अय्यूब की पुस्तक: दुःख में विश्वास की परीक्षा
परिचय
रात के दो बजे अस्पताल का गलियारा बहुत लंबा लगता है। एक पिता वहाँ बेंच पर बैठा है, हाथों में एक कागज़ है जिस पर डॉक्टर ने कुछ लिखा है, और उसके भीतर एक ही वाक्य घूम रहा है: "मैंने तो सब कुछ ठीक किया था।" वह चर्च जाता था, दसवाँ देता था, किसी का बुरा नहीं चाहता था। और फिर भी।
बाइबल में एक पूरी पुस्तक ऐसे ही गलियारे में बैठी है। अय्यूब की पुस्तक उस आदमी की कहानी है जिसके बारे में परमेश्वर स्वयं गवाही देते हैं कि वह खरा और सीधा है, और जिसकी दुनिया एक ही दिन में ढह जाती है। यह पुस्तक धर्मशास्त्र की सबसे ईमानदार किताब है, क्योंकि यह दर्द को सजाती नहीं।
इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पुस्तक कब और किस परिस्थिति में लिखी गई, कैसे गढ़ी गई है, इसके मुख्य विषय और पद क्या हैं, यह पूरी बाइबल में कहाँ फिट होती है, और सबसे महत्वपूर्ण बात: यह आपके अपने गलियारे में क्या कहती है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अय्यूब की पुस्तक को आम तौर पर "दुःख के प्रश्न का उत्तर" के रूप में पढ़ा जाता है। मगर एक चौंकाने वाली सच्चाई है: परमेश्वर अय्यूब के "क्यों" का उत्तर एक बार भी नहीं देते। न आकाश से कोई स्पष्टीकरण आता है, न स्वर्ग के दरबार का ब्यौरा अय्यूब को बताया जाता है। इसके बजाय परमेश्वर स्वयं आते हैं, और अय्यूब तृप्त हो जाता है।
इसलिए हम इस पुस्तक को इस कोण से पढ़ेंगे: दुःख का उत्तर एक तर्क नहीं, एक व्यक्ति है। अय्यूब को व्याख्या नहीं, उपस्थिति मिली; सिद्धांत नहीं, दर्शन मिला। और यही रेखा सीधे उस क्रूस तक जाती है जहाँ परमेश्वर ने दुःख के बारे में बोलने के बजाय दुःख में उतरना चुना।
बाइबल अय्यूब की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?
पुस्तक की शुरुआत बहुत शांत है। ऊज़ देश में अय्यूब नाम का एक व्यक्ति रहता था, धनी, बड़े परिवार वाला, और परमेश्वर के सामने खरा। वह अपने बच्चों के लिए नियमित बलिदान चढ़ाता था, इस डर से कि कहीं उन्होंने मन में परमेश्वर की निन्दा न की हो। यह आदमी धर्म का दिखावा नहीं कर रहा था; वह वास्तव में परमेश्वर से डरता था।
फिर पर्दा उठता है और हमें कुछ ऐसा दिखाया जाता है जो अय्यूब को कभी नहीं दिखाया गया: स्वर्ग का दरबार। शैतान एक प्रश्न उठाता है जो पूरी पुस्तक का असली विषय है। वह यह नहीं पूछता, "क्या दुःख उचित है?" वह पूछता है, "क्या अय्यूब बिना कारण परमेश्वर का भय मानता है?" अर्थात: क्या कोई मनुष्य परमेश्वर से इसलिए प्रेम कर सकता है कि वे परमेश्वर हैं, न कि इसलिए कि उनसे कुछ मिलता है? क्या आशीषें हटा दी जाएँ तो भक्ति बची रहेगी?
एक ही दिन में अय्यूब के पशु, नौकर और दसों बच्चे चले जाते हैं। और तब वह वाक्य आता है जो सदियों से मातम के घरों में दोहराया जाता है। अय्यूब 1:21 कहता है: "मैं अपनी माँ के गर्भ से नंगा निकला और नंगा ही लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य हो।"
ध्यान दें, यह वाक्य कठोर वैराग्य नहीं है। अय्यूब ने कपड़े फाड़े, सिर मुँड़ाया, धरती पर गिरा। वह टूटा हुआ है। मगर उसका टूटना उसे परमेश्वर से दूर नहीं, परमेश्वर के चरणों की ओर ले जाता है। वह अपनी संपत्ति को अधिकार नहीं, अमानत मानता है।
दूसरा प्रहार उसके शरीर पर होता है। सिर से पैर तक फोड़े, राख पर बैठा हुआ, ठीकरे से खुजाता हुआ। उसकी पत्नी, जो स्वयं दसों बच्चे खो चुकी है, कहती है कि परमेश्वर की निन्दा कर और मर जा। अय्यूब का उत्तर अय्यूब 2:10 में है: "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख भी न लें?"
