवाल आता है। और वह सवाल परमेश्वर की आज्ञा को थोड़ा-सा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, ताकि वह आज्ञा कठोर लगे और परमेश्वर कंजूस लगे। पहला हमला वचन पर नहीं, वचन की व्याख्या पर था; और परमेश्वर की सामर्थ्य पर नहीं, परमेश्वर के हृदय पर था।

यीशु मसीह स्वयं इस चरित्र का सबसे तीखा वर्णन देते हैं। यूहन्ना 8:44 में वे कहते हैं, "तुम अपने पिता शैतान से हो, और अपने पिता की अभिलाषाओं के अनुसार करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उस में नहीं। जब वह झूठ बोलता है, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है, वरन् झूठ का पिता है।" यहाँ दो बातें जुड़ी हुई हैं: झूठ और हत्या। झूठ केवल ग़लत सूचना नहीं है; झूठ मारता है। अदन में झूठ सुनने के बाद मनुष्य ने जीवन खो दिया। आज भी जब कोई युवा यह झूठ मान लेता है कि "मेरा जीवन बेकार है," तो वह झूठ उसे भीतर से मारने लगता है।

वह कहाँ से आया? बाइबल कोई विस्तृत जीवनी नहीं देती, पर संकेत साफ़ हैं। वह सृष्टि का हिस्सा है, सृष्टिकर्ता नहीं। वह एक प्राणी है जो परमेश्वर के सामने जवाबदेह है। अय्यूब 1:7 में यह बात चौंकाने वाले ढंग से दिखती है: "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'तू कहाँ से आता है?' शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, 'पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और उसमें आते-जाते आया हूँ।'" यह दृश्य किसी दो बराबर की शक्तियों की लड़ाई का नहीं है। यहाँ परमेश्वर पूछते हैं और शैतान जवाब देता है। वह घूमता है, ताकता है, ताक लगाता है, पर वह एक सीमा के भीतर है जो परमेश्वर ने बाँधी है। अय्यूब की पूरी पुस्तक में शैतान अय्यूब को छू भी नहीं सकता जब तक अनुमति न मिले। यह उन सब के लिए गहरी शांति है जो सोचते हैं कि उनका जीवन किसी अंधी दुष्ट शक्ति के हाथ में है।

नाम भी बहुत कुछ बताते हैं। "शैतान" का अर्थ है विरोधी, मुक़दमा चलाने वाला; "इब्लीस" का अर्थ है दोष लगाने वाला, बदनाम करने वाला। वह अभियोग लगाता है: परमेश्वर के सामने आपके बारे में, और आपके मन में परमेश्वर के बारे में। 1 पतरस 5:8 चेतावनी देता है, "सचेत हो, और जागते रहो; क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह की नाईं ढूंढ़ता फिरता है, कि किस को फाड़ खाए।"

और उसकी सबसे सफल चाल वेश बदलना है। 2 कुरिन्थियों 11:14 कहता है, "और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है।" पौलुस यह बात झूठे प्रेरितों के संदर्भ में लिख रहे थे, यानी उन लोगों के संदर्भ में जो कलीसिया के भीतर आत्मिक भाषा बोलते थे। शैतान की सबसे ख़तरनाक उपस्थिति डरावनी नहीं, धार्मिक होती है। वह अंधकार में नहीं, रोशनी की नक़ल में आता है।

उसकी ताक़त डर में नहीं, भरोसेमंद दिखने में है।

इसलिए बाइबल हमें हथियार देती है, ताबीज़ नहीं। इफिसियों 6:11 कहता है, "परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो, कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको।" शब्द "युक्तियाँ" महत्वपूर्ण है: यह चालाकी की, योजना की भाषा है। और लक्ष्य "जीतना" नहीं, "खड़े रहना" है, क्योंकि जय पहले ही मिल चुकी है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

