बाइबल पात्र

शिमशोन का जीवन: असाधारण बल, बड़ी भूल और अंतिम जय

परिचय

गाजा के एक चक्की-घर में एक आदमी अनाज पीस रहा है। उसकी दोनों आँखें निकाली जा चुकी हैं, उसके पैरों में पीतल की बेड़ियाँ हैं, और उसके सिर के बाल, जो कभी उसकी पहचान थे, अब मुँड़े हुए हैं। बाहर पलिश्ती लोग हँस रहे हैं। बैल का काम अब इस्राएल का न्यायी कर रहा है। यह वही आदमी है जिसका जन्म स्वर्गदूत ने घोषित किया था, जिसने शेर को खाली हाथों फाड़ डाला था, जिसने गाजा के नगर-फाटक उठाकर पहाड़ पर रख दिए थे।

यह पतन कैसे हुआ? और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नए नियम में परमेश्वर उसका नाम विश्वास के नायकों की सूची में लिखते हैं।

इस पृष्ठ पर आप शिमशोन का पूरा जीवन क्रम से देखेंगे, उसके जन्म की घोषणा से लेकर मंदिर के खंभों तक, और यह भी समझेंगे कि उसकी कहानी हमें अनुग्रह के बारे में क्या सिखाती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

हम शिमशोन की कहानी को उसके बालों की कहानी की तरह नहीं, बल्कि उसकी आँखों की कहानी की तरह पढ़ेंगे। न्यायियों की पुस्तक बार-बार कहती है कि हर एक वही करता था जो उसकी आँखों में अच्छा लगता था, और शिमशोन इस वाक्य का जीवित चित्र है। वह जो देखता है, वही चाहता है। इसलिए परमेश्वर उसे सुधारने में जो अंतिम साधन प्रयोग करते हैं, वह अंधापन है। जब आँखें चली जाती हैं, तब पहली बार उसकी प्रार्थना सच्ची होती है। देखना, अंधा होना, और अंधेपन में सचमुच देखना: यही सूत्र इस पूरे पृष्ठ में लौटकर आएगा।

बाइबल शिमशोन के जीवन के बारे में क्या कहती है?

शिमशोन की कहानी न्यायियों 13 से 16 तक फैली है, और वह अचानक नहीं आती। न्यायियों की पुस्तक एक उतरती हुई सीढ़ी है: इस्राएल पाप करता है, परमेश्वर उसे शत्रुओं के हाथ में कर देते हैं, लोग दुहाई देते हैं, परमेश्वर एक छुड़ानेवाला भेजते हैं, और कुछ समय बाद सब फिर वैसा ही हो जाता है। हर चक्र पिछले चक्र से कुछ अधिक अंधकारमय है। शिमशोन इस पुस्तक का अंतिम बड़ा न्यायी है, और ध्यान दीजिए कि उसकी कहानी में एक बात पहली बार होती है: लोग दुहाई नहीं देते। कोई पुकार नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। चालीस वर्ष से पलिश्ती उन पर राज कर रहे हैं और इस्राएल इतना अभ्यस्त हो चुका है कि उसे छुटकारा माँगना भी याद नहीं। ऐसे मौन के बीच परमेश्वर स्वयं पहल करते हैं।

एक निःसन्तान स्त्री के पास, दान के गोत्र के मानोह की पत्नी के पास, यहोवा का दूत आता है और कहता है: "क्योंकि, देख, तू गर्भवती होगी और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा। और उसके सिर पर छुरा न फिराया जाए, क्योंकि वह बालक जन्म ही से परमेश्वर का नाजीर रहेगा; और इस्राएलियों को पलिश्तियों के हाथ से छुड़ाने में वही प्रथम पुरुष होगा" (न्यायियों 13:5)। इस एक पद में तीन बातें छिपी हैं। पहली, यह बच्चा परमेश्वर का उपहार है, मनुष्य की योजना नहीं। दूसरी, वह जन्म से नाजीर है; गिनती 6 में नाजीर की मन्नत एक स्वैच्छिक, समय-सीमित समर्पण थी, जिसमें दाखमधु से दूरी, बाल न कटवाना और लाश से अशुद्ध न होना शामिल था, परन्तु शिमशोन ने यह मन्नत चुनी नहीं, वह इसमें जन्मा। तीसरी, और सबसे मार्मिक, वह "छुड़ाने में प्रथम पुरुष होगा", यानी वह काम पूरा नहीं करेगा। परमेश्वर शुरू से ही जानते हैं कि यह छुड़ानेवाला अधूरा रहेगा।

