बाइबल पात्र

पौलुस प्रेरित का जीवन: सताने वाले से सुसमाचार प्रचारक तक

परिचय

दमिश्क की सड़क पर धूल उड़ रही थी। एक जवान यहूदी विद्वान घोड़े पर सवार होकर तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, उसकी जेब में महायाजक के हस्ताक्षर वाले पत्र थे, और उसके मन में एक ही जुनून था कि यीशु के अनुयायियों को पकड़कर यरूशलेम लाया जाए। वह कट्टर था, पढ़ा-लिखा था, और अपने आप को परमेश्वर का सच्चा सेवक मानता था। लेकिन कुछ ही घंटों में वह ज़मीन पर गिरा हुआ, अंधा, और काँपता हुआ मिलेगा। जिस यीशु को वह मरा हुआ समझता था, वही उससे बोलेगा।

यह कहानी शाऊल की है, जो पौलुस बना। इस पृष्ठ पर आप उसके पूरे जीवन की यात्रा देखेंगे, उसके फरीसी बचपन से लेकर रोम की कालकोठरी में लिखे अंतिम शब्दों तक, और समझेंगे कि क्यों उसका जीवन आज भी हर विश्वासी के लिए एक आईना है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकांश लेख पौलुस को एक "बदले हुए आदमी" के रूप में दिखाते हैं, मानो दमिश्क की घटना एक धार्मिक टर्निंग पॉइंट थी और बाकी सब उसका परिणाम। यह मार्गदर्शिका एक अलग कोण से चलती है: पौलुस का पूरा जीवन अनुग्रह और अयोग्यता के बीच का लगातार तनाव है। वह कभी अपने अतीत को नहीं भूला, और यही उसकी सेवा की ताक़त बनी। हम उसे केवल "प्रेरित" के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखेंगे जो जीवन भर यह कहता रहा, "मैं सबसे छोटा हूँ", और फिर भी सबसे आगे दौड़ता रहा। यही तनाव आज हमारे भी विश्वास का असली ईंधन है।

बाइबल पौलुस के जीवन के बारे में क्या कहती है?

पौलुस का जन्म तरसुस नामक शहर में हुआ, जो आज के तुर्की में है। वह जन्म से रोमी नागरिक था, यहूदी परिवार में पला-बढ़ा, बिन्यामीन के गोत्र से था, और फरीसी परंपरा में सिखाया गया था। यरूशलेम में उसने गमलीएल के चरणों में पढ़ाई की, जो उस समय का सबसे सम्मानित रब्बी था। इसलिए जब वह मसीहियों को सताने निकला, तो यह किसी अनपढ़ का जुनून नहीं था, बल्कि एक धर्मशास्त्री का सुविचारित युद्ध था।

उसकी शुरुआती पहचान हमें प्रेरितों के काम 7 में मिलती है, जहाँ स्तिफनुस को पत्थरवाह किया जा रहा है और शाऊल पत्थरवाह करने वालों के कपड़ों की रखवाली कर रहा है। वह इस हत्या से सहमत था। इसके तुरंत बाद वह "कलीसिया को उजाड़ने" लगा, घर-घर जाकर पुरुषों और स्त्रियों को घसीटकर बंदीगृह में डालने लगा।

फिर वह क्षण आता है जो सब कुछ बदल देता है। प्रेरितों के काम 9:1-6 में लिखा है: "शाऊल जो अब तक प्रभु के चेलों को धमकाने और मार डालने की धुन में था, महायाजक के पास गया, और उससे दमिश्क की सभाओं के नाम पर इस अभिप्राय की चिट्ठियाँ माँगीं, कि क्या पुरुष, क्या स्त्री, जिन्हें वह इस पंथ पर पाए उन्हें बाँधकर यरूशलेम में ले आए। परन्तु चलते-चलते जब वह दमिश्क के निकट पहुँचा, तो एकाएक आकाश से उसके चारों ओर ज्योति चमकी, और वह भूमि पर गिर पड़ा, और यह शब्द सुना, 'हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?' उसने पूछा, 'हे प्रभु, तू कौन है?' उसने कहा, 'मैं यीशु हूँ, जिसे तू सताता है। परन्तु अब उठकर नगर में जा, और जो कुछ तुझे करना है, वह तुझ से कहा जाएगा।'"