यह पुस्तक की पहली बड़ी शिक्षा है। सच्चा विश्वास परमेश्वर के हाथ से केवल मिठाई चुनकर नहीं खाता। परन्तु यहाँ रुककर यह भी देखना ज़रूरी है कि अय्यूब यह कहकर चुप नहीं हो जाता। अध्याय तीन में वह अपने जन्मदिन को शाप देता है। जो व्यक्ति अध्याय दो में इतनी सुन्दर बात कहता है, वही अध्याय तीन में चाहता है कि वह कभी पैदा ही न हुआ होता। बाइबल इन दोनों को साथ रखती है, और यह हमारे लिए बड़ी राहत है: समर्पण और चीख एक ही हृदय में रह सकती हैं।
अगले उनतीस अध्यायों में तीन मित्र आते हैं। पहले सात दिन वे चुप बैठे रहते हैं, और वही उनकी सबसे अच्छी सेवा है। जैसे ही वे बोलना शुरू करते हैं, वे एक ऐसा गणित थोपने लगते हैं जिसे बाद में परमेश्वर स्वयं गलत ठहराते हैं: दुःख पाप का सीधा दंड है, इसलिए अय्यूब ने कुछ किया होगा। उनकी बातों में कई पंक्तियाँ सुनने में बिल्कुल सही लगती हैं, कुछ को तो नया नियम भी उद्धृत करता है, फिर भी उनका पूरा ढाँचा झूठा है, क्योंकि वे परमेश्वर के नाम पर एक निर्दोष व्यक्ति की पीठ पर बोझ रख रहे हैं।
और अय्यूब? वह अपने दोस्तों से बहस करते हुए भी असल में परमेश्वर से बात करना चाहता है। अय्यूब 13:15 में उसका दिल फूट पड़ता है: "देखो, वह मुझे घात करेगा, तौभी मैं उसकी बाट जोहता रहूँगा; तौभी मैं उसके सामने अपने चालचलन का पक्ष लूँगा।"
यह पुस्तक का धड़कता हुआ केंद्र है। अय्यूब परमेश्वर से लड़ रहा है, परमेश्वर के ही सामने, परमेश्वर की ही ओर। उसने आस्था और शिकायत के बीच चुनाव नहीं किया; उसने दोनों को एक साथ परमेश्वर के हाथों में डाल दिया।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
अय्यूब बाइबल का अकेला टापू नहीं है। पुराने नियम में उसे ज्ञान-साहित्य के बीच रखा गया है, नीतिवचन और सभोपदेशक के साथ। नीतिवचन जीवन के नियम सिखाता है: परिश्रम से समृद्धि, आलस्य से गरीबी। अय्यूब उस पुस्तक की तरह खड़ा है जो कहती है कि नियम सच हैं, मगर वे परमेश्वर पर लागू होने वाला फार्मूला नहीं हैं। अय्यूब के बिना ज्ञान-साहित्य एक कठोर लेन-देन बन जाता, और उसके मित्र उसी लेन-देन के पुजारी हैं।
भजन संहिता में विलाप के भजन वही स्वर उठाते हैं जो अय्यूब उठाता है, और भजन 73 उसी संकट से जूझता है: दुष्ट फल-फूल रहे हैं और भक्त कुचला जा रहा है। यिर्मयाह अध्याय बीस में भविष्यद्वक्ता अपने जन्मदिन को शाप देता है, ठीक जैसे अय्यूब अध्याय तीन में। यहेजकेल 14:14 में परमेश्वर नूह, दानिय्येल और अय्यूब को धार्मिकता के तीन आदर्श के रूप में एक साँस में नाम लेते हैं, जिससे पता चलता है कि इस्राएल में अय्यूब एक जानी-पहचानी, वास्तविक हस्ती था।
लेकिन असली सूत्र वहाँ खिंचता है जहाँ अय्यूब खुद इशारा करता है। अध्याय नौ में वह तड़पकर कहता है कि उसके और परमेश्वर के बीच कोई बिचवई नहीं है, कोई नहीं जो दोनों पर हाथ रख सके। अध्याय सोलह में वह कहता है कि उसका साक्षी स्वर्ग में है। और अय्यूब 19:25 में वह आशा की सबसे ऊँची चोटी पर चढ़ जाता है: "मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।"
राख पर बैठा एक कोढ़ी आदमी उस व्यक्ति की माँग कर रहा है जो अभी आया नहीं है। और वह व्यक्ति आया। यीशु मसीह ठीक वही बिचवई हैं जिसे अय्यूब ढूँढ़ रहा था, वही छुड़ानेवाला जो अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा। यहाँ हमारा दृष्टिकोण फिर सामने आता है: अय्यूब की पुकार किसी सिद्धांत के लिए नहीं थी, किसी के लिए थी।
