निर्गमन 2:14
पाठ
मूसा ने झगड़ते दो इब्रियों के बीच खड़े होकर अपराधी को टोका, और जवाब में उसे एक ऐसा प्रश्न मिला जो उसकी पूरी पहचान को चीर गया: "किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" उसी साँस में वह आदमी कल की बात खोल देता है, "जिस भाँति तूने मिस्री को घात किया क्या उसी भाँति तू मुझे भी घात करना चाहता है?" रेत में दबाई हुई लाश अब गवाह बन गई। और जो युवक कल हाथ उठाकर न्याय करने निकला था, वह आज काँप रहा है: "निश्चय वह बात खुल गई है।" एक ही वाक्य में मूसा का आत्मविश्वास टूटता है और चालीस साल का निर्वासन शुरू होता है।
मर्म
वह प्रश्न व्यंग्य में पूछा गया था, पर वह धर्मशास्त्र का सबसे गंभीर प्रश्न है: अधिकार कहाँ से आता है? मूसा के पास सब कुछ था, राजकुमार की परवरिश, अपने लोगों के लिये तड़प, और साहस। पर एक चीज़ नहीं थी: बुलाहट। उसने स्वयं को न्यायी ठहराया, और इसलिये उसे इधर-उधर देखना पड़ा कि कोई देख न ले। जो उद्धार मनुष्य अपनी शक्ति और अपने समय पर गढ़ता है, वह रेत में छिपाना पड़ता है; जो उद्धार परमेश्वर देते हैं, वह जलती झाड़ी के सामने खुलकर सौंपा जाता है। यही अनुग्रह का व्याकरण है। इस अध्याय का असली मोड़ मूसा का पराक्रम नहीं, बल्कि वचन 24 है: परमेश्वर ने "अपनी वाचा को… स्मरण किया।" छुटकारा वाचा से जन्मता है, जोश से नहीं।
सूत्र
इस वचन में एक नमूना पैदा होता है जो बाइबल में बार-बार लौटता है: उद्धारकर्ता अपने ही लोगों के हाथों ठुकराया जाता है, और उस ठुकराए जाने के रास्ते से ही परमेश्वर उसे सचमुच का अधिकार देते हैं। स्तिफनुस प्रेरितों 7 में इसी दृश्य को पकड़ता है: जिस मूसा को इब्रियों ने अस्वीकार किया, उसी को परमेश्वर ने हाकिम और छुड़ाने वाला बनाकर भेजा। "किसने तुझे… ठहराया?" का उत्तर मूसा नहीं दे सका; चालीस साल बाद परमेश्वर ने जलती झाड़ी से दिया। और यही प्रश्न यूहन्ना के उस वाक्य में गूँजता है कि वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण न किया। मसीह ने अधिकार छीना नहीं, पिता के हाथ से पाया, और ठुकराए जाने के बीच से ही राज्य लाया। मूसा की विफलता इस बड़ी कहानी की पहली आहट है।
दर्पण
यह प्रश्न आपके जीवन में भी पूछा जाता है, कभी खुले शब्दों में, कभी चुप्पी में। आप परिवार में किसी को सुधारते हैं और जवाब मिलता है, "तुम कौन हो कहने वाले?" आप दफ़्तर में सही बात उठाते हैं और कोई आपका पुराना समझौता याद दिला देता है। दर्द यहाँ दोहरा है: बात सही थी, पर बोलने वाले के हाथ साफ़ नहीं थे। मूसा का असली संकट यह नहीं था कि उसने न्याय चाहा, बल्कि यह कि उसने पहले "इधर-उधर देखा कि कोई नहीं है।" जो जीवन गवाहों से बचकर जिया जाता है, वह किसी न किसी दिन अपना ही मुँह बंद कर देता है। आज एक कागज़ पर वह एक काम लिखिए जिसे आप इस शर्त पर कर रहे हैं कि किसी को पता न चले, और उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़कर वह कागज़ फाड़ दीजिए।
मुख्य पात्र
मूसा यहाँ दो दुनियाओं के बीच टूटा हुआ आदमी है। महल में पला, पर "अपने भाई-बन्धुओं" के दुःखों पर उसकी दृष्टि जाती है। मिद्यान की लड़कियाँ उसे "एक मिस्री पुरुष" कहेंगी, और वह स्वयं अपने बेटे का नाम रखकर कबूल करेगा, "मैं अन्य देश में परदेशी हूँ।" वह न पूरा मिस्री है, न इब्रियों का अपना। इस वचन में उसका भीतर का ढाँचा गिरता है: पहले क्रोध, फिर छिपाव, फिर पहचाने जाने का आतंक। "मूसा यह सोचकर डर गया" यह वाक्य उस आदमी के बारे में है जिसे आगे परमेश्वर से मुँह पर मुँह बात करने वाला कहा जाएगा। परमेश्वर टूटे हुए लोगों को नहीं छोड़ते; वे उन्हें रेगिस्तान में ले जाकर नए सिरे से गढ़ते हैं।
अंतर्पाठ
"रेत में छिपा दिया" के पीछे एक पुरानी गूँज है: कैन ने भी सोचा था कि मिट्टी खून निगल लेगी, पर परमेश्वर ने कहा कि वह भूमि से पुकार रहा है। छिपाया हुआ लहू चुप नहीं रहता, यह उत्पत्ति 4 का नियम है और मूसा पर भी लागू होता है, केवल दूसरे दिन ही खुल जाता है। दूसरी ओर, इसी पुस्तक के अगले अध्याय का विरोधाभास देखिए। वचन 14 में एक इब्री पूछता है, "किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" और जलती झाड़ी के सामने मूसा स्वयं पूछेगा, "मैं कौन हूँ?" जो आदमी पहले बिना बुलाहट हाकिम बना, वह बुलाहट मिलने पर खुद को अयोग्य कहता है। परमेश्वर का बुलाया जाना आत्मविश्वास नहीं, समर्पण पैदा करता है।
प्रश्न
पाठ एक बात पर चुप है, और यह चुप्पी खटकती है: क्या मूसा ने पाप किया? इब्रानियों 11 उसे विश्वास के नायकों में गिनता है, स्तिफनुस उसके कदम को अपने भाइयों की रक्षा की चेष्टा कहता है, पर निर्गमन स्वयं कोई निर्णय नहीं सुनाता। न भर्त्सना, न शाबाशी, केवल रेत, लाश और डर। और अगर उसका इरादा भला था, तो परमेश्वर ने उसे सफल क्यों नहीं होने दिया? चालीस साल भेड़ें चराने में क्यों? इसका कोई साफ़ उत्तर नहीं मिलता। जो मिलता है, वह इतना ही है: परमेश्वर का समय मनुष्य के जोश से धीमा और गहरा है, और वे किसी की असफलता को कचरे में नहीं फेंकते, उसे भट्ठी बना देते हैं। यह सांत्वना नहीं जो दर्द मिटा दे, पर यह सच है जिस पर खड़े हो सकते हैं।
चिंतन
आपके जीवन में कौन-सा भला काम आप परमेश्वर की बुलाहट के बिना, अपने बल पर पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं?
जब कोई आपकी पिछली विफलता याद दिलाकर आपको चुप कराता है, तो आप डर में भागते हैं या परमेश्वर के सामने खुलते हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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