इफिसियों 4:1
पाठ
पौलुस रोम की जंजीरों में बैठा है, और वहीं से वह लिखता है: मैं, जो प्रभु का बन्दी हूँ, तुमसे आज्ञा नहीं देता, विनती करता हूँ। विनती किस बात की? कि जिस बुलाहट से परमेश्वर ने तुम्हें बुलाया, तुम्हारी रोज़ की चाल उस बुलाहट के वज़न के बराबर हो। तीन अध्यायों तक उसने यह गिनाया कि परमेश्वर ने मसीह में क्या-क्या कर दिया है, चुनना, छुड़ाना, जिलाना, पास लाना। अब चौथे अध्याय का पहला शब्द है "इसलिए"। यानी अब बात करनी है पाँवों की। और आगे की पंक्तियाँ बताती हैं कि यह "योग्य चाल" कोई आध्यात्मिक ऊँचाई नहीं, बल्कि बहुत ज़मीनी चीज़ है: दीनता, नम्रता, धीरज, और एक दूसरे को प्रेम से सह लेना।
मर्म
ध्यान दीजिए कि क्रम उलटा नहीं है। पौलुस यह नहीं कहता कि योग्य चलो ताकि बुलाहट मिले; वह कहता है कि बुलाहट पहले ही मिल चुकी है, अब उसके योग्य चलो। यही सुसमाचार की पूरी व्याकरण है। आप कमाने के लिए नहीं चलते, आप उस चीज़ के भीतर चलते हैं जो पहले से आपकी हो चुकी है। यूनानी शब्द अक्सिओस का मूल अर्थ तराज़ू से जुड़ा है: दोनों पलड़े बराबर हों। एक तरफ़ परमेश्वर का बुलाना, दूसरी तरफ़ आपका जीवन, और सवाल यह है कि क्या ये दोनों एक ही वज़न के दिखते हैं।
यहाँ अनुग्रह ढीलापन नहीं बनता, वह ज़िम्मेदारी बन जाता है। और यह भी देखिए कि योग्यता का पैमाना क्या है: प्रार्थना के घंटे नहीं, बाइबल का ज्ञान नहीं, बल्कि दीनता और सहनशीलता। परमेश्वर ने जिस महिमा में आपको बुलाया है, उसका प्रमाण इस बात में दिखेगा कि आप उस व्यक्ति के साथ कैसे पेश आते हैं जिसे सहना आपको भारी लगता है।
सूत्र
यह "इसलिए" कोई नया आविष्कार नहीं है, यह परमेश्वर का पुराना तरीका है। सीनै पर भी व्यवस्था देने से पहले परमेश्वर ने याद दिलाया कि वे ही इस्राएल को मिस्र से निकाल लाए हैं; छुटकारा पहले, आज्ञा बाद में। इस्राएल को "चलना" सिखाया गया, और चलना ही उनके विश्वास का शब्द बन गया। पौलुस उसी धारा में खड़ा है, पर अब बुलाहट का केन्द्र मसीह है। इसी अध्याय में वह लिखता है कि वह "पृथ्वी की निचली जगहों में उतरा भी था" और फिर "सारे आकाश के ऊपर चढ़ भी गया"। जो सबसे नीचे उतरा, वही अब आपसे दीनता माँगता है। योग्य चाल का नमूना कोई नैतिक आदर्श नहीं, एक उतरता हुआ प्रभु है।
आईना
तो सोचिए: आपकी बुलाहट का वज़न कहाँ हल्का पड़ जाता है? शायद रविवार को नहीं, बल्कि सोमवार की उस मीटिंग में जहाँ आपका सुझाव अनदेखा हुआ और आपने ठंडी चुप्पी से बदला लिया। शायद उस रिश्तेदार के साथ, जिसका फ़ोन देखकर आप स्क्रीन उलट देते हैं। शायद घर में, जहाँ आप सबसे ज़्यादा जानकार हैं और इसीलिए सबसे कम नम्र। पौलुस "सह लो" कहता है, और यही शब्द चुभता है, क्योंकि सहना का मतलब है कि सामने वाला बदलेगा नहीं और फिर भी आप प्रेम में टिके रहेंगे। हम बदलाव माँगते हैं; मसीह सहनशीलता माँगते हैं।
आज ही, एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे सहना आपको सबसे भारी लगता है, नाम के नीचे लिखिए "यही मेरी योग्य चाल है", और एक मिनट उसके लिए प्रार्थना कीजिए।
प्रश्न