पूरी बाइबल में शैतान एक बढ़ता हुआ खलनायक नहीं, एक सिकुड़ता हुआ शत्रु है। उत्पत्ति में वह बोलता है और मनुष्य गिर जाता है, पर उसी अध्याय में परमेश्वर एक प्रतिज्ञा देते हैं: स्त्री का वंश सर्प के सिर को कुचल डालेगा और सर्प उसकी एड़ी को डसेगा। यही वह धागा है जो पूरे पवित्रशास्त्र में खिंचा हुआ है। पहली ही हार में जय की घोषणा छिपी है।

पुराने नियम में शैतान का नाम बहुत कम बार आता है, और यह अपने आप में एक धर्मशास्त्रीय संदेश है। इस्राएल के पड़ोसी जातियों में देवताओं की लड़ाइयों की कहानियाँ भरी थीं, जहाँ अच्छाई और बुराई की दो बराबर शक्तियाँ आपस में भिड़ती हैं। बाइबल जान-बूझकर ऐसी तस्वीर नहीं बनाती। अय्यूब 1 और 2 में शैतान स्वर्गीय सभा में एक हाज़िर होने वाला प्राणी है। जकर्याह 3 में वह याजक यहोशू के दाहिने खड़ा होकर दोष लगाता है, और परमेश्वर उसे झिड़कते हैं और गंदे वस्त्रों की जगह शुद्ध वस्त्र पहनाते हैं। 1 इतिहास 21 में वह दाऊद को उभाड़ता है। बस इतना। पुराना नियान उसे मुख्य पात्र बनने ही नहीं देता; मुख्य पात्र परमेश्वर हैं और उनकी वाचा है।

फिर यीशु मसीह आते हैं और युद्ध खुलकर सामने आ जाता है। जंगल में शैतान वही पुरानी चाल चलता है: "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है..." यानी परमेश्वर के वचन पर संदेह, जो बपतिस्मे में अभी-अभी बोला गया था। यीशु हर बार लिखे हुए वचन से उत्तर देते हैं, और मत्ती 4:10 में कहते हैं, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" जो आदम वाटिका में हार गया, वह दूसरा आदम वीराने में खड़ा रह गया। चेलों के लौटने पर यीशु लूका 10:18 में कहते हैं, "मैं शैतान को बिजली की नाईं स्वर्ग से गिरा हुआ देख रहा था।"

क्रूस पर वह एड़ी डसी गई, और उसी क्षण सिर कुचला गया। इब्रानियों 2:14 समझाता है कि यीशु मसीह मांस और लोहू के भागी हुए, "ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिस के पास मृत्यु की सामर्थ थी, अर्थात् शैतान को निकम्मा कर दे।" 1 यूहन्ना 3:8 कहता है, "परमेश्वर का पुत्र इसी लिये प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे।" ध्यान दीजिए, मसीह ने शैतान से कोई सौदा नहीं किया, कोई बहस नहीं जीती; उन्होंने वह चीज़ छीन ली जिस पर शैतान की पकड़ थी, यानी पाप का दोष और मृत्यु का डर।

और तब प्रकाशितवाक्य 12:9 का शक्तिशाली वाक्य आता है: "और वह बड़ा अजगर अर्थात् वही पुराना सांप, जो शैतान और इब्लीस कहलाता है, और सारे संसार का भरमानेवाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया, और उसके दूत भी उसके साथ गिरा दिए गए।" "वही पुराना सांप" पूरे बाइबल के धागे को एक गाँठ में बाँध देता है: अदन का सवाल पूछने वाला और इतिहास का भरमाने वाला एक ही है। और क्रिया देखिए: "गिरा दिया गया।" यह भविष्य की धमकी नहीं, हो चुकी घटना का ऐलान है। उसी अध्याय में विश्वासियों की जय का तरीक़ा बताया गया है, मेम्ने का लोहू और गवाही का वचन। अंत में प्रकाशितवाक्य 20 में उसे आग और गन्धक की झील में डाल दिया जाता है। शत्रु की कहानी का अंत लिखा जा चुका है; अभी हम केवल उसके तड़पते दिन जी रहे हैं।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति यह है कि शैतान परमेश्वर का बराबर का विरोधी है, जैसे दो पहलवान अखाड़े में हों और नतीजा अनिश्चित हो। यह सोच बाइबल की नहीं, बुतपरस्त कहानियों की है। अय्यूब 1:7 में शैतान परमेश्वर के प्रश्न का उत्तर देता है; वह प्रश्न पूछने की स्थिति में नहीं है। वह सृजा हुआ प्राणी है, सर्वज्ञ नहीं, सर्वशक्तिमान नहीं, और सर्वव्यापी नहीं। रोमियों 16:20 कहता है, "शान्ति का परमेश्वर शैतान को तुम्हारे पैरों से जल्द कुचलवा देगा।" जिसे परमेश्वर विश्वासियों के पैरों तले कुचलवाते हैं, वह परमेश्वर का प्रतिद्वंद्वी नहीं हो सकता।