यहाँ एक बात नोट करने योग्य है। यीशु यह नहीं कहते, "तू मेरे चेलों को क्यों सताता है?" वे कहते हैं, "तू मुझे क्यों सताता है।" कलीसिया और मसीह एक हैं। पौलुस की पूरी बाद की धर्मशास्त्र, जिसमें वह कलीसिया को मसीह की देह कहता है, इसी एक वाक्य से पैदा होती है।

तीन दिन तक वह अंधा रहा, न खाया न पिया। फिर हनन्याह नामक एक साधारण चेला उसके पास भेजा गया। कल्पना कीजिए हनन्याह के डर की, जिसे उसी आदमी के पास जाना था जो उसे मारने आया था। लेकिन परमेश्वर ने उससे कहा कि यह "मेरा चुना हुआ पात्र है।" पौलुस बपतिस्मा लेता है, और उसी दिन से वह उसी यीशु का प्रचार करने लगता है जिसे वह कुछ दिन पहले तक मिटाने आया था।

गलातियों 1:13-16 में पौलुस खुद इसे इन शब्दों में याद करता है: "तुम ने मेरे बारे में सुना है कि मैं यहूदी मत में कैसा चालचलन करता था, कि मैं परमेश्वर की कलीसिया को अत्यन्त सताता और नाश करता था। और मैं यहूदी मत में अपनी जाति के बहुतेरे समवयस्कों से बढ़ता जाता था और अपने बापदादों के व्यवहारों के लिये बहुत ही उत्साही था। परन्तु परमेश्वर की, जिस ने मेरी माता के गर्भ ही से मुझे ठहराया और अपने अनुग्रह से बुलाया, जब प्रसन्नता हुई, कि अपने पुत्र को मुझ में प्रगट करे कि मैं अन्यजातियों में उसका सुसमाचार सुनाऊँ।"

यहाँ ध्यान दीजिए, वह कहता है "माता के गर्भ ही से।" पौलुस का बुलावा उसके सताने से पहले तय था। परमेश्वर उसे तब भी जानते थे जब वह अपने आप को नहीं जानता था।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

पौलुस की कहानी अकेली नहीं है। वह उस बड़े धागे का हिस्सा है जो पूरी बाइबल में चलता है, कि परमेश्वर अयोग्य लोगों को चुनते हैं और उन्हें अपने काम के लिए तैयार करते हैं।

पुराने नियम में मूसा एक हत्यारा था जो मिस्री को मारकर भाग गया, और वही परमेश्वर की महिमा का पहला प्रकट करने वाला बना। दाऊद ने व्यभिचार और हत्या दोनों किए, और फिर भी उसे "परमेश्वर के मन के अनुसार" कहा गया, क्योंकि उसने पश्चाताप किया। योना ने परमेश्वर की आज्ञा से भागने की कोशिश की, और फिर भी उसे नीनवे भेजा गया। हर बार कहानी एक ही है, कि मानव की विफलता परमेश्वर के अनुग्रह को नहीं रोक सकती।

पौलुस इस श्रृंखला की चरम कड़ी है। लेकिन उसमें एक नई बात है। पुराने नियम के सेवक इस्राएल के भीतर काम करते थे। पौलुस अन्यजातियों के लिए भेजा गया। यहीं परमेश्वर की योजना का सबसे विस्तृत हिस्सा प्रकट होता है, कि उद्धार केवल यहूदियों के लिए नहीं, बल्कि हर जाति, हर भाषा, हर लोग के लिए है। अब्राहम को दिया गया वादा, कि "तेरे द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे," पौलुस के मिशन में जीता-जागता होने लगता है।

