मत्ती 3:10
पाठ
कुल्हाड़ा अब टहनियों पर नहीं, जड़ पर रखा है। यूहन्ना फरीसियों और सदूकियों से कहता है कि समय की घड़ी आख़िरी मोड़ पर आ चुकी है: "जो-जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में झोंका जाता है।" यह चेतावनी नहीं, घोषणा है। किसान खेत में घूम चुका है, पेड़ परखे जा चुके हैं, और लोहा ज़मीन पर टिका हुआ इंतज़ार कर रहा है कि हाथ उठे। बात छँटाई की नहीं, जड़ से हटाने की है। और यह बात उन्हीं से कही जा रही है जो धर्म के पेशेवर जानकार थे, जो यरदन के किनारे शायद दूसरों को देखने आए थे, खुद को सौंपने नहीं।
मूल बात
इस एक वाक्य में परमेश्वर के न्याय का स्वभाव खुल जाता है, और वह हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई तक उतरता है। जड़ पर रखा कुल्हाड़ा कहता है कि परमेश्वर ऊपरी सुधार से संतुष्ट नहीं होते। पत्तियाँ हरी हो सकती हैं, छाल चिकनी, पेड़ दूर से भरा-पूरा दिख सकता है, पर प्रश्न एक ही है: फल कहाँ है? और फल का अर्थ यूहन्ना पहले ही बता चुका है, "मन फिराव के योग्य फल", यानी ऐसा जीवन जो बदले हुए मन का सबूत हो। वंश, परंपरा, मंदिर की सदस्यता, अब्राहम का नाम, ये सब पेड़ की ऊँचाई हैं, फल नहीं। परमेश्वर की कृपा सस्ती नहीं; वह जड़ तक पहुँचती है, और इसीलिए वह सचमुच बचाती है।
जोड़ने वाला सूत्र
यूहन्ना का कुल्हाड़ा हवा में अधर नहीं लटका रहता। अगली ही साँस में वह कहता है कि उसके बाद आनेवाला "पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा", और उसके हाथ में सूप है। यानी जो न्यायी आ रहा है, वही वर्षों तक गलील की धूल में चलेगा, और एक दिन खुद उस आग के नीचे खड़ा होगा जो फलहीन पेड़ों के लिए जली थी। यही सुसमाचार का पलटाव है: कुल्हाड़ा उठता है, पर पहला प्रहार उस पर पड़ता है जो अकेला अच्छा फल लाया। मसीह में यह वचन रद्द नहीं होता, पूरा होता है। जड़ पर रखा लोहा अब भी वहीं है, पर जो उससे जुड़ जाता है जिसे काटा गया, वह बचता है, और उसकी डालियों पर फल आने लगते हैं।
दर्पण
यह पद उस सवाल पर उँगली रखता है जिसे हम टालना पसंद करते हैं: मेरे जीवन में जो धार्मिक दिखता है, क्या वह सचमुच फल है, या सिर्फ़ ऊँचाई? रविवार की नियमितता, बाइबल पढ़ने का रिकॉर्ड, कलीसिया में पद, पीढ़ियों से चला आ रहा विश्वासी परिवार, ये सब सुंदर हो सकते हैं और फिर भी बाँझ। फल वहाँ दिखता है जहाँ कीमत लगती है: जिस कर्मचारी के साथ आपने रूखा व्यवहार किया, उससे माफ़ी माँगने में; उस पैसे में जो आप चुपचाप देते हैं; उस रिश्तेदार के प्रति धैर्य में जिसे आप सालों से सहन कर रहे हैं। यूहन्ना की आवाज़ भीतर के उस हिसाब को तोड़ती है जो कहता है, "मैं तो ठीक ही हूँ।"
आज ही एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिख लीजिए जो आपके विश्वास में दिखती तो है पर फल नहीं लाती, और उसके नीचे एक ठोस काम लिखिए जो आप इसी सप्ताह करेंगे।
प्रश्न
फिर भी एक काँटा बचा रहता है: अगर परमेश्वर जड़ तक देखते हैं, तो कौन सुरक्षित है? हम में से किसके फल इतने भरे हैं कि कुल्हाड़े के सामने टिक जाएँ? यूहन्ना यहाँ कोई सांत्वना नहीं देता, और मैं भी नहीं दूँगा, क्योंकि पाठ नहीं देता। वह "आनेवाले क्रोध" की बात करता है जैसे वह असली हो, और वह असली है। इसका जवाब बेहतर प्रदर्शन नहीं है, बल्कि वह है जो यूहन्ना के ठीक बाद पानी में उतरता है। पर इस पद में वह अभी खड़ा नहीं हुआ। इसलिए यहाँ थोड़ी देर असहज रहना ईमानदारी है: पहले डर, फिर कृपा। जो क्रम उलटा करता है, वह दोनों को हल्का कर देता है।