दूसरी भ्रांति इसके ठीक उलट है: शैतान कोई व्यक्ति नहीं, बस बुराई का प्रतीक है, समाज की कुरीतियों का दूसरा नाम। पर यीशु मसीह उससे बातें करते हैं, उसे फटकारते हैं, और यूहन्ना 8:44 में उसे "झूठ का पिता" कहते हैं। कोई प्रतीक किसी को जंगल में ले जाकर प्रस्ताव नहीं देता। जब हम उसे केवल रूपक बना देते हैं, तो हम उन आवाज़ों के आगे निहत्थे खड़े हो जाते हैं जिन्हें हम "अपने विचार" समझकर स्वीकार कर लेते हैं। शत्रु को न मानना उससे बचाव नहीं करता; यह उसे बिना नाम के काम करने की आज़ादी देता है।

तीसरी भ्रांति है हर बात का दोष उस पर डाल देना। "शैतान ने मुझसे करवाया" आज का सबसे सस्ता बहाना बन गया है। याकूब हमें दूसरी दिशा में भेजता है: परीक्षा हमारी अपनी अभिलाषा से भी खिंचती है। हमारे तीन शत्रु हैं, शरीर, संसार और शैतान; और अक्सर दोषी हमारा अपना अनुशासनहीन मन होता है। इसीलिए याकूब 4:7 का क्रम बहुत सोच-समझकर रखा गया है: "इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।" पहले समर्पण, फिर सामना। जो आदमी परमेश्वर के अधीन नहीं है, वह शैतान का सामना करने के लिए कोई ज़मीन ही नहीं रखता; वह शत्रु से उस क्षेत्र में लड़ रहा है जो उसने ख़ुद शत्रु को सौंप दिया है।

चौथी भ्रांति यह है कि शैतान की उपस्थिति हमेशा भयानक और स्पष्ट रूप से गंदी होती है, इसलिए जो चीज़ धार्मिक, आत्मिक और सुंदर लगती है, वह सुरक्षित है। 2 कुरिन्थियों 11:14 इस भरोसे की धज्जियाँ उड़ा देता है: "शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है।" उसकी सबसे बड़ी सफलताएँ कब्रिस्तानों में नहीं, मंचों पर, किताबों में और आत्मविश्वास से भरे उपदेशों में मिली हैं, जहाँ अनुग्रह को सस्ता कर दिया गया या मसीह को हटाकर सफलता का सूत्र बेच दिया गया। इसीलिए इफिसियों 6:11 "युक्तियों" की बात करता है, क्योंकि सबसे बड़ा ख़तरा हमला नहीं, चतुराई है। और इसलिए विवेक का पैमाना भावना नहीं, लिखा हुआ वचन है।

