मत्ती का सुसमाचार: वादा किया हुआ राजा और स्वर्ग का राज्य
परिचय
नया नियम एक ऐसी सूची से शुरू होता है जिसे ज़्यादातर पाठक पलटकर आगे बढ़ जाते हैं। इब्राहीम, इसहाक, याकूब, फिर नाम पर नाम, कुछ जाने-पहचाने, कुछ बिलकुल अजनबी, और बीच-बीच में चार स्त्रियाँ जिनकी कहानियाँ किसी शरीफ़ खानदान की बहीखाते में लिखी नहीं जातीं। कल्पना कीजिए कि पहली सदी का कोई यहूदी विश्वासी यह पन्ना खोलता है, जिसका मन्दिर या तो ख़तरे में है या राख हो चुका है, जिसे आराधनालय से निकाला जा चुका है, और जिससे उसके अपने रिश्तेदार पूछते हैं, "अगर यीशु सचमुच मसीह था, तो सब कुछ बिखरा क्यों पड़ा है?"
मत्ती उस आदमी के हाथ में एक वंशावली रखता है। क्योंकि वह कहना चाहता है: कुछ भी बिखरा नहीं है, परमेश्वर हिसाब रख रहे हैं, और वादा किया हुआ राजा आ चुका है।
इस पन्ने पर आप मत्ती के सुसमाचार को उसके लेखक, उसके समय, उसकी बनावट और उसके दिल से जानेंगे, और अन्त में एक व्यावहारिक पढ़ने की योजना भी पाएँगे।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
मैं मत्ती को दो कोष्ठकों के बीच पढ़ता हूँ। पहला कोष्ठक अध्याय एक में खुलता है: बालक का नाम "इम्मानुएल" रखा जाएगा, अर्थात् "परमेश्वर हमारे साथ"। आख़िरी कोष्ठक अध्याय अट्ठाईस में खुलता है और कभी बन्द नहीं होता: "मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।" इन दोनों के बीच जो कुछ है, वह वादा किए हुए राजा की कहानी है जो सिंहासन से दूर बैठकर शासन नहीं करता, बल्कि अपनी प्रजा के बीच में आकर बसता है। इसलिए इस मार्गदर्शिका में स्वर्ग का राज्य कोई नक्शा या भविष्य की तारीख़ नहीं है, बल्कि राजा की उपस्थिति है। यही मत्ती को पढ़ने का सबसे गरम और सबसे चुनौतीपूर्ण तरीक़ा है।
बाइबल मत्ती के सुसमाचार के बारे में क्या कहती है?
मत्ती अपनी पुस्तक की सारी धड़कन पहले अध्याय में ही खोल देता है। स्वर्गदूत यूसुफ से कहता है: "वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। यह वाक्य ध्यान से पढ़िए। यहूदी लोग एक ऐसे राजा की बाट जोह रहे थे जो रोमी सेना से उद्धार दे, चुंगी से उद्धार दे, अपमान से उद्धार दे। परमेश्वर एक गहरी क़ैद की ओर उँगली उठाते हैं: पाप। और वे यह भी नहीं कहते कि "वह उद्धार का रास्ता दिखाएगा", बल्कि "वह उद्धार करेगा"। नाम ही काम बन जाता है। इसी अध्याय में यशायाह की भविष्यवाणी दोहराई जाती है कि उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा, जिसका अर्थ है "परमेश्वर हमारे साथ"। पहला कोष्ठक खुल गया।
फिर मत्ती हमें सीधे यीशु की पहली सार्वजनिक घोषणा तक ले जाता है: "उस समय से यीशु ने प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, 'मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है'" (मत्ती 4:17)। यह मत्ती के सुसमाचार का शीर्षक-वाक्य है। "स्वर्ग का राज्य" मत्ती का अपना मुहावरा है, जो वह लगभग तीस बार इस्तेमाल करता है। यह किसी दूसरे लोक की बात नहीं है, बल्कि परमेश्वर के राजपद की बात है जो स्वर्ग से उतरकर इस धरती पर, इस समय में, यीशु की देह में दस्तक दे रहा है। और उसका पहला असर आदेश नहीं, निमंत्रण है: मन फिराओ। दिशा बदलो, क्योंकि राजा दरवाज़े पर है।
