परमेश्वर के सामने झुककर धन्यवाद
विनम्रता और आभार
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए निर्गमन 20:10, लूका 18:14, लूका 17:15-16 and लूका 1:22.
☀ सुबह का पल
परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो।
निर्गमन 20:10
काम की दुनिया एक बात मान कर चलती है: जिसकी कीमत है, वह काम करता रहे, जो बैठ गया, वह बेकार हो गया। नौकर की कीमत उसके काम में है, बैल की कीमत उसके खींचने में। पर यह आज्ञा इस हिसाब को तोड़ देती है।
यह आज्ञा सिर्फ परिवार के मुखिया के लिए नहीं है। इसमें बेटा है, बेटी है, दास है, दासी है, और वह पशु भी जो हल खींचता है। जिसे कोई हुक्म नहीं दे सकता, उसे भी विश्राम का हक दिया गया। मिस्र में जहाँ से ये लोग निकले थे, वहाँ दास को आराम माँगने का कोई अधिकार नहीं था। अब परमेश्वर खुद उसके लिए आवाज़ उठाता है।
यह एक ऐसे परमेश्वर की तस्वीर है जो नीचे खड़े व्यक्ति को भूलता नहीं। जो मालिक और नौकर दोनों से कहता है, तुम दोनों की साँस कीमती है, सिर्फ उसकी नहीं जो हुक्म देता है।
आज सुबह जब काम की सूची लंबी लगे, याद रखो कि तुम्हारा मोल तुम्हारे आउटपुट से नहीं नापा जाता। और यह भी याद रखो कि जो तुम्हारे नीचे काम करता है, उसका मोल भी वैसे ही नहीं नापा जाता।
आज
आज किसी एक व्यक्ति को सोचो जो तुम्हारे लिए काम करता है, घर में सहायक, दफ़्तर में जूनियर, दुकान वाला। उसे आज कोई ऐसा काम मत सौंपो जो रुक सकता है, और उससे कहो, आज आराम से काम करना।
✦ दोपहर का पल
मैं तुम से कहता हूँ, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्यधर्मी ठहराऔर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आपको बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आपको छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।”
लूका 18:14
धर्मी ठहरा। यह वह शब्द है जिस पर पूरी कहानी टिकी है, और जिस पर हम अक्सर से नज़र फिसला देते हैं। हम सोचते हैं कहानी प्रार्थना के बारे में है, पर असल में यह फैसले के बारे में है, कि मंदिर से निकलते समय परमेश्वर की नज़र में कौन सही ठहरा।
जो ब्यौरा अक्सर छूट जाता है, वह यह है कि फरीसी अकेला खड़ा हुआ था। वह भीड़ से हटकर, अपने लिए जगह बनाकर खड़ा हुआ, मानो उसकी भलाई को किसी और की निकटता से कोई खतरा हो। उसकी प्रार्थना सूची थी, उपवास, दशमांश, तुलना। चुंगी लेने वाला दूर खड़ा रहा, पर उसकी प्रार्थना एक वाक्य से ज़्यादा नहीं थी।
कहानी यहीं मुड़ती है, कि जो आदमी अपनी भलाई गिनकर घर गया, वह वैसे ही गया जैसे आया था। जो खाली हाथ आया था, वह धर्मी ठहरकर गया। परमेश्वर ने सूची नहीं, ईमानदारी तौली।
दोपहर के इस छोटे से ठहराव में यह सवाल आसान नहीं है। काम की दुनिया में हम दिन भर अपनी उपलब्धियाँ गिनते हैं, अपनी तुलना औरों से करते हैं, और बिना जाने अपने लिए एक अलग कोना बना लेते हैं जहाँ हम भीड़ से ऊपर खड़े महसूस करें। यह कहानी वहीं से बुलाती है, भीड़ में वापस, हाथ खाली करके।
आज
आज खाना खाने से पहले एक मिनट चुपचाप बैठें और धीरे से कहें, परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर। किसी सूची के बिना, किसी तुलना के बिना, बस यही एक वाक्य।
◐ दोपहर का पल
तब उनमें से एक यह देखकर कि मैं चंगा हो गया हूँ, ऊँचे शब्द से परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ लौटा; और यीशु के पाँवों पर मुँह के बल गिरकर उसका धन्यवाद करने लगा; और वह सामरी था।
लूका 17:15-16