बालक बड़ा होता है और लिखा है कि यहोवा ने उसे आशीष दी और उसका आत्मा उसे उभारने लगा। फिर आती है वह आयत जो शिमशोन के बल का रहस्य खोल देती है। तिम्ना के रास्ते में एक जवान सिंह उस पर गरजता है: "तब यहोवा का आत्मा उस पर बल से उतरा, और उसके हाथ में कुछ न था, फिर भी उसने उसको ऐसा फाड़ डाला जैसा बकरी का बच्चा फाड़ा जाता है। परन्तु जो काम उसने किया था उसे उसने अपने माता पिता को न बताया" (न्यायियों 14:6)। यहाँ बाइबल बड़ी सफाई से बताती है कि शक्ति का स्रोत उसकी पेशियाँ या उसके बाल नहीं, यहोवा का आत्मा है। बाल केवल चिह्न थे, सामर्थ्य की बैटरी नहीं। यही वाक्य आगे भी दोहराया जाता है: जब वह अश्कलोन में पलिश्तियों को मारता है, जब वह नई रस्सियों को सन के सूत की तरह तोड़ देता है, हर बार लिखा है कि आत्मा उस पर बल से उतरा।

आगे की कहानी विचित्र मोड़ों से भरी है। तिम्ना की पलिश्ती स्त्री से विवाह, विवाह-भोज में पहेली, धोखा, बदला, तीस सौ लोमड़ियों के द्वारा खेतों में आग, रामतलही में हज़ार लोगों का संहार गदहे के जबड़े की हड्डी से, और उसके बाद प्यास से मरता हुआ एक आदमी जो पहली बार परमेश्वर को पुकारता है। हर अध्याय में दो धाराएँ साथ बहती हैं: परमेश्वर की सामर्थ्य, जो सचमुच पलिश्तियों को तोड़ती है, और शिमशोन की वासना, जो उसे बार-बार शत्रु के आँगन में खींच ले जाती है। परमेश्वर उसके टेढ़े रास्तों को भी अपने उद्देश्य के लिए काम में लाते हैं, परन्तु वे उनके परिणामों से उसे बचाते नहीं।

बल उधार का था, परन्तु चुनाव उसके अपने थे।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

शिमशोन के जन्म की घोषणा अकेली नहीं है। सारा, रिबका, राहेल, हन्ना: बाइबल में बार-बार परमेश्वर एक बाँझ स्त्री की गोद से छुटकारा शुरू करते हैं, ताकि कोई यह न कह सके कि यह मनुष्य का पराक्रम था। मानोह की पत्नी उस श्रृंखला की एक कड़ी है जो सीधे नए नियम तक जाती है, जहाँ एक स्वर्गदूत एक कुँवारी के पास आकर एक पुत्र की घोषणा करता है और कहता है कि वह अपने लोगों को उनके पापों से उद्धार देगा। शिमशोन और यीशु मसीह, दोनों के जन्म की घोषणा स्वर्ग से हुई; परन्तु एक ने छुड़ाना "शुरू" किया और दूसरे ने क्रूस पर कहा, "पूरा हुआ।"

नाजीर की मन्नत का सूत्र भी आगे बढ़ता है। गिनती 6 में यह पूर्ण समर्पण का चिह्न था। शिमशोन इस चिह्न को पहनता है पर उसे जीता नहीं: वह लाश के पास जाता है, अशुद्ध शेर के शव में से मधु निकालकर खाता है, पलिश्ती भोजों में बैठता है। उसका सिर समर्पित था, उसका हृदय नहीं। शमूएल, जो उसके तुरंत बाद आता है, दूसरी ही तरह का नाजीर है; और अंत में वह आता है जिसने कहा कि उसका भोजन अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करना है। यीशु मसीह ने बाहरी चिह्नों के बिना भीतर से पूर्ण समर्पण जिया, और इसीलिए वे उन सब के लिए उद्धार बन सके जिनका समर्पण टूटा हुआ है।

