निर्गमन 2:9
पाठ
फ़िरौन की बेटी नदी के किनारे खड़ी है, हाथ में एक टोकरी, और उसके सामने एक इब्री स्त्री। वह उससे कहती है: “तू इस बालक को ले जाकर मेरे लिये दूध पिलाया कर, और मैं तुझे मजदूरी दूँगी।” और वह स्त्री बालक को ले जाकर दूध पिलाने लगती है। इतना ही, एक वाक्य में सौदा तय। पर ध्यान दीजिए कि इस सौदे में कौन क्या पा रहा है: राजकुमारी को एक धाई मिली, और उस माँ को अपना ही बेटा वापस मिला, कानूनी सुरक्षा के साथ, और ऊपर से वेतन भी। जिस बच्चे को नील नदी में डुबोने का राजकीय आदेश था, अब उसी राजघराने के ख़र्चे पर पाला जा रहा है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आता। पूरे दूसरे अध्याय में वे चुप हैं, कम से कम पद 23 तक, जहाँ पहली बार लिखा है कि उन्होंने कराहना सुना। और फिर भी यह पद परमेश्वर के काम करने के तरीके की सबसे साफ़ तस्वीरों में से एक है। साम्राज्य की मशीन पूरी ताक़त से चल रही थी, आदेश जारी था, सिपाही तैनात थे, और उस मशीन ने ठीक उसी बच्चे को बचा लिया जिसे वह मारना चाहती थी, और बचाने का बिल भी ख़ुद चुकाया। इब्रानी में जो शब्द यहाँ “मजदूरी” के लिये है, साखार, वही शब्द आगे चलकर परमेश्वर के दिए हुए प्रतिफल के लिये इस्तेमाल होता है। उद्धार शोरगुल से नहीं, बल्कि एक सामान्य-सी नौकरी की पेशकश से शुरू होता है। यही परमेश्वर का ढंग है: वे इतिहास को ऊपर से नहीं, अक्सर नीचे से, हाशिये से मोड़ते हैं।
सूत्र
नील नदी इस कहानी में दो चीज़ें एक साथ है: कब्रगाह और गर्भ। फ़िरौन ने उसे इब्रानी लड़कों की मौत का साधन बनाया, और परमेश्वर ने उसी पानी से एक छुड़ानेवाले को बाहर निकाला। पद 10 में नाम की व्याख्या यही है, “मैंने इसको जल से निकाला था।” जिस बच्चे को पानी से निकाला गया, वही एक दिन पूरी क़ौम को समुद्र के बीच से निकालेगा। यह पैटर्न बाइबल में दोहराता रहता है: एक राजा बच्चों को मारने का हुक्म देता है, एक बच्चा बच निकलता है, और वही बचा हुआ बच्चा छुटकारा लेकर लौटता है। मत्ती अपनी सुसमाचार-कहानी में यीशु को जान-बूझकर इसी साँचे में रखता है, हेरोदेस का आदेश, मिस्र की भागदौड़, और फिर मिस्र से वापसी। परमेश्वर छुटकारा किसी सेना से नहीं, बल्कि एक बचे हुए बच्चे से शुरू करते हैं।
दर्पण
सोचिए उस माँ की चाल कैसी रही होगी जब वह अपने ही बेटे को गोद में लिए राजमहल के पहरे के सामने से गुज़री होगी। कागज़ पर वह नौकरानी थी, दिल में माँ। और उसका “मंत्रालय” क्या था? दूध पिलाना। रात में जागना, कपड़े धोना, थपकी देना। यही वह जगह थी जहाँ परमेश्वर इस्राएल के इतिहास को मोड़ रहे थे। हम अक्सर अपनी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों को उस “असली काम” के लिये रुकावट समझते हैं जो हम परमेश्वर के लिये करना चाहते हैं: बीमार माँ-बाप की सेवा, बच्चों का होमवर्क, वह नौकरी जो बस बिल चुकाती है। यह पद कहता है कि वहीं मोर्चा है। आज जो सबसे साधारण देखभाल का काम आपके हिस्से में है, उसे करने से ठीक पहले उस व्यक्ति का नाम ज़ोर से बोलिए और एक वाक्य में परमेश्वर से कहिए, “यह काम मैं आपके लिये कर रहा हूँ।” बस इतना।