नया नियम अय्यूब को दो तरह से उठाता है। एक, याकूब 5:11 हमें उसके धीरज की याद दिलाता है और साथ ही "प्रभु के अन्त" की, अर्थात इस बात की कि प्रभु बहुत दयालु और कृपालु हैं। दो, 1 कुरिन्थियों 3:19 में पौलुस अय्यूब 5:13 को उद्धृत करता है कि परमेश्वर बुद्धिमानों को उनकी ही चतुराई में फँसा देते हैं, यह दिखाते हुए कि मानव बुद्धि का घमंड परमेश्वर के सामने टिकता नहीं।
और सबसे गहरी कड़ी यह है कि सुसमाचारों में एक निर्दोष व्यक्ति फिर पीड़ित होता है, इस बार पूर्ण रूप से निर्दोष। यीशु मसीह पर भी उन्हीं मित्रों जैसे लोगों ने आरोप लगाए कि वे परमेश्वर से मारे गए हैं। मगर गतसमनी में जो प्रश्न अय्यूब ने पूछा था, वहाँ परमेश्वर के पुत्र ने पूछा, और उत्तर देने के बजाय पिता ने उन्हें उठा लिया। रोमियों 8:18 में पौलुस उसी तराजू को हमारे हाथ में देता है: "क्योंकि मैं समझता हूँ, कि इस समय के दु:ख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं।"
अय्यूब की पुस्तक प्रश्न खुला छोड़ती है; क्रूस और पुनरुत्थान उस खुले प्रश्न में परमेश्वर का चेहरा रख देते हैं।
रचना और मुख्य विषय
पुस्तक की बनावट अपने आप में एक उपदेश है। बाहरी ढाँचा गद्य में है और भीतर का विशाल हिस्सा काव्य में। अध्याय एक और दो गद्य की प्रस्तावना हैं, जहाँ हमें स्वर्ग के दरबार का दृश्य मिलता है। अध्याय बयालीस का उत्तरार्ध गद्य का उपसंहार है। इन दोनों के बीच, अध्याय तीन से बयालीस के आरंभ तक, हिब्रू भाषा की सबसे शक्तिशाली और सबसे कठिन कविता फैली हुई है।
बीच का हिस्सा तीन बड़े खंडों में बँटा है। पहला खंड अध्याय तीन से इकतीस तक है: तीन चक्रों में एलीपज, बिलदद और सोपर बोलते हैं और अय्यूब हर बार उत्तर देता है। चक्र आगे बढ़ते हैं तो मित्रों की भाषा कठोर होती जाती है और अय्यूब की भाषा साहसी। अध्याय अट्ठाईस एक अलग सा रत्न है, ज्ञान पर एक कविता जो पूछती है कि बुद्धि कहाँ मिलेगी, और उत्तर देती है कि खानों में हीरा मिल सकता है, बुद्धि नहीं; वह केवल परमेश्वर के पास है। अध्याय उनतीस से इकतीस में अय्यूब अपनी अंतिम पैरवी करता है और अपने चालचलन का लंबा लेखा-जोखा देता है।
दूसरा खंड अध्याय बत्तीस से सैंतीस है, जहाँ एलीहू नाम का एक जवान अचानक बोलता है। वह पुराने तीनों से इस बात में भिन्न है कि वह अय्यूब पर किसी विशेष पाप का आरोप गिनाने के बजाय परमेश्वर की महानता और शिक्षा देने वाले दुःख की बात करता है। वह परमेश्वर के आने का जैसे मंच तैयार करता है, तूफ़ान और बादलों का वर्णन करते हुए।
तीसरा खंड अध्याय अड़तीस से इकतालीस है, और यहीं पुस्तक पलट जाती है। यहोवा आँधी में से बोलते हैं। और वे क्या कहते हैं? अय्यूब 38:4 में उनका पहला वाक्य एक प्रतिप्रश्न है: "जब मैं ने पृथ्वी की नींव डाली, तब तू कहाँ था? यदि तू समझदार हो तो उत्तर दे।"
इसके बाद अध्यायों तक जंगली बकरियाँ, बर्फ़ के भंडार, समुद्र की सीमा, शुतुरमुर्ग, घोड़ा, बाज़, बहमोत और लिव्यातान का वर्णन चलता है। इस पूरे भाषण में शैतान का ज़िक्र एक बार भी नहीं आता, अय्यूब के दुःख का कारण एक बार भी नहीं बताया जाता, और मित्रों के आरोपों का बिन्दुवार खंडन भी नहीं होता। परमेश्वर अय्यूब को अपने ब्रह्मांड में घुमाते हैं और कहते हैं, देखो, मैं जो चला रहा हूँ वह तुम्हारी समझ से बड़ा है, और उसका एक कोना भी लापरवाही से नहीं चलता।
परमेश्वर ने व्याख्या नहीं दी, उन्होंने अपना चेहरा दिया।
और चमत्कार यह है कि अय्यूब संतुष्ट हो जाता है। अध्याय बयालीस में वह कहता है कि उसने पहले परमेश्वर का समाचार कान से सुना था, परन्तु अब उसकी आँखें उन्हें देखती हैं। उत्तर मिला नहीं, फिर भी शिकायत खत्म हो गई। यही इस पुस्तक की रचना का संदेश है: प्रस्तावना में हमें कारण दिखाया जाता है, अय्यूब को नहीं; और अय्यूब बिना कारण जाने भी विश्राम पा जाता है, क्योंकि उसे कारण से बड़ी चीज़ मिल गई।