वह दसवां आदमी दोहरे अर्थ में बाहरी था, कोढ़ी भी और सामरी भी। नौ दूसरे साथ चल रहे थे, जैसे यीशु ने कहा था, याजकों के पास जा रहे थे, क्योंकि यही व्यवस्था थी, कुष्ठ ठीक होने की घोषणा याजक ही कर सकता था। वे ठीक वही कर रहे थे जो कहा गया था। और शायद इसीलिए नहीं रुके।
सामरी के लिए यह याजक के पास जाना वैसे भी खाली रस्म थी, उसे वहां से कोई पूरी बहाली नहीं मिलनी थी। शायद इसीलिए वह रुक सका, मुड़ सका, और उसने जो देखा उसका सामना किया, अपनी त्वचा साफ हो चुकी थी, लेकिन वह जिसने यह किया वह अभी सामने ही था।
नौ को शरीर मिला। एक को देनेवाला मिला। यही फर्क कहानी में सबसे तीखा है, व्यवस्था का पालन और भेंट देनेवाले की ओर मुड़ना एक ही बात नहीं है।
आज भी कोई चीज़ ठीक हो सकती है, काम बन सकता है, कोई उलझन सुलझ सकती है, और हम सीधे अगले काम की ओर चल पड़ते हैं, बिना मुड़े, बिना रुके।
आज
अभी जो एक चीज़ आज ठीक हुई है, चाहे छोटी ही क्यों न लगे, उसे ज़ोर से बोलकर कहो, ऊंचे शब्द से, जैसे उस सामरी ने किया, भले ही कोई सुनता न हो।
☾ संध्या का क्षण
जब वह बाहर आया, तो उनसे बोल न सका अतः वे जान गए, कि उसने मन्दिर में कोई दर्शन पाया है; और वह उनसे संकेत करता रहा, और गूँगा रह गया।
लूका 1:22
ज़कर्याह की चुप्पी सज़ा नहीं थी, वह एक जगह थी जहाँ परमेश्वर का वचन उसके भीतर जड़ पकड़ सके।
वह एक याजक था, बरसों से मन्दिर में सेवा करता आया था। उस दिन उसकी बारी थी धूप जलाने की, एक ऐसा काम जो हर याजक को जीवन में शायद एक ही बार मिलता था। बाहर लोग उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, वैसा ही आशीष सुनने के लिए जो वह सैकड़ों बार दे चुका था। पर उस दिन भीतर कुछ और हुआ। गबरीएल ने उसे बताया कि उसकी प्रार्थना सुनी गई है, पर जब उसने शंका की, तो उसकी आवाज़ छीन ली गई।
जो आशीष बोलता था, वह अब कुछ बोल न सका। महीनों तक उसने अपने घर में, अपने परिवार में केवल हाथों से बातें की। जिस ज़बान से वह दूसरों को शब्द देता था, वह अब उसकी अपनी समझ से भी बड़ी बात के सामने गूँगी पड़ गई।
पर यही चुप्पी वह जगह बनी जहाँ वचन पक गया। जब बेटे का नाम लिखने का समय आया, उसने लिखा, यूहन्ना, और तभी उसकी ज़बान खुली, आशीष के गीत में।
आज की शाम में भी कुछ ऐसा हो सकता है जिसे तुम अभी शब्दों में नहीं बाँध पा रहे, कोई उलझन, कोई अनकहा डर, कोई प्रार्थना जिसका उत्तर अभी साफ नहीं है। उसे ज़बरदस्ती शब्द देने की ज़रूरत नहीं।
आज
एक कागज़ पर वह बात लिख दो जिसे तुम अभी कह नहीं पा रहे, उसे मोड़कर अपनी बाइबल के बीच रख दो, और कुछ क्षण चुपचाप बैठकर उसे परमेश्वर को सौंप दो।
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10परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो।
14मैं तुम से कहता हूँ, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्यधर्मी ठहराऔर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आपको बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आपको छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।”
15तब उनमें से एक यह देखकर कि मैं चंगा हो गया हूँ, ऊँचे शब्द से परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ लौटा;
16और यीशु के पाँवों पर मुँह के बल गिरकर उसका धन्यवाद करने लगा; और वह सामरी था।
22जब वह बाहर आया, तो उनसे बोल न सका अतः वे जान गए, कि उसने मन्दिर में कोई दर्शन पाया है; और वह उनसे संकेत करता रहा, और गूँगा रह गया।
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