नए नियम में पौलुस यीशु के काम को पूरा करता है, लेकिन खुद यीशु के जीवन के दौरान वह चेला नहीं था। यही उसकी अनोखी स्थिति है। बारह प्रेरितों ने यीशु के साथ चलकर सीखा। पौलुस को यीशु ने सीधे स्वर्ग से प्रकाशन दिया। इसलिए वह बार-बार कहता है कि उसका सुसमाचार "मनुष्यों से नहीं" आया।

हर विफलता परमेश्वर के हाथ में एक बीज है।

पुराने नियम की भविष्यवाणियाँ, जैसे यशायाह 49:6, कि परमेश्वर का दास "अन्यजातियों के लिये ज्योति" होगा, पौलुस के जीवन में एक नए तरीके से पूरी होती हैं। वह मसीह की उस ज्योति को लेकर यूरोप तक जाता है। रोमियों, इफिसियों, कुलुस्सियों जैसी पत्रियों में वह दिखाता है कि यहूदी और अन्यजाति अब एक नई मानवता में जोड़े गए हैं, कि क्रूस ने बीच की दीवार गिरा दी।

तो पौलुस को समझे बिना बाइबल का दूसरा हिस्सा अधूरा रह जाता है। वह वह पुल है जिस पर होकर सुसमाचार यरूशलेम से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुँचा।

उसके जीवन का सार

पौलुस के जीवन में तीन क्षण ऐसे हैं जो सब कुछ बदल देते हैं, और तीनों में वही तनाव दिखता है, अनुग्रह और अयोग्यता का।

पहला क्षण दमिश्क का है, जिसकी बात हमने की। यह उसका पुनर्जन्म था। यहाँ वह पहली बार समझा कि सारी धार्मिक मेहनत, सारा शास्त्र-ज्ञान, सारी जातीय शुद्धता, यीशु मसीह के सामने बेकार है। बाद में वह फिलिप्पियों 3:7-8 में लिखेगा: "परन्तु जो-जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ। उसी के लिये मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूँ।"

"कूड़ा" शब्द बहुत तीव्र है। यूनानी में यह वह शब्द है जो सड़े हुए कचरे या मल के लिए इस्तेमाल होता है। पौलुस अपने पूरे धार्मिक इतिहास को इसी शब्द से पुकारता है।

दूसरा क्षण अन्ताकिया में आता है, जब पवित्र आत्मा उसे विशेष सेवा के लिए अलग करते हैं। प्रेरितों के काम 13:2 में लिखा है: "जब वे उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे, तो पवित्र आत्मा ने कहा, 'मेरे लिये बरनबास और शाऊल को उस काम के लिये अलग करो जिस के लिये मैं ने उन्हें बुलाया है।'"

यहाँ ध्यान दीजिए कि पौलुस को खुद नहीं भेजा जाता, बल्कि कलीसिया के बीच से, उपवास और प्रार्थना के दौरान, आत्मा उसे अलग करते हैं। यह उसकी पहली मिशनरी यात्रा की शुरुआत है, और अगले पंद्रह वर्षों में वह तीन बड़ी यात्राएँ करेगा, पूरे भूमध्य सागर के इर्दगिर्द कलीसियाएँ लगाएगा, और लगभग तेरह पत्रियाँ लिखेगा जो नए नियम का बड़ा हिस्सा बनेंगी।

तीसरा क्षण रोम की जेल में आता है। अपने जीवन के अंत में, जब सिर कटने की तैयारी हो रही थी, उसने अपने आत्मिक पुत्र तीमुथियुस को लिखा। 2 तीमुथियुस 4:7 में उसके शब्द हैं: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है।"