प्रश्न
सवाल जो टलता नहीं: बाक़ी माँओं का क्या हुआ? आदेश सिर्फ़ मूसा के लिये नहीं था, हर इब्री लड़के के लिये था। कितनी टोकरियाँ बनीं जो कभी नहीं मिलीं? कितनी बहनें दूर खड़ी रहीं और कुछ नहीं हुआ? पाठ इस पर एक शब्द नहीं कहता। यह चुप्पी क्रूर लगती है, और उसे मीठा बनाने की कोशिश करना बेईमानी होगी। जो हम कह सकते हैं, बस इतना: यह बचाव किसी एक परिवार का निजी सौभाग्य नहीं था, यह पूरी क़ौम के छुटकारे की पहली ईंट थी। जिस बच्चे को दूध पिलाया जा रहा था, वह अस्सी साल बाद उन्हीं माँओं की संतानों को बाहर ले जाएगा। पर उस पीढ़ी की माँओं के लिये यह उत्तर देर से आया, बहुत देर से। परमेश्वर का समय हमारे दुख के समय से मेल नहीं खाता, और बाइबल इस असहजता को छिपाती नहीं।
पहले श्रोता
जिन्होंने यह कहानी पहली बार सुनी, वे वही लोग थे जो मिस्र से निकल आए थे या उनके बच्चे थे। उनके लिये फ़िरौन की बेटी कोई परी-कथा का पात्र नहीं थी; वे जानते थे कि राजकुमारी का नदी पर आना एक धार्मिक-राजसी दृश्य होता था, दासियाँ, छाता, ठहरी हुई ख़ामोशी। और वे यह भी जानते थे कि मिस्र में धाई रखने का नियमित अनुबंध होता था, तय वेतन, तय अवधि। यानी यह पद उनके कानों में कोई चमत्कार नहीं, एक बिल्कुल सामान्य कारोबारी बात थी। और ठीक इसीलिये वे हँसे होंगे। साम्राज्य ने अपने ही क़ानूनी काग़ज़ात से अपने दुश्मन को पाल लिया। ग़ुलामों की उस हँसी में एक तरह का धीमा विद्रोह था: तुम्हारी ताक़त आख़िरी शब्द नहीं है।
शास्त्र की गूँज
इसी अध्याय का अंत इस पद पर रोशनी डालता है: “और परमेश्वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को, जो उसने अब्राहम, और इसहाक, और याकूब के साथ बाँधी थी, स्मरण किया।” पद 9 में परमेश्वर चुप हैं, पर पद 24 बताता है कि वे उस चुप्पी में क्या कर रहे थे। वाचा को याद रखना, यानी उसे चुपचाप पूरा करना शुरू कर देना। और इब्रानियों 11:23, जिसकी ओर पद 2 इशारा करता है, इस माँ-बाप के छिपाने को विश्वास कहता है, डर नहीं। यह ज़रूरी है: उनके पास कोई दर्शन नहीं था, कोई आवाज़ नहीं, सिर्फ़ एक टोकरी और एक जोखिम। विश्वास हमेशा आश्वासन के बाद नहीं आता; कभी-कभी वह अँधेरे में उठाया गया अगला कदम होता है।
चिंतन
आपकी ज़िंदगी का कौन-सा “दूध पिलाना” है, वह साधारण काम जिसे आप कम आँकते हैं, पर जो शायद परमेश्वर के काम की असली जगह है?
जब परमेश्वर चुप लगते हैं, तो आप उस चुप्पी को कैसे पढ़ते हैं: अनुपस्थिति के रूप में, या ऐसे काम के रूप में जो अभी दिखाई नहीं दे रहा?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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