उपसंहार में परमेश्वर मित्रों से नाराज़ होते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अय्यूब की तरह ठीक बात नहीं कही। यह चौंकाने वाला है: वह आदमी जो चिल्लाया, झगड़ा, सवाल किए, वह ठीक बोलने वाला ठहरा; और वे लोग जिन्होंने सुरक्षित धर्मशास्त्र बोला, दोषी ठहरे। परमेश्वर ईमानदार संघर्ष को सजी हुई धार्मिकता से अधिक पसंद करते हैं।
इस पुस्तक के मुख्य पद
अय्यूब 1:21 पुस्तक का पहला स्तंभ है: "मैं अपनी माँ के गर्भ से नंगा निकला और नंगा ही लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य हो।" यह पद हमें सिखाता है कि विश्वास की जड़ आशीषों में नहीं, देने वाले में होती है। अय्यूब अपने बच्चों को "मेरा अधिकार" नहीं कहता, और अपनी संपत्ति को "मेरी कमाई" नहीं। वह जन्म और मृत्यु के बीच खुद को एक खाली हाथ आए और खाली हाथ जाने वाले मेहमान के रूप में देखता है, जिसे बीच के वर्षों में जो कुछ मिला, वह उपहार था। यहाँ शोक इनकार में नहीं बदलता; अय्यूब रोते हुए आराधना करता है। यह पद अंत्येष्टि में इसलिए पढ़ा जाता है कि यह दर्द को झूठा दिलासा नहीं देता, बल्कि दर्द को परमेश्वर के नाम के नीचे रख देता है।
अय्यूब 2:10 दूसरा स्तंभ है: "क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख भी न लें?" यह वाक्य उस सौदेबाज़ी का अंत कर देता है जिसमें हम अनजाने जीते हैं, जहाँ हम मानते हैं कि आराधना का बदला आराम है। अय्यूब कहता है कि परमेश्वर का हाथ एक ही है, चाहे उसमें से मिठाई आए या कड़वाहट। यह उदासीनता नहीं, भरोसा है: वह हाथ जिसने दिया, बुरा नहीं हो सकता, चाहे आज जो दे रहा है वह समझ में न आए। ध्यान रखें, पद के अंत में लिखा है कि इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया, और उसके बाद अध्याय तीन का भयानक विलाप आता है। इसका अर्थ यह है कि विलाप पाप नहीं है।
अय्यूब 19:25 तीसरा और सबसे ऊँचा स्तंभ है: "मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।" जिस हिब्रू शब्द का अनुवाद "छुड़ानेवाला" है, वह उस निकट संबंधी के लिए इस्तेमाल होता था जो अपने परिवार का कर्ज़ चुकाकर, ज़मीन छुड़ाकर, न्याय दिलाकर उसका सम्मान बहाल करता था। अय्यूब के पास इस पृथ्वी पर कोई वकील नहीं बचा; उसकी सेहत, संतान, संपत्ति और नाम सब चले गए। और तभी वह घोषणा करता है कि उसका छुड़ानेवाला जीवित है और अंत में खड़ा होगा। यह पूरे पुराने नियम की सबसे साहसी पंक्तियों में से एक है, क्योंकि यह मलबे के ऊपर बोली गई है।
और यहाँ हमारा दृष्टिकोण अपनी सबसे साफ़ शक्ल में दिखता है। अय्यूब ने अंत में एक सिद्धांत नहीं पकड़ा, एक व्यक्ति पकड़ा। वह "मेरा" कहता है, "एक" नहीं। उसका सहारा जानकारी नहीं, रिश्ता था। नया नियम उस व्यक्ति का नाम बता देता है, और रोमियों 8:18 उस "अन्त" को महिमा के तराजू पर तोल देता है।
पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
अय्यूब की पुस्तक शुरू से आखिर तक एक बैठक में पढ़ने की किताब नहीं है, और यही कारण है कि बहुत लोग अध्याय दस के आसपास हार मान लेते हैं। एक बेहतर रास्ता है।
पहले सप्ताह में केवल अध्याय एक, दो और तीन पढ़िए, और इन्हें धीरे पढ़िए। यहाँ पूरी पुस्तक का नक्शा है: स्वर्ग का दृश्य, दो प्रहार, अय्यूब की आराधना, और फिर उसका विलाप। लिखकर रखिए कि प्रस्तावना में हमें क्या पता चलता है जो अय्यूब को कभी नहीं बताया जाता। यह एक अंतर पूरी पुस्तक की चाबी है।