तीसरा सूत्र न्यायियों की पुस्तक का वह दुखद वाक्य है: उन दिनों इस्राएल में कोई राजा न था, हर एक वही करता था जो उसे अच्छा लगता था। शिमशोन इस अराजकता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है, और इसीलिए उसकी कहानी एक राजा की माँग पैदा करती है। न्यायियों के बाद रूत, और रूत के बाद दाऊद, और दाऊद के वंश में वह राजा जिसकी आँखें कभी वासना से नहीं भटकीं।

और फिर, आश्चर्यजनक रूप से, नया नियम शिमशोन का नाम आदर के साथ लेता है: "अब और क्या कहूँ? मुझे इतना समय नहीं कि गिदोन, और बाराक, और शिमशोन, और यिप्तह, और दाऊद, और शमूएल, और भविष्यद्वक्ताओं के विषय में वर्णन करूँ" (इब्रानियों 11:32)। इस सूची में शिमशोन का नाम इसलिए नहीं है कि उसका चरित्र अनुकरणीय था, बल्कि इसलिए कि उसने अपने सबसे अंधकारमय क्षण में परमेश्वर पर भरोसा किया। इब्रानियों 11 चरित्रों की प्रशंसा-सूची नहीं, परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की सूची है। वह अध्याय हमें सिखाता है कि विश्वास का अर्थ दोषहीनता नहीं, बल्कि अंत में परमेश्वर की ओर मुड़ना है। और यहीं शिमशोन की कहानी सुसमाचार को छूती है: उसका नाम स्वर्ग की सूची में उसकी योग्यता से नहीं, अनुग्रह से लिखा गया।

उसके जीवन का सार

शिमशोन के जीवन के तीन निर्णायक क्षण हैं, और तीनों उसकी आँखों से जुड़े हैं।

पहला क्षण तिम्ना में है। वह एक पलिश्ती स्त्री को देखता है और अपने माता-पिता से कहता है कि उसी को उसके लिए ले आएँ, "क्योंकि वह मुझे अच्छी लगती है" (न्यायियों 14:3)। मूल इब्रानी में यह वाक्य और भी नुकीला है: वह मेरी आँखों में ठीक है। वही शब्द जो पूरी पुस्तक का रोग है। माता-पिता समझाते हैं, व्यवस्था मना करती है, परन्तु शिमशोन के लिए निर्णय की कसौटी परमेश्वर का वचन नहीं, उसकी आँख की पसंद है। यह क्षण महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं उसके जीवन का ढाँचा तय हो जाता है। परमेश्वर उस विवाह के झगड़े को भी पलिश्तियों के विरुद्ध काम में ले आते हैं, परन्तु ध्यान दीजिए कि परमेश्वर का उपयोग करना और परमेश्वर का अनुमोदन करना दो अलग बातें हैं।

दूसरा क्षण दलीला की गोद है। यह अचानक नहीं आया; इससे पहले गाजा की वेश्या का प्रसंग है, यानी शिमशोन उसी दिशा में लगातार बहता रहा। दलीला चार बार पूछती है, तीन बार वह झूठ बोलकर शत्रु के साथ खेलता है, और चौथी बार टूट जाता है: "तब उसने अपने मन का सारा भेद खोलकर उससे कहा, 'मेरे सिर पर छुरा नहीं फिरा, क्योंकि मैं माता के गर्भ ही से परमेश्वर का नाजीर हूँ; इसलिये यदि मैं मूँड़ा जाऊँ, तो मेरा बल घट जाएगा, और मैं निर्बल होकर अन्य सब मनुष्यों के समान हो जाऊँगा'" (न्यायियों 16:17)। वह अपने समर्पण का चिह्न एक ऐसी स्त्री के हाथ में सौंप देता है जो उसे बेच रही है। और फिर आती है बाइबल की सबसे डरावनी पंक्तियों में से एक: "तब उसने कहा, 'हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!' और वह चौंककर जाग उठा, और सोचा, 'मैं पहले के समान बाहर जाऊँगा और अपने को छुड़ाऊँगा।' परन्तु वह न जानता था कि यहोवा उसके पास से चला गया है" (न्यायियों 16:20)। वह न जानता था। पतन की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि सामर्थ्य चली गई, बल्कि यह कि उसे पता ही नहीं चला। इसके बाद पलिश्ती उसकी आँखें निकाल लेते हैं। जो आँखें उसे भटकाती रहीं, वे ही उसकी कीमत बन गईं।