तीन क्रियाएँ, तीन तस्वीरें। कुश्ती लड़ी, यानी संघर्ष किया। दौड़ पूरी की, यानी हार नहीं मानी। विश्वास की रखवाली की, यानी सुसमाचार को शुद्ध रखा। यही उसके जीवन का सारांश है। शुरुआत में वह विश्वासियों को पकड़ने दौड़ रहा था। अंत में वह विश्वास को पकड़े हुए दौड़ पूरी कर रहा था।

पौलुस से हम क्या सीखते हैं

पहला पाठ है, कि अनुग्रह अतीत को मिटाता नहीं, उसे रूपांतरित करता है। पौलुस कभी यह भूला नहीं कि वह कलीसिया का सताने वाला था। 1 कुरिन्थियों 15:9-10 में वह लिखता है: "क्योंकि मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूँ, वरन् प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं, क्योंकि मैं ने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था। परन्तु मैं जो कुछ भी हूँ, परमेश्वर के अनुग्रह से हूँ। और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ; परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया, तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।"

यहाँ एक अद्भुत बात है। वह अपनी पहचान अनुग्रह से जोड़ता है, न कि अपने अतीत से। लेकिन वह अतीत को भी नहीं छिपाता। कई मसीही अपनी विफलताओं को दफनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। पौलुस अपने घाव खुले रखता है, ताकि अनुग्रह की चमक दिखाई दे।

दूसरा पाठ है, कि सच्चा बुलावा शांति से नहीं, संघर्ष से पहचाना जाता है। पौलुस को कोड़े खाने पड़े, पत्थरवाह हुआ, जहाज़ डूबे, भूख-प्यास सही, झूठे भाइयों से खतरा उठाया। उसने कभी यह नहीं सोचा कि "अगर परमेश्वर मेरे साथ हैं तो मुसीबतें क्यों?" उसने माना कि मुसीबतें ही इस बात का प्रमाण हैं कि वह सही रास्ते पर है। आज हम आराम को आशीष का पैमाना बना लेते हैं, और थोड़ी कठिनाई आते ही सोचते हैं कि परमेश्वर हमसे नाराज़ हैं। पौलुस का जीवन इस झूठ को तोड़ता है।

तीसरा पाठ है, कि सुसमाचार व्यक्तिगत नहीं, समुदायिक है। पौलुस अकेला नहीं चला। बरनबास, सीलास, तीमुथियुस, लूका, प्रिस्किल्ला और अक्विला, ओनेसिफुरुस, ऐसे कई नाम उसकी पत्रियों में आते हैं। उसने कलीसियाएँ लगाईं, अगुवे तैयार किए, चिट्ठियाँ लिखीं जो सामूहिक रूप से पढ़ी जातीं। आज का व्यक्तिवादी मसीही विश्वास, जहाँ हर कोई अपना निजी संबंध यीशु से रखता है और कलीसिया से दूरी बनाता है, पौलुस के मॉडल के बिल्कुल विपरीत है।

अनुग्रह ने उसे बदला, अनुग्रह ही उसे चलाता रहा।

दर्पण

अब रुककर अपने आप से पूछिए। आप अपने अतीत को कैसे देखते हैं? क्या आप उसे छिपाकर एक "अच्छे मसीही" का चेहरा बनाए रखते हैं? पौलुस ने अपना अतीत खुला रखा, क्योंकि उसने समझा कि उसका अतीत अनुग्रह के लिए मंच बन गया। जो पाप आपको आज भी शर्मिंदा करता है, वही परमेश्वर के हाथ में आपकी सबसे बड़ी गवाही बन सकता है।

क्या आप उस काम में लगे हैं जो आपको आराम देता है, या उसमें जो परमेश्वर ने बुलाया है? पौलुस अगर सुरक्षित यरूशलेम में रहकर धर्म पढ़ाता रहता, तो शायद बहुत सम्मान पाता। लेकिन उसने असुरक्षित सड़कें चुनीं, अनजान शहर चुने, जहाँ लोग उसे पत्थर मार सकते थे। आपकी नौकरी, आपका समय, आपके पैसे, क्या ये आपकी सुविधा के आसपास घूम रहे हैं, या मसीह के मिशन के आसपास?