दूसरे सप्ताह में अध्याय चार से चौदह पढ़िए, पहला संवाद चक्र, और पढ़ते हुए दो कॉलम मन में बनाइए: मित्र क्या मानते हैं, अय्यूब क्या मानता है। ध्यान दीजिए कि मित्रों की कितनी बातें आपने चर्च में सुनी हैं। यहाँ अय्यूब 13:15 आता है; उस पद पर रुकिए।
तीसरे सप्ताह में अध्याय पन्द्रह से इकतीस पढ़िए। यह भाग सबसे लंबा और सबसे दोहराव भरा लगता है, और यह जान-बूझकर ऐसा है, क्योंकि दुःख अपने आप में दोहराव भरा होता है। इस भाग में अध्याय उन्नीस और अध्याय अट्ठाईस को अलग से, ऊँचे स्वर में पढ़िए।
चौथे सप्ताह में अध्याय बत्तीस से सैंतीस, एलीहू के भाषण, एक ही बैठक में पढ़ जाइए, और फिर अध्याय अड़तीस से बयालीस को इस तरह पढ़िए जैसे कोई कविता सुन रहा हो, न कि जैसे कोई अदालत का फैसला। अय्यूब 38:4 और अय्यूब 42:10 पर देर तक रुकिए।
कुछ सुझाव जो मदद करेंगे। जब मित्रों के भाषण पढ़ें, हर पंक्ति को परमेश्वर का वचन मानकर जीवन में लागू न करें; बाइबल यहाँ उनके शब्दों को सच्चाई से दर्ज करती है, अनुमोदित नहीं करती, और अध्याय बयालीस में परमेश्वर स्वयं यह स्पष्ट कर देते हैं। कविता को गद्य की तरह न पढ़ें; अतिशयोक्ति, चित्र और भावना उसकी भाषा है। और यदि आप स्वयं इस समय किसी गहरे दुःख में हैं, तो अध्याय तीन से शुरू करना गलत नहीं होगा, क्योंकि वहाँ बाइबल आपकी भाषा बोलती है।
पढ़ने के साथ भजन 13, भजन 73, विलापगीत अध्याय तीन और रोमियों अध्याय आठ को साथ रखिए। और अंत में याकूब 5:11 को दो बार पढ़िए, क्योंकि वहाँ पूरी कहानी का सारांश एक ही वाक्य में है: प्रभु बहुत दयालु और कृपालु हैं।
दर्पण
आपने भी वह हिसाब लगाया है, मानिए या न मानिए। आपने सोचा है कि अगर मैं ईमानदारी से काम करूँ, तो प्रमोशन मिलेगा; अगर मैं परिवार में धीरज रखूँ, तो घर शांत रहेगा; अगर मैं दसवाँ देता रहूँ, तो कमी नहीं होगी; अगर मैं शरीर की देखभाल करूँ, तो रिपोर्ट ठीक आएगी। और फिर कोई एक दिन आया जब हिसाब गलत निकला, और आपको लगा कि परमेश्वर ने अनुबंध तोड़ दिया है।
अय्यूब की पुस्तक आपसे यह नहीं कहती कि आपका दर्द छोटा है। वह आपसे यह कहती है कि आपका अनुबंध कभी था ही नहीं। परमेश्वर आपके अच्छे कामों के बदले आपको एक सुरक्षित जीवन बेचने वाले व्यापारी नहीं हैं; वे पिता हैं, और पिता का प्रेम रसीद पर नहीं चलता।
यह बात चुभती है, क्योंकि अगर हिसाब झूठा है तो हमारा नियंत्रण भी झूठा है। मगर सोचिए, यह मुक्त भी करता है। अगर आशीष कमाई नहीं थी, तो उसका जाना दंड भी नहीं है। अगर आपकी नौकरी छूटी, तो यह इसका सबूत नहीं है कि परमेश्वर नाराज़ हैं। अगर आपकी देह बीमार है, तो यह गुप्त पाप का चालान नहीं है। अगर आपका विवाह टूटा या आपका अकेलापन सालों से खिंच रहा है, तो कोई आत्मिक जुर्माना नहीं कट रहा।
और आपको यह सुनने की ज़रूरत है: आपको शांत रहने की अनुमति नहीं चाहिए, आपको चिल्लाने की अनुमति चाहिए। अय्यूब चिल्लाया, और परमेश्वर ने उसे "मेरा दास" कहा। यदि आप महीनों से एक विनम्र, सजा हुआ, प्लास्टिक जैसा विश्वास ओढ़े हुए हैं और भीतर सब जल रहा है, तो इस पुस्तक की सबसे बड़ी भेंट यह है कि आप अपनी पूरी सच्चाई परमेश्वर के सामने रख सकते हैं, और वे उसे संभाल लेंगे।
एक आखिरी बात। अय्यूब के गलियारे का अंत उत्तर नहीं था, दर्शन था। तो आज आप प्रार्थना में उत्तर से पहले उपस्थिति मांगिए। कहिए: मुझे कारण समझ में नहीं आ रहा, आप ही आ जाइए।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को अय्यूब की कहानी सुनाना डरावना लग सकता है, क्योंकि इसमें बच्चों की मृत्यु, बीमारी और गहरा दुःख है। मगर बच्चे दुःख से अनजान नहीं होते। उनके दादा-दादी बीमार पड़ते हैं, पालतू जानवर मर जाते हैं, दोस्त दूसरे शहर चले जाते हैं, माता-पिता की नौकरी छूट जाती है। अगर हम चुप रहेंगे तो वे खुद ही एक गलत निष्कर्ष निकाल लेंगे, अक्सर यही कि "बुरा हुआ क्योंकि मैं बुरा था।" अय्यूब की पुस्तक ठीक इसी झूठ को तोड़ती है।
