भजन संहिता 103:14
यह वचन
भजनकार परमेश्वर की क्षमा और करुणा की लंबी सूची गिनाते-गिनाते अचानक एक कारण बताता है: "क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।" यानी परमेश्वर की दया कोई भावुक क्षण नहीं, बल्कि ठोस जानकारी पर टिकी है। वे जानते हैं कि हम किस चीज़ से गढ़े गए हैं, क्योंकि गढ़नेवाले वही हैं। पिता की तरह वे अपने बच्चों पर तरस खाते हैं (पद 13), और यह तरस इसलिए आता है कि उन्हें याद है, भूला नहीं है, कि हमारे भीतर धूल है। अगले ही पद में वह छवि खुलती है: घास, मैदान का फूल, हवा का एक झोंका।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर की करुणा का आधार हमारी निर्दोषता नहीं, हमारी नाज़ुकी है। यह चौंकाने वाली बात है, क्योंकि हम आमतौर पर सोचते हैं कि परमेश्वर तब दया करते हैं जब हम पछताते हैं या सुधरते हैं। पद 14 कहता है: वे दया करते हैं क्योंकि वे सच्चाई जानते हैं। इब्रानी शब्द येत्ज़ेर का अर्थ है "गढ़ी हुई वस्तु, बनावट", वही शब्द जो कुम्हार के काम के लिए इस्तेमाल होता है। परमेश्वर हमें अपनी ही कारीगरी के रूप में देखते हैं, और कारीगर जानता है कि बर्तन कहाँ पतला है। इसका मतलब यह नहीं कि पाप बहाना बन जाता है; पद 10 साफ़ कहता है कि हमारे अपराध असली थे। मतलब यह है कि परमेश्वर हमसे वह उम्मीद नहीं करते जो मिट्टी कभी पूरी नहीं कर सकती, और फिर भी हमें छोड़ते नहीं।
पूरा सूत्र
"मिट्टी" शब्द हमें सीधे उत्पत्ति की उस दोपहर में ले जाता है जब परमेश्वर ज़मीन की धूल से मनुष्य को गढ़ते हैं और उसमें अपनी श्वास फूँकते हैं। मनुष्य की गरिमा और मनुष्य की नाज़ुकी एक ही वाक्य में पैदा हुई हैं। बाइबल की पूरी कहानी इसी तनाव को संभालती है: धूल जो परमेश्वर की छवि धारण करती है। और कहानी का सबसे अनपेक्षित मोड़ यह है कि जाननेवाले परमेश्वर ने बाहर से जानना काफ़ी नहीं समझा। यूहन्ना लिखता है कि वचन देहधारी हुआ; परमेश्वर ने वही मिट्टी पहन ली, थके, प्यासे हुए, कब्र तक गए। पद 14 में जो सहानुभूति दूर से झुकी हुई लगती है, मसीह में वह भीतर से जानी हुई सहानुभूति बन जाती है। इसीलिए क्रूस पर करुणा और न्याय एक-दूसरे को काटते नहीं, मिलते हैं।
आईना
अगर परमेश्वर हमारी बनावट का हिसाब रखते हैं, तो सवाल यह है कि हम किसकी बनावट भूल जाते हैं। अपने किशोर बेटे से आप वह परिपक्वता माँगते हैं जो आपके पास तीस की उम्र में नहीं थी। दफ़्तर में उस साथी को आप "बहाने बनानेवाला" कह देते हैं, जबकि वह रात भर बीमार माँ के पास जागा था। अपने शरीर से आप छह घंटे की नींद पर बारह घंटे का काम वसूलते हैं और फिर हैरान होते हैं कि चिड़चिड़ापन कहाँ से आया। सबसे कठोर हम अक्सर अपने ही साथ होते हैं: वही गलती दोहराने पर हम खुद को वह क्षमा नहीं देते जो परमेश्वर पद 12 में दे चुके हैं। पर धार यहाँ भी है: "मैं तो मिट्टी हूँ" पाप का लाइसेंस नहीं। मिट्टी होना सीमा स्वीकारना है, ज़िम्मेदारी टालना नहीं।
आज एक काग़ज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी कमज़ोरी इस हफ़्ते आपको सबसे ज़्यादा खटकी, नाम के नीचे लिखिए "यह भी मिट्टी है", और एक वाक्य में परमेश्वर से उस पर पिता जैसी दया माँगिए।
पृष्ठभूमि