क्या आप अकेले चल रहे हैं? पौलुस के जीवन में हर बड़ा काम किसी और के साथ हुआ। यदि आपके जीवन में कोई नहीं है जिसके साथ आप कमज़ोरी बाँट सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं, तो कुछ बदलना होगा। कलीसिया से जुड़ना विकल्प नहीं, आवश्यकता है।

और अंत में, क्या आप अपनी दौड़ पूरी करने के लिए तैयार हैं? पौलुस ने अंत में कहा, "मैं ने विश्वास की रखवाली की है।" यह तभी संभव है जब हर दिन विश्वास की रखवाली की जाए। एक बार का समर्पण काफी नहीं है। रोज़ की छोटी-छोटी हार, समझौते, आलस्य, यही धीरे-धीरे विश्वास को खा जाते हैं। आज ही रुककर पूछिए, क्या मैं अभी भी वही दौड़ रहा हूँ जो शुरू की थी?

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को पौलुस की कहानी सुनाना बहुत आसान है, क्योंकि इसमें नाटक है, रोशनी है, यात्राएँ हैं, जहाज़ हैं, कैदखाने हैं, और सबसे बड़ी बात, एक ऐसा नायक है जो पहले खलनायक था। छोटे बच्चों को बस इतना बताइए कि "एक आदमी था जो यीशु से बहुत नाराज़ था। लेकिन एक दिन यीशु ने आसमान से उससे बात की, और वह उनका सबसे अच्छा दोस्त बन गया।" यह उनके लिए काफी है।

बड़े बच्चों को समझाइए कि पौलुस का बदलाव क्यों मायने रखता है। कि परमेश्वर किसी को भी बदल सकते हैं, चाहे उसने कितनी गलतियाँ की हों। बच्चे अक्सर यह डरते हैं कि "अगर मैं शरारत करूँगा तो परमेश्वर मुझसे नाराज़ हो जाएँगे।" पौलुस की कहानी उन्हें दिखाती है कि परमेश्वर का प्यार गलती से बड़ा है।

किशोरों को यह दिखाया जा सकता है कि पौलुस भी एक जवान था जब वह गलत रास्ते पर चला। जवानी में हुई गलतियाँ जीवन खत्म नहीं करतीं। परमेश्वर वहाँ से भी उठा सकते हैं।

फेथ नेटवर्क पर हमारे पास तीन अलग उम्र समूहों के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, 3 से 6 साल के छोटे बच्चों के लिए सरल कहानी के रूप में, 7 से 12 साल के बच्चों के लिए विस्तार से, और 12 साल से ऊपर के किशोरों के लिए गहरी सोच के साथ। हर उम्र के अनुसार भाषा और उदाहरण चुने गए हैं, ताकि पौलुस का जीवन उनके अपने जीवन से जुड़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पौलुस का असली नाम क्या था?

पौलुस का यहूदी नाम शाऊल था, जो इस्राएल के पहले राजा शाऊल के नाम पर रखा गया था, क्योंकि पौलुस भी बिन्यामीन के गोत्र से था। पौलुस उसका रोमी नाम था, जिसे वह अन्यजातियों के बीच अपनी सेवा के दौरान इस्तेमाल करने लगा। प्रेरितों के काम 13 के बाद बाइबल उसे लगभग हमेशा पौलुस ही कहती है। यह बदलाव किसी नाम-परिवर्तन की धार्मिक रस्म नहीं थी, बल्कि उसकी बहुसांस्कृतिक पहचान का प्रतिबिंब था।

पौलुस ने कितनी पत्रियाँ लिखीं?