सबसे सरल भाषा में कहानी ऐसी है: अय्यूब परमेश्वर से बहुत प्रेम करता था। एक दिन उसके साथ बहुत बुरी बातें हुईं, और उसके दोस्तों ने कहा कि यह ज़रूर उसकी गलती का नतीजा है। मगर वे गलत थे। अय्यूब बहुत रोया, उसने परमेश्वर से बहुत सारे सवाल पूछे, और परमेश्वर ने उसे डाँटा नहीं। अंत में परमेश्वर स्वयं आए और अय्यूब से बात की, और अय्यूब का मन शांत हो गया, इसलिए नहीं कि उसे सब समझ आ गया, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर उसके साथ थे।
बच्चों के साथ इस कहानी में तीन बातें सबसे ज़रूरी हैं: दुःख हर बार सज़ा नहीं होता, परमेश्वर से सवाल पूछना बुरा नहीं है, और परमेश्वर अपने बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते।
अलग-अलग उम्र के लिए अलग-अलग गहराई चाहिए। छोटे बच्चों के लिए, तीन से छह साल, हमारे पास एक बहुत ही कोमल संस्करण है जो भरोसे पर केंद्रित है। सात से बारह साल के बच्चों के लिए एक ऐसा पाठ है जो दोस्तों की गलत बातों और परमेश्वर के उत्तर पर बात करता है। और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए एक गहरी सामग्री है जो उनके अपने सवालों को गंभीरता से लेती है, क्योंकि उस उम्र में "अगर परमेश्वर भले हैं तो दुनिया ऐसी क्यों है" कोई सैद्धांतिक प्रश्न नहीं होता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अय्यूब की पुस्तक किसने लिखी?
बाइबल लेखक का नाम नहीं बताती, इसलिए पुस्तक तकनीकी रूप से अनामी है। यहूदी परंपरा में एक मत मूसा को लेखक मानता है, और कुछ विद्वान सुलैमान के समय के किसी ज्ञानी लेखक की ओर इशारा करते हैं, क्योंकि उस दौर में इस्राएल में ज्ञान-साहित्य फल-फूल रहा था। कुछ लोग यह भी सुझाते हैं कि मूल कहानी बहुत पुरानी है और बाद में किसी प्रेरित लेखक ने उसे काव्य रूप में गढ़ा। जो निश्चित है वह यह है कि लेखक हिब्रू कविता का असाधारण कारीगर था और परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित था।
अय्यूब की पुस्तक कब लिखी गई और उसकी घटनाएँ कब हुईं?
घटनाओं का माहौल कुलपिताओं के युग का है, अर्थात अब्राहम, इसहाक और याकूब के समय जैसा। अय्यूब की संपत्ति पशुओं में गिनी जाती है, वह स्वयं अपने परिवार के लिए बलिदान चढ़ाता है, कोई याजक या मंदिर या मूसा की व्यवस्था नहीं दिखती, इस्राएल राष्ट्र का ज़िक्र नहीं है, और अंत में वह एक सौ चालीस वर्ष और जीता है। लिखे जाने का समय इससे बहुत बाद का हो सकता है। यहेजकेल 14:14 दिखाता है कि निर्वासन के समय तक अय्यूब इस्राएल में एक जाना-पहचाना नाम था।
क्या अय्यूब एक वास्तविक व्यक्ति था या यह केवल एक कहानी है?
बाइबल उसे वास्तविक व्यक्ति के रूप में पेश करती है। यहेजकेल 14:14 में परमेश्वर नूह और दानिय्येल के साथ अय्यूब का नाम लेते हैं, और याकूब 5:11 विश्वासियों को उसके धीरज का ठोस उदाहरण देता है, जो किसी काल्पनिक पात्र के लिए अजीब होता। यह भी सच है कि पुस्तक का बड़ा हिस्सा सावधानी से गढ़ी गई कविता है, जिसका मतलब है कि लेखक ने एक वास्तविक व्यक्ति की कहानी को साहित्यिक कला के साथ प्रस्तुत किया है। ऐतिहासिकता और काव्यात्मक शिल्प आपस में टकराते नहीं।
अय्यूब की पुस्तक में कितने अध्याय हैं और उसका ढाँचा क्या है?