आज इसे जीवन में उतारना

मान लीजिए आपके दफ़्तर में एक साथी आपके काम का श्रेय ले लेता है। भीतर से आवाज़ उठती है: "बोलो कुछ नहीं, बस उसका नुक़सान करने का मौक़ा ढूँढ़ो। परमेश्वर तो तुम्हारे लिए न्याय नहीं करेंगे, ख़ुद करो।" पहचानिए यह कौन-सी आवाज़ है। यह वही पुराना सवाल है नए कपड़ों में: क्या परमेश्वर सचमुच भले हैं, क्या वे सचमुच देख रहे हैं? जय का पहला क़दम बड़े-बड़े आत्मिक ऐलान नहीं, बल्कि एक सचेत वाक्य है: "मेरा न्याय परमेश्वर के हाथ में है, और उनका वचन कहता है कि वे मेरे प्रतिफल हैं।" शैतान का सामना करने का मतलब है उसके झूठ को सच के सामने रख देना।

घर में यह और महीन होता है। पति-पत्नी के बीच पंद्रह मिनट की बहस के बाद वह आवाज़ कहती है: "यह शादी गलती थी। यह इंसान कभी नहीं बदलेगा।" यह सामान्य थकान नहीं है; यह एक अभियोग है, और इब्लीस का काम अभियोग लगाना है। आपकी लड़ाई अपने जीवनसाथी से नहीं, उस परिभाषा से है जो शत्रु उनके बारे में आपके मन में गढ़ रहा है। ऐसे क्षण में सबसे शक्तिशाली हथियार यह है कि आप अपने साथी के लिए ज़ोर से प्रार्थना करें। शैतान उस कमरे में नहीं टिकता जहाँ अनुग्रह माँगा जा रहा हो।

पैसे के मामले में झूठ अलग रूप लेता है: "थोड़ा और सुरक्षित हो जाओ, फिर देना शुरू करोगे।" यह लालच नहीं कहलाता, यह "समझदारी" कहलाता है। ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का यही रूप है। इसका ठोस इलाज है नियमित, योजनाबद्ध उदारता, क्योंकि आदत झूठ की सबसे बड़ी दुश्मन है।

शरीर और अकेलेपन के क्षेत्र में शत्रु पहले फुसलाता है और फिर उसी बात पर दोष लगाता है। रात के अकेलेपन में वह कहता है, "तेरा हक़ है, थोड़ा सुख ले ले," और सुबह वही आवाज़ कहती है, "अब तू परमेश्वर के सामने मुँह दिखाने लायक़ नहीं।" दोनों वाक्य एक ही मुँह से निकले हैं। यही वह जगह है जहाँ प्रकाशितवाक्य 12:11 का "मेम्ने का लोहू" ठोस हथियार बन जाता है: आप दोष के सामने अपनी सफ़ाई नहीं देते, आप मसीह का लहू दिखाते हैं।

और समय के मोर्चे पर एक शांत चाल चलती है: व्यस्तता। जिस विश्वासी के पास वचन पढ़ने और प्रार्थना करने का समय नहीं बचा, उसे गिराने के लिए किसी बड़े हमले की ज़रूरत नहीं रहती। इसलिए इफिसियों 6:11 के हथियार रोज़ बाँधे जाते हैं: सत्य, धार्मिकता, सुसमाचार, विश्वास, उद्धार, वचन और प्रार्थना। ये सात आत्मिक मंत्र नहीं, रोज़ की आदतें हैं।

दर्पण

अब सीधे आपसे बात। आप इस पृष्ठ पर आए, इसका मतलब है कहीं कोई आवाज़ आपको परेशान कर रही है। आप जानते हैं वह वाक्य क्या है। वह आपके सबसे कमज़ोर हिस्से पर हाथ रखता है, आपकी आय पर, आपके शरीर पर, आपकी संतान पर, या उस पाप पर जिसका ज़िक्र आपने किसी से नहीं किया। और वह हमेशा एक ही निष्कर्ष तक ले जाता है: परमेश्वर से दूर हट जाओ, ख़ुद सँभालो।

मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि "सकारात्मक सोचिए।" सकारात्मक सोच झूठ के सामने काग़ज़ की ढाल है। मैं आपसे पूछूँगा: आप उस आवाज़ को कौन मानते हैं? अगर आप उसे अपना सच मानते रहेंगे, तो आप उससे बहस करेंगे और हार जाएँगे, क्योंकि जिस बात को हम अपना मानते हैं, उसका हम बचाव करते हैं। पर अगर आप उसे उसका नाम देंगे, झूठ, और उसके सामने लिखा हुआ वचन रख देंगे, तो लड़ाई का मैदान बदल जाएगा।