राजा जब बोलता है, तो वह अपनी प्रजा का नक्शा नए सिरे से खींचता है। पहाड़ पर बैठकर वह कहता है: "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे। धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे। धन्य हैं वे, जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे। धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी। धन्य हैं वे, जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे। धन्य हैं वे, जो मेल करानेवाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे। धन्य हैं वे, जो धर्म के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है" (मत्ती 5:3-10)। यह प्रवेश-परीक्षा नहीं है, यह राजा की प्रजा का चेहरा है। ग़ौर कीजिए कि पहली और आख़िरी आशीष एक ही वादे पर लौटती है, और वह वादा वर्तमान काल में है: राज्य उन्हीं का है, अभी।
राज्य की केन्द्रीयता उस एक पद में सबसे साफ़ दिखती है जिसे लाखों विश्वासी कंठस्थ रखते हैं: "इसलिए पहले तुम उसके राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी" (मत्ती 6:33)। यह चिन्ता के बीचोंबीच बोला गया वाक्य है, रोटी और कपड़े की बात के ठीक बाद।
फिर पुस्तक के मध्य में कैसरिया फिलिप्पी के रास्ते पर एक सवाल खड़ा होता है, और पतरस का उत्तर आता है: "तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है" (मत्ती 16:16)। यहाँ से सुसमाचार का रुख़ मुड़ जाता है, क्योंकि राजा तुरन्त बताता है कि उसका राज्याभिषेक क्रूस पर होगा। और वहीं, उसकी अन्तिम साँस के साथ, मत्ती लिखता है: "और देखो, मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़े हो गया, और धरती डोल गई, और चट्टानें फट गईं" (मत्ती 27:51)। जो परमेश्वर हमारे साथ आए थे, अब उनके और हमारे बीच का आख़िरी परदा भी हट गया।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
मत्ती को समझने के लिए उसकी पहली पंक्ति काफ़ी है: यह "यीशु मसीह की वंशावली" है, "दाऊद की सन्तान" और "इब्राहीम की सन्तान"। ये दो नाम पूरे पुराने नियम को समेट लेते हैं। इब्राहीम से परमेश्वर ने कहा था कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे; दाऊद से उन्होंने कहा था कि उसका सिंहासन सदा बना रहेगा। मत्ती कहता है: दोनों वादे एक ही व्यक्ति में आकर मिलते हैं।
इसीलिए यह सुसमाचार बार-बार रुककर कहता है, "यह इसलिए हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था, वह पूरा हो।" कुँवारी से जन्म में यशायाह पूरा होता है, बैतलहम में मीका, मिस्र से लौटने में होशे का वाक्य "मैं ने अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया", गलील में सेवकाई शुरू करने में यशायाह का अंधकार में बैठे लोगों पर चमकने वाला उजियाला, गदहे पर बैठकर यरूशलेम में प्रवेश करने में जकर्याह। मत्ती केवल पद उद्धृत नहीं करता, वह पैटर्न दिखाता है। यीशु मिस्र जाते हैं और लौटते हैं, जैसे इस्राएल लौटा था। वे जल में बपतिस्मा लेते हैं और फिर चालीस दिन जंगल में परखे जाते हैं, जैसे इस्राएल चालीस वर्ष जंगल में परखा गया, पर जहाँ इस्राएल गिरा, वहाँ वे खड़े रहते हैं और तीनों बार व्यवस्थाविवरण से उत्तर देते हैं। वे पहाड़ पर चढ़कर व्यवस्था की व्याख्या करते हैं, जैसे मूसा सीनै पर चढ़ा था, पर वे मूसा से बड़े हैं, क्योंकि वे कहते हैं "परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ"।