पुस्तक में बयालीस अध्याय हैं। अध्याय एक और दो गद्य की प्रस्तावना हैं, जहाँ स्वर्ग का दरबार और अय्यूब पर आए दो प्रहार दिखाए जाते हैं। अध्याय तीन से इकतीस तक तीन मित्रों के साथ तीन चक्रों में संवाद चलता है, जिसमें अध्याय अट्ठाईस ज्ञान पर एक अलग कविता है। अध्याय बत्तीस से सैंतीस एलीहू के भाषण हैं। अध्याय अड़तीस से इकतालीस में यहोवा आँधी में से बोलते हैं, और अध्याय बयालीस में अय्यूब का पश्चाताप तथा गद्य का उपसंहार आता है।
शैतान अय्यूब को कैसे सता सका, क्या परमेश्वर ने अनुमति दी?
हाँ, पुस्तक साफ़ कहती है कि शैतान अय्यूब को परमेश्वर की अनुमति की सीमा के भीतर ही छू सका, पहले संपत्ति और संतान तक, फिर देह तक लेकिन जीवन नहीं। यह हमें असहज करता है, मगर इसका दूसरा पहलू बड़ा दिलासा है: बुराई स्वतंत्र और असीम नहीं है, उसकी हर सीमा परमेश्वर के हाथ में तय होती है। ध्यान दें कि परमेश्वर के भाषणों में शैतान का नाम एक बार भी नहीं आता, जैसे कि पुस्तक कहना चाहती है कि अय्यूब का सच्चा विश्राम शत्रु को समझने में नहीं, परमेश्वर को देखने में है।
अय्यूब के मित्रों की बातें गलत क्यों थीं, जब वे सुनने में सही लगती हैं?
क्योंकि उन्होंने सच्ची बातों को झूठे ढाँचे में जड़ दिया। यह सच है कि परमेश्वर न्यायी हैं और पाप का परिणाम होता है, मगर मित्रों ने इसे एक यंत्र बना दिया: दुःख देखो, पाप ढूँढ़ो। इस गणित से उन्होंने एक निर्दोष आदमी को अपराधी बना दिया और परमेश्वर की ओर से बोलने का दावा करते हुए घाव पर नमक रख दिया। अंत में परमेश्वर उन्हीं से नाराज़ होते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अय्यूब की तरह ठीक बात नहीं कही। सही शब्द भी गलत हृदय के साथ हिंसा बन सकते हैं।
अय्यूब 19:25 में "छुड़ानेवाला" कौन है?
हिब्रू में यहाँ जो शब्द है वह उस निकट संबंधी के लिए प्रयोग होता था जो कर्ज़ चुकाकर, संपत्ति छुड़ाकर या न्याय दिलाकर अपने परिवार के सदस्य को बचाता था, जैसा रूत की पुस्तक में बोअज़ करता है। अय्यूब उस पल में मानवीय रूप से पूरी तरह अकेला है, और वह घोषणा करता है कि उसका छुड़ानेवाला जीवित है और अंत में पृथ्वी पर खड़ा होगा। मसीही कलीसिया ने सदा इसमें यीशु मसीह की छाया देखी है, वही बिचवई जिसकी कमी अय्यूब अध्याय नौ में महसूस करता है।
एलीहू कौन था और उसके भाषण अलग क्यों हैं?
एलीहू एक जवान व्यक्ति है जो तीनों मित्रों और अय्यूब की पूरी बहस सुनने के बाद बोलता है। वह पुराने मित्रों से इस बात में भिन्न है कि वह अय्यूब पर किसी गुप्त पाप की सूची नहीं थोपता, बल्कि परमेश्वर की महानता, उनकी शिक्षा देने की रीति और मनुष्य के सीमित ज्ञान पर बोलता है। अंत में परमेश्वर उसे नाम लेकर नहीं डाँटते, जैसा वे बाकी तीन को करते हैं। उसके भाषणों में आँधी और बादलों का वर्णन बढ़ता जाता है, जो परमेश्वर के आँधी में से बोलने का मंच तैयार करता है।
क्या परमेश्वर ने अय्यूब के "क्यों" का उत्तर दिया?
नहीं, और यही पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है। अध्याय अड़तीस से इकतालीस में परमेश्वर अय्यूब से लगभग सत्तर प्रश्न पूछते हैं और उसके एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं देते। वे उसे सृष्टि की सैर पर ले जाते हैं, तारों से लेकर जंगली गधों और समुद्र की सीमाओं तक, और यह दिखाते हैं कि यह ब्रह्मांड ज्ञान और देखरेख से भरा है, यहाँ कुछ भी अंधाधुंध नहीं चलता। अय्यूब को कारण नहीं मिला, परमेश्वर मिले, और वह उसके लिए पर्याप्त था।
अय्यूब को अंत में दुगना क्यों मिला, क्या यह समृद्धि की शिक्षा है?