तीसरा क्षण गाजा के दागोन-मंदिर में है। अंधा, बंधा, हँसी का पात्र। परन्तु न्यायियों 16:22 धीरे से कहता है कि उसके सिर के बाल फिर बढ़ने लगे, और यह वाक्य केवल बालों के बारे में नहीं, अनुग्रह के बारे में है। वह खंभों के बीच खड़ा होकर प्रार्थना करता है, अपने जीवन की दूसरी दर्ज प्रार्थना, और कहता है, "हे प्रभु यहोवा, मेरी सुधि ले; हे परमेश्वर, अब की बार मुझे बल दे" (न्यायियों 16:28)। फिर: "और शिमशोन ने कहा, 'मैं पलिश्तियों के संग मर जाऊँ।' और वह अपना सारा बल लगाकर झुका; तब वह घर उन सरदारों और उसमें के सब लोगों पर गिर पड़ा। और जिनको उसने मरते समय मार डाला वे उन से भी अधिक थे जिन्हें उसने अपने जीवन में मार डाला था" (न्यायियों 16:30)।

अंधा होकर उसने पहली बार सचमुच देखा।

शिमशोन से हम क्या सीखते हैं

पहली शिक्षा यह है कि वरदान और चरित्र एक ही चीज़ नहीं हैं। शिमशोन पर बार-बार परमेश्वर का आत्मा बल से उतरा, और वही आदमी वासना, प्रतिशोध और घमंड में डूबा रहा। हम अक्सर सोचते हैं कि जिसकी सेवकाई में सामर्थ्य दिखती है, उसका भीतर भी वैसा ही होगा। शिमशोन इस भ्रम को तोड़ता है। परमेश्वर अपने उद्देश्य के लिए हमारे टूटे-फूटे जीवन का उपयोग कर सकते हैं, और वे यह करते भी हैं; परन्तु उपयोग किया जाना पवित्र होने का प्रमाणपत्र नहीं है। जो जन सेवकाई में हैं, उनके लिए यह चेतावनी और राहत दोनों है: फल परमेश्वर से आता है, इसलिए घमंड का कोई कारण नहीं, और चरित्र की उपेक्षा का कोई बहाना नहीं।

दूसरी शिक्षा पतन की रफ़्तार के बारे में है। शिमशोन एक रात में नहीं गिरा। पहले उसने देखा, फिर उसने चाहा, फिर उसने हल्के-फुल्के खेल खेले, तीन बार दलीला के साथ झूठ का मनोरंजक खेल, और फिर चौथी बार सब खो दिया। न्यायियों 16:20 का सबसे भयानक शब्द है "न जानता था"। आत्मिक सुन्नता धीरे-धीरे आती है। जो पाप हमें कल चुभता था और आज नहीं चुभता, वह घटा नहीं, हमारी संवेदना घटी है। इसीलिए बाइबल हमें आज सुनने, आज पश्चाताप करने, आज वापस मुड़ने का बुलावा देती है।

तीसरी शिक्षा सबसे मीठी है: परमेश्वर आधे-अधूरे लोगों को भी छोड़ते नहीं। जब बाल फिर उगने लगे, शिमशोन को नहीं पता था कि परमेश्वर उसकी कहानी का अंतिम अध्याय लिख रहे हैं। उसकी अंतिम प्रार्थना में बदले की भाषा भी है और सच्चे भरोसे की भाषा भी, और परमेश्वर ने उसे सुना। इसका अर्थ यह नहीं कि पाप के परिणाम मिट गए; उसकी आँखें वापस नहीं मिलीं, उसका जीवन छोटा रह गया, उसका काम अधूरा रहा। परन्तु अनुग्रह ने उसका नाम विश्वास की सूची में लिख दिया। यदि आप सोचते हैं कि आपने बहुत देर कर दी, तो गाजा के चक्की-घर की ओर देखिए; परमेश्वर वहीं से फिर शुरू करते हैं।

