यशायाह 27
पाठ
अध्याय की शुरुआत ही चौंकाने वाली है: यहोवा अपनी "कड़ी, बड़ी, और दृढ़ तलवार" उठाते हैं, और वार किसी सेना पर नहीं, बल्कि लिव्यातान पर होता है, उस समुद्री अजगर पर जो प्राचीन संसार में अराजकता और अंधकार का प्रतीक था। उसके तुरंत बाद दृश्य बदल जाता है: एक दाख की बारी, जिसे परमेश्वर स्वयं क्षण-क्षण सींचते और रात-दिन रखवाली करते हैं, और जिसके विषय में वे कहते हैं, "मेरे मन में जलजलाहट नहीं है।" फिर बात याकूब की ताड़ना की होती है, नापी-तुली और सोच-विचार कर दी गई, जिसका उद्देश्य वेदियों और अशेरा की मूरतों का चूर-चूर होना है। अंत में एक बड़ा नरसिंगा फूँका जाता है, और अश्शूर तथा मिस्र में बिखरे हुए लोग एक-एक करके इकट्ठे होकर पवित्र पर्वत पर दण्डवत् करते हैं।
मर्म
यहाँ परमेश्वर के दो चेहरे नहीं, एक ही हृदय दो रूपों में दिखता है। जो तलवार अजगर को घात करती है, वही हाथ दाख की बारी को सींचता है; सृष्टि की अराजकता का नाश और वाचा के लोगों की रक्षा एक ही काम के दो पहलू हैं। इसलिए वचन 4 का वाक्य इतना असाधारण है: "मेरे मन में जलजलाहट नहीं है।" जिस परमेश्वर के पास कँटीले पेड़ों को भस्म करने की पूरी सामर्थ्य है, वे भस्म करने के बजाय निमंत्रण देते हैं, "वे मेरी शरण लें, वे मेरे साथ मेल कर लें।" यही अनुग्रह का असली स्वाद है: न्याय टाला नहीं जाता, पर उसका लक्ष्य विनाश नहीं शुद्धिकरण है। इस्राएल की ताड़ना "सोच-विचार कर" दी गई, नापी हुई, ताकि अधर्म का प्रायश्चित हो और मूर्तियों की वेदियाँ चूने के पत्थरों जैसी चकनाचूर हों। पवित्रता यहाँ क्रोध का नाम नहीं, बचाने की जिद का नाम है।
सूत्र
यशायाह की किताब में दाख की बारी पहले भी आ चुकी है, और वहाँ कहानी बुरी तरह खत्म हुई थी: परमेश्वर ने अपनी बारी की बाड़ तोड़ दी, वह उजड़ गई, और उसमें कँटीले पेड़ उग आए। अध्याय 27 उसी गीत को उलट देता है। अब वही कँटीले पेड़ हैं, पर अब वे परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होने के बजाय शरण लेने के लिए बुलाए जा रहे हैं; और बाड़ तोड़नेवाला रखवाला बन गया है जो "रात-दिन" पहरा देता है। यह पूरे छुटकारे की कहानी का ढाँचा है: परमेश्वर जिसे न्याय में उजाड़ते हैं, उसी को अनुग्रह में फिर से लगाते हैं। और जब यीशु कहते हैं कि वे सच्ची दाखलता हैं और उनका पिता किसान है, तो वे इसी लंबे सूत्र को अपने ऊपर ले लेते हैं: अब बारी की रक्षा किसी और की धार्मिकता पर नहीं, उनके अपने जीवन पर टिकी है। वचन 6 का वादा, कि याकूब के फलों से "जगत भर जाएगा", मसीह में ही उस विश्वव्यापी आकार तक पहुँचता है।
दर्पण
हममें से बहुतों के भीतर एक चुपचाप डर बैठा रहता है कि परमेश्वर का गुस्सा नापा हुआ नहीं है। जब नौकरी छूटती है, जब जाँच की रिपोर्ट खराब आती है, जब कोई रिश्ता टूटता है, मन तुरंत हिसाब लगाने लगता है: यह किस पाप की सजा है, और क्या अभी और आएगा? वचन 8 इस डर के आर-पार जाता है। ताड़ना "सोच-विचार कर" दी गई, तौलकर, पुरवाई की आँधी की तरह तेज़ पर सीमित। परमेश्वर बेकाबू नहीं होते। साथ ही यह पाठ हमें आराम में सोने नहीं देता, क्योंकि इसका लक्ष्य साफ है: वेदियों का चूर-चूर होना। हमारी वेदियाँ पत्थर की नहीं, पर वे हैं: वह सुरक्षा जो हमने बैंक बैलेंस में गाड़ रखी है, वह पहचान जो बच्चों की सफलता से बनती है, वह ठिकाना जहाँ हम परमेश्वर के बजाय जाते हैं।