यहाँ चुभने वाली बात है। याकूब 4:7 पहले कहता है, "परमेश्वर के आधीन हो जाओ।" हममें से बहुत लोग शत्रु से लड़ना चाहते हैं पर समर्पण नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि प्रार्थना से हमारा डर चला जाए, पर वह गुप्त पाप, वह पुरानी कड़वाहट, वह वित्तीय बेईमानी बनी रहे। शत्रु को ठीक ऐसा ही सौदा पसंद है, क्योंकि जहाँ आप परमेश्वर की बात नहीं मानते, वहाँ आप उसकी बात मानने लगते हैं।

और यहाँ स्वतंत्रता है। जिसका आपको सामना करना है, वह आपके प्रभु का प्रतिद्वंद्वी नहीं है, वह एक गिराया हुआ प्राणी है जिसके पास केवल शब्द बचे हैं। वह आपको धमका सकता है, छू नहीं सकता, जब तक आपके पिता अनुमति न दें। आपको जय पाने के लिए लड़ना नहीं है; आपको उस जय में खड़ा रहना है जो क्रूस पर हो चुकी है।

आप एक जीती हुई लड़ाई के भीतर खड़े हैं।

आज रात जब वह आवाज़ लौटे, तो उससे बहस न करें। मसीह का नाम लें, वचन खोलें, और किसी विश्वासी भाई या बहन को फ़ोन कर दें। अंधेरा उजाले में नहीं ठहरता, और झूठ गवाही के सामने भाग जाता है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को शैतान के बारे में सिखाना डराना नहीं है, बल्कि उन्हें यह भरोसा देना है कि यीशु मसीह सबसे बलवान हैं। छोटे बच्चों से आप कह सकते हैं कि परमेश्वर ने बहुत सुंदर स्वर्गदूत बनाए थे, पर एक स्वर्गदूत ने कहा, "मैं परमेश्वर से बड़ा बनना चाहता हूँ," और उसे परमेश्वर की उपस्थिति से निकाल दिया गया। अब वह झूठ बोलकर लोगों को उलझाता है, जैसे उसने वाटिका में उलझाया, पर वह परमेश्वर जितना बड़ा कभी नहीं है और वह कुछ भी परमेश्वर की अनुमति के बिना नहीं कर सकता। बच्चों को यह भी बताइए कि उसकी आवाज़ पहचानने का सबसे आसान तरीक़ा यह है: जो बात आपको झूठ बोलने, छिपाने, नफ़रत करने या यह सोचने के लिए उभाड़े कि "परमेश्वर तुमसे प्यार नहीं करते," वह बात परमेश्वर से नहीं आई।

घर पर एक सरल अभ्यास बहुत काम करता है। बच्चे से पूछिए, "आज तुम्हारे मन में कोई ऐसी बात आई जो परमेश्वर के वचन से मेल नहीं खाती?" और फिर उसके साथ उस बात के ऊपर बाइबल का एक वाक्य बोलिए। बच्चे इस तरह डर से नहीं, सच से लड़ना सीखते हैं।

हर उम्र की समझ अलग होती है, इसलिए हमारे पास इस विषय की अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए बहुत सरल और कोमल रूप में, सात से बारह साल के बच्चों के लिए बाइबल की कहानियों और उदाहरणों के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए उन सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं, जैसे डरावनी फ़िल्में, ऑनलाइन दबाव और आत्म-घृणा की आवाज़ें। बच्चों की उम्र के अनुसार सही पृष्ठ चुनिए और उसे उनके साथ बैठकर पढ़िए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शैतान कौन है, आसान शब्दों में?

