भुलाए जाने पर भी वह भला है
उसकी अटूट भलाई
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए एज्रा 3:11, उत्पत्ति 40:23, 2 तीमुथियुस 4:6-7 and उत्पत्ति 28:16-17.
☀ सुबह का पल
सो वे यह गा गाकर यहोवा की स्तुति और धन्यवाद करने लगे, “वह भला है, और उसकी करुणा इस्राएल पर सदैव बनी है।” और जब वे यहोवा की स्तुति करने लगे तब सब लोगों ने यह जानकर कि यहोवा के भवन की नींव अब पड़ रही है, ऊँचे शब्द से जयजयकार किया।
एज्रा 3:11
ध्यान दीजिए कि वे कैसे गाते हैं, एक दूसरे के साथ। यह कोई अकेला गायक नहीं था जो भीड़ के सामने गा रहा था। यह बारी-बारी से गाया गया भजन था, एक पक्ष बोलता, दूसरा उत्तर देता। बरसों तक बिखरे हुए लोग अब फिर से एक दूसरे के साथ सुर मिला रहे थे।
इससे पहले क्या था? सत्तर साल की बंधुआई, एक गिरा हुआ मंदिर, एक शहर जिसकी दीवारें टूटी पड़ी थीं। लोग लौटे तो सबसे पहले उन्होंने वेदी बनाई, बलिदान चढ़ाने के लिए, डर के बावजूद कि आसपास की जातियाँ क्या करेंगी। फिर दूसरे महीने में, नींव के पत्थर रखे गए।
यही मोड़ था। याजक वस्त्र पहनकर तुरहियाँ बजा रहे थे, लेवीय झाँझ लेकर वही भजन गा रहे थे जो सुलैमान के समय गाया गया था, यहोवा अच्छा है, उसकी करुणा सदा की है। खंडहरों पर फिर वही आराधना गूँज उठी जो पहले मंदिर में गूँजी थी। टूटने के बाद भी गीत वही निकला।
उसी समय कुछ बूढ़े, जिन्होंने पहला मंदिर अपनी आँखों से देखा था, रो पड़े, क्योंकि यह उससे छोटा था। और जवान खुशी से चिल्लाए। दोनों आवाज़ें सच्ची थीं, और दोनों एक साथ उठीं। नया आरंभ पुराने दुख को मिटाता नहीं, वह उसके साथ खड़ा होता है।
आज सुबह अगर आपके भीतर कुछ गिरा हुआ पड़ा है, कोई रिश्ता, कोई योजना, कोई सपना, तो ध्यान रखिए कि नींव का पत्थर पूरा मंदिर नहीं होता, पर उसके बिना मंदिर कभी नहीं बनता। आज रखा गया छोटा पत्थर कल की इबादत बन सकता है।
आज
आज किसी एक काम को, जो आप टालते आ रहे हैं, पहला कदम भर उठाइए, सिर्फ पहला ईंट रखिए, बाकी बाद में। उसे शुरू करके लिख दीजिए या किसी को बता दीजिए कि आपने शुरुआत कर दी है।
✦ दोपहर का पल
फिर भी पिलानेहारों के प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा; परन्तु उसे भूल गया।
उत्पत्ति 40:23
दुनिया मानती है कि अगर तुमने किसी बड़े आदमी का सही समय पर भला किया है, तो वह तुम्हें याद रखेगा, कि एहसान का बदला चुकता होता ही है। यूसुफ ने भी यही उम्मीद की थी।
कारागार में उसके साथ दो बंदी पड़े थे, राजा का पिलाने वाला और रोटी पकाने वाला। दोनों को एक ही रात स्वप्न आए, और यूसुफ ने उनका अर्थ खोल दिया, ठीक वैसा ही जैसा निकला। जाते समय यूसुफ ने बस इतना कहा कि मुझे याद रखना, मुझे यहाँ से निकलवा देना।
लेकिन पिलाने वाला भूल गया। दो पूरे साल यूसुफ कारागार में पड़ा रहा, भुलाया हुआ, किसी की फाइल में दबा हुआ नाम। उसका सही काम, उसकी ईमानदार मदद, किसी याद में नहीं बदली। यह उसे सिखाया होगा कि इंसान का धन्यवाद अक्सर उतना ही ठोस होता है जितना हवा।
आज भी वैसा ही होता है। मेहनत से किया गया काम बिना किसी नोटिस के निकल जाता है, मदद भुला दी जाती है, श्रेय कोई और ले जाता है। यह शब्द तुम्हें झूठी तसल्ली नहीं देता, सच बताता है, लोग भूल जाते हैं, यह असामान्य नहीं। पर यूसुफ की पूरी कहानी बाद में यह भी दिखाती है कि परमेश्वर की स्मृति से कोई दिन छूटता नहीं।
आज
आज दोपहर के भोजन के समय, एक काम याद करो जिसका किसी ने धन्यवाद नहीं दिया, और उसे बिना शिकायत के ज़ोर से परमेश्वर के सामने बोल दो।
◐ दोपहर का पल
क्योंकि अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे संसार से जाने का समय आ पहुँचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है।
2 तीमुथियुस 4:6-7
