2 कुरिन्थियों 5:18
पाठ
पौलुस नई सृष्टि की बात कहकर तुरंत जोड़ता है कि इसका स्रोत कहीं और है: "सब बातें परमेश्वर की ओर से हैं।" यह वाक्य किसी व्यक्ति की आत्मिक उपलब्धि पर पर्दा गिरा देता है। परमेश्वर ने पहल की, परमेश्वर ने मसीह के द्वारा अपने साथ हमारा मेल मिलाप किया, और फिर उसी परमेश्वर ने उस मेल मिलाप की सेवा हमारे हाथों में सौंप दी। तीन क्रियाएँ हैं और तीनों का कर्ता एक ही है। मनुष्य यहाँ केवल वह है जिसके साथ कुछ किया गया, और फिर वह जिसे कुछ सौंपा गया। बीच में कोई सौदेबाज़ी नहीं, कोई शर्त नहीं, कोई योग्यता की सूची नहीं। जो मिला, वह पहले उपहार है और उसके बाद ही ज़िम्मेदारी।
मर्म
ध्यान दीजिए कि मेल मिलाप की दिशा उलटी है, उस दिशा से जो धर्म आमतौर पर मानता है। संसार के लगभग हर धार्मिक ढाँचे में नाराज़ देवता को मनुष्य मनाता है: बलि, तप, दान, प्रायश्चित। यहाँ नाराज़ पक्ष स्वयं आगे बढ़कर मेल कराता है। परमेश्वर ने "अपने साथ हमारा मेल मिलाप कर लिया", और अगला पद खोलकर बताता है कि इसका अर्थ क्या है: "उनके अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाया।" यह भावनात्मक नरमी नहीं, कानूनी और वास्तविक कार्रवाई है; दोष कहीं गया, हवा में नहीं घुला, वह मसीह पर रखा गया। और तब वही परमेश्वर जो सुलह कराता है, सुलह कराने वालों को नियुक्त भी करता है। अनुग्रह पाने वाला अनुग्रह का वाहक बन जाता है, वरना वह अनुग्रह समझा ही नहीं गया।
साझा सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी एक टूटे रिश्ते से शुरू होती है: अदन में मनुष्य छिपता है, परमेश्वर पुकारते हैं। उसके बाद से हर वाचा, हर वेदी, हर बलिदान उसी दरार को पाटने की कोशिश है। लेवीय व्यवस्था में प्रायश्चित का दिन साल में एक बार आता था, और अगले साल फिर आना पड़ता था; खून बहता रहा क्योंकि दोष ठहरा रहा। पौलुस कहता है कि यह चक्र टूट चुका है, और इसे तोड़ने वाला पुजारी नहीं, स्वयं परमेश्वर हैं। पद 21 इसे चरम तक ले जाता है: जो पाप से अज्ञात था, उसी को उन्होंने पाप ठहराया। मसीह में वह सब पूरा हुआ जिसकी ओर मन्दिर केवल इशारा कर पाता था।
दर्पण
यह पद आपकी उस आदत पर उँगली रखता है जिससे आप सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं: खाता रखने की आदत। देवर ने क्या कहा था, बॉस ने किस मीटिंग में आपको काट दिया था, पिता ने किस साल आपको अकेला छोड़ दिया था। हम दोष लगाना छोड़ते नहीं, क्योंकि दोष हमें एक तरह की सत्ता देता है। और साथ ही हमारे भीतर यह डर बैठा रहता है कि परमेश्वर भी हमारा ऐसा ही खाता रखते हैं। यह पद दोनों को एक साथ काटता है: वे खाता नहीं रखते, और उन्होंने आपको खाता बंद करने की सेवा सौंपी है। आज उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसका हिसाब आप मन में गिनते आए हैं, और उस नाम के सामने ऊँची आवाज़ में कहिए: "मैं इसका दोष इस पर नहीं लगाऊँगा।"
मुख्य पात्र
इस वाक्य का नायक मनुष्य नहीं है। तीनों क्रियाओं का कर्ता परमेश्वर हैं, और यही सबसे चौंकाने वाली बात है। अपराध हमने किया, दूरी हमने बनाई, पर पहला कदम उन्होंने उठाया। ध्यान दीजिए कि पाठ यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने अपने साथ मेल करने का अवसर दिया; वह कहता है, उन्होंने "मेल मिलाप कर लिया।" यह किए जा चुके काम की भाषा है। और फिर वही परमेश्वर, जो सब कुछ स्वयं कर सकते थे, इस संदेश को कमज़ोर, पिटे हुए, बदनाम प्रेरितों के हाथ में सौंप देते हैं। यह उनका स्वभाव है: वे काम अपने हाथ में रखते हैं, पर सेवा दूसरों को बाँट देते हैं।
पृष्ठभूमि
कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, पैसा, प्रतिष्ठा और वक्तृत्व की मंडी। वहाँ की कलीसिया से पौलुस का रिश्ता उस समय तनाव में था; कुछ लोग उसकी काया, उसकी बोली और उसकी यातनाओं को उसकी असफलता का प्रमाण बता रहे थे। इसी पत्र में वह कहता है कि कुछ लोग "दिखावटी बातों पर घमण्ड करते हैं।" इसी घायल संबंध के बीच वह मेल मिलाप की बात करता है, जो संयोग नहीं है। जिस शब्द का वह प्रयोग करता है, कातालागे, वह रोमी दुनिया में दुश्मनी को मित्रता में बदलने के लिए इस्तेमाल होता था, और राजदूत वह होता था जो सम्राट की शर्तें लेकर पराजित नगर तक जाता था। पौलुस स्वयं को वही दूत कहता है।
अंतर्पाठ
रोमियों 5 में पौलुस यही बात और तीखेपन से रखता है: हम शत्रु थे, तभी परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु से हमारा मेल हुआ। यानी मेल मिलाप सुधरे हुए लोगों का इनाम नहीं, शत्रुओं के लिए किया गया काम है। कुलुस्सियों 1 इस दायरे को और चौड़ा करता है, जहाँ क्रूस के लहू से स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं का मेल कराया जाता है; पौलुस के लिए यह व्यक्तिगत शांति का अनुभव भर नहीं, ब्रह्मांड की मरम्मत है।
पर एक तनाव भी है जिसे छिपाना बेईमानी होगी। पद 19 कहता है कि परमेश्वर ने संसार का मेल मिलाप कर लिया, और पद 20 उसी साँस में विनती करता है, "परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो।" काम पूरा है, फिर भी निवेदन ज़रूरी है। यही तनाव यशायाह 43 में भी है, जिसे पौलुस पद 17 में गूँजाता है: परमेश्वर कहते हैं कि वे नई बात करने वाले हैं, और फिर भी उसी अध्याय में वे अपनी प्रजा से उनके पाप का बोझ उठाने की बात करते हैं। घोषणा पहले आती है, स्वीकार बाद में; पर बिना स्वीकार के घोषणा किसी तक पहुँचती नहीं। इसीलिए सेवा सौंपी गई है, और इसीलिए वह ज़रूरी है।
चिंतन
आप अपने भीतर परमेश्वर को किस रूप में देखते हैं: उस न्यायी के रूप में जिसे मनाना है, या उस पिता के रूप में जो पहले ही पास आ चुके हैं? आपका उत्तर आपकी प्रार्थनाओं में कैसे सुनाई देता है?
यदि मेल मिलाप की सेवा आपको सौंपी गई है, तो आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप संदेश तो जानते हैं पर दूत बनने से कतराते हैं, और उसकी सबसे बड़ी कीमत क्या होगी?
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2 Corinthians 5:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 5:18 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 5:18 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 5:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 5:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 5:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह बात वहाँ कहता है जहाँ वह समझा रहा है कि अब वह किसी को शरीर के अनुसार नहीं पहचानता। "इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।" ध्यान दे, यह कल की आशा नहीं, बीता हुआ काम है। तो जिस इंसान को तू आज तक उसके पुराने रूप में देखता आया है, क्या तू उसे नई सृष्टि मान पाएगा?
पौलुस कहता है, "यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये; और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं।" कुरिन्थ के लोग उस पर हँसते थे कि वह जुनूनी है, पागल है। पौलुस बचाव नहीं करता, बस इतना कहता है कि उसकी दीवानगी परमेश्वर के सामने है, और उसकी समझदारी उनकी भलाई के लिए।
सोचो, क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा है? जो आँसू, जो प्रार्थनाएँ दुनिया को बेतुकी लगें, वे परमेश्वर के लिए हों; और जो शब्द तुम बोलते हो, वे दूसरे की भलाई के लिए।
पौलुस ने अभी अभी लिखा है कि हम शरीर में हों या शरीर से अलग, हमारी असली चाहत क्या है? यही, "हम यही लक्ष्य रखते हैं, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें, हम उसे भाते रहें।"
सोचो, न स्वर्ग पाना लक्ष्य है, न दुख से बचना। बस उसे भाना। जैसे एक बच्चा दिनभर की छोटी छोटी बातों में पिता की मुस्कान ढूँढता है। आज तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
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