शैतान परमेश्वर का बनाया हुआ एक आत्मिक प्राणी है, जो घमंड के कारण परमेश्वर के विरुद्ध हो गया और अब मनुष्यों को परमेश्वर से दूर करने का काम करता है। उसके नाम ही उसका काम बताते हैं: "शैतान" का अर्थ विरोधी या मुक़दमा चलाने वाला है, और "इब्लीस" का अर्थ दोष लगाने वाला है। यीशु मसीह उसे यूहन्ना 8:44 में "झूठ का पिता" और "आरम्भ से हत्यारा" कहते हैं। वह परमेश्वर का बराबर का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक सीमित, जवाबदेह और मसीह के क्रूस पर पराजित प्राणी है।

क्या शैतान पहले एक स्वर्गदूत था?

बाइबल कोई विस्तृत जीवनी नहीं देती, पर वह लगातार यही मानकर चलती है कि शैतान एक सृजा हुआ आत्मिक प्राणी है जो गिर गया। यूहन्ना 8:44 कहता है कि वह "सत्य पर स्थिर न रहा," यानी कभी वह सत्य में था। प्रकाशितवाक्य 12:9 में उसके साथ "उसके दूत भी" गिराए जाते हैं, जिससे पता चलता है कि उसके अधीन स्वर्गदूतों का एक समूह है। 2 पतरस और यहूदा उन स्वर्गदूतों का ज़िक्र करते हैं जिन्होंने अपनी पदवी नहीं रखी। इसलिए यह समझ पवित्रशास्त्र के अनुरूप है, हालाँकि विवरण कम हैं।

क्या यशायाह 14 और यहेजकेल 28 शैतान के बारे में हैं?

इन दोनों अध्यायों का प्राथमिक संदर्भ ऐतिहासिक राजाओं का है, बाबेल का राजा और सोर का राजा, जिनके घमंड और पतन का वर्णन किया गया है। परंपरागत रूप से कलीसिया ने इनमें उस बड़े घमंड की छाया भी देखी है जिसने शैतान को गिराया, क्योंकि भाषा मनुष्य से बड़ी लगती है। यह पढ़ना उपयोगी हो सकता है, पर इन पदों को शैतान की आधिकारिक जन्मकथा बनाकर उस पर पूरा सिद्धांत खड़ा करना ठीक नहीं। उसकी पहचान के लिए हमें यूहन्ना 8:44 और प्रकाशितवाक्य 12:9 जैसे स्पष्ट पदों पर टिकना चाहिए।

शैतान और इब्लीस में क्या अंतर है?

दोनों एक ही व्यक्ति के दो नाम हैं, जो उसके दो कामों को उजागर करते हैं। "शैतान" इब्रानी शब्द से आता है जिसका अर्थ है विरोधी या अभियोग लगाने वाला, और "इब्लीस" यूनानी शब्द से, जिसका अर्थ है बदनाम करने वाला, निंदक। प्रकाशितवाक्य 12:9 दोनों को साथ रखकर यह बात साफ़ कर देता है: "वही पुराना सांप, जो शैतान और इब्लीस कहलाता है।" इसके अलावा बाइबल उसे परखने वाला, इस संसार का हाकिम, और बालजबूल जैसे नामों से भी पुकारती है, पर व्यक्ति एक ही है।

क्या शैतान मेरे विचार पढ़ सकता है?

नहीं, विचारों को जानना केवल परमेश्वर का गुण है; बाइबल बार-बार कहती है कि वे ही मन की थाह लेते हैं। शैतान सर्वज्ञ नहीं है और न सर्वव्यापी; अय्यूब 1:7 में वह बताता है कि वह "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते" आया है, जो एक सीमित प्राणी की भाषा है। हालाँकि वह हज़ारों वर्षों से मनुष्यों को देख रहा है, इसलिए हमारी आदतों, कमज़ोरियों और प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाने में वह बहुत कुशल है। इसीलिए वचन "युक्तियों" की बात करता है, जादुई सर्वज्ञता की नहीं।

क्या शैतान किसी विश्वासी को वश में कर सकता है?

