1 कुरिन्थियों 1:21
यह पाठ
एक वाक्य, और उसमें दो बार "ज्ञान" शब्द आता है, पर दोनों बार अलग अर्थ में। पौलुस कहते हैं कि संसार ने अपनी सारी बुद्धि लगाकर भी परमेश्वर को नहीं पहचाना, और यह विफलता परमेश्वर के अपने ज्ञान के अनुसार ही हुई, अनजाने में नहीं। फिर आता है वह वाक्यांश जिस पर सब कुछ टिका है: "परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करनेवालों को उद्धार दे।" जो रास्ता मनुष्य को सबसे बेढंगा लगता है, क्रूस पर चढ़ाए गए एक व्यक्ति के बारे में बोला गया साधारण संदेश, वही परमेश्वर की चुनी हुई राह ठहरी। यह तर्क से हारना नहीं, यह परमेश्वर की स्वेच्छा से चुनी गई प्रसन्नता है। और यहीं पर पाठ हमें रुकने को कहता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि संसार का ज्ञान झूठा था या कि सोचना पाप है। वे कुछ अधिक बेचैन करने वाली बात कहते हैं: ज्ञान अपनी जगह ठीक रहा, पर उस रास्ते से परमेश्वर तक पहुँचा नहीं जा सका। बुद्धि की सीढ़ी ऊपर तो गई, मगर उस दरवाज़े तक नहीं। और परमेश्वर ने इस खाई को और बेहतर तर्क देकर नहीं, बल्कि एक सूली पर लटके आदमी की कहानी सुनाकर पाटा। यह सोचिए: उद्धार का आधार हमारी समझ की गहराई नहीं, परमेश्वर की प्रसन्नता है। इसका मतलब है कि कोई भी अपनी बुद्धि के बल पर इस दरवाज़े से भीतर नहीं आता, और कोई भी अपनी बुद्धि की कमी के कारण बाहर नहीं रहता। यह अपमानजनक है, और यही इसकी कृपा है।
सामान्य सूत्र
यह "अच्छा लगा" परमेश्वर का कोई नया स्वभाव नहीं है। जिस परमेश्वर ने अब्राहम को बाँझ पत्नी के साथ जाति का पिता बनाया, जिसने दस भाइयों में सबसे छोटे को राजा चुना, जिसने मिस्र के विरुद्ध हकलाते मूसा को भेजा, वही अब सूली को अपना सिंहासन बनाते हैं। पौलुस स्वयं यशायाह की ओर इशारा करते हैं: "मैं ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करूँगा।" वह वचन उस समय कहा गया था जब यरूशलेम के राजनीतिज्ञ चतुर गठबंधनों से अपनी रक्षा कर रहे थे। परमेश्वर की आदत पुरानी है, और क्रूस उसका चरम है। बाइबल की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: बचाने का काम वहाँ से शुरू होता है जहाँ मनुष्य का हिसाब खत्म होता है।
दर्पण
हम सब चुपचाप ऐसा विश्वास चाहते हैं जिस पर शर्म न आए। दफ्तर की चाय के समय, रिश्तेदारों की बहस में, बच्चे के तीखे सवाल के सामने, हमें एक ऐसा उत्तर चाहिए जो हमें बुद्धिमान दिखाए। इसलिए हम सुसमाचार को थोड़ा सजाते हैं, थोड़ा छानते हैं, क्रूस को पीछे रखकर पहले नैतिकता या मनोविज्ञान सामने करते हैं। पौलुस का वाक्य इस आदत पर उँगली रखता है: जिसे आप शर्मनाक समझकर छिपा रहे हैं, वही परमेश्वर की चुनी हुई सामर्थ्य है। दूसरी ओर, जो पढ़ा-लिखा नहीं है और सोचता है कि उसकी समझ कम पड़ती है, उससे यह वचन कहता है कि दरवाज़ा कभी बुद्धि से खुला ही नहीं था।
आज किसी शांत कोने में जाकर क्रूस का संदेश तीन वाक्यों में ज़ोर से बोलिए, बिना कोई सफ़ाई या तर्क जोड़े, और उन वाक्यों को अपने कानों से सुनिए।
मुख्य पात्र
इस आयत का मुख्य पात्र कोई प्रेरित या दार्शनिक नहीं, परमेश्वर स्वयं हैं। और जो क्रिया उनके लिए प्रयोग हुई है वह विचित्र है: यूनानी में εὐδόκησεν, यानी "उन्हें भला लगा", "उनका मन इसी में रमा"। यह मजबूरी का शब्द नहीं, आनंद का शब्द है। परमेश्वर ने क्रूस को विकल्प न होने के कारण नहीं चुना; उन्हें इसमें प्रसन्नता मिली। यहाँ हम उस परमेश्वर से मिलते हैं जो अपनी महिमा छिपाकर प्रकट करते हैं, जो ऊँचाई से नहीं, नीचाई से बोलते हैं, और जो मनुष्य के सम्मान की तालिका को उलट देना पसंद करते हैं। इस स्वभाव को समझ लेना आसान नहीं; उसके सामने चुप हो जाना शायद अधिक सही है।
