लूका 18:7
पाठ
यीशु अभी-अभी उस बेशर्म न्यायी की कहानी सुना चुके हैं जो न परमेश्वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था, और फिर भी उस विधवा की लगातार पुकार से हार गया। अब वे उस कहानी से एक सवाल खींचकर सुननेवालों के सामने रख देते हैं: "अतः क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते; और क्या वह उनके विषय में देर करेगा?" ध्यान दीजिए, यह उत्तर नहीं, प्रश्न है। यीशु कोई गारंटी का कागज़ नहीं थमाते; वे एक ऐसा सवाल हवा में छोड़ देते हैं जो सुननेवाले के भीतर उतरकर वहीं बैठ जाता है। और वह सवाल दो हिस्सों में आता है: क्या वे न्याय करेंगे? और क्या वे देर करेंगे? पहला हिस्सा भरोसा जगाता है। दूसरा हिस्सा घाव को छूता है।
मूल मर्म
यह पद परमेश्वर की तुलना उस अधर्मी न्यायी से नहीं करता, बल्कि उससे उलटी दिशा में ले जाता है। यदि एक ऐसा आदमी, जिसके भीतर न ईश्वर-भय है न लोक-लाज, केवल अपनी शांति बचाने के लिए न्याय कर देता है, तो वह परमेश्वर क्या करेंगे जो अपने लोगों को "अपने चुने हुए" कहते हैं? यहाँ रिश्ता ही तर्क का आधार है। विधवा उस न्यायी के लिए अजनबी थी, एक झंझट; हम परमेश्वर के लिए अपने हैं। पर यीशु सस्ती तसल्ली नहीं देते। वे "रात-दिन" शब्द रखते हैं, यानी वे मान लेते हैं कि पुकार लंबी खिंचेगी, कि रातें होंगी जिनमें कोई उत्तर नहीं आएगा। प्रार्थना यहाँ जादू की चाबी नहीं, बल्कि उस रिश्ते में टिके रहने का नाम है जहाँ न्याय अभी दिखाई नहीं देता, पर परमेश्वर का चरित्र बदला नहीं है।
सूत्र
"रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते" वाला वाक्य अचानक नहीं आया। यह इस्राएल की पुरानी आवाज़ है। मिस्र की ईंट-भट्टियों में वे कराहते रहे, और शास्त्र कहता है कि परमेश्वर ने उनकी चिल्लाहट सुनी और अपनी वाचा को याद किया। वहाँ भी उत्तर चार सौ साल बाद आया, पर आया। यीशु इसी लंबी परंपरा में खड़े होकर बोल रहे हैं, और उससे भी आगे: कुछ ही दिनों में वे स्वयं गतसमनी में रात भर पुकारनेवाले बनेंगे, और उस पुकार का तत्काल उत्तर नहीं, बल्कि क्रूस मिलेगा। तीसरे दिन जो हुआ, वही परमेश्वर का "न्याय चुकाना" है। इसलिए यह पद खोखला आश्वासन नहीं देता; यह हमें उस व्यक्ति की ओर ले जाता है जिसने स्वयं देर सही, और जिसके जी उठने में परमेश्वर ने दिखा दिया कि वे अपनों को अंततः नहीं छोड़ते।
दर्पण
आपके पास भी शायद एक ऐसी प्रार्थना है जिसे आपने कहना बंद कर दिया है। वह बीमार माँ, वह बेटा जो अब चर्च नहीं आता, वह मुकदमा जो सात साल से अदालत में घिसट रहा है, वह दफ़्तर जहाँ झूठ बोलनेवाले को पदोन्नति मिली और आपको चुप्पी। हम प्रार्थना छोड़ते नहीं, हम बस उस विषय को छोड़ देते हैं, क्योंकि हर बार उसे उठाना घाव को फिर से खोलना है। यीशु उस चुप्पी को नाम देते हैं: यही साहस छोड़ना है। ध्यान दीजिए, विधवा ने अपनी माँग का शब्द नहीं बदला, उसने बस दोहराना बंद नहीं किया। आज रात सोने से पहले वह एक बात, जिसे आपने प्रार्थना में कहना छोड़ दिया है, ज़ोर से बोलकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए, बिना सुंदर शब्दों के, ठीक उसी रूखे वाक्य में जो मन में पड़ा है।
बारीकी
"और क्या वह उनके विषय में देर करेगा?" इस "देर करेगा" के पीछे जो यूनानी क्रिया है, वह है माक्रोथ्युमेओ, जिसका सामान्य अर्थ "देर करना" नहीं, बल्कि "लंबे समय तक धीरज रखना" है। नये नियम में यही शब्द बार-बार परमेश्वर की सहनशीलता के लिए आता है। यानी वाक्य में एक दोहरापन छिपा है: क्या वे अपने लोगों के मामले में ढील देंगे, या क्या वे उनके प्रति धीरज धरते रहेंगे? दोनों अर्थ एक-दूसरे को काटते नहीं, वे एक-दूसरे को समझाते हैं। जो देर हमें अनदेखी लगती है, वह शायद वही धीरज है जो अभी दूसरों को, और कभी-कभी हमें ही, समय दे रहा है। पर यीशु इस दोहरेपन को सुलझाते नहीं। वे इसे प्रश्न के रूप में ही छोड़ देते हैं, जैसे कहते हों: तुम्हें इसी अनसुलझेपन में प्रार्थना करना सीखना है।