दर्पण

आप अपनी नौकरी में सक्षम हैं। आप घर में सम्मानित हैं। लोग कहते हैं कि परमेश्वर आपका उपयोग कर रहे हैं। और आपके फ़ोन में, आपके खर्च के तरीके में, आपके गुस्से में, आपके अकेलेपन के किसी कोने में एक ऐसी बात चल रही है जिसे आप वर्षों से "सम्भाल" रहे हैं। शिमशोन भी सम्भाल रहा था। तीन बार उसने दलीला को उल्टा जवाब दिया और सोचा कि वह नियंत्रण में है। चौथी बार वह जागा और सामर्थ्य जा चुकी थी, और सबसे भयानक बात यह थी कि उसे इसका पता भी नहीं चला।

पूछिए अपने आप से: पिछली बार कब आपके भीतर किसी बात ने आपको चुभा और आपने उसे अनसुना कर दिया? शिमशोन का बल उसके बालों में नहीं था और आपकी सुरक्षा आपकी पिछली गवाही में नहीं है। जो बीता समय परमेश्वर के साथ जीया गया, वह आज के दिन के लिए भोजन नहीं बन सकता।

और अब दूसरी तरफ़ देखिए, क्योंकि यह दर्पण केवल तोड़ने के लिए नहीं है। यदि आप उस स्थान पर हैं जहाँ आपको लगता है कि आपने अपना अवसर गँवा दिया है, जहाँ आपका विवाह घायल है, आपके बच्चे दूर हैं, आपका शरीर थका है और आपका नाम बदनाम है, तो सुनिए: बाल फिर उगने लगे। परमेश्वर ने अंधे, बेड़ियों में जकड़े, अपनी ही मूर्खता की चक्की पीसते आदमी की प्रार्थना सुनी। उन्होंने यह नहीं कहा कि पहले अपने को साफ़ करके आ। उन्होंने उसका हाथ उस खंभे तक पहुँचाया।

आप जहाँ हैं वहीं से पुकारिए। "हे प्रभु, मेरी सुधि ले" जितनी कमज़ोर प्रार्थना है, उतनी ही सच्ची भी हो सकती है। यीशु मसीह उन लोगों के लिए मरे जिनकी आँखें भटकती हैं और जिनके वादे टूटते हैं। यही सुसमाचार है, और यही आपकी एकमात्र आशा है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को शिमशोन बहुत जल्दी पसंद आ जाता है, और यही ख़तरा भी है। लम्बे बालों वाला ताकतवर आदमी, शेर, लोमड़ियाँ, गिरता हुआ मंदिर: यह सब एक सुपरहीरो जैसा लगता है। पर शिमशोन सुपरहीरो नहीं था, और यही बात बच्चों को कोमलता से बतानी ज़रूरी है।

सरल शब्दों में कहानी ऐसे कही जा सकती है: परमेश्वर ने एक परिवार को एक ख़ास बेटा दिया, जिसका काम था अपने लोगों को बुरे शत्रुओं से बचाना। परमेश्वर ने उसे बहुत बड़ी ताकत दी, पर वह ताकत उसके बालों में नहीं थी, वह परमेश्वर से आती थी। बाल केवल एक याद दिलाने वाला चिह्न थे कि यह लड़का परमेश्वर का है। शिमशोन ने अक्सर वही किया जो उसे अच्छा लगा, बिना परमेश्वर से पूछे, और उसे इसका बहुत दुख उठाना पड़ा। परन्तु जब वह सबसे कमज़ोर था, तब उसने परमेश्वर को पुकारा, और परमेश्वर ने उसे सुना।

छोटे बच्चों के साथ यहीं रुकना अच्छा है: ताकत परमेश्वर की है, और परमेश्वर हमें सुनते हैं। बड़े बच्चों के साथ आप यह जोड़ सकते हैं कि अच्छे चुनाव और बुरे चुनाव के परिणाम होते हैं, और किशोरों के साथ दलीला के प्रसंग को ईमानदारी से खोला जा सकता है, क्योंकि वे उस दबाव को समझते हैं।

Faith.network पर शिमशोन की कहानी के अलग-अलग उम्र के अनुसार तैयार किए गए पाठ उपलब्ध हैं: तीन से छह वर्ष के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए। हर उम्र को उतना ही दिया गया है जितना वह सम्भाल सकती है, और हर पाठ अंत में उसी एक बात पर आता है: सच्चा छुड़ानेवाला यीशु मसीह है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिमशोन कौन था और वह कब जीवित था?

