बाइबल पुस्तक

इफिसियों की पत्री: मसीह में हमारी आशीषें और आत्मिक युद्ध

परिचय

रोम के एक किराए के मकान में एक आदमी बैठा है, उसकी कलाई एक सिपाही की कलाई से जंजीर से बँधी है। वह न यात्रा कर सकता है, न कलीसियाओं में जा सकता है, न अपनी सफाई में कुछ बड़ा कर सकता है। उसके पास बस कागज़, कलम और एक दोस्त है जो चिट्ठी ले जाएगा। और उस आदमी की कलम से जो शब्द निकलते हैं, वे गरीबी की नहीं, अमीरी की भाषा बोलते हैं: आशीष, धन, महिमा, विरासत, सामर्थ, ऊँचाई, गहराई। जो कैदी है, वह धनवानों की तरह लिखता है।

यही इफिसियों की पत्री है। छह छोटे अध्याय, पर उनमें मसीही विश्वास का पूरा नक्शा खिंचा हुआ है: परमेश्वर ने अनुग्रह में क्या किया, उसने एक नई मानवता कैसे रची, और वह नई मानवता अब कैसे चले और कैसे खड़ी रहे।

इस पृष्ठ पर आप इस पत्री का लेखक, समय, पृष्ठभूमि, ढाँचा और मुख्य विषय जानेंगे, मुख्य पदों की गहराई में उतरेंगे, और अंत में इसे पढ़ने की एक व्यावहारिक योजना पाएँगे।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

ज़्यादातर लोग इफिसियों को दो हिस्सों में बाँट देते हैं: पहले तीन अध्याय "आशीषें" और आखिरी अध्याय "आत्मिक युद्ध"। हम इस पृष्ठ पर उन्हें जोड़कर पढ़ेंगे, क्योंकि पौलुस ने उन्हें जोड़ा ही था। पाँच बार वह "स्वर्गीय स्थानों" की बात करता है: वहीं हमें हर आशीष मिली है, वहीं मसीह बैठा है, वहीं हम उसके साथ बैठाए गए हैं, और वहीं वह युद्ध चल रहा है। यानी जिस जगह हमें बिठाया गया है, उसी जगह लड़ाई होती है। इसका सीधा नतीजा यह है: परमेश्वर के हथियार कोई नया साज-सामान नहीं हैं, वे अध्याय 1 से 3 की आशीषों को पहन लेना हैं। और यह युद्ध ज़मीन जीतने का नहीं, जीती हुई ज़मीन पर खड़े रहने का युद्ध है।

बाइबल इफिसियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?

पत्री अपना लेखक खुद बताती है: "पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित है" (इफिसियों 1:1)। तीन बार वह अपनी कैद का ज़िक्र करता है, और छठे अध्याय के अंत में अपने लिए यही प्रार्थना मँगवाता है कि जंजीरों में बँधा राजदूत होकर भी वह हियाव के साथ सुसमाचार सुनाए। शुरुआती कलीसिया ने इसे हमेशा पौलुस की पत्री माना; दूसरी सदी के लेखक इसे पौलुस के नाम से उद्धृत करते हैं। आज कुछ विद्वान इसकी लंबी, गूँजती वाक्य-रचना और शब्दावली के कारण सवाल उठाते हैं, पर जो आदमी जंजीर में बैठकर आराधना की मनोदशा में लिख रहा हो, उसकी भाषा उपदेश की तेज़ बहस से अलग, स्तुति की तरह बहे तो यह अचरज की बात नहीं। जंजीरें उसकी कलम को रोक नहीं पाईं।

समय के बारे में सबसे संभावित बात यह है कि यह पत्री ईसवी 60 से 62 के बीच रोम की नज़रबंदी के दौरान लिखी गई, उसी दौर में जब कुलुस्सियों और फिलेमोन की पत्रियाँ लिखी गईं। तुखिकुस इन चिट्ठियों को लेकर एशिया प्रदेश गया (इफिसियों 6:21-22)। ध्यान देने की बात है कि सबसे पुरानी कुछ हस्तलिपियों में पहली आयत में "इफिसुस में" शब्द नहीं मिलते, इसलिए बहुत संभव है कि यह एक परिपत्र था, जो इफिसुस से शुरू होकर आसपास की कलीसियाओं में पढ़ा जाता रहा। इसीलिए इसमें किसी स्थानीय झगड़े या नाम का ज़िक्र नहीं है; यह पूरी कलीसिया के लिए लिखी गई एक बुनियादी चिट्ठी है।