कठिन प्रश्न
अगला ही पद कहता है, "वह तुरन्त उनका न्याय चुकाएगा।" और हमारा पूरा अनुभव इसके विरुद्ध गवाही देता है। जिन विश्वासियों ने बीसवीं सदी में शिविरों में दम तोड़ा, उनके लिए "तुरन्त" कहाँ था? ईमानदारी यही है कि इस पद को घड़ी की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। "तुरन्त" यहाँ शायद गति के बारे में कम और निश्चितता के बारे में अधिक है: जब परमेश्वर उठते हैं, तो कोई देरी उन्हें रोक नहीं पाती। पर यह भी पूरा उत्तर नहीं, और मैं इसे पूरा उत्तर कहकर आपको धोखा नहीं दूँगा। ध्यान दीजिए कि यीशु स्वयं यह सवाल हल नहीं करते; वे इसे पलटकर हमारी ओर फेंक देते हैं: "क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?" असली अनिश्चितता परमेश्वर की निष्ठा में नहीं, हमारी टिकाऊपन में है।
मुख्य पात्र
इस पद का केंद्र वह न्यायी नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका जो चित्र उभरता है वह चौंकानेवाला है। वे "अपने चुने हुए" कहते हैं। चुनाव का यह शब्द यहाँ किसी धार्मिक बहस के लिए नहीं, कोमलता के लिए इस्तेमाल हुआ है: ये मेरे अपने हैं, इन्हें मैंने चुना है, इनकी आवाज़ मैं पहचानता हूँ। वह न्यायी विधवा की पुकार से चिढ़ता था; परमेश्वर की दुनिया में पुकार बोझ नहीं, रिश्ते की ध्वनि है। और वे रात-दिन सुनते हैं, यानी उन घंटों में भी जब हमें लगता है कि आसमान बंद है और हमारी बात कहीं टकराकर लौट आई है। यह ऐसा परमेश्वर हैं जो सुनने से थकते नहीं, पर जिनकी चुप्पी को हमें सहना सीखना पड़ता है, बिना यह मान लिए कि चुप्पी अनुपस्थिति है।
चिंतन के प्रश्न
आपकी कौन-सी प्रार्थना ऐसी है जिसे आपने इसलिए छोड़ दिया कि उत्तर नहीं आया, और अगर आप उसे आज फिर उठाएँ तो आपके भीतर सबसे पहले क्या टूटेगा?
यदि "देर" का अर्थ अनदेखी नहीं बल्कि धीरज है, तो आपके जीवन की किस प्रतीक्षा को आप दोबारा, नई नज़र से देखना चाहेंगे?
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Luke 18:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 18:7 का क्या अर्थ है?
लूका 18:7 किस विषय में है?
लूका 18:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका 18:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 18:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 18 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु ने साफ साफ बता दिया था कि उसे पकड़वाया जाएगा, मारा जाएगा और तीसरे दिन जी उठेगा। फिर भी लिखा है, "परन्तु वे इन बातों को न समझे, और यह बात उनसे छिपी रही, और जो कहा गया था वह उनकी समझ में न आया।" और ठीक इसके बाद एक अंधा पुकार उठता है कि वह देख सके। कभी कभी जो चलते फिरते हैं वही सबसे ज़्यादा अंधे होते हैं। तुझे क्या समझ नहीं आ रहा? उसी से माँग ले।
धन्यवाद कि जब मैं दूर खड़ा होकर आँखें भी उठा नहीं पाता, तब भी तू सुनता है। उस चुंगी लेनेवाले की छोटी सी पुकार, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर," तूने ठुकराई नहीं। धन्यवाद कि मेरी टूटी हुई प्रार्थना भी तेरे सामने स्वीकार होती है।
यीशु ने यह दृष्टान्त उन लोगों से कहा, "जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं और दूसरों को तुच्छ जानते थे।" ध्यान दे, ये दो बातें साथ चलती हैं। जिस पल मैं अपनी धार्मिकता पर टिकता हूँ, उसी पल किसी और को नीचा देखना शुरू कर देता हूँ। अपने मन की जाँच का सबसे सच्चा पैमाना यही है: आज मैंने किसे तुच्छ समझा?
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