संदेह के बीच विश्वास की खोज
संदेह से विश्वास
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए यूहन्ना 1:46, योना 4:7, निर्गमन 32:31-32 and यूहन्ना 20:27.
☀ सुबह का पल
नतनएल ने उससे कहा, “क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है?” फिलिप्पुस ने उससे कहा, “चलकर देख ले।”
यूहन्ना 1:46
नतनएल अंजीर के पेड़ की छाँव में बैठा था, शायद दिन की पहली ठंडी हवा में, जब फिलिप्पुस साँस फुलाए हुए दौड़ता आया, आँखों में एक चमक लिए, एक नाम लेकर जो उसकी पूरी दुनिया बदलने वाला था।
और नतनएल की पहली प्रतिक्रिया एक सवाल थी, लगभग एक ठहाके जैसा, "नासरत?" नासरत उस समय इतना छोटा, इतना भुला हुआ गाँव था कि किसी भी भविष्यवक्ता ने उसका नाम तक नहीं लिया था। वह जगह नक्शे पर मुश्किल से दिखती थी, लोग उसे गिनते भी नहीं थे।
यह सवाल किसी बुरे इरादे से नहीं उठा, बल्कि उस समय की सामान्य सोच से उठा, जहाँ बड़े शहर ही बड़ी बातों के योग्य समझे जाते थे। और फिर भी, परमेश्वर का पुत्र ठीक वहीं से आया, जहाँ से किसी ने कुछ अच्छे की उम्मीद भी नहीं की थी।
शायद आज सुबह तुम्हारे भीतर भी कोई ऐसा ही सवाल है, अपने शहर के बारे में, अपने परिवार के बारे में, अपनी साधारण ज़िंदगी के बारे में, क्या यहाँ से कुछ अच्छा निकल सकता है। फिलिप्पुस ने बहस नहीं की, उसने बस बुलाया, "आओ और देख लो।"
आज
आज किसी एक जगह, नाम या परिस्थिति को लिख लो जिसे तुम भीतर ही भीतर कमतर समझते आए हो, अपना गाँव, अपना काम, अपनी कहानी। उस पर्ची पर फिलिप्पुस के शब्द लिख दो, "आओ और देख लो," और घर से निकलने से पहले इसे एक बार ज़ोर से पढ़ लो।
✦ दोपहर का पल
सवेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्वर ने एक कीड़े को भेजा, जिसने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया।
योना 4:7
रातों रात जिसे बनने में महीनों लगे, वह क्यों बिगड़ जाता है, और वह भी किसी एक छोटी, लगभग अनदेखी चीज़ से?
योना की लता रातों रात उगी थी, छाया देने के लिए, और एक रात में ही एक कीड़े ने उसे कुतर डाला। ध्यान दीजिए, वह कीड़ा अपने आप नहीं आया। पाठ कहता है परमेश्वर ने उसे ठहराया, वही शब्द जो उस बड़ी मछली के लिए इस्तेमाल हुआ था जिसने योना को बचाया। छोटा कीड़ा और बड़ी मछली, दोनों एक ही हाथ के औज़ार थे।
योना उस लता के लिए दुखी हुआ, पर उसी शहर के लिए नहीं जिसमें एक लाख बीस हज़ार लोग थे। एक छोटे कीड़े ने उसका असली प्रेम उघाड़ दिया, आराम से प्रेम, लोगों से नहीं।
दोपहर के इस छोटे से ठहराव में यह सवाल अपने ऊपर ले आइए। आज की कोई छोटी झुंझलाहट, वह सहकर्मी की बात, वह काम जो अटक गया, क्या वह भी कोई कीड़ा है जो किसी छाया को कुतर रहा है जिसे आपने ज़रूरत से ज़्यादा पकड़ रखा था?