रोम की किसी नम, अंधेरी कोठरी में एक बूढ़ा आदमी बैठा है, जंजीरों में, जानता हुआ कि अगली सुनवाई शायद आखिरी होगी। यही पौलुस है, जो तीमुथियुस को यह पत्र लिख रहा है।
जिस शब्द का अनुवाद 'being offered' किया गया है, वह मंदिर की भाषा से आता है, उस पेय-बलि के लिए जो यज्ञ के ऊपर उंडेल दी जाती थी, आखिरी हिस्सा, जो बलि को पूरा करता था। पौलुस अपने मरने को ऐसे ही देखता है, उंडेला जा रहा हूँ, बलि के अंत में।
'अच्छी लड़ाई' और 'दौड़ पूरी की' भी सेना के नहीं बल्कि खेल के मैदान के शब्द हैं, उस समय के खिलाड़ी की भाषा जो थककर, लंगड़ाते हुए, फिर भी अंतिम रेखा तक पहुँचा। और याद रखें, इस अध्याय में वह यह भी लिखता है कि बाकी सब उसे छोड़ गए, कि ठंड में उसे अपनी चादर की ज़रूरत है। यह कोई जयघोष नहीं, यह अकेलेपन में कहा गया वाक्य है।
यहाँ कुछ चुभता है, क्योंकि अक्सर हम मान लेते हैं कि विश्वासयोग्यता का अंत तालियों में होगा। पौलुस के लिए यह ठंडी कोठरी और छोड़े जाने में हुआ। क्या आज की आपकी थकी हुई, अधूरी, अनदेखी लड़ाई भी इस नाम के लायक है, 'अच्छी लड़ाई'?
आज
एक कागज़ पर उस संघर्ष का नाम लिखिए जिसे आप आज ढो रहे हैं, काम का, रिश्ते का, स्वास्थ्य का, जो कुछ भी हो। उसे अपनी मेज़ पर रख दीजिए जहाँ आज शाम तक आपकी नज़र उस पर पड़े।
☾ संध्या का क्षण
तब याकूब जाग उठा, और कहने लगा, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को न जानता था।” और भय खाकर उसने कहा, “यह स्थान क्या ही भयानक है! यह तो परमेश्वर के भवन को छोड़ और कुछ नहीं हो सकता; वरन् यह स्वर्ग का फाटक ही होगा।”
उत्पत्ति 28:16-17
एक पत्थर तकिया बना, और वही रात याकूब की ज़िन्दगी की सबसे पवित्र रात निकली।
लूज़ कोई मंदिर वाला शहर नहीं था। न वेदी, न पुजारी, बस खुला मैदान, धूल और ऊपर तारों भरा आसमान। याकूब अपने भाई से डरकर भाग रहा था, अकेला, थका हुआ, दोषी मन लिए। रात होते ही उसने ज़मीन से एक पत्थर उठाया, उसे सिर के नीचे रखा और लेट गया। यही उसकी शाम की तैयारी थी, कोई प्रार्थना नहीं, बस थकान।
नींद में उसने एक सीढ़ी देखी जो धरती से आकाश तक पहुँचती थी, उस पर स्वर्गदूत ऊपर नीचे आ-जा रहे थे, और ऊपर यहोवा खड़ा होकर उससे प्रतिज्ञा कर रहा था। जागते ही याकूब ने जो कहा, वही ऊपर लिखा है, वह जगह पवित्र थी, और उसे पता ही नहीं था।
सुबह याकूब ने वही पत्थर उठाया, उसे खड़ा करके उस पर तेल डाला और उस जगह का नाम लूज़ से बदलकर बेतेल, यानी परमेश्वर का घर रख दिया। एक साधारण पत्थर स्मारक बन गया, क्योंकि कुछ वहाँ हुआ था।
तुम्हारा कमरा, तुम्हारा बिस्तर, आज की यह साधारी जगह भी बेतेल हो सकती है, भले ही पूरे दिन तुम्हें इसका एहसास न हुआ हो। शाम इसी को पहचानने का समय है।
आज
सोने से पहले अपने आसपास से कोई छोटी चीज़ उठाओ, एक पत्थर, चाबी या सिक्का, और उसे अपने तकिए के पास रख दो। उसे देखकर धीरे से कहो, "यहोवा यहाँ है," फिर चैन से सो जाओ।
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11सो वे यह गा गाकर यहोवा की स्तुति और धन्यवाद करने लगे, “वह भला है, और उसकी करुणा इस्राएल पर सदैव बनी है।” और जब वे यहोवा की स्तुति करने लगे तब सब लोगों ने यह जानकर कि यहोवा के भवन की नींव अब पड़ रही है, ऊँचे शब्द से जयजयकार किया।
23फिर भी पिलानेहारों के प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा; परन्तु उसे भूल गया।
6क्योंकि अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे संसार से जाने का समय आ पहुँचा है।
7मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है।
16तब याकूब जाग उठा, और कहने लगा, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को न जानता था।”
17और भय खाकर उसने कहा, “यह स्थान क्या ही भयानक है! यह तो परमेश्वर के भवन को छोड़ और कुछ नहीं हो सकता; वरन् यह स्वर्ग का फाटक ही होगा।”
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