यह भजन मंदिर की आराधना में गाया जाता था, उस समाज में जहाँ जीवन सचमुच घास जैसा था। आधे बच्चे पाँच साल से पहले मर जाते थे, एक सूखा पूरे गाँव को कंगाल कर देता था, और पूरब से आती गरम हवा कुछ दिनों में हरे मैदान को भूसा बना देती थी। पद 6 में "पिसे हुए" लोग कोई काव्यात्मक कल्पना नहीं थे, वे कर्ज़ में डूबे किसान और अदालत में हारे विधवा-अनाथ थे। आसपास के साम्राज्यों के देवता ताक़तवर सेवक चाहते थे; राजा प्रदर्शन पर इनाम देते थे। इसी माहौल में इस्राएल गाता है कि उनका परमेश्वर पद 8 की उसी वाणी में बोलते हैं जो मूसा को सुनाई गई थी: "दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला।" यह राजनीतिक बयान भी था।
कठिन सवाल
अगर परमेश्वर जानते हैं कि हम मिट्टी हैं, तो वे हमसे पूर्णता की माँग क्यों करते हैं, और मिट्टी को पाप का दोषी क्यों ठहराते हैं? भजन इस उलझन को सुलझाता नहीं। पद 10 मानता है कि हमारे अपराध बदले के लायक थे; पद 14 कहता है कि परमेश्वर ने बदला नहीं दिया। यानी हमारी नाज़ुकी हमें निर्दोष नहीं बनाती, बस परमेश्वर के धैर्य का कारण बनती है। और दूसरा, तीखा सवाल: अगर वे हमारी कमज़ोरी जानते हैं, तो हवा के एक झोंके से फूल उड़ जाने देते क्यों हैं (पद 16)? यहाँ भजनकार जवाब नहीं देता, वह तुलना करता है: घास एक मौसम की है, परन्तु "यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग-युग।" हमारी छोटी उम्र का उत्तर लंबी उम्र नहीं, स्थायी करुणा है। यह राहत सस्ती नहीं है; यह भरोसा है जो कब्र के सामने खड़ा होकर बोला जाता है।
पहले सुननेवाले
कल्पना कीजिए कि यह पद उस स्त्री के कानों में पड़ता है जिसने पिछले साल दो बच्चे दफ़नाए, या उस बंधुआ मज़दूर के कानों में जो कर्ज़ चुका नहीं पाया। उनके लिए "मनुष्य मिट्टी ही है" कोई दार्शनिक टिप्पणी नहीं थी, वह उनकी रोज़ की सच्चाई थी, और अक्सर शर्म की बात भी: कमज़ोर होना उस दुनिया में अपमान था। इस भजन ने उनकी कमज़ोरी को शर्म से निकालकर परमेश्वर की करुणा का आधार बना दिया। "स्मरण रहता है" उनके लिए वाचा की भाषा थी, वही शब्द जो मिस्र की गुलामी में परमेश्वर के याद करने के लिए इस्तेमाल हुआ था। याद रखना का मतलब था: कुछ करने के लिए उठ खड़े होना। हम इसे भावना समझ लेते हैं; वे इसे हस्तक्षेप समझते थे।
मनन के प्रश्न
किस व्यक्ति से आप ऐसी अपेक्षा रख रहे हैं जो मिट्टी कभी पूरी नहीं कर सकती, और वह अपेक्षा आपने कहाँ से सीखी?
अपनी सीमा स्वीकारना और अपनी ज़िम्मेदारी से बचना, इन दोनों के बीच की रेखा आपके जीवन में इस समय कहाँ खिंचती है?
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Psalms 103:14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 103:14 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 103:14 किस विषय में है?
भजन संहिता 103:14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 103:14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 103:14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 103 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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