आज
भोजन के बाद दो मिनट निकालिए। आज की किसी एक छोटी झुंझलाहट को कागज़ पर नाम दीजिए, और लिखिए कि वह आपके भीतर किस आराम या किस पकड़ को उघाड़ रही है।
◐ दोपहर का पल
तब मूसा यहोवा के पास जाकर कहने लगा, “हाय, हाय, उन लोगों ने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है। तो भी अब तू उनका पाप क्षमा कर नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे।”
निर्गमन 32:31-32
किले की दीवार में जब कोई हिस्सा गिर जाता था, तो रात में कोई न कोई उस खाली जगह में खड़ा होता था। पत्थर की जगह अब एक शरीर होता, हवा सीधी लगती, जंगली जानवर या शत्रु सबसे पहले उसी से टकराते। वह जगह खतरनाक थी, क्योंकि वहाँ खड़ा व्यक्ति बाकी सबके बीच और विनाश के बीच की आखिरी दीवार होता था।
मूसा पहाड़ से नीचे आया, सोने के बछड़े को देखा, और परमेश्वर का क्रोध भड़कता देखा। वह इस्राएल के लिए वही टूटी हुई जगह बन गया। उसने कोई सफाई नहीं दी, पाप को पाप ही कहा। फिर उसने कुछ ऐसा माँगा जो डराता है, अगर क्षमा नहीं तो उसका अपना नाम परमेश्वर की पुस्तक से मिटा दिया जाए। वह दूर खड़े होकर प्रार्थना नहीं कर रहा था, वह खुद उस खाली जगह में खड़ा था।
यह प्रार्थना आसान उत्तर नहीं देती। यह सवाल छोड़ जाती है, क्या मैं कभी किसी के लिए इतना आगे बढ़ूँगा कि खुद को खतरे में डाल दूँ। दोपहर की थकान में यह सवाल और तीखा लगता है, क्योंकि दूरी बनाए रखना आसान है, बीच में खड़ा होना नहीं।
आज
आज किसी एक का नाम कागज़ पर लिखो, जिससे तुम थके हो या जिसके पाप ने तुम्हें चोट दी है, और उस नाम को हाथ में पकड़कर दो मिनट परमेश्वर से उसके लिए माँगो, बिना सफाई दिए, बिना शर्त लगाए।
☾ संध्या का क्षण
तब उसने थोमा से कहा, “अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।”
यूहन्ना 20:27
उंगली हवा में रुक जाती है। कमरे में दीया धीरे जल रहा है, दरवाज़े अब भी बंद हैं, और थोमा का हाथ उस घाव से बस एक सांस दूर है। कोई जल्दी नहीं है। कोई डांट नहीं है।
आठ दिन थोमा ने इंतज़ार किया था। दूसरे चेले कहते रहे, हमने प्रभु को देखा है, पर उसने दूर रहकर कहा, जब तक मैं खुद न देखूं, न छूऊं, मैं नहीं मानूंगा। यह ज़िद नहीं थी, यह दर्द था। जिसे उसने सूली पर खोते देखा था, उसे वह दोबारा नहीं खो सकता था, बिना यकीन के।
और यीशु उसे शर्मिंदा नहीं करते। वे अपने हाथ आगे बढ़ाते हैं, अपने घाव खोलकर दिखाते हैं, मानो कहते हों, आ, यहीं है, देख ले, डर मत। उनका शरीर अब भी निशान लिए खड़ा है, पर वही निशान अब जीवन का प्रमाण बन गए हैं।
आज का दिन भी कुछ निशान छोड़ गया होगा, कोई सवाल जो सुबह से मन में अटका रहा, कोई बात जिस पर यकीन करना कठिन लगा। शाम को वह सब छिपाने की ज़रूरत नहीं। जिसने थोमा के सामने अपने हाथ खोले, वही आज तुम्हारे सामने भी खुला खड़ा है।
आज
अपनी दोनों हथेलियां खोलकर एक मिनट चुप बैठो, आज के दिन की किसी एक उलझन को ज़ोर से नाम लो, फिर धीरे कहो, मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर।
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46नतनएल ने उससे कहा, “क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है?” फिलिप्पुस ने उससे कहा, “चलकर देख ले।”
7सवेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्वर ने एक कीड़े को भेजा, जिसने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया।
31तब मूसा यहोवा के पास जाकर कहने लगा, “हाय, हाय, उन लोगों ने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है।
32तो भी अब तू उनका पाप क्षमा कर नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे।”
27तब उसने थोमा से कहा, “अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।”
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