आज ही एक कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिस पर आप असल में भरोसा करते हैं, फिर उसे फाड़कर फेंक दीजिए और ज़ोर से कहिए: "मैं आपकी शरण लेता हूँ, मुझसे मेल कर लीजिए।"
पृष्ठभूमि
अध्याय 24 से 27 तक यशायाह की भाषा अचानक विश्वव्यापी हो जाती है: पूरी पृथ्वी, समुद्र का अजगर, मृत्यु का निगला जाना, बड़ा नरसिंगा। पर यह किसी सपने की दुनिया नहीं है। आठवीं सदी ईसा पूर्व में अश्शूर पश्चिम एशिया का सबसे क्रूर साम्राज्य था, और उसकी नीति थी हारे हुए लोगों को उखाड़कर दूर देश में बसा देना, ताकि उनकी पहचान मिट जाए। उत्तरी राज्य के साथ यही हुआ। जो बच निकले, उनमें से बहुत से मिस्र भाग गए, जहाँ वे परदेशी मजदूरों की तरह जीते रहे। वचन 13 इन्हीं दो पतों को नाम लेकर पुकारता है, अश्शूर और मिस्र, यानी वे लोग जिनके बारे में सब मान चुके थे कि वे इतिहास से मिट गए। यही उस समय की सबसे नामुमकिन बात थी, और यही वादा किया जा रहा है।
एक बारीकी
वचन 12 की खेती की तस्वीर पर ज़रा रुकिए। यहोवा "फरात से लेकर मिस्र के नाले तक अपने अन्न को फटकेगा।" फटकना यानी दाँवने के बाद अन्न को हवा में उछालना ताकि भूसी उड़ जाए और दाना रह जाए। पर इसके बाद जो होता है वह अजीब है: दाना बोरों में नहीं भरा जाता, बल्कि "तुम एक-एक करके इकट्ठे किए जाओगे।" यह उस किसान की तस्वीर है जो खलिहान में झुककर बिखरे हुए दाने एक-एक चुनता है। एक साम्राज्य लोगों को हज़ारों की गिनती में गिनता है; परमेश्वर उन्हें एक-एक करके उठाते हैं। जो निर्वासन में खो गए थे, वे भीड़ के रूप में नहीं, नाम लेकर लौटाए जाते हैं। पुनर्स्थापना यहाँ आँकड़ा नहीं, झुककर किया गया व्यक्तिगत काम है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर चार रूपों में दिखते हैं, और चारों को साथ रखना ही असली काम है। वे योद्धा हैं जो अराजकता के अजगर को तलवार से घात करते हैं; वे माली हैं जो क्षण-क्षण सींचते हैं; वे पहरेदार हैं जो रात-दिन जागते हैं; और वे किसान हैं जो बिखरा हुआ अन्न चुनते हैं। इनमें कोई विरोधाभास नहीं, क्योंकि चारों काम एक ही चाह से निकलते हैं: कि उनकी बारी बची रहे। पर वचन 11 इस चित्र को नरम नहीं होने देता। वही "कर्ता" और "रचनेवाला" उन पर दया नहीं करेंगे जो निर्बुद्धि बने रहते हैं। जो परमेश्वर बनाते हैं, वे बनाई हुई चीज़ के सामने विवश नहीं हो जाते। उनकी करुणा असीम है, पर वह लापरवाह नहीं है।
शास्त्र की गूँज
