होशे 11
पाठ
आठवें पद में परमेश्वर अपने भीतर की उथल-पुथल खोलकर रख देते हैं: "मैं कैसे तुझे अदमा के समान छोड़ दूँ… मेरा हृदय तो उलट-पुलट हो गया।" जो इब्रानी क्रिया यहाँ "उलट-पुलट" के लिए आई है, वही क्रिया उत्पत्ति 19 में सदोम और अदमा के "उलट दिए जाने" के लिए इस्तेमाल होती है। यानी परमेश्वर कहते हैं: जिन नगरों को मैंने उलट दिया था, उनके बदले अब मैं अपना ही हृदय उलट देता हूँ। यही इस अध्याय की धड़कन है।
अध्याय एक पिता की स्मृति से शुरू होता है, जिसने अपने बालक को मिस्र से बुलाया, उसे पाँव-पाँव चलना सिखाया, गोद में उठाया, प्रेम की डोरी से खींचा। फिर आरोप आता है: वह बालक भागता ही गया, बाल देवताओं के पीछे। दंड की घोषणा होती है, अश्शूर, तलवार, और फिर अचानक सब रुक जाता है, क्योंकि पिता का मन पिघल जाता है।
मर्म
पद 1 निर्गमन 4:22 की गूँज है, जहाँ परमेश्वर फ़िरौन से कहते हैं कि इस्राएल "मेरा पहलौठा पुत्र" है। होशे उस राष्ट्रीय दावे को घर के भीतर ले आता है: छुड़ौती अब राजनीतिक घटना नहीं, पितृत्व का अनुभव है। और यहीं पर एक गहरी बात खुलती है। व्यवस्था में हठीले पुत्र का अंत स्पष्ट था, नगर के पुरनियों के सामने उसे मार डाला जाता था। इस्राएल बिलकुल वैसा ही पुत्र है, और पद 5 से 7 तक न्याय उसी दिशा में बढ़ता है। फिर पद 9 आता है: "क्योंकि मैं मनुष्य नहीं परमेश्वर हूँ।" ध्यान दीजिए, यह वाक्य यहाँ पवित्रता को न्याय का आधार नहीं, बल्कि क्षमा का आधार बनाता है। परमेश्वर की "अन्यता" इसमें है कि वे क्रोध में बहकर अपने प्रेम को नहीं भूलते, जैसा मनुष्य भूल जाता है।
सूत्र
मत्ती 2:15 इस अध्याय के पहले पद को सीधे यीशु मसीह पर लागू करता है, और यह सिर्फ़ एक सुविधाजनक उद्धरण नहीं है। मत्ती एक पैटर्न पहचान रहा है: जो पुत्र मिस्र से बुलाया गया और विफल हुआ, उसकी जगह अब एक पुत्र खड़ा है जो मिस्र से बुलाया जाएगा और विफल नहीं होगा। इस्राएल जंगल में परीक्षा में गिरा; यीशु मसीह जंगल में खड़े रहे। इस्राएल ने "मेरी ओर फिरने से इन्कार कर दिया"; यीशु मसीह ने पिता की ओर मुड़े रहना कभी नहीं छोड़ा। और होशे 11 का सबसे कठिन प्रश्न, कि न्याय कहाँ गया, क्रूस पर उत्तर पाता है। परमेश्वर का हृदय जो उलट गया, वह न्याय को रद्द नहीं करता, वह उसे अपने ऊपर ले लेता है।
दर्पण
पद 3 की चुभन यह है: "वे न जानते थे कि उनका चंगा करनेवाला मैं हूँ।" यह विद्रोह से भी ज़्यादा भूलने की कहानी है। आपने नौकरी बचाई, बच्चे को संभाला, बीमारी से उबरे, और किसी मोड़ पर उसका श्रेय चुपचाप अपनी समझदारी, अपने नेटवर्क, अपनी मेहनत को चला गया। बाल की मूरत आज धूप नहीं माँगती, वह बस आपके भरोसे की जगह ले लेती है: बचत खाता, प्रतिष्ठा, वह व्यक्ति जिसके बिना आप अधूरे महसूस करते हैं। और फिर भी पद 4 कहता है कि परमेश्वर जोत खोलकर सामने आहार रखते हैं, ज़बरदस्ती नहीं, पोषण।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर अपने जीवन की तीन घटनाएँ लिखिए जिनमें आप बचे या संभले, और हर एक के आगे लिखिए, "यह आपने किया, मेरे चंगा करनेवाले।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे यहाँ असुरक्षित दिखाई देते हैं। वे अपने अतीत को याद करते हैं जैसे कोई पिता पुरानी तस्वीरें देखता हो: पहला कदम, गोद, झुककर खाना खिलाना। होशे की भाषा में परमेश्वर झुकते हैं, और यह मूर्तियों के देवताओं से बिलकुल उलट है, जो झुकते नहीं, माँगते हैं। फिर वे क्रोधित होते हैं, सच्चा क्रोध, जो नगरों और बेंड़ों तक पहुँचता है। और फिर वे अपने ही निर्णय के सामने ठिठक जाते हैं। यह कमज़ोरी नहीं है; यह वह स्वतंत्रता है जो केवल परमेश्वर के पास है, कि वे अपने प्रेम के कारण अपने क्रोध को रोक सकें बिना अपनी पवित्रता खोए। पद 10 में वही पिता सिंह बनकर गरजता है, पर इस बार बिखेरने के लिए नहीं, बुलाने के लिए।