नए नियम में पौलुस के नाम से तेरह पत्रियाँ हैं, रोमियों से लेकर फिलेमोन तक। कुछ विद्वान इब्रानियों को भी उसका मानते हैं, हालाँकि इब्रानियों में लेखक का नाम नहीं दिया गया है, और परंपरा एकमत नहीं है। इन तेरह पत्रियों में कुछ कलीसियाओं को लिखी गईं और कुछ व्यक्तिगत, जैसे तीमुथियुस, तीतुस और फिलेमोन को। इन पत्रियों के बिना मसीही धर्मशास्त्र की नींव अधूरी रह जाती है।

पौलुस की मौत कैसे हुई?

बाइबल पौलुस की मौत का सीधा वर्णन नहीं देती। प्रेरितों के काम की पुस्तक रोम में उसके नज़रबंदी पर समाप्त होती है। प्राचीन कलीसिया की परंपरा के अनुसार, नीरो के शासनकाल में लगभग 64 से 67 ईस्वी के बीच, पौलुस को रोम के बाहर सिर काटकर मार डाला गया। रोमी नागरिक होने के कारण उसे क्रूस नहीं दिया गया, बल्कि तलवार से मारा गया। उसकी अंतिम पत्री, दूसरी तीमुथियुस, इसी शहादत की छाया में लिखी गई है।

क्या पौलुस शादीशुदा था?

बाइबल इस पर स्पष्ट नहीं है। 1 कुरिन्थियों 7 में पौलुस अविवाहित लोगों से कहता है कि "जैसा मैं हूँ, वैसे ही रहो।" इससे कई विद्वान मानते हैं कि लेखन के समय वह अविवाहित था। कुछ का मानना है कि वह विधुर था, क्योंकि फरीसी परंपरा में शादी की अपेक्षा थी, और महासभा के सदस्य के लिए विवाह लगभग अनिवार्य था। लेकिन यह अनुमान है। पौलुस ने अपने अविवाहित जीवन को सेवा के लिए एक आशीष माना।

पौलुस बारह प्रेरितों में से एक था?

नहीं। बारह प्रेरित वे थे जिन्हें यीशु ने अपनी सेवकाई के दौरान चुना था। यहूदा के गिरने के बाद मत्तियाह को चुना गया। पौलुस अलग तरीके से बुलाया गया, सीधे यीशु के द्वारा उनके पुनरुत्थान के बाद। वह खुद को "समय से पहले जन्मे हुए के समान" कहता है। लेकिन उसका प्रेरितीय अधिकार बारहों से कम नहीं था, क्योंकि उसका बुलावा स्वयं मसीह से आया था, न कि किसी मानवीय संस्था से।

दमिश्क में क्या हुआ था?

पौलुस दमिश्क की तरफ मसीहियों को गिरफ्तार करने जा रहा था। रास्ते में एक अत्यंत तेज़ ज्योति ने उसे घेर लिया और वह ज़मीन पर गिर पड़ा। यीशु ने उससे सीधे बात की और पूछा, "तू मुझे क्यों सताता है?" वह तीन दिन के लिए अंधा हो गया। दमिश्क में हनन्याह नामक एक चेला उसके पास आया, प्रार्थना की, और उसकी आँखें खुल गईं। उसी क्षण से वह यीशु का प्रचारक बन गया। यह घटना प्रेरितों के काम में तीन बार दोहराई गई है, जो इसकी महत्ता दिखाती है।

पौलुस ने कितनी मिशनरी यात्राएँ कीं?

पारंपरिक रूप से पौलुस की तीन मिशनरी यात्राएँ गिनी जाती हैं, जो प्रेरितों के काम 13 से 21 तक दर्ज हैं। इन यात्राओं में उसने आज के तुर्की, ग्रीस, साइप्रस और कई अन्य क्षेत्रों की यात्रा की। इसके बाद उसे बंदी बनाकर रोम ले जाया गया, जिसे कुछ लोग उसकी चौथी यात्रा मानते हैं। परंपरा कहती है कि छूटने के बाद उसने स्पेन तक जाने की योजना बनाई और शायद वहाँ पहुँचा भी, लेकिन बाइबल इस पर मौन है।

पौलुस के "काँटे" का क्या मतलब है?

2 कुरिन्थियों 12 में पौलुस "शरीर में एक काँटा" का उल्लेख करता है, जिसे उसने तीन बार दूर करने की प्रार्थना की, पर प्रभु ने कहा, "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है।" यह क्या था, बाइबल स्पष्ट नहीं करती। कुछ मानते हैं कि यह कोई शारीरिक बीमारी थी, शायद आँखों की समस्या, कुछ मानते हैं कि यह विरोधियों का सतत हमला था। जो भी हो, यह उसकी विनम्रता का साधन बना, ताकि वह अपनी सफलताओं पर घमंड न करे।

क्या पौलुस ने यीशु को देखा था?

पौलुस ने यीशु को उनकी सांसारिक सेवकाई के दौरान देखा हो, इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन दमिश्क की सड़क पर उसने पुनरुत्थित मसीह को देखा। इसी अनुभव के आधार पर वह अपने आप को प्रेरित मानता है। 1 कुरिन्थियों 9:1 में वह लिखता है, "क्या मैं ने अपने प्रभु यीशु को नहीं देखा?" उसका मसीह के साथ मुठभेड़ शारीरिक थी, आत्मिक नहीं, हालाँकि यह पुनरुत्थान के बाद हुआ था।

पौलुस ने अन्यजातियों को क्यों प्राथमिकता दी?

क्योंकि यीशु ने खुद उसे इसी काम के लिए बुलाया था। प्रेरितों के काम 9 में हनन्याह से प्रभु कहते हैं कि पौलुस "अन्यजातियों और राजाओं" के सामने उनका नाम प्रचार करेगा। इसका मतलब यह नहीं कि पौलुस यहूदियों की परवाह नहीं करता था, वह हर नए शहर में पहले आराधनालय जाता था। लेकिन जब यहूदी उसके संदेश को अस्वीकार करते, वह अन्यजातियों की ओर मुड़ जाता। रोमियों 9 से 11 में उसका यहूदी लोगों के लिए गहरा दुख साफ दिखता है।

पौलुस और पतरस में मतभेद क्यों हुआ था?

गलातियों 2 में पौलुस बताता है कि अन्ताकिया में उसने पतरस का "मुँह पर सामना किया।" पतरस पहले अन्यजाति विश्वासियों के साथ खाता था, पर जब यरूशलेम से कुछ यहूदी विश्वासी आए, तो वह डरकर अलग हो गया। पौलुस ने इसे पाखंड कहा, क्योंकि इससे यह संदेश जाता कि अन्यजाति दूसरे दर्जे के मसीही हैं। यह मतभेद व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि सुसमाचार की शुद्धता का सवाल था। यह घटना दिखाती है कि पौलुस ने सच्चाई को रिश्तों से ऊपर रखा।

अंत में

पौलुस की कहानी हमें एक ही सच्चाई पर बार-बार लौटाती है, कि परमेश्वर का अनुग्रह उन्हें भी बदल सकता है जिन्हें दुनिया लिख चुकी है। लेकिन इससे भी बढ़कर, यह अनुग्रह अतीत को मिटाता नहीं, उसे गवाही में बदल देता है। पौलुस अपने अंत तक "सबसे छोटा प्रेरित" रहा, और यही उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी। जितना वह अपनी अयोग्यता को जानता था, उतना ही वह अनुग्रह पर निर्भर रहा।

अगर आप उसकी पत्रियाँ पढ़ना चाहते हैं, तो रोमियों से शुरुआत कीजिए, फिर इफिसियों और फिलिप्पियों पर आइए, और अंत में तीमुथियुस और तीतुस को पढ़िए, जहाँ आप उसके सेवा के अंतिम दिनों की झलक पाएँगे। प्रेरितों के काम को साथ-साथ पढ़ना उपयोगी होगा, ताकि आप उसके जीवन की भूगोलिक और ऐतिहासिक रूपरेखा समझ सकें।