यशायाह 5 का दाख की बारी का गीत इस अध्याय के पीछे लगातार बजता है। वहाँ परमेश्वर ने सब कुछ किया था और फल खट्टे निकले; इसलिए बाड़ हटा दी गई। अध्याय 27 उसी बारी को दोबारा खोलता है, इस बार रखवाली के वादे के साथ। दोनों को साथ पढ़िए और आपको पता चलेगा कि पुनर्स्थापना कोई हल्की माफी नहीं, बल्कि लंबे न्याय के दूसरे छोर पर मिला अनुग्रह है। दूसरा, वचन 9 को पौलुस रोमियों 11:27 में उठाता है, जहाँ वह इस्राएल के भविष्य पर बात करते हुए कहते हैं कि परमेश्वर की वाचा का सार यही है कि वे पापों को दूर करेंगे। यानी पौलुस इस पद को केवल इतिहास का टुकड़ा नहीं, आज भी खुली हुई प्रतिज्ञा मानते हैं।
पहले सुननेवाले
कल्पना कीजिए कि आप यरूशलेम में खड़े हैं और आपके चचेरे भाई को दस साल पहले अश्शूरी सैनिक बाँधकर ले गए थे। आपने मान लिया है कि वह मर चुका है। ऐसे में "बड़ा नरसिंगा फूँका जाएगा" सुनना केवल भविष्यवाणी नहीं, कलेजे पर हाथ रखने जैसा है। नरसिंगा उस समय युद्ध, राजा के राज्याभिषेक और पर्व की बुलाहट का चिन्ह था; यहाँ वह बिखरे हुओं के लिए घर लौटने का संकेत है। और वे लौटकर व्यापार करने नहीं, "पवित्र पर्वत पर यहोवा को दण्डवत्" करने आते हैं। पहले सुननेवालों के लिए यह वादा राजनीतिक भी था और आराधना का भी: बिखराव का अंत तब होता है जब लोग फिर एक साथ झुकते हैं। नया नियम इसी नरसिंगे की गूँज मत्ती 24:31 में सुनता है।
कठिन प्रश्न
वचन 4 कहता है, "मेरे मन में जलजलाहट नहीं है", और सात पद बाद वही परमेश्वर कहते हैं कि उनका रचनेवाला उन पर "अनुग्रह न करेगा।" इसे मिलाकर पढ़ना असहज है, और इसे चिकना कर देना बेईमानी होगी। पाठ खुद कोई सफाई नहीं देता। जो वह देता है वह बीच में रखा हुआ वचन 5 है: शरण लेने और मेल करने का न्योता। अनुग्रह के इनकार का कारण यहाँ परमेश्वर की कंजूसी नहीं, बल्कि लोगों का "निर्बुद्धि" होना है, यानी बार-बार खुले दरवाजे के सामने से मुँह फेर लेना। फिर भी सवाल पूरी तरह हल नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए। यह पाठ हमें दो सच्चाइयाँ एक साथ थमा देता है और उनमें से किसी को छोड़ने की इजाज़त नहीं देता: परमेश्वर के पास क्रोध नहीं है, और परमेश्वर को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन सी "वेदी" खड़ी है, वह भरोसे की जगह जो परमेश्वर की जगह ले रही है, और उसे चूर-चूर होने में क्या खोएगा?
क्या आप अपनी वर्तमान कठिनाई को "सोच-विचार कर" दी गई, नापी हुई ताड़ना के रूप में देख पाते हैं, या भीतर यह डर है कि परमेश्वर का हाथ रुकेगा ही नहीं?
"एक-एक करके इकट्ठे किए जाओगे" में आप किसका नाम रखना चाहेंगे, कौन आपकी नज़र में खो चुका है जिसे परमेश्वर अब भी चुन सकते हैं?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Isaiah 27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यशायाह 27 का क्या अर्थ है?
यशायाह 27 किस विषय में है?
यशायाह 27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यशायाह 27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 27 में आपको क्या स्पर्श करता है?
इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें