मत्ती 5:34
पाठ
यीशु अभी-अभी उस पुरानी आज्ञा का हवाला दे चुके हैं जो हर यहूदी बच्चे को रटाई जाती थी: झूठी शपथ मत खाना, और जो शपथ परमेश्वर के नाम पर खाई है उसे पूरा करना। फिर वे एक वाक्य से उस पूरी व्यवस्था का ढाँचा हिला देते हैं: "परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि कभी शपथ न खाना।" और तुरंत पहला उदाहरण देते हैं, वह जो उस समय सबसे चालाक माना जाता था: स्वर्ग की शपथ। लोग सोचते थे कि परमेश्वर का नाम लिए बिना "स्वर्ग की कसम" कहना एक सुरक्षित रास्ता है, एक ऐसी शपथ जो तकनीकी रूप से बाध्य नहीं करती। यीशु इस दरवाज़े को बंद कर देते हैं, और कारण बताते हैं: स्वर्ग परमेश्वर का सिंहासन है।
मूल बात
यहाँ असली मुद्दा शपथ का शिष्टाचार नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया में कोई ऐसा कोना बचा है जहाँ परमेश्वर उपस्थित नहीं। शपथ का पूरा तंत्र इसी मान्यता पर टिका था कि कुछ शब्द परमेश्वर के सामने बोले जाते हैं और बाकी शब्द यूँ ही, हवा में। उसी से सच बोलने के दो स्तर बन जाते हैं: एक गंभीर सच्चाई, जब कसम खाई जाए, और एक सस्ता रोज़मर्रा का बोलना, जहाँ थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात चल जाती है। यीशु कहते हैं कि ऐसा कोई तटस्थ क्षेत्र है ही नहीं। जिसे तुम गवाह बनाने की कोशिश में टाल रहे हो, वह पहले से ही सिंहासन पर बैठा सुन रहा है। इसलिए राज्य का नागरिक अपनी विश्वसनीयता किसी कसम से उधार नहीं लेता; वह स्वयं विश्वसनीय होता है, वरना उसकी कोई भी बात विश्वसनीय नहीं।
जोड़नेवाला धागा
शपथ का रिवाज़ बाइबल में कहीं से टपका नहीं, वह परमेश्वर के अपने व्यवहार से निकला है। अब्राहम से वाचा बाँधते समय वे स्वयं शपथ खाते हैं, क्योंकि मनुष्य को भरोसे के लिए कोई ठोस चीज़ चाहिए थी। यानी शपथ परमेश्वर की एक रियायत है, हमारे अविश्वास के कारण दी गई बैसाखी। यीशु उस बैसाखी को इसलिए हटाते हैं क्योंकि अब वह स्वयं आ गए हैं जिनमें परमेश्वर का हाँ पूरा होता है। जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को "लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने" आया है, वह झूठ की जड़ पर कुल्हाड़ी रखता है, न कि उसकी शाखाओं पर। राज्य का चिह्न यह नहीं कि हम और ज़ोरदार कसमें खाएँ, बल्कि यह कि हमारे वचन की गुणवत्ता उस परमेश्वर जैसी होने लगे जो वादा करके मुकरते नहीं।
दर्पण
ज़रा ईमानदारी से देखिए कि आप किन जगहों पर अपनी बात को सहारा देने के लिए कुछ जोड़ते हैं। "मम्मी-पापा की कसम", "भगवान जानता है", "सच बता रहा हूँ यार"। हर बार जब हमें अपने शब्दों के पीछे कोई गवाह खड़ा करना पड़ता है, हम चुपचाप यह मान लेते हैं कि अकेले हमारा शब्द कमज़ोर है। और वह सचमुच कमज़ोर है, क्योंकि हमने उसे खुद सस्ता किया। ऑफ़िस में "कल तक भेज देता हूँ" कहकर तीन दिन लगाना, बच्चे से "रविवार को ज़रूर चलेंगे" कहकर भूल जाना, किसी बीमार दोस्त से "मैं प्रार्थना करूँगा" कहकर उसका नाम तक याद न रखना। ये झूठ अदालत में नहीं पकड़े जाते, पर ये धीरे-धीरे हमें ऐसा आदमी बना देते हैं जिसकी हाँ का कोई वज़न नहीं। आज ही एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति को, जिससे आपने कुछ वादा करके टाल दिया है, अभी संदेश भेजिए और बिना सफ़ाई दिए लिखिए कि मैं यह नहीं कर पाया, और यह नई तारीख है जिस पर मैं टिकूँगा।