पृष्ठभूमि समझना ज़रूरी है। इफिसुस एशिया प्रदेश की राजधानी थी, अरतिमिस देवी के भव्य मंदिर का शहर, जादू-टोने और तंत्र-मंत्र का बड़ा केंद्र। प्रेरितों के काम 19 में हम पढ़ते हैं कि विश्वास में आए लोगों ने अपनी जादू की पोथियाँ जलाईं, और चाँदी के कारीगरों ने पौलुस के विरुद्ध दंगा किया। जिस शहर में लोग अदृश्य शक्तियों से डरते थे, वहाँ पौलुस लिखता है कि मसीह हर प्रधानता और अधिकार से ऊपर बैठा है और सब कुछ उसके पैरों तले कर दिया गया है।

अब पत्री का दिल सुनिए। पौलुस पहले बताता है कि हमारे पास क्या है: "हमको उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है" (इफिसियों 1:7)। गौर कीजिए, क्षमा सस्ती नहीं है, वह लहू की कीमत पर है; पर वह हमारे लिए मुफ्त है, क्योंकि वह "अनुग्रह के धन" से निकलती है। पौलुस हिसाब की भाषा नहीं, खज़ाने की भाषा बोलता है।

फिर वह हमारी हालत बताता है: हम अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे, और मरे हुए आदमी के पास अपनी तरफ से कुछ देने को नहीं होता। इसी पृष्ठभूमि में वह निचोड़ लिखता है: "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है" (इफिसियों 2:8)। और उसी साँस में, घमंड के दरवाज़े बंद करने के बाद, वह काम का दरवाज़ा खोलता है: "क्योंकि हम उसी के बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजे गए जो परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किए" (इफिसियों 2:10)। कर्म उद्धार की जड़ नहीं, उसका फल हैं; और वे फल भी पहले से परमेश्वर के तैयार किए हुए हैं।

यहीं से पत्री का दूसरा आधा हिस्सा निकलता है। जिसे मुफ्त में इतना मिला है, वह अब "बुलाहट के योग्य" चले: एकता में, सच्चाई में, पवित्रता में, घर में, काम में, और अंत में हथियार बाँधकर खड़ा रहे। पहला हिस्सा बताता है कि परमेश्वर ने क्या किया; दूसरा बताता है कि अब हम कैसे जिएँ। दोनों के बीच कोई दीवार नहीं, एक सीढ़ी है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

इफिसियों अचानक आसमान से नहीं टपकती; इसकी हर बड़ी तस्वीर पुराने नियम से उठाई गई है और मसीह में पूरी होती है।

पहली तस्वीर चुनाव की है। व्यवस्थाविवरण में परमेश्वर इस्राएल से कहते हैं कि उसने उन्हें उनकी बड़ाई के कारण नहीं, बस अपने प्रेम के कारण चुना। इफिसियों 1 वही भाषा लेकर आता है, पर अब उसका घेरा इस्राएल से बढ़कर हर जाति तक फैल गया है: परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें मसीह में चुन लिया, कि हम उसके सामने पवित्र और निर्दोष हों। अब्राहम से किया वादा कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे, यहाँ फलता है, जब अन्यजाति के विश्वासी "संगी वारिस" बन जाते हैं (इफिसियों 3:6)।

दूसरी तस्वीर मंदिर की है। यरूशलेम के मंदिर में एक दीवार थी जो अन्यजातियों को भीतरी आँगन से रोकती थी। पौलुस उसी छवि का प्रयोग करता है जब वह लिखता है कि मसीह ने "बैर की दीवार" को ढा दिया और दोनों को एक नया मनुष्य बना दिया। और फिर वह उलटा कर देता है: अब पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर, मसीह के कोने के पत्थर होने से, विश्वासियों का समाज ही परमेश्वर का पवित्रस्थान बन गया है, जहाँ आत्मा बसता है। यशायाह 57 का वह वचन, जिसमें परमेश्वर दूर और निकट वालों को शान्ति सुनाते हैं, इफिसियों 2:17 में यीशु के मुँह से बोला हुआ सुनाई देता है।

तीसरी तस्वीर विवाह की है। होशे, यशायाह और यहेजकेल में परमेश्वर खुद को इस्राएल का पति कहते हैं, एक ऐसा पति जो बेवफ़ा दुल्हन को छोड़ता नहीं। पौलुस उत्पत्ति 2:24 का हवाला देकर उस पुराने भेद को खोलता है: पति-पत्नी का एक तन होना असल में मसीह और कलीसिया की ओर इशारा करता रहा है। इसी नींव पर वह आदेश देता है: "हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम किया और उसके लिये अपने आप को दे दिया" (इफिसियों 5:25)।