जो व्यक्ति मसीह का है, उसमें पवित्र आत्मा वास करते हैं, और मसीह की स्वामित्व-मुहर शत्रु के अधिकार से बड़ी है। इसलिए बाइबल विश्वासियों को कहीं भी यह नहीं सिखाती कि वे शैतान के क़ब्ज़े में जाने से डरें; वह उन्हें सचेत रहने और सामना करने को कहती है, जैसे याकूब 4:7 और 1 पतरस 5:8 में। फिर भी शत्रु विश्वासियों पर दबाव डाल सकता है, झूठ बो सकता है, दोष लगा सकता है और वहाँ जगह पा सकता है जहाँ हम जान-बूझकर पाप में बने रहते हैं। बचाव अधिकार में नहीं, समर्पण में है।

परमेश्वर ने शैतान को अब तक नष्ट क्यों नहीं किया?

बाइबल पूरा उत्तर नहीं देती, पर वह बहुत कुछ बताती है। उसका दंड घोषित हो चुका है और नियत है: प्रकाशितवाक्य 20 में उसका अंत आग और गन्धक की झील है। परमेश्वर ने अपने समय की योजना बनाई है, और उसी धीरज में हमारे उद्धार का समय भी शामिल है। इस बीच परमेश्वर शत्रु की दुष्टता को भी अपने लोगों के भले के लिए मोड़ देते हैं, जैसा अय्यूब में और सबसे बढ़कर क्रूस पर हुआ, जहाँ शैतान की सबसे बड़ी चाल उसकी अपनी हार बन गई।

मैं कैसे जानूँ कि यह परीक्षा शैतान से है या मेरे अपने मन से?

व्यावहारिक रूप से यह फ़र्क़ करना ज़रूरी नहीं, क्योंकि उत्तर एक ही है: परमेश्वर के अधीन होना और सच के साथ खड़े होना। याकूब सिखाता है कि हमारी अपनी अभिलाषा भी हमें खींचती है, इसलिए हर बुरी सोच पर शत्रु का ठप्पा लगाना ईमानदारी नहीं। पहचान का पैमाना स्रोत का अनुमान नहीं, दिशा है: जो विचार आपको छिपाने, झूठ बोलने, निराश होने या यह मानने को उभाड़े कि परमेश्वर का अनुग्रह आपके लिए नहीं है, वह परमेश्वर से नहीं आता, चाहे वह आपकी आवाज़ में बोले।

क्या हमें शैतान को ज़ोर से फटकारना चाहिए?

बाइबल हमें शैतान का सामना करने को कहती है, पर ध्यान दीजिए कैसे। याकूब 4:7 का क्रम है, पहले परमेश्वर के अधीन होना, फिर सामना करना। यीशु मसीह ने वीराने में लिखे हुए वचन से उत्तर दिया, कोई आत्मिक प्रदर्शन नहीं किया, और यहूदा का पत्र हमें शत्रु के साथ अपमानजनक जुगलबंदी से सावधान करता है। इसलिए चिल्लाने से नहीं, वचन बोलने, पाप त्यागने, प्रार्थना करने और मसीह के लहू पर भरोसा करने से जय मिलती है। शत्रु शोर से नहीं, अधिकार और पवित्रता से भागता है।

शैतान की चालें क्या-क्या हैं?

उसकी चालें बदली नहीं हैं, केवल उनका पहनावा बदला है। पहली चाल संदेह है, जैसे उत्पत्ति 3:1 में परमेश्वर की आज्ञा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना। दूसरी चाल झूठ है, यूहन्ना 8:44 के अनुसार यह उसका स्वभाव है। तीसरी चाल दोष लगाना है, ताकि आप अनुग्रह से दूर भागें। चौथी और सबसे ख़तरनाक चाल है नक़ल, क्योंकि 2 कुरिन्थियों 11:14 कहता है कि वह "ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है," यानी झूठी शिक्षा और धार्मिक दिखावे के रास्ते आता है।

क्या शैतान बीमारी, दुर्घटना और आर्थिक नुक़सान का कारण है?