पर क्या कोई सचमुच इस बुलाहट के "योग्य" चल सकता है? तराज़ू का दूसरा पलड़ा तो असीम है: चुना जाना, छुड़ाया जाना, परमेश्वर की सन्तान कहलाना। मेरी दीनता उस वज़न की बराबरी कभी नहीं करेगी, और पौलुस कहीं यह नहीं बताता कि कितना काफ़ी है। कोई मापदंड नहीं, कोई पास-फ़ेल रेखा नहीं। यह असहज है। पर शायद यही बात हमें झूठी सन्तुष्टि से बचाती है, क्योंकि जिस दिन आपको लगे कि आपने पलड़ा बराबर कर लिया, उसी दिन दीनता ख़त्म हो जाएगी। सुसमाचार यह नहीं कहता कि आप योग्य हो गए; वह कहता है कि आप योग्य ठहराए गए, और अब जीवन भर उस ठहराव की ओर चलते जाना है। यह तनाव मिटता नहीं, इसी में चलना सीखना है।
बारीकी
"मैं जो प्रभु में बन्दी हूँ।" पौलुस यह नहीं लिखता कि मैं रोम का क़ैदी हूँ या कैसर का। ज़ंजीर वही है, हाथ वही हैं, पर मालिक बदल गया है। और यहीं से वह आदेश नहीं, विनती करता है। सोचिए: एक प्रेरित, जिसके पास अधिकार था, अपनी बेड़ियों को ही अपना अधिकार-पत्र बनाता है। वह उनसे दीनता माँगने से पहले स्वयं सबसे नीची जगह से बोलता है। और यह संयोग नहीं कि कुछ ही पंक्तियों बाद वह मसीह के बारे में लिखता है कि वे "बन्दियों को बाँध ले गया"। पौलुस उसी विजेता का बँधुआ है, और उसकी क़ैद ही उसकी स्वतंत्रता का रूप है।
अन्तर्पाठ
इसी अध्याय का अन्त वही बात दूसरे कोण से कहता है: "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।" योग्य चाल का पैमाना हमारी क्षमता नहीं, परमेश्वर का व्यवहार है; जितना मिला, उतना बाँटो। और फिलिप्पियों में पौलुस उसी दीनता का गीत गाता है, जहाँ मसीह ने अपने आप को रिक्त किया और दास का रूप लिया। दोनों जगह तर्क एक ही है: नीचे उतरना कमज़ोरी नहीं, वह मसीह के आकार में ढलना है। इफिसियों 4:2 की सूची इसीलिए कोई नैतिक चेकलिस्ट नहीं; वह उस प्रभु का चेहरा है जिसने आपको बुलाया।
मनन
इस हफ़्ते किस एक रिश्ते में मेरी चाल और मेरी बुलाहट का वज़न सबसे ज़्यादा असमान दिखा?
अगर दीनता और सहनशीलता ही मेरी आत्मिक परिपक्वता का पैमाना हो, तो मैं वास्तव में कहाँ खड़ा हूँ?
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Ephesians 4:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
और सबका एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपर, और सब के मध्य में, और सब में है।" ध्यान दे, पौलुस यह बात कलीसिया की फूट के बीच लिख रहा है। जिस भाई से तेरा मन खिंचा हुआ है, उसी के भीतर भी वही पिता बसा है। उसे ठुकराते समय तू किसे दूर कर रहा है?
हर एक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने से" शरीर बढ़ता है। यानी जोड़ भी ज़रूरी है, वह हिस्सा जो दिखता नहीं, बस दो को थामे रखता है। शायद कलीसिया में तुम्हारा काम वही है, किसी को जोड़े रखना, थामे रखना। छोटा लगता है? पर तुम्हारे बिना देह वहीं रुक जाती है। और यह सब बढ़ोतरी एक ही दिशा में है, प्रेम में।
जीत के बाद राजा लूट का माल अपने लोगों में बाँटता था। मसीह भी ऊँचे पर चढ़ा, पर जीत अपने पास नहीं रखी: "वह ऊँचे पर चढ़ा और बन्धुवाई को बन्दी बनाकर ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।" जो तुझे बाँधे रखता था, अब वही उसका बन्दी है। और तेरे भीतर जो वरदान है, वह उसी विजय का हिस्सा है। उसे दबाकर मत रख।
पिता, तूने हर एक को कुछ न कुछ देकर भेजा है। मुझे भी तैयार कर, ताकि जो सेवा मेरे हाथ में है उसे प्रेम से कर सकूँ। मेरे काम से तेरे लोग मज़बूत हों, और तेरी देह थोड़ी और पूरी होती जाए।
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