फिलिप्पियों 4:19
पाठ
पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को यह नहीं कहता कि "मैं तुम्हारा कर्ज़ चुका दूँगा", बल्कि यह कि परमेश्वर स्वयं उनका हिसाब बराबर करेंगे: "और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा।" उन्होंने जो भेजा, वह उनके अपने भंडार में से गया; अब पौलुस घोषणा करता है कि जिस परमेश्वर की सेवा में यह भेंट चढ़ी, वही उनकी कमी की भरपाई करेंगे। और नाप उनकी आवश्यकता का नहीं, परमेश्वर की सम्पत्ति का है, और वह सम्पत्ति कहीं दूर स्वर्ग में नहीं, बल्कि मसीह यीशु में उपलब्ध है। अगले ही वाक्य में यह वचन स्तुति में फूट पड़ता है, मानो ऐसा वादा चुपचाप नहीं पढ़ा जा सकता।
मूल बात
"हर एक घटी" वाक्यांश में पुराने नियम की एक लम्बी गूँज सुनाई देती है। भजन संहिता 23 का चरवाहा जिसके कारण भेड़ को कुछ घटी नहीं होती; जंगल में मन्ना, जहाँ हर परिवार के पास ठीक उतना ही निकलता था जितना चाहिए, न ज़्यादा न कम। पौलुस उसी परम्परा में खड़ा होकर बोलता है, पर एक निर्णायक अन्तर के साथ: भण्डार अब "मसीह यीशु में" है। यानी परमेश्वर की देने की इच्छा किसी अनिश्चित भाग्य पर नहीं, उस व्यक्ति पर टिकी है जिसने अपने आप को दे दिया। इसलिए यह वचन समृद्धि का वादा नहीं, वाचा का वादा है। और ध्यान दीजिए, यह उन लोगों से कहा गया जो स्वयं कंगाल थे और फिर भी दे रहे थे। परमेश्वर की भरपाई वहाँ प्रकट होती है जहाँ लोग जोखिम उठाकर खुले हाथ रखते हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
इस वादे की जड़ दो अध्याय पहले है। उसी पत्री में पौलुस ने लिखा था कि मसीह ने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी अपने आप को दीन किया, दास का रूप धरा, मृत्यु तक आज्ञाकारी रहे। वही गति यहाँ उलटी दिशा में चलती है: जिसने स्वयं घटी अपनाई, वही अब दूसरों की घटी पूरी करता है। पौलुस दूसरी जगह इसी बात को इस तरह कहता है कि मसीह धनी होकर भी हमारे लिये कंगाल बने, ताकि हम उनकी कंगाली से धनी हो जाएँ। यह कोई काव्यात्मक अलंकार नहीं, बल्कि उस "धन" का पता है जिसका ज़िक्र आयत 19 में है। वह धन क्रूस से होकर आता है। इसीलिए यह वादा उस अर्थव्यवस्था का हिस्सा है जिसमें देना ही पाने का रास्ता बन जाता है, और अन्तिम भरपाई उस दिन पूरी होगी जब "प्रभु निकट है" वाला निकट आना सचमुच घटेगा।
दर्पण
यह वचन दीवार पर टाँगने में जितना मीठा लगता है, जीने में उतना काँटेदार है। जब बेटी की फीस भरने का महीना आता है, जब नौकरी का ठेका बढ़ाया नहीं जाता, जब इलाज का खर्च बचत खा जाता है, तब भीतर एक हिसाब चलने लगता है: क्या मैंने ज़्यादा दे दिया? इस आयत के मूल पाठक वे लोग थे जिन्होंने अपनी गरीबी में से भेजा था, और पौलुस उन्हें तुरन्त अमीर नहीं बना देता। वह उनका खाता परमेश्वर के हाथ में सौंप देता है, और खाता वहाँ सुरक्षित है, यह उन्हें विश्वास से मानना है, बही देखकर नहीं। यहाँ हमारा असली डर उघड़ता है: हम परमेश्वर पर नहीं, अपने बफर पर भरोसा करते हैं। आज ही, अगले दस मिनट में, किसी एक व्यक्ति को जो सुसमाचार की सेवा में लगा है, एक निश्चित रकम भेजें और उसे लिखकर बता दें कि यह उसके लिये है।
पृष्ठभूमि
फिलिप्पी रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ सम्मान, संरक्षण और एहसान की गणित बहुत साफ़ थी। कोई आपको देता था, तो आप उसके ग्राहक बन जाते थे और बदले में निष्ठा चुकाते थे। आयत 15 से 18 तक पौलुस जानबूझकर व्यापार की भाषा उठाता है, "लेने-देने के विषय में", "फल", "मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है", जैसे कोई रसीद काट रहा हो। फिर अचानक वह कलम उस रोमी व्यवस्था से हटाकर मन्दिर की ओर मोड़ देता है: उनकी भेंट "सुखदायक सुगन्ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान" है। और आयत 19 में वह खुद को चुकाने वाले की भूमिका से पूरी तरह हटा लेता है। पौलुस उनका संरक्षक नहीं बनता; परमेश्वर स्वयं देनदार की जगह लेते हैं। कैदखाने में बैठा आदमी यह लिख रहा है, और कैसर के घराने के विश्वासी उसके साथ नमस्कार भेज रहे हैं।
