उत्पत्ति 1:8
पाठ
दूसरे दिन के अंत में परमेश्वर उस अन्तर को, उस विशाल खुली जगह को जो उन्होंने ऊपर के जल और नीचे के जल के बीच बनाई थी, एक नाम देते हैं: "आकाश"। फिर वही लय जो पूरे अध्याय में बजती रहती है, "तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।"
पर यहाँ एक चूक है जिसे ध्यान से पढ़नेवाला पाठक अनदेखा नहीं कर सकता। हर दूसरे दिन के अंत में लिखा है, "परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे दिन यह वाक्य गायब है। पहले दिन उजियाला अच्छा था, तीसरे दिन दो बार अच्छा कहा गया। बीच में एक चुप्पी है, और वह चुप्पी संयोग नहीं लगती।
मर्म
यह पद परमेश्वर के बारे में दो बातें कहता है जो पूरी बाइबल में गूँजती रहती हैं। पहली, वे नाम देते हैं। प्राचीन दुनिया में नाम रखना अधिकार का काम था; जो नाम देता है, वही स्वामी है। जिस आकाश को आसपास की जातियाँ देवता मानती थीं, उसे परमेश्वर सिर्फ़ एक नाम देकर अपनी सृष्टि के भीतर उसका स्थान तय कर देते हैं। आकाश पूजनीय नहीं, आज्ञाकारी है।
दूसरी, वे जगह बनाते हैं। सृष्टि का यह दिन कुछ नया गढ़ने का नहीं, बल्कि जल को पीछे धकेलकर साँस लेने की जगह खोलने का दिन है। और वह अनकहा "अच्छा है" याद दिलाता है कि यह जगह अभी अधूरी है, अभी खाली है, अभी किसी की प्रतीक्षा में है। परमेश्वर काम को बीच में छोड़ते नहीं, पर वे उसे जल्दबाज़ी में पूरा भी घोषित नहीं करते। जो अधूरा है, उसे वे अधूरा ही कहते हैं, और अगले दिन लौट आते हैं।
सूत्र
जल को बाँटना और उसके बीच जीवन की जगह खोलना, यह चित्र बाइबल में बार-बार लौटता है। जब इस्राएल मिस्र से निकलता है, तो जल फिर दो भाग होता है और बीच में सूखी भूमि प्रकट होती है, ठीक वैसे ही जैसे अगले पद में होगी। छुटकारा और सृष्टि एक ही मुद्रा में होते हैं: परमेश्वर पानी को पीछे हटाते हैं ताकि उनके लोग साँस ले सकें और चल सकें। यही कारण है कि बपतिस्मा का जल डरावना और मुक्तिदायी दोनों है; उसमें से होकर एक नई जगह में निकलना पड़ता है। और यीशु मसीह, जो अपने चेलों से कहते हैं कि वे उनके लिए जगह तैयार करने जा रहे हैं, वही काम कर रहे हैं जो दूसरे दिन शुरू हुआ था। जगह बनाना परमेश्वर का हस्ताक्षर है।
दर्पण
आपके जीवन में भी शायद कोई "दूसरा दिन" चल रहा है। वह नौकरी जो अभी बनी नहीं, बस चल रही है। वह विवाह जिसमें झगड़ा थम गया है पर गर्मी लौटी नहीं। वह बेटा या बेटी जिसके लिए आप वर्षों से प्रार्थना कर रहे हैं और अब तक कोई मोड़ नहीं आया। हम ऐसे समय में दो में से एक गलती करते हैं: या तो जबरदस्ती कहते हैं कि सब अच्छा है, या मान लेते हैं कि परमेश्वर ने हाथ खींच लिया। यह पद दोनों को काटता है। परमेश्वर अधूरे को अधूरा कहने से नहीं डरते, और वे लौटकर आते हैं। आज कागज़ के एक टुकड़े पर उस अधूरी बात का नाम लिखिए, उसके नीचे लिखिए "दूसरा दिन", और उसे हाथ में लेकर एक वाक्य में परमेश्वर से कहिए कि आप उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
संदर्भ