मुख्य पात्र
यूहन्ना को समझिए। ऊँट के रोम का वस्त्र, चमड़े का कमरबन्द, टिड्डियाँ और वनमधु। यह आदमी किसी से कुछ नहीं चाहता, इसलिए किसी से डरता भी नहीं। जब यरूशलेम के सबसे प्रभावशाली लोग उसके सामने आते हैं, तो वह उनकी उपस्थिति को उपलब्धि नहीं मानता, "हे साँप के बच्चों" कहता है। यह कड़वाहट नहीं, प्रेम का एक कठोर रूप है; वह जानता है कि जिनकी धार्मिकता पर कोई सवाल नहीं उठाता, वे सबसे अधिक खतरे में हैं। और इस पूरी कठोरता के बीच वह खुद को इतना छोटा मानता है कि आनेवाले की जूती उठाने के योग्य भी नहीं समझता। कड़ी आवाज़ और झुकी हुई गर्दन, यही सच्चे भविष्यद्वक्ता की पहचान है।
एक बारीकी
"रखा हुआ है", यह छोटा-सा वाक्यांश पूरे पद का भार उठाता है। कुल्हाड़ा उठाया नहीं जा रहा, घुमाया नहीं जा रहा; वह ज़मीन पर, जड़ से सटा हुआ, स्थिर पड़ा है। यह तस्वीर गति की नहीं, ठहराव की है, और इसीलिए इतनी डरावनी है। धमकी वह है जो चिल्लाती है; यह चुप है। किसान ने फैसला कर लिया, औज़ार जगह पर रख दिया, अब सिर्फ़ समय बाकी है। इस चुप्पी में ही कृपा छिपी है: अभी हाथ उठा नहीं है, अभी मौसम बाकी है, अभी फल आ सकता है। परमेश्वर का धैर्य और उनका न्याय एक ही वाक्य में, एक ही पेड़ के नीचे, साथ-साथ खड़े हैं।
चिंतन
मेरे जीवन में कौन-सी चीज़ है जिसे मैं फल समझता हूँ, पर जो असल में सिर्फ़ विरासत या आदत है?
अगर कुल्हाड़ा अभी भी रखा हुआ है और उठा नहीं, तो परमेश्वर का यह धैर्य मुझसे इस सप्ताह क्या माँग रहा है?
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Matthew 3:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 3:10 का क्या अर्थ है?
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मत्ती 3:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 3:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यूहन्ना उन्हें लौटाता नहीं, पर पूछता है, "हे साँप के बच्चों, तुम्हें किसने चेतावनी दी कि आनेवाले प्रकोप से भागो?" वे सही जगह आए थे, पर शायद गलत कारण से। सज़ा से बचने की चाह और परमेश्वर की ओर मुड़ने की चाह, दोनों एक जैसी दिखती हैं। आज तू जिस प्रार्थना में खड़ा है, उसमें डर बोल रहा है या प्रेम?
यूहन्ना कहता है, "उसका सूप उसके हाथ में है।" सूप गेहूँ को नष्ट करने नहीं, उसे भूसी से अलग करने के लिए उठाया जाता है। ध्यान दे, वही हाथ जो भूसी को जलाता है, गेहूँ को खत्ते में सम्भालकर रखता है। आज जो तेज़ हवा तेरे जीवन पर चल रही है, शायद वह तुझे उड़ाने नहीं, तुझमें से भूसी हटाने आई है।
लोग यरूशलेम से चलकर जंगल तक आए, और वहाँ पानी में खड़े होकर "अपने अपने पापों को मानकर" बपतिस्मा लिया। किसी ने बहाना नहीं बनाया। हर एक ने अपना नाम, अपना बोझ खुद कहा। सोचो, तुम्हारे मन में जो बात सालों से छिपी है, क्या तुमने कभी उसे शब्द दिए हैं? जो पाप कहा नहीं जाता, वह धोया भी नहीं जाता।
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