और चौथी तस्वीर, जो हमारे दृष्टिकोण के लिए सबसे अहम है, हथियारों की है। यशायाह 11 और यशायाह 59 में परमेश्वर स्वयं योद्धा की तरह सजते हैं: धार्मिकता की झिलम, उद्धार का टोप, जलजलाहट का बाना। इफिसियों 6 में वही कवच परमेश्वर के लोगों को पहनाया जाता है। यानी हम अपना कवच नहीं गढ़ते, हम परमेश्वर का कवच पहनते हैं। यशायाह 52 के "शुभ समाचार सुनाने वाले के सुन्दर पाँव" अब हर विश्वासी के पाँवों में मेल के सुसमाचार के जूते बन जाते हैं।

इस तरह पुराने नियम की चार धाराएँ, चुनाव, मंदिर, विवाह और योद्धा-परमेश्वर, मसीह में आकर एक हो जाती हैं। इफिसियों की पत्री का दावा यही है कि स्वर्ग और पृथ्वी की सारी वस्तुएँ अंत में मसीह में एक कर दी जाएँगी, और कलीसिया उस योजना का पहला नमूना है।

रचना और मुख्य विषय

पत्री का ढाँचा बहुत साफ़ है और उसे जान लेना आधी व्याख्या है। अध्याय 1 से 3 बताते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया; अध्याय 4 से 6 बताते हैं कि अब हम क्या करें। पहले हिस्से में एक भी आदेश नहीं है, दूसरे हिस्से में चालीस से ज़्यादा। पौलुस कभी इस क्रम को उलटता नहीं। पहले अनुग्रह, फिर ज़िम्मेदारी।

पहला हिस्सा एक लंबी स्तुति से खुलता है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आशीष दी है" (इफिसियों 1:3)। आगे की आयतें उन आशीषों को तीन लहरों में गिनाती हैं: पिता ने चुना, पुत्र ने लहू से छुड़ाया, आत्मा ने छाप लगाकर विरासत की बयाना के तौर पर खुद को दे दिया। फिर पौलुस प्रार्थना करता है (1:15-23) कि हमारी आँखें खुलें और हम उस सामर्थ को जान सकें जो मसीह को मरे हुओं में से जिलाकर हर अधिकार के ऊपर बिठा देने में काम आई थी। अध्याय 2 व्यक्तिगत उद्धार (2:1-10) और फिर सामूहिक मेल-मिलाप (2:11-22) दिखाता है: पहले कब्र से बाहर, फिर दीवार के पार। अध्याय 3 में पौलुस उस "भेद" की सेवकाई का बयान करता है और दूसरी प्रार्थना के साथ खत्म करता है, जिसमें वह मसीह के प्रेम की चौड़ाई, लंबाई, ऊँचाई और गहराई जानने की बिनती करता है, और अंत में उस परमेश्वर की स्तुति करता है जो हमारी विनती और समझ से बहुत ही बढ़कर कर सकते हैं।

दूसरा हिस्सा "चाल" के शब्द पर टिका है। पौलुस बार-बार कहता है: योग्य चाल चलो, प्रेम में चलो, ज्योति की सन्तान की तरह चलो, बुद्धिमानों की तरह चलो। सबसे पहले एकता आती है: "और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो" (इफिसियों 4:3)। ध्यान दें, एकता बनानी नहीं है, वह आत्मा ने पहले से दी है; हमें उसे "रखना" है, और उसके लिए यत्न करना है, यानी पसीना बहाना है। इसके बाद मसीह के दिए सेवकों का ज़िक्र है, जिनका काम विश्वासियों को सेवा के लिए तैयार करना है, ताकि देह बढ़े और सिद्धता तक पहुँचे। फिर पुराने स्वभाव को उतारने और नए को पहनने की बात (4:17-32), शुद्धता और ज्योति का जीवन (5:1-14), और आत्मा से परिपूर्ण होकर आराधना करने वाला समाज (5:15-21)।

घर की बात इसी बहाव में आती है। 5:21 में एक-दूसरे के अधीन रहने का आदेश दिया गया है, और उसके बाद पत्नी-पति, सन्तान-माता-पिता, दास-स्वामी के संबंधों को मसीह की छाया में रखा गया है। यह सत्ता का ढाँचा नहीं, क्रूस का ढाँचा है, क्योंकि पति को जो आदर्श दिया गया है वह अपनी जान देने वाला उद्धारकर्ता है।