शिमशोन इस्राएल के न्यायियों में अंतिम बड़ा न्यायी था, दान गोत्र का व्यक्ति, जिसका जीवन न्यायियों 13 से 16 में दर्ज है। वह उस समय जीया जब इस्राएल का कोई राजा नहीं था और पलिश्ती चालीस वर्ष से देश पर दबाव बनाए हुए थे, सम्भवतः राजा शाऊल के समय से कुछ सौ वर्ष पहले। बाइबल कहती है कि उसने बीस वर्ष इस्राएल का न्याय किया। उसका काम मुख्यतः अकेले लड़ना था, सेना इकट्ठी करना नहीं, और वह पलिश्तियों के शिकंजे को ढीला कर पाया, पूरी तरह तोड़ नहीं पाया।

क्या शिमशोन का बल उसके बालों में था?

नहीं। बाइबल स्पष्ट कहती है कि उसका बल यहोवा के आत्मा से आता था, जैसे न्यायियों 14:6 में लिखा है कि यहोवा का आत्मा उस पर बल से उतरा और उसने सिंह को खाली हाथों फाड़ डाला। लम्बे बाल उसकी नाजीर मन्नत का बाहरी चिह्न थे, यानी इस बात का प्रमाण कि वह जन्म से परमेश्वर को समर्पित है। जब उसने वह चिह्न दलीला के हाथों गँवा दिया, तो असल में उसने अपने समर्पण को तुच्छ जाना, और परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य हटा ली। बाल जादुई नहीं थे; वे एक सम्बन्ध की निशानी थे।

नाजीर होने का क्या अर्थ है?

गिनती 6 में नाजीर की मन्नत एक विशेष समर्पण थी जिसे कोई इस्राएली स्वेच्छा से, एक निश्चित समय के लिए ले सकता था। उसमें तीन बातें थीं: दाखमधु और अंगूर से बनी किसी वस्तु से दूर रहना, सिर के बाल न कटवाना, और मुर्दे के स्पर्श से अशुद्ध न होना। शिमशोन का मामला अनोखा था, क्योंकि न्यायियों 13:5 के अनुसार वह जन्म ही से नाजीर ठहराया गया था, आजीवन। दुखद बात यह है कि उसने तीनों में से हर एक सीमा को किसी न किसी रूप में तोड़ा, और केवल बालों का चिह्न अंत तक बचा रहा।

दलीला कौन थी और उसने शिमशोन को क्यों धोखा दिया?

दलीला सोरेक नाम की तराई में रहनेवाली स्त्री थी जिससे शिमशोन प्रेम करता था। पलिश्तियों के पाँच सरदारों ने उसे भारी धनराशि, प्रत्येक की ओर से ग्यारह सौ टुकड़े चाँदी, देने का वादा किया यदि वह शिमशोन के बल का भेद निकाल ले। न्यायियों 16 में वह चार बार पूछती है और हर बार अपने शब्दों को शिमशोन के विरुद्ध आज़माती है, इसलिए शिमशोन को उसके इरादे का पता था। यही इस कहानी का सबसे कड़वा हिस्सा है: उसने आँखें खुली रखकर धोखा चुना, क्योंकि जो उसे अच्छा लगता था, वही उसके निर्णय की कसौटी थी।

न्यायियों 16:20 का क्या अर्थ है कि यहोवा उसके पास से चला गया?

यह पद बताता है कि शिमशोन नींद से चौंककर उठा, सोचा कि वह पहले की तरह अपने को छुड़ा लेगा, "परन्तु वह न जानता था कि यहोवा उसके पास से चला गया है।" इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने उससे वह विशेष सामर्थ्य हटा ली जो उसके बुलावे के लिए दी गई थी। सबसे गम्भीर बात "न जानता था" है: वह आत्मिक रूप से इतना सुन्न हो गया था कि उसे परमेश्वर की अनुपस्थिति भी महसूस नहीं हुई। यह हर विश्वासी के लिए चेतावनी है कि पाप सबसे पहले हमारी संवेदनशीलता छीनता है, फिर बाकी सब।

क्या शिमशोन ने आत्महत्या की थी?