प्रश्न
फिर भी एक काँटा बचा रहता है: अश्शूर सचमुच आया। सामरिया 722 ईसा पूर्व में गिरा, तलवार सचमुच चली। तो पद 9 का "मैं फिर एप्रैम को नाश करूँगा नहीं" क्या हुआ? ईमानदार उत्तर यह है कि होशे दंड को रद्द नहीं करता, वह उसे अंतिम होने से रोकता है। अदमा मिटकर इतिहास से गायब हो गया; इस्राएल बिखरा, पर चिड़ियों की तरह लौटने का वादा उसके साथ रहा। यह सस्ता आराम नहीं है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर का प्रेम परिणामों को हटाता नहीं, उन्हें अंतिम शब्द बनने नहीं देता। और हमें यह मानना पड़ता है कि इन दोनों के बीच कैसे संतुलन बनता है, यह पूरी तरह हमारी समझ में नहीं आता।
संदर्भ
होशे आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरी राज्य में बोल रहा है, यारोबाम द्वितीय के समृद्ध दशकों के बाद के अराजक वर्षों में, जब राजा एक के बाद एक मारे जा रहे थे और विदेश नीति दो महाशक्तियों के बीच झूल रही थी। पद 5 इसी का व्यंग्य है: जो मिस्र की ओर मदद के लिए देखते हैं, उन्हें मिस्र नहीं, अश्शूर मिलेगा। "बाल" कोई दूर की अजीब बात नहीं थी, वह खेती, बारिश और उर्वरता का देवता था, यानी रोज़ी-रोटी की बीमा पॉलिसी। इसीलिए पद 3 की भाषा इतनी तीखी है: जिसने सचमुच चंगा किया और खिलाया, उसी को छोड़कर वे उस देवता के पास गए जो देता कुछ नहीं था, केवल माँगता था।
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आपके जीवन में वह कौन सा क्षेत्र है जहाँ आप परमेश्वर को "चंगा करनेवाला" मानते तो हैं, पर व्यवहार में किसी और पर टिके हुए हैं?
यदि परमेश्वर का हृदय आपके लिए "उलट-पुलट" हुआ है, तो इसका असर आपके उन रिश्तों पर क्या होना चाहिए जिनमें आपने क्रोध को अंतिम शब्द बना रखा है?
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Hosea 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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होशे 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
होशे 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hosea 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वे मिस्र से पक्षी के समान, और अश्शूर के देश से कबूतरी के समान थरथराते हुए आएँगे; और मैं उनको उनके घरों में बसा दूँगा।" ध्यान दे, लौटनेवाले काँप रहे हैं। उनके पास न सफाई है, न साहस, बस डरते हुए घर की ओर उड़ना। और परमेश्वर उन्हें डाँटता नहीं, बसा देता है। तेरा काँपता हुआ लौटना भी उसे मंज़ूर है।
पिता, आपने मुझे तब से प्यार किया जब मैं कुछ भी लौटा नहीं सकता था। जैसे आपने अपने बच्चे को गुलामी से बाहर बुलाया, वैसे ही मुझे भी हर उस जगह से निकाल लाइए जो मुझे बाँधती है। मुझे याद रहे कि मैं आपका हूँ, आपकी संतान।
पिता, तूने मुझे डर से नहीं, प्रेम की कोमल डोरी से अपनी ओर खींचा है। जब बोझ मेरी गर्दन पर भारी पड़ा, तूने झुककर उसे हल्का किया और मुझे अपने हाथों से खिलाया। मुझे भागने की नहीं, तेरे पास ठहरने की इच्छा दे। तेरी नरमी मुझे फिर से नया कर दे।
पिता, आपकी आवाज़ सुनकर मेरा मन काँप उठता है, फिर भी वही आवाज़ मुझे घर बुलाती है। मैं दूर भटक गया हूँ, पर आप मुझे भूले नहीं। मुझे सुनने की ताकत दीजिए और आपके पीछे चलने का साहस भी, ताकि मैं लौट आऊँ।
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