शास्त्र की गूँज
यीशु जो कारण देते हैं, वह यशायाह 66:1 से उठाया गया है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि आकाश उनका सिंहासन और पृथ्वी उनके पाँवों की चौकी है। वहाँ बात मंदिर के घमंड की थी: तुम मेरे लिए कौन सा घर बनाओगे? यीशु उसी तर्क को शपथ पर लगाते हैं: तुम स्वर्ग को किस हक़ से गवाह बुलाते हो, वह तो मेरा सिंहासन है। दूसरी गूँज याकूब की पत्री में सुनाई देती है, जहाँ वह लगभग इन्हीं शब्दों को दोहराता है और जोड़ता है कि ऐसा न हो कि तुम दण्ड के योग्य ठहरो। यानी पहली कलीसिया ने इसे ऊँचा आदर्श नहीं, बल्कि व्यावहारिक नियम माना था, क्योंकि झूठ समुदाय का सबसे सस्ता और सबसे घातक रोग है।
मुख्य पात्र
इस वाक्य में यीशु का अधिकार नंगा होकर सामने आ जाता है। कोई रब्बी यह नहीं कहता था "परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ"; रब्बी दूसरों के हवाले देते थे। यीशु व्यवस्था की धारा के ऊपर खड़े होकर बोलते हैं, पर उसे गिराने नहीं, उसके भीतर छिपे इरादे को खोलने के लिए। और ध्यान दीजिए, वे क्रोधित नहीं लगते; वे तर्क देते हैं, शांति से, एक के बाद एक चीज़ गिनाते हुए कि स्वर्ग, पृथ्वी, यरूशलेम, यहाँ तक कि तुम्हारा अपना सिर भी तुम्हारा नहीं। यह उस व्यक्ति की आवाज़ है जो सृष्टि को मालिक की नज़र से देखता है। और वह स्वयं वैसा ही जिया: पीलातुस के सामने, जहाँ एक कसम उनकी जान बचा सकती थी, उन्होंने कसम नहीं खाई, सिर्फ़ सच कहा।
पहले सुननेवाले
पहाड़ पर बैठे लोग ऐसी दुनिया से आए थे जहाँ बाज़ार कसमों पर चलता था। गवाह, सौदा, कर्ज़, तलाक़, सब में शपथ थी, और उसके साथ एक पूरी चालाकी विकसित हो चुकी थी: कौन सी कसम बाध्यकारी है और कौन सी नहीं, किस शब्द से बचाव का रास्ता खुला रहता है। गरीब किसान जानता था कि यह खेल अमीर और पढ़े-लिखे के पक्ष में है, क्योंकि वही बारीकियाँ जानता है। यीशु की बात उनके कानों में आज़ादी की तरह गिरी होगी: अब तुम्हें भाषा के जाल में जीतने की ज़रूरत नहीं, सीधा बोलो और जी लो। साथ ही यह डरावनी भी थी, क्योंकि अब बचने का कोई तकनीकी रास्ता नहीं बचा।
चिंतन के प्रश्न
पिछले हफ़्ते की किस बात में आपने अपने शब्द को मज़बूत दिखाने के लिए कुछ जोड़ा, और उसके नीचे कौन सी असुरक्षा छिपी थी?
जिन लोगों के साथ आप रोज़ रहते हैं, अगर उनसे पूछा जाए कि आपकी "हाँ" कितनी भरोसेमंद है, तो वे क्या कहेंगे?
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Matthew 5:34 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 5:34 का क्या अर्थ है?
मत्ती 5:34 किस विषय में है?
मत्ती 5:34 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 5:34 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 5:34 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.
जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"
ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।
आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।
यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?
यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?
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