जिस शब्द का अनुवाद "अन्तर" हुआ है, वह इब्रानी में राकीअ है, जिसका मूल अर्थ है धातु की तरह पीटकर फैलाई गई कोई चीज़। कल्पना कीजिए एक तनी हुई चादर, एक गुंबद, जो ऊपर के भारी जल को रोके रखता है। प्राचीन पूर्व में लोग सचमुच ऐसा ही सोचते थे: ऊपर पानी, नीचे पानी, और बीच में हम। यह डरावनी तस्वीर थी, क्योंकि पड़ोसी जातियों की कहानियों में यह गुंबद किसी पराजित समुद्री दानव की लाश से बनाया गया था, और देवता आपस में लड़ते थे। उत्पत्ति में कोई युद्ध नहीं है। कोई दानव नहीं है। सिर्फ़ एक वचन, और जल चुपचाप अपनी जगह ले लेता है। जो इस्राएली इन कहानियों के बीच पले थे, उनके लिए यह चुप्पी ही सबसे बड़ा दावा थी।
मुख्य पात्र
इस पद में परमेश्वर तीन काम करते हैं: वे अलग करते हैं, वे नाम देते हैं, और वे रुक जाते हैं। तीनों एक ही चरित्र दिखाते हैं। अलग करना बताता है कि वे अराजकता के विरुद्ध हैं, पर उसे नष्ट नहीं करते, उसे सीमा देते हैं। नाम देना बताता है कि वे स्वामी हैं, और स्वामित्व यहाँ कब्ज़ा नहीं बल्कि व्यवस्था है। और रुक जाना, "अच्छा है" न कहना, सबसे मार्मिक है। यह परमेश्वर जल्दबाज़ी में अपने ही काम की तारीफ़ नहीं करते। वे बेचैन नहीं हैं। जो पूरा नहीं हुआ, उस पर मुहर नहीं लगाते। ऐसा परमेश्वर आपके अधूरेपन से घबराता नहीं, क्योंकि वे स्वयं धैर्य से काम करते हैं, दिन पर दिन, साँझ से भोर तक।
पहले श्रोता
जिन लोगों ने यह पहली बार सुना, उनके लिए समुद्र मनोरंजन नहीं, आतंक था। इस्राएल नाविकों की जाति नहीं थी; गहरा जल उनके लिए मृत्यु और अव्यवस्था का प्रतीक था। और आकाश? आसपास हर जाति उसे पूजती थी, सूर्य, चंद्रमा, तारे, सब देवता। अब उन्हें बताया जाता है कि जिस चीज़ से वे डरते हैं और जिस चीज़ को उनके पड़ोसी पूजते हैं, वह दोनों उनके परमेश्वर की बनाई और नामांकित रचना है। सिर के ऊपर जो फैला है, वह मंदिर की छत है, प्रतिद्वंद्वी नहीं। और "साँझ हुई फिर भोर हुआ" उनके अपने दिन की गिनती थी, वही लय जिसमें वे सब्त मनाते थे। सृष्टि की कहानी उनके कैलेंडर में उतर आई थी।
मनन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अभी "दूसरे दिन" पर है, और आप उसे अच्छा कहने या छोड़ देने में से क्या करना चाहते हैं?
अगर परमेश्वर ने आकाश तक को नाम देकर उसकी जगह तय कर दी, तो आपके जीवन की कौन-सी शक्ति आप अब भी देवता की तरह मान रहे हैं?
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Genesis 1:8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
उत्पत्ति 1:8 का क्या अर्थ है?
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उत्पत्ति 1:8 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 1:8 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Genesis 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तब सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पाँचवाँ दिन हो गया।" ध्यान दे, परमेश्वर का दिन सांझ से शुरू होता है, भोर से नहीं। पहले अंधेरा, फिर उजाला। जहाँ तू आज खड़ा है, शायद वह सांझ हो, अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का पहला पहर। जो उसने पाँचवें दिन किया, वही वह तेरे अंधेरे में भी कर रहा है।
पिता, आपने आकाशमण्डल को स्वर्ग कहा, और मैं हर सुबह उस नीले विस्तार को देखकर धन्यवाद देता हूँ। सांझ हुई फिर भोर हुआ, यह क्रम आपके हाथ में है। इसलिए मेरे दिनों की गिनती भी आप ही करते हैं, और यह मुझे शान्ति देता है।
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