कठिन प्रश्न
पर एक काँटा बचा रहता है। अगर संसार परमेश्वर के ही ज्ञान के अनुसार उन्हें नहीं जान सका, तो क्या वह अँधेरा परमेश्वर ने ही रखा था? पौलुस इसे न समझाते हैं, न नरम करते हैं। वे केवल दो बातें साथ-साथ रख देते हैं: मनुष्य की विफलता असली है, और परमेश्वर उससे ऊपर हैं। मेरे पास इसे सुलझाने वाला सूत्र नहीं। जो मैं देख पाता हूँ वह यह है कि यह वाक्य किसी को बाहर रखने के लिए नहीं, घमंड तोड़ने के लिए लिखा गया है, जैसा आगे आता है, "ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के सामने घमण्ड न करने पाए।" रहस्य यहाँ दीवार नहीं, झुकने की जगह है।
शास्त्र की गूँज
आयत 19 में उद्धृत यशायाह 29:14 इस पूरे तर्क की जड़ है: परमेश्वर ने पहले भी अपने लोगों की चतुराई को निष्फल किया है, और क्रूस उसी न्याय का अंतिम रूप है। दूसरी गूँज लूका 10:21 से आती है, जहाँ यीशु पवित्र आत्मा में आनंदित होकर पिता का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने ये बातें ज्ञानियों से छिपाकर बालकों पर प्रकट कीं। वही शब्द, वही प्रसन्नता। यानी पौलुस कोई नई धर्मशास्त्रीय खोज नहीं कर रहे; वे अपने प्रभु की हँसी दोहरा रहे हैं।
मनन के प्रश्न
सुसमाचार का कौन-सा हिस्सा आप दूसरों के सामने रखते हुए भीतर से झिझकते हैं, और वह झिझक किसकी नज़र से जुड़ी है?
अगर उद्धार आपकी समझ पर नहीं, परमेश्वर की प्रसन्नता पर टिका है, तो आपकी प्रार्थना का स्वर आज कैसे बदलेगा?
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1 Corinthians 1:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 1:21 का क्या अर्थ है?
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1 कुरिन्थियों 1:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 1:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
परमेश्वर की इच्छा से" पौलुस अपनी पहचान नहीं गिनाता, बल्कि बताता है कि यह चुनाव उसका अपना नहीं था। जिस कलीसिया में लोग गुटों में बँटे थे, वहाँ वह शुरू ही यहाँ से करता है कि बुलाहट ऊपर से आती है। और उसके साथ खड़ा है सोस्थिनेस, जो कभी विरोधी खेमे में था, अब "भाई" कहलाता है। सोचो, तुम्हारा नाम किसके साथ लिखा जा सकता है, अगर अनुग्रह अपना काम पूरा करे?
परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो कुछ नहीं हैं उन्हें भी चुन लिया।" पौलुस कुरिन्थुस की उस कलीसिया को लिख रहा है जहाँ लोग अपने ज्ञान और रुतबे पर इतराते थे। और वह कहता है, देखो, परमेश्वर ने तुम्हें इसलिए नहीं चुना कि तुम कुछ थे। तुम्हारा खालीपन ही उसकी जगह बना। आज जो कमी तुझे शर्मिंदा करती है, वही शायद उसका दरवाजा हो।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें प्रभु यीशु मसीह के नाम में एक साथ बुलाया है, ताकि हम एक ही बात कहें और हम में फूट न हो। धन्यवाद उन भाई बहनों के लिए जिनके साथ मैं एक ही मन और एक ही मत होकर मिला रहता हूँ, और उस क्षमा के लिए जो हमारी दरारों को भरती है।
पिता, तू विश्वासयोग्य है, और यही मेरा सहारा है। धन्यवाद कि तूने मुझे अपने पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया। मैं दूर था, फिर भी तूने नाम लेकर पुकारा और अपने बेटे के साथ जोड़ दिया। तेरी बुलाहट कभी नहीं बदलती, इसके लिए मेरा मन आभार से भरा है।
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