न्यायियों 16:30 में शिमशोन कहता है, "मैं पलिश्तियों के संग मर जाऊँ," और मंदिर के खंभे गिराकर स्वयं भी मर जाता है। बाइबल इसे आत्महत्या की तरह नहीं, बल्कि एक योद्धा के अंतिम कार्य की तरह प्रस्तुत करती है, जैसे कोई सैनिक अपने लोगों के छुटकारे के लिए जान देता है। उसका लक्ष्य अपनी मृत्यु नहीं, परमेश्वर के शत्रुओं की पराजय था, और मृत्यु उस कार्य की कीमत थी। इसीलिए उसे इब्रानियों 11 में विश्वास के लोगों के साथ गिना जाता है, और इसीलिए उसकी मृत्यु को इस्राएल के लिए एक छुटकारा कहा जाता है।

शिमशोन का नाम इब्रानियों 11 की विश्वास सूची में क्यों है?

इब्रानियों 11:32 में लेखक कहता है कि समय की कमी के कारण वह गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिप्तह, दाऊद, शमूएल और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन नहीं कर सकता। यह सूची चरित्र की प्रशंसा नहीं, विश्वास की गवाही है, और उसमें बहुत से टूटे-फूटे लोग हैं। शिमशोन का नाम वहाँ है क्योंकि अपने जीवन के अंतिम, सबसे अंधकारमय क्षण में उसने अपनी ताकत पर नहीं, परमेश्वर पर भरोसा किया और उन्हें पुकारा। यह पद हमें सिखाता है कि परमेश्वर हमारे अतीत से नहीं, अपने अनुग्रह से हमारा नाम लिखते हैं।

शिमशोन और यीशु मसीह में क्या समानताएँ और अंतर हैं?

दोनों के जन्म की घोषणा स्वर्गदूत ने की, दोनों जन्म से परमेश्वर को समर्पित थे, दोनों को अपने ही लोगों ने शत्रु के हाथ में सौंपा, और दोनों ने अपनी मृत्यु के द्वारा शत्रु को सबसे बड़ी हार दी। अंतर इससे भी बड़े हैं। शिमशोन अपने पाप के कारण मरा, यीशु मसीह हमारे पाप के कारण; शिमशोन ने शत्रुओं को मारकर छुटकारा शुरू किया, यीशु मसीह ने अपने शत्रुओं के लिए प्राण देकर छुटकारा पूरा किया; शिमशोन ने बदला माँगा, यीशु मसीह ने क्षमा माँगी। शिमशोन छाया है, यीशु मसीह वास्तविकता।

शिमशोन ने गदहे के जबड़े की हड्डी से क्या किया?

न्यायियों 15 में, जब पलिश्ती उसे पकड़ने आए और यहूदा के लोगों ने उसे बाँधकर सौंप दिया, तब यहोवा का आत्मा उस पर बल से उतरा, उसके बंधन टूट गए और उसने एक गदहे के जबड़े की ताज़ी हड्डी उठाकर एक हज़ार पुरुषों को मार डाला। उस स्थान का नाम रामत-लही पड़ा। इसके तुरंत बाद वह प्यास से मरने लगा और परमेश्वर को पुकारा, और परमेश्वर ने उसके लिए जल निकाला। यह प्रसंग दिखाता है कि जो पराक्रम में अजेय लगता है, वह भी एक घूँट पानी के लिए परमेश्वर पर निर्भर है।

शिमशोन ने कितने वर्ष इस्राएल का न्याय किया और उसके बाद क्या हुआ?

बाइबल दो बार कहती है कि शिमशोन ने पलिश्तियों के दिनों में बीस वर्ष इस्राएल का न्याय किया। उसकी मृत्यु के बाद उसके भाई और पिता का सारा घराना आया और उसकी लाश उठाकर सोरा और एशताओल के बीच उसके पिता मानोह की कब्र में गाड़ दिया। इसके बाद न्यायियों की पुस्तक और भी अंधकारमय अध्यायों में उतरती है, जहाँ मूर्तिपूजा और हिंसा का वर्णन है, और पाठक के मन में एक ही प्रश्न बचता है: इस्राएल को एक सच्चे राजा की कितनी आवश्यकता है।

क्या परमेश्वर ने शिमशोन के पाप को अनदेखा किया?