और अंत में 6:10-20 का हथियारबंद अनुच्छेद: "परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो, कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको" (इफिसियों 6:11)। यहाँ पत्री का वृत्त पूरा होता है। जिस सच्चाई, धार्मिकता, मेल, विश्वास, उद्धार और वचन की बात अध्याय 1 से 5 में हुई थी, वही अब कवच के टुकड़ों के नाम बन जाते हैं। कवच कोई नया सामान नहीं, आशीषें पहनी हुई हैं।

इस पुस्तक के मुख्य पद

इफिसियों 2:8 पत्री का केंद्र है: "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है।" हर शब्द तौला हुआ है। "अनुग्रह ही से" मतलब कारण पूरी तरह परमेश्वर की ओर से है; "विश्वास के द्वारा" मतलब विश्वास कीमत नहीं, खाली हाथ है जो दान लेता है; "तुम्हारी ओर से नहीं" मतलब हमारी धार्मिकता, जाति, परंपरा या अनुभव का इसमें कोई योगदान नहीं। अगले पद में पौलुस कारण भी बताता है: ऐसा न हो कि कोई घमंड करे। जो उद्धार पाने के लिए कुछ करता है, वह कभी निश्चिंत नहीं हो सकता, क्योंकि उसे हमेशा डर रहेगा कि कहीं कम रह गया हो। दान लेने वाला ही चैन से सो सकता है।

इफिसियों 2:10 उसी सिक्के का दूसरा पहलू है: "क्योंकि हम उसी के बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजे गए जो परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किए।" यहाँ "सृजे गए" शब्द उत्पत्ति की गूँज है: अनुग्रह मरम्मत नहीं, नई सृष्टि है। और भले काम हमारे बनाए हुए प्रोजेक्ट नहीं हैं; वे पहले से तैयार किए हुए रास्ते हैं जिन पर हमें चलना है। इसका अर्थ है कि आपके दिन की वह थकाऊ ज़िम्मेदारी, वह बीमार रिश्तेदार, वह मुश्किल सहकर्मी, संभवतः आपके लिए तैयार किया गया "भला काम" है, कोई रुकावट नहीं।

इफिसियों 6:11 पत्री को ज़मीन पर उतारता है: "परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो, कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको।" तीन बातें गौर करने लायक हैं। पहली, हथियार "परमेश्वर के" हैं, हमारी हिम्मत या तकनीक के नहीं। दूसरी, "सारे" कहा गया है; आधा कवच पहनकर लड़ने वाला खुले हिस्से पर घायल होता है, और अक्सर हमारा खुला हिस्सा वही होता है जिसे हम मामूली समझते हैं, जैसे ज़बान, पैसा, या अकेलेपन के वक्त की आदतें। तीसरी और सबसे बड़ी बात: लक्ष्य "खड़े रह सको" है, आगे बढ़कर इलाका जीतना नहीं। इलाका मसीह ने क्रूस और पुनरुत्थान में जीत लिया; शैतान "युक्तियों" से, यानी चालबाज़ियों और झूठ से, हमें उस जीती हुई ज़मीन से हटाने की कोशिश करता है। इसलिए आत्मिक युद्ध मुख्य रूप से सच्चाई में अड़े रहने का युद्ध है।

दर्पण

अब सवाल आप से। आप इफिसियों के किस आधे हिस्से में जी रहे हैं? बहुत लोग दूसरे आधे में जीते हैं और पहले को भूल जाते हैं: कोशिश, कोशिश, और फिर थकान। आप रविवार को आते हैं, सेवा करते हैं, चंदा देते हैं, पर भीतर कहीं यह डर रहता है कि परमेश्वर आप से खुश नहीं हैं। उस डर के साथ इफिसियों 1:7 को धीरे-धीरे पढ़िए। आपकी क्षमा आपकी प्रगति पर नहीं, मसीह के लहू पर टिकी है। वह कीमत कभी घटती नहीं।

और कुछ लोग पहले आधे में अटक जाते हैं: अनुग्रह, आशीष, स्वर्गीय स्थान, पर घर में वही कड़वी ज़बान, वही ठंडा रिश्ता, वही दफ्तर की बेईमानी। इफिसियों आपके लिए असुविधाजनक है, क्योंकि यह पत्री आत्मिकता को रसोई, बिस्तर, बही-खाते और दफ्तर तक घसीट लाती है। जो आदमी कहता है कि मैं मसीह में बैठा हूँ पर अपनी पत्नी से प्रेम नहीं करता, वह पौलुस के हिसाब से कवच पहने ही नहीं है।

शायद आपकी लड़ाई अकेलेपन की है। शहर में कमरा है, नौकरी है, पर कोई ऐसा नहीं जिसे सच बता सकें। इफिसियों 4:3 का "यत्न करो" आप से कहता है कि संगति एक मिल जाने वाली चीज़ नहीं, एक लड़ी जाने वाली चीज़ है; किसी को माफ करने का, पहले फोन करने का, और फिर से भरोसा करने का पसीना।

और अगर आप आज थके हुए हैं, डरे हुए हैं, किसी लत या किसी याद से जूझ रहे हैं, तो यह याद रखिए कि आप से पहले वह आदमी जंजीर में था जिसने यह चिट्ठी लिखी। उसके हालात नहीं बदले थे, उसकी नज़र बदली थी। आप की भी परिस्थिति आज शाम तक न बदले, लेकिन आप जान सकते हैं कि आप कहाँ बैठाए गए हैं। और जो मसीह के साथ बैठा है, वह खड़ा भी रह सकता है।

इस पत्री को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

शुरुआत एक ही बैठक से कीजिए। पूरी पत्री ज़ोर से पढ़ने में लगभग बीस मिनट लगते हैं, और इसे एक साँस में पढ़ने से वह बहाव समझ आता है जो टुकड़ों में पढ़ने पर छूट जाता है। पहली बार नोट्स न बनाइए, सिर्फ सुनिए, जैसे इफिसुस की उस कलीसिया ने सुना होगा जब तुखिकुस ने चिट्ठी खोली थी।

दूसरे चरण में चार हफ्तों की योजना अच्छी रहती है। पहला हफ्ता अध्याय 1 पर, जहाँ आप हर उस क्रिया को रेखांकित कर सकते हैं जिसका कर्ता परमेश्वर है; आप पाएँगे कि लगभग सब कुछ वही करते हैं। दूसरा हफ्ता अध्याय 2 और 3 पर, कब्र से मंदिर तक की यात्रा पर। तीसरा हफ्ता अध्याय 4 और 5 पर, जहाँ हर आदेश के सामने लिखिए कि वह किस आशीष से निकलता है; उदाहरण के लिए, क्षमा करने का आदेश इस सत्य से निकलता है कि मसीह में हमें क्षमा मिली। चौथा हफ्ता अध्याय 6 पर, कवच के एक-एक टुकड़े को अपने जीवन के एक-एक कमज़ोर मोर्चे से जोड़कर।

पढ़ते हुए "मसीह में", "उसमें" और "उसके द्वारा" जैसे शब्दों पर निशान लगाइए। यह पत्री का धड़कता दिल है और करीब तीस बार आता है। साथ ही "स्वर्गीय स्थानों में" के पाँचों स्थान (1:3, 1:20, 2:6, 3:10, 6:12) ढूँढ़िए और उन्हें एक पन्ने पर लिखिए; वही इस पत्री की कुंजी है।

प्रार्थना के लिए पत्री की दोनों प्रार्थनाओं का प्रयोग कीजिए। इफिसियों 1:15-23 को अपने परिवार के नामों के साथ पढ़िए, और इफिसियों 3:14-21 को अपने लिए। पौलुस सेहत या सुविधा नहीं माँगता, वह जानने और भीतरी सामर्थ की भीख माँगता है; कुछ हफ्ते वैसा माँगकर देखिए, प्रार्थना का स्वाद बदल जाता है।

कंठस्थ करने के लिए तीन पद चुनिए: इफिसियों 2:8, इफिसियों 2:10 और इफिसियों 6:11। ये तीन मिलकर पूरी पत्री का सार हैं: मुफ्त उद्धार, तैयार किए हुए काम, और पहना हुआ कवच। और अगर आप किसी समूह में पढ़ रहे हैं, तो कुलुस्सियों की पत्री साथ-साथ पढ़िए; दोनों एक ही समय की हैं और एक-दूसरे को रोशन करती हैं, जैसे एक ही सच्चाई की दो तस्वीरें अलग कोण से ली गई हों।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को इफिसियों समझाने का सबसे आसान रास्ता दो तस्वीरें हैं: एक तोहफा और एक कवच।

पहली तस्वीर यह है कि परमेश्वर ने हमें एक बहुत बड़ा तोहफा दिया, और तोहफे की कीमत हम नहीं चुकाते, देने वाला चुकाता है। यीशु ने हमारे लिए सब कुछ दे दिया, इसलिए हम परमेश्वर के परिवार में आ गए। बच्चे यह बात तुरंत पकड़ लेते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि जन्मदिन का उपहार कमाया नहीं जाता।

दूसरी तस्वीर यह है कि परमेश्वर अपने बच्चों को एक सिपाही की पोशाक देते हैं, पर यह पोशाक दूसरों से लड़ने के लिए नहीं है। यह पोशाक हमें झूठ और डर के सामने डटकर खड़े रहना सिखाती है: सच्चाई की पेटी, क्षमा का कवच, शान्ति के जूते, भरोसे की ढाल, और बाइबल की तलवार। बच्चों से पूछिए कि कौन सी बात उन्हें डराती है, और फिर दिखाइए कि उस डर के सामने कौन सा टुकड़ा काम आता है।

एक बात का ध्यान रखिए: छोटे बच्चों के साथ शैतान और अन्धकार की शक्तियों पर ज़्यादा देर न रुकिए। उन्हें यह ज़रूर बताइए कि यीशु सबसे बलवन्त हैं और वे सबसे ऊपर बैठे हैं, ताकि बात डर पर नहीं, सुरक्षा पर खत्म हो।

इस विषय पर हमारे पास उम्र के हिसाब से अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (3 से 6 वर्ष) सरल कहानी और चित्रों के साथ, प्राथमिक उम्र के बच्चों के लिए (7 से 12 वर्ष) सवाल-जवाब और गतिविधियों के साथ, और किशोरों के लिए (12 वर्ष से ऊपर) पहचान, दबाव और सोशल मीडिया के सवालों से जोड़कर। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वही पृष्ठ चुनिए और साथ बैठकर पढ़िए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इफिसियों की पत्री किसने लिखी?

पत्री की पहली ही आयत में लेखक अपना नाम बताता है: पौलुस, जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित है। वह भीतर तीन बार अपनी कैद का उल्लेख करता है और खुद को जंजीरों में बँधा राजदूत कहता है। शुरुआती कलीसिया ने दूसरी सदी से ही इसे पौलुस की पत्री के रूप में उद्धृत किया और किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया। आधुनिक समय में शैली के आधार पर कुछ आपत्तियाँ उठाई गई हैं, पर पत्री का आराधना जैसा लहजा और कैद की परिस्थिति इस भाषा को अच्छी तरह समझा देती है।

इफिसियों की पत्री कब और कहाँ लिखी गई?

सबसे प्रचलित और संभावित मत यह है कि पौलुस ने इसे ईसवी 60 से 62 के बीच रोम में अपनी नज़रबंदी के दौरान लिखा, जिसका वर्णन प्रेरितों के काम 28 में मिलता है। इसे कुलुस्सियों और फिलेमोन के साथ "कैद की पत्रियों" में गिना जाता है, क्योंकि चारों में कैद का ज़िक्र है और तुखिकुस तथा कुछ और नाम दोनों चिट्ठियों में साझा हैं। कुछ विद्वान कैसरिया की कैद को भी संभव मानते हैं, पर इससे पत्री के अर्थ पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता।

क्या यह पत्री सिर्फ इफिसुस की कलीसिया के लिए लिखी गई थी?

सबसे पुरानी कुछ महत्वपूर्ण हस्तलिपियों में पहली आयत में "इफिसुस में" शब्द नहीं हैं, और पत्री में किसी स्थानीय व्यक्ति, झगड़े या परिस्थिति का नाम नहीं आता, जबकि पौलुस इफिसुस में तीन साल रहा था। इससे बहुत विद्वान मानते हैं कि यह एक परिपत्र था, जो एशिया प्रदेश की कई कलीसियाओं में बारी-बारी पढ़ा जाता था और इफिसुस उसका मुख्य केंद्र था। इसका एक सुंदर नतीजा है: यह चिट्ठी शुरू से ही पूरी कलीसिया के लिए लिखी गई एक बुनियादी पाठशाला है।

इफिसियों की पत्री का मुख्य विषय क्या है?

पत्री का मुख्य विषय है मसीह में परमेश्वर की योजना और उस योजना में कलीसिया का स्थान। पहले तीन अध्याय बताते हैं कि परमेश्वर ने अनुग्रह से क्या किया: चुना, छुड़ाया, जिलाया, एक किया और अपना निवास बनाया। आखिरी तीन अध्याय बताते हैं कि इस सच्चाई के मुताबिक चाल कैसी हो: एकता, पवित्रता, प्रेम, घर-परिवार में आदर और अंत में आत्मिक मोर्चे पर दृढ़ता। सब कुछ "मसीह में" इस छोटे से वाक्यांश के चारों ओर घूमता है, जो पत्री में लगभग तीस बार आता है।

"स्वर्गीय स्थानों में" का क्या अर्थ है?

यह वाक्यांश सिर्फ इफिसियों में मिलता है और पाँच बार आता है। इसका अर्थ कोई भौगोलिक जगह नहीं, बल्कि वह अदृश्य वास्तविकता है जहाँ परमेश्वर का राज है और जहाँ फैसले होते हैं। वहीं हमें हर आशीष मिली है (1:3), वहीं मसीह बिठाया गया है (1:20), वहीं हम उसके साथ बैठाए गए हैं (2:6), वहीं स्वर्गीय शक्तियाँ परमेश्वर की बुद्धि देख रही हैं (3:10), और वहीं हमारा युद्ध चल रहा है (6:12)। यानी हमारी सुरक्षा और हमारी लड़ाई एक ही जगह की हैं।

अनुग्रह से उद्धार और भले कामों में तालमेल कैसे बैठता है?

इफिसियों 2:8 और इफिसियों 2:10 को साथ पढ़ना इसका जवाब है। आठवीं आयत कहती है कि उद्धार परमेश्वर का दान है और हमारी ओर से कुछ नहीं; दसवीं आयत कहती है कि हम मसीह यीशु में भले कामों के लिए सृजे गए, और वे काम परमेश्वर ने पहले से तैयार किए हैं। इसलिए भले काम उद्धार की कीमत नहीं, उसका फल हैं। पेड़ फल देता है क्योंकि वह जीवित है; फल लगाने से वह जीवित नहीं होता।

परमेश्वर के सारे हथियार क्या हैं और उन्हें कैसे पहना जाए?

इफिसियों 6:14-18 में छह टुकड़े गिनाए गए हैं: सच्चाई का पटुका, धार्मिकता की झिलम, मेल के सुसमाचार के जूते, विश्वास की ढाल, उद्धार का टोप और आत्मा की तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, और इन सबके साथ हर समय प्रार्थना। इन्हें "पहनना" किसी मंत्र या विधि से नहीं होता, बल्कि उन सच्चाइयों पर जानबूझकर भरोसा करके होता है जिन्हें पौलुस पहले पाँच अध्यायों में समझा चुका है। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है वचन पढ़ना, झूठ को नकारना, क्षमा में चलना और प्रार्थना में टिके रहना।

क्या आत्मिक युद्ध का मतलब दुष्टात्माओं को ललकारना है?

इफिसियों 6 में इसका ज़ोर कहीं और है। पौलुस बार-बार "खड़े रहो" कहता है, "हमला करो" नहीं। हमारा संघर्ष अंधकार की शक्तियों से है, पर जीत मसीह ने पहले से हासिल कर ली है, और हमारा काम उसकी जीती हुई ज़मीन पर अड़े रहना है। इसलिए आत्मिक युद्ध का सामान्य रूप नाटकीय नहीं, बहुत साधारण है: सच बोलना, माफ करना, वासना से भागना, वचन पर टिकना और प्रार्थना में लगे रहना। जहाँ शास्त्र दुष्टात्माओं से निकाले जाने की बात करता है, वहाँ भी अधिकार मसीह का है, हमारी तकनीक का नहीं।

इफिसियों 5:22-33 क्या स्त्रियों को दबाने की शिक्षा देता है?

नहीं। यह पूरा भाग 5:21 से शुरू होता है, जहाँ सब विश्वासियों को एक-दूसरे के अधीन रहने को कहा गया है, और उसकी सबसे लंबी हिदायत पति के लिए है, स्त्री के लिए नहीं। इफिसियों 5:25 पति से कहता है कि वह अपनी पत्नी से वैसा प्रेम करे जैसा मसीह ने कलीसिया से किया और अपने आप को दे दिया। यह बलिदान का आदर्श है, दबदबे का नहीं। जहाँ पति इस तरह जान देने को तैयार है, वहाँ अधीनता डर की नहीं, भरोसे की होती है।

इफिसियों और कुलुस्सियों की पत्री में क्या फर्क है?

दोनों एक ही समय लिखी गईं और इनके कई वाक्य आपस में मिलते-जुलते हैं, पर ज़ोर अलग है। कुलुस्सियों में पौलुस गलत शिक्षा का खंडन कर रहा है और मसीह की श्रेष्ठता पर ज़ोर देता है, यानी सिर पर। इफिसियों में कोई खास गलती सुधारने की जल्दी नहीं है, और ज़ोर कलीसिया पर है, यानी देह पर। एक ही सच्चाई को एक पत्री में मसीह की ओर से और दूसरी में उसके लोगों की ओर से देखा गया है। इसीलिए इन्हें साथ पढ़ना बहुत फलदायी होता है।

"पवित्र आत्मा को उदास न करो" का क्या अर्थ है?

इफिसियों 4:30 में यह आदेश झूठ, क्रोध, चोरी, गंदी बातचीत और कड़वाहट की चर्चा के बीच आता है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा कोई शक्ति नहीं, एक व्यक्ति हैं, और हमारे रिश्तों में की जाने वाली बेरहमी उन्हें दुख पहुँचाती है। ध्यान दीजिए, "उदास" करने की बात उन पापों के संदर्भ में है जो समाज को तोड़ते हैं, न कि आराधना की शैली या किसी बाहरी नियम के संदर्भ में। आत्मा को प्रसन्न करने का रास्ता वही है जो अगली आयत बताती है: एक-दूसरे पर कृपालु होना और क्षमा करना।

अगर परमेश्वर ने पहले से चुन लिया, तो मेरे निर्णय का क्या महत्व है?

इफिसियों 1 चुनाव को घबराहट का विषय नहीं, स्तुति का विषय बनाता है; उसका मकसद यह दिखाना है कि हमारा उद्धार हमारी पकड़ पर नहीं, परमेश्वर की पकड़ पर टिका है। उसी पत्री में पौलुस दर्जनों आदेश देता है, विश्वास करने की बात करता है और मेहनत से एकता रखने को कहता है, इसलिए शास्त्र हमारे निर्णयों को गंभीरता से लेता है। बाइबल दोनों सच्चाइयों को साथ रखती है: परमेश्वर का पहले चुनना, और हमारा उत्तर देना। एक को दूसरे से काटकर पढ़ने पर ही उलझन होती है।

इफिसियों की पत्री पढ़ना कहाँ से शुरू करें?

सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले पूरी पत्री एक ही बैठक में पढ़ी जाए, जिसमें करीब बीस मिनट लगते हैं, और फिर चार हफ्तों में अध्याय-दर-अध्याय लौटा जाए। पहले हिस्से (अध्याय 1 से 3) में उन क्रियाओं पर निशान लगाइए जिनका कर्ता परमेश्वर है, और दूसरे हिस्से (अध्याय 4 से 6) में हर आदेश को उस आशीष से जोड़िए जिससे वह निकलता है। प्रार्थना के लिए 1:15-23 और 3:14-21 का प्रयोग कीजिए, और इफिसियों 2:8 तथा इफिसियों 6:11 कंठस्थ कर लीजिए।

अंत में

इफिसियों की पत्री हमें दो बातें एक साथ सिखाती है, और उन्हें अलग करते ही दोनों बिगड़ जाती हैं। पहली, हम अपनी मेहनत से एक इंच भी ऊपर नहीं चढ़े; लहू से खरीदी गई क्षमा, अनुग्रह से मिला उद्धार और पहले से तैयार किए गए काम, सब परमेश्वर की ओर से हैं। दूसरी, यह मुफ्त मिली ऊँचाई हमें आराम कुर्सी नहीं, एक मोर्चा देती है; जिस स्वर्गीय स्थान में हम मसीह के साथ बैठाए गए हैं, वहीं अंधकार की शक्तियाँ हमें झूठ और थकान से हिलाना चाहती हैं। इसीलिए पौलुस आशीषों से शुरू करता है और कवच पर खत्म करता है। पहले बैठाए गए, तब खड़े रहने को बुलाए गए।

अगर इस पृष्ठ से आप एक ही बात ले जाएँ, तो यह ले जाइए: आत्मिक युद्ध नई शक्तियाँ ढूँढ़ने का नाम नहीं, पहले से मिली सच्चाइयों को पहन लेने का नाम है। आज ही अध्याय 1 खोलिए और उसे ज़ोर से पढ़िए, फिर अध्याय 6 पढ़िए, और देखिए कि एक ही चिट्ठी के दोनों सिरे कैसे एक-दूसरे को थामे हुए हैं। इसके बाद कुलुस्सियों और फिलिप्पियों की पत्री पढ़िए, उसी कैदी की और चिट्ठियाँ, जिसकी जंजीरें उसकी स्तुति से हल्की पड़ गई थीं।

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