नहीं। अय्यूब 42:10 कहता है: "जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने उसका दु:ख दूर किया, और यहोवा ने अय्यूब को पहले से दूना दे दिया।" ध्यान दीजिए कि मोड़ प्रार्थना पर आता है, सौदे पर नहीं, और वह प्रार्थना उन्हीं लोगों के लिए है जिन्होंने उसे तोड़ा था। दुगनी आशीष इनाम की रसीद नहीं, कृपा का उपहार है। और कोई हिसाब उन दस कब्रों को नहीं भरता; पुस्तक बहाली को अंतिम उत्तर नहीं, अंतिम आशा का चिह्न बनाती है।
बहमोत और लिव्यातान क्या हैं?
अध्याय चालीस और इकतालीस में परमेश्वर दो विशाल प्राणियों का लंबा वर्णन करते हैं। कुछ लोग इन्हें दरियाई घोड़ा और मगरमच्छ जैसे वास्तविक जीव मानते हैं, कुछ इन्हें प्राचीन काव्य में अराजकता की शक्तियों के प्रतीक मानते हैं, और कुछ दोनों को जोड़कर पढ़ते हैं। संदेश दोनों तरह से एक ही है: जिन शक्तियों के सामने मनुष्य असहाय है, परमेश्वर उनके साथ खेलते हैं और उन्हें अपनी सीमा में रखते हैं। अय्यूब की दुनिया में जो जंगली और बेकाबू दिखता है, वह भी सिंहासन के अधीन है।
अय्यूब की पुस्तक का मुख्य संदेश क्या है?
सबसे छोटे रूप में: परमेश्वर की भलाई हमारे आराम पर निर्भर नहीं है, और हमारा विश्वास आशीष की रसीद नहीं है। पुस्तक इस सवाल से शुरू होती है कि क्या कोई मनुष्य परमेश्वर से बिना लाभ के प्रेम कर सकता है, और अय्यूब का जीवन उत्तर देता है कि हाँ, कृपा से यह संभव है। साथ ही वह हमें दुःख के बीच ईमानदार रहने की स्वतंत्रता देती है, आसान जवाब देने वाले धर्मशास्त्र से सावधान करती है, और अंत में एक छुड़ानेवाले की ओर उँगली उठाती है जो अभी अय्यूब की आँखों से छिपा था।
अय्यूब की पुस्तक और रोमियों 8:18 का क्या संबंध है?
अय्यूब का पूरा संघर्ष एक तराजू का संघर्ष है: मेरा दर्द इतना भारी है, इसके बदले क्या रखा जा सकता है? नया नियम उसी तराजू पर दूसरा पलड़ा रख देता है। रोमियों 8:18 कहता है: "क्योंकि मैं समझता हूँ, कि इस समय के दु:ख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं।" पौलुस दर्द को छोटा नहीं कहता, वह आने वाली महिमा को अकल्पनीय रूप से बड़ा कहता है। अय्यूब ने वह महिमा दूर से देखी; मसीह में वह हमारे लिए निश्चित हो गई।
अंत में
अय्यूब की पुस्तक हमें वह नहीं देती जो हम चाहते हैं, और ठीक इसलिए वह हमें वह देती है जिसकी हमें ज़रूरत है। हम कारण मांगते हैं; हमें परमेश्वर मिलते हैं। हम एक ऐसी व्याख्या चाहते हैं जो दर्द को समझने योग्य बना दे और इस तरह हमें फिर नियंत्रण में ले आए; परमेश्वर आँधी में से बोलते हैं और नियंत्रण की हमारी कल्पना को कोमलता से तोड़ देते हैं, फिर हमें अपने साथ बिठा लेते हैं। राख पर बैठा अय्यूब अंत में यह नहीं कहता कि अब मुझे सब समझ आ गया; वह कहता है कि पहले मैंने कान से सुना था, अब मेरी आँखें देखती हैं।
अगर आप आज किसी गलियारे में बैठे हैं, तो इस पुस्तक को एक कोने से पढ़िए और दूसरे कोने से प्रार्थना कीजिए। अध्याय तीन में अपनी चीख पहचानिए, अध्याय उन्नीस में अपनी आशा बोलिए, अध्याय अड़तीस में चुप हो जाइए, और अध्याय बयालीस में उन लोगों के लिए प्रार्थना करना सीखिए जिन्होंने आपको समझा नहीं। और जब समझ न आए, तो उस छुड़ानेवाले का नाम लीजिए जो जीवित है और अंत में खड़ा होगा। वही उत्तर है, क्योंकि उत्तर कभी तर्क नहीं था; वह सदा एक व्यक्ति थे।