नहीं। परमेश्वर ने शिमशोन के टेढ़े रास्तों को भी अपने उद्देश्य के लिए काम में लिया, परन्तु उसे परिणामों से नहीं बचाया। उसने अपनी आँखें खोईं, अपनी स्वतंत्रता खोई, अपनी गवाही खोई और अपना जीवन छोटा किया, और उसका सौंपा हुआ काम अधूरा रह गया। यही बाइबल का संतुलन है: अनुग्रह क्षमा देता है, पर पाप के घाव अपने निशान छोड़ जाते हैं। इसलिए शिमशोन की कहानी एक बहाना नहीं, एक चेतावनी है, और साथ ही आशा भी, क्योंकि अंत में परमेश्वर ने उसे सुना।

शिमशोन की कहानी बाइबल में कहाँ पढ़ी जा सकती है?

पूरी कहानी न्यायियों 13 से 16 तक चार अध्यायों में है। न्यायियों 13 में जन्म की घोषणा और मानोह के परिवार को स्वर्गदूत का दर्शन है, न्यायियों 14 में तिम्ना की स्त्री, सिंह और पहेली का प्रसंग, न्यायियों 15 में लोमड़ियाँ, यहूदा का विश्वासघात, जबड़े की हड्डी और परमेश्वर से मिला जल, और न्यायियों 16 में गाजा, दलीला, अंधापन तथा दागोन के मंदिर का अंत। नए नियम में उसका नाम इब्रानियों 11:32 में आता है। इन अध्यायों को एक ही बार में पढ़ना सबसे अच्छा है, ताकि उतार-चढ़ाव का पूरा प्रभाव दिखे।

अंत में

शिमशोन की कहानी को आँखों की कहानी की तरह पढ़ने पर वह हमारे बहुत पास आ जाती है। वह हर बार वही चुनता रहा जो उसे भला दिखा, और परमेश्वर ने अंत में उससे वही चीज़ ले ली जिसने उसे भरमाया था। और फिर, उस अंधकार में, बेड़ियों और चक्की और हँसी के बीच, उसके सिर के बाल फिर उगने लगे और उसका हृदय पहली बार सचमुच झुका। परमेश्वर का अनुग्रह अंतिम अध्याय में भी काम करता है।

यदि आप आगे पढ़ना चाहें, तो न्यायियों 13 से 16 एक बार बिना रुके पढ़िए, फिर गिनती 6 में नाजीर की मन्नत देखिए, और अंत में इब्रानियों 11 पूरा पढ़िए। वहाँ आप देखेंगे कि विश्वास के लोगों की सूची कमज़ोर लोगों की सूची है, जिनके पीछे एक बलवान परमेश्वर खड़े हैं।

और फिर उसकी ओर देखिए जिसने खंभों के बीच नहीं, दो लकड़ियों के बीच अपनी बाँहें फैलाईं, जिसने बदला नहीं माँगा बल्कि क्षमा माँगी, और जिसने मरते हुए कहा कि काम पूरा हो गया। शिमशोन ने छुड़ाना शुरू किया। यीशु मसीह ने उसे पूरा किया।

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पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर विलापगीत 4:4

दूध पीते बच्चे की जीभ प्यास के मारे तालू से चिपक गई है; बच्चे रोटी माँगते हैं, परन्तु कोई उन्हें…

धन्यवाद संपादकीय पर उत्पत्ति 24:49

पिता, धन्यवाद कि आप हमारे साथ सदा "कृपा और सच्चाई" का व्यवहार करते हैं, जैसे अब्राहम के दास ने मांगा…

प्रार्थना संपादकीय पर यशायाह 46:1

पिता, जिन चीज़ों पर मैं भरोसा करता हूँ, वे खुद बोझ बन जाती हैं और मुझे उन्हें ढोना पड़ता है।…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर तीतुस 2:5

ध्यान दे, पौलुस सूची के अंत में कारण जोड़ता है: "कि परमेश्वर के वचन की निंदा न होने पाए।" यानी…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर भजन संहिता 39:2

मैं मौन होकर चुप रहा, भलाई की ओर से भी मैं चुप रहा; और मेरी पीड़ा बढ़ गई।" दाऊद ने…

प्रार्थना संपादकीय पर मरकुस 6:18

पिता, मुझे भी सच बोलने का साहस दे, तब भी जब सुनने वाला नाराज़ हो जाए। मैं अक्सर चुप रह…

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