कभी-कभी हाँ, और अय्यूब की पुस्तक इसका उदाहरण है, पर हर दुख का कारण वही नहीं है। बाइबल दुख के कई कारण बताती है: पतित सृष्टि, हमारे अपने निर्णय, दूसरों का पाप, और परमेश्वर का अनुशासन या परीक्षा में परिपक्वता। सबसे ज़रूरी बात अय्यूब 1 में दिखती है: शत्रु सीमा पार नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर की अनुमति के बिना उसे कुछ छूने का अधिकार नहीं। इसलिए विश्वासी अपने दुख में जासूसी नहीं करते, वे परमेश्वर के हाथ पर भरोसा करते हैं।

शैतान का अंत क्या होगा?

उसका भविष्य पहले ही लिखा हुआ है। उत्पत्ति 3:15 में सर्प के सिर को कुचलने की प्रतिज्ञा क्रूस पर पूरी हुई, जहाँ इब्रानियों 2:14 के अनुसार मसीह ने मृत्यु की सामर्थ्य रखने वाले को निकम्मा कर दिया। प्रकाशितवाक्य 12:9 घोषित करता है कि वह "पृथ्वी पर गिरा दिया गया," और प्रकाशितवाक्य 20 में उसे सदा के लिए दंड की जगह में डाल दिया जाता है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आज हम किसी अनिश्चित युद्ध में नहीं, बल्कि एक घोषित विजय के आख़िरी दिनों में जी रहे हैं।

शैतान के डर से छुटकारा कैसे पाऊँ?

डर तब कम होता है जब तस्वीर सही होती है। जब तक हम शैतान को परमेश्वर का बराबर का प्रतिद्वंद्वी समझते हैं, डर बना रहेगा; जब हम अय्यूब 1:7 की तस्वीर देखते हैं, जहाँ वह परमेश्वर के प्रश्न का उत्तर देता है, डर टूटने लगता है। इसके बाद हथियार बाँधिए, जैसे इफिसियों 6:11 कहता है, और रोज़ वचन तथा प्रार्थना में रहिए। और सबसे बढ़कर, अकेले न लड़िए; कलीसिया में खुलकर बताइए कि आप किस बात से जूझ रहे हैं, क्योंकि अंधेरे में बोला गया झूठ रोशनी में टिक नहीं पाता।

अंत में

अगर इस पूरे पृष्ठ से आपको एक ही बात याद रखनी हो, तो यह याद रखिए: आपका शत्रु सृजा हुआ है, सीमित है, झूठा है, और पहले से गिराया हुआ है। उसके पास कोई नया हथियार नहीं है। अदन में उसने परमेश्वर की भलाई पर सवाल उठाया, वीराने में उसने परमेश्वर के वचन पर सवाल उठाया, और आज आपके बिस्तर पर, आपके दफ़्तर में, आपके फ़ोन की स्क्रीन पर वह वही काम कर रहा है। पर क्रूस के बाद सब कुछ बदल गया। मेम्ने का लहू बहा, अभियोग की फ़ाइल फाड़ दी गई, और मृत्यु का डर टूट गया।

वह दहाड़ सकता है, राज नहीं कर सकता।

तो आगे क्या? अगले हफ़्ते इफिसियों 6 धीरे-धीरे पढ़िए और एक-एक हथियार पर रुककर पूछिए, "मेरे जीवन में यह कहाँ कमज़ोर है?" इसके साथ अय्यूब 1 और 2 पढ़िए, ताकि आप देख सकें कि शत्रु किस छोटी सी सीमा में बँधा है। फिर प्रकाशितवाक्य 12 पर पहुँचिए और उस गवाही के वचन को अपनी ज़ुबान पर रखिए। और आज ही, किसी एक झूठ को नाम देकर उसके सामने पवित्रशास्त्र का एक वाक्य रख दीजिए। यही सामना है, और यही जय का साधारण, दैनिक, विश्वासयोग्य मार्ग है।

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