और जब आप पढ़ें, तो केवल जानकारी के लिए न पढ़ें। अपने आप से पूछते रहिए, यह आदमी, जिसने कभी मसीहियों को मारा था, आज मेरे लिए क्या कह रहा है? क्योंकि पौलुस की सबसे बड़ी विरासत उसके शब्दों में नहीं, उसके जीवन में है, और वह जीवन आपको भी उसी दौड़ में उतरने के लिए बुला रहा है।

यह पृष्ठ साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter
दैनिक वचन

हर सुबह आपके इनबॉक्स में एक बाइबल अंश और मनन

हर सुबह आपको एक बाइबल अंश और एक छोटा मनन मिलेगा, जिससे आप अपना दिन आरंभ कर सकें। पहले से ही 5.946 लोग साथ पढ़ रहे हैं।

आपको पहले एक पुष्टिकरण ईमेल मिलेगा। आप कभी भी एक क्लिक से सदस्यता समाप्त कर सकते हैं।

अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

प्रार्थना संपादकीय पर 3 यूहन्ना 1:14

पिता, चिट्ठियों और संदेशों से बहुत कुछ कह दिया जाता है, पर आमने सामने मिलने की जगह कोई नहीं ले…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर प्रेरितों के काम 27:44

तूफान के बाद जहाज टूट गया, पर उसी टूटे हुए जहाज के तख्तों ने लोगों को किनारे तक पहुँचाया। "इस…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर व्यवस्थाविवरण 4:15

तुम ने कोई रूप न देखा, केवल शब्द ही सुना," होरेब पर यही हुआ। परमेश्वर ने अपने आप को सुनाया,…

धन्यवाद संपादकीय पर 2 शमूएल 16:1

भागते हुए दाऊद के लिए आपने रास्ते में ही रोटी, किशमिश, अंजीर और दाखमधु भेज दिया, वह भी गदहों पर…

प्रार्थना संपादकीय पर श्रेष्ठगीत 5:14

प्रभु, आपके हाथ मेरे लिए सबसे कीमती हैं, सोने और नीलमणि से भी बढ़कर। जब मैं थक जाता हूँ, वही…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर निर्गमन 4:17

मूसा के हाथ में कोई राजदण्ड नहीं था, बस भेड़ चराने की साधारण लाठी थी। चालीस साल से वही लकड़ी…

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल अध्ययन और मनन तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडलों का उपयोग करता है। सारी सामग्री बाइबल के मूल पाठ से ही तैयार की जाती है और प्रतिदिन एक स्वतंत्र, स्वचालित गुणवत्ता जाँच द्वारा परखी जाती है: प्रत्येक भाषा साइट से यादृच्छिक नमूने पवित्रशास्त्र के प्रति निष्ठा, बाइबल के शब्दशः उद्धरण, भाषा और स्पष्टता के आधार पर आँके जाते हैं, और परिणाम बिना संपादन के प्रकाशित किए जाते हैं। फिर भी, कोई भी व्याख्या अचूक नहीं है और त्रुटियाँ हो सकती हैं। इस मंच पर कुछ भी पेशेवर सलाह नहीं है, और इसकी सामग्री से कोई अधिकार प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो आप पढ़ें उसे सदा स्वयं बाइबल से जाँचें, और Faith.network को अपने व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन, प्रार्थना और स्थानीय कलीसिया के जीवन के पूरक के रूप में उपयोग करें, कभी भी उनके स्थान पर नहीं। हमारी पूर्ण अस्वीकरण सूचना और उपयोग की शर्तें लागू होती हैं। हमारी दैनिक गुणवत्ता जाँच देखें

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव
कंपनी?