मुख्य पात्र
"मेरा परमेश्वर।" यह छोटा सा सर्वनाम पूरी आयत का भार उठाता है। यह वही आदमी है जिसने चार आयत पहले कहा था कि उसने हर दशा में सन्तोष करना सीख लिया है, भूखा रहना भी और तृप्त होना भी। यानी जो यह वादा दे रहा है, वह भरे पेट से नहीं बोल रहा। उसने स्वयं परमेश्वर की भरपाई कई बार देर से, अजीब रास्तों से और कभी-कभी केवल सामर्थ्य के रूप में पाई है, रोटी के रूप में नहीं। इससे परमेश्वर का जो चेहरा उभरता है वह मशीन का नहीं, पिता का है: वे अपने बच्चों का हिसाब याद रखते हैं, पर वे अपनी विधि से चुकाते हैं। और वे कंजूस नहीं। जो व्यक्ति अपने बेटे को दे चुका, वह कमी में हाथ खींचकर खड़ा नहीं रहेगा।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर अपने धन "में से" कुछ देंगे, बल्कि "अपने उस धन के अनुसार"। फ़र्क बड़ा है। एक करोड़पति दस रुपये दे तो वह उसके धन में से है, पर उसके धन के अनुसार नहीं। यहाँ नाप देने वाले की सम्पत्ति है, पाने वाले की ज़रूरत नहीं। और उस धन पर दो मोहरें लगी हैं: "महिमा सहित" और "मसीह यीशु में"। पहली मोहर बताती है कि यह भरपाई उस लोक से आती है जहाँ परमेश्वर का तेज बसता है, इसलिए वह हमेशा हमारी सूची के अनुसार नहीं दिखेगी। दूसरी बताती है कि इसका पता कहाँ है। जो मसीह के बाहर इस वादे को उठाना चाहता है, वह खाली चेक लेकर बैंक जाता है।
मनन के प्रश्न
आपकी कौन सी "घटी" ऐसी है जिसे आप चुपचाप अपनी बचत, अपनी योजना या अपने संपर्कों से पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं, और उसे "मसीह यीशु में" रखने का ठोस अर्थ आपके लिये इस सप्ताह क्या होगा?
अगर परमेश्वर की भरपाई अक्सर दूसरों के खुले हाथों से होकर आती है, तो पिछले महीने आप किसकी घटी पूरी करने का माध्यम बने, और किसकी बन सकते थे पर नहीं बने?
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Philippians 4:19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Philippians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद उन लोगों के लिए जो मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। जिन्होंने चुपचाप मेरा बोझ उठाया, मेरे लिए प्रार्थना की और ज़रूरत के समय हाथ बढ़ाया। उनका भला करना मेरे लिए आपका ही प्रेम था। उन्हें आशीष दीजिए।
पौलुस यह बात जेल से लिखता है, जहाँ पहरेदार उसके दरवाज़े पर खड़े थे। और वही चित्र वह उठाता है, "परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" ध्यान दे, शान्ति हालात नहीं बदलती, वह तेरे मन पर पहरा देती है। डर अंदर आने की कोशिश करता रहेगा, पर उसे भीतर घुसने नहीं दिया जाएगा। आज तू किस चिंता को प्रार्थना में सौंपेगा?
पौलुस सिर्फ यह नहीं कहता कि मेरी बातें सुनो। वह कहता है, "जो बातें तुमने मुझसे सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझमें देखीं, उन्हीं का पालन किया करो।" उसने अपना जीवन खुला रख दिया था। क्या कोई तुम्हें देखकर मसीह को सीख सकता है? और ध्यान दो, पहले शान्ति हृदय की रखवाली करती है, पर यहाँ शान्ति का परमेश्वर स्वयं साथ चलता है। जब तुम मानने लगते हो, तब वह पास आ जाता है।
हे फिलिप्पियों, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में... तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहभागिता न की।" पौलुस को वह शुरुआती दिन याद है, जब वह जाना-पहचाना नाम नहीं था और देने में कोई फायदा नहीं दिखता था। तब फिलिप्पी ने हाथ बढ़ाया। सोचो, क्या तुम किसी का साथ तब देते हो जब उसका काम अभी छोटा और अनजाना है?
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