यीशु इसे स्वयं स्पष्ट करते हैं: "यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ; लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ" (मत्ती 5:17)। पुराना नियम रद्द नहीं होता, वह अपने गन्तव्य पर पहुँचता है। मन्दिर के बारे में वे कहते हैं, "यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी बड़ा है" (मत्ती 12:6)। जो कुछ मन्दिर करता था, अर्थात् परमेश्वर की उपस्थिति को उनके लोगों के बीच लाना, वह अब एक व्यक्ति में सिमट आया है।
और यहीं इस पुस्तक का कैनन में स्थान समझ आता है। मलाकी के आख़िरी शब्दों और मत्ती के पहले शब्दों के बीच चार सौ साल की खामोशी है। नया नियम मत्ती से इसलिए शुरू होता है क्योंकि यह पुस्तक पुल की तरह बनी है: एक छोर पुराने नियम की मिट्टी में गड़ा है, दूसरा छोर सारी जातियों की ओर बढ़ा हुआ है। पुराने नियम में परमेश्वर की उपस्थिति तम्बू में, फिर मन्दिर में, फिर परदे के पीछे थी। मत्ती में वह उपस्थिति चरनी में लेटती है, गलील की गलियों में चलती है, कोढ़ी को छूती है, क्रूस पर परदा फाड़ देती है, और अन्त में वादा करती है कि वह हमेशा साथ रहेगी।
राज्य कोई नक्शा नहीं, राजा की उपस्थिति है।
लेखक, समय और परिस्थितियाँ: चुंगी लेनेवाले की मेज़ से
चारों सुसमाचारों की तरह मत्ती भी अपने भीतर लेखक का नाम नहीं लिखता। पर प्राचीन कलीसिया की गवाही एक स्वर में है। दूसरी सदी के आरम्भ में पापियास लिखता है कि मत्ती ने प्रभु के वचनों को इब्रानी भाषा-शैली में संकलित किया; इरेनियस, ओरिजन और अन्य प्राचीन लेखक भी इसी नाम पर सहमत हैं, और हस्तलिपियों पर शीर्षक हमेशा "मत्ती के अनुसार" ही मिलता है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि अगर कलीसिया किसी पुस्तक को झूठा नाम देना चाहती, तो वह किसी बड़े प्रेरित का नाम चुनती, किसी चुंगी लेनेवाले का नहीं।
और यही इस सुसमाचार का सबसे मार्मिक पहलू है। मत्ती अपनी बुलाहट की कहानी बिना किसी सजावट के लिखता है: "यीशु ने वहाँ से आगे बढ़कर मत्ती नामक एक मनुष्य को चुंगी की चौकी पर बैठे देखा, और उससे कहा, 'मेरे पीछे हो ले।' वह उठकर उसके पीछे हो लिया" (मत्ती 9:9)। मरकुस और लूका उसे लेवी कहते हैं और उसके पेशे को हल्के में छोड़ देते हैं; मत्ती अपने ही चेलों की सूची में अपने नाम के साथ "चुंगी लेनेवाला" लिखवाता है। यह आदमी अपने अतीत को छिपाता नहीं, क्योंकि वही उसकी सबसे बड़ी गवाही है। जो लोग उसे देशद्रोही और पापी समझते थे, उन्हीं के बीच राजा आकर उसकी मेज़ पर बैठ गया।
चुंगी लेनेवाले की आदतें उसकी लेखनी में साफ़ दिखती हैं। वह हिसाब रखता है: वंशावली को तीन बार चौदह पीढ़ियों में बाँटता है, शिक्षाओं को पाँच बड़े भाषणों में सहेजता है, पुराने नियम की भविष्यवाणियों की एक तरह की बहीखाता बनाता है, सिक्कों और कर्ज़ और मज़दूरी की उपमाएँ बार-बार लाता है। दस हज़ार तोड़ों के कर्ज़ की कहानी, दाख की बारी के मज़दूरों की मज़दूरी, तोड़ों का दृष्टान्त, मन्दिर का कर, ये सब उसी हाथ से निकले हैं जो कभी रसीदें काटता था। मत्ती अन्त तक हिसाब रखता है, और हिसाब मिल जाता है।
पुस्तक कब लिखी गई, इस पर विद्वान बँटे हुए हैं। कई लोग इसे सन् 60 के दशक में रखते हैं, यरूशलेम के मन्दिर के नाश से पहले; कई इसे सन् 70 के बाद के दशकों में रखते हैं, क्योंकि अध्याय 22 और 24 की भाषा में मन्दिर के विनाश की छाया दिखाई देती है। दोनों ही संभावनाएँ विश्वास के लिए कोई ख़तरा नहीं हैं। परिस्थिति स्पष्ट है: यह सुसमाचार मुख्यतः यहूदी पृष्ठभूमि वाले विश्वासियों के लिए लिखा गया, संभवतः सीरिया के अन्ताकिया जैसे किसी शहर में, जहाँ यहूदी और ग़ैरयहूदी विश्वासी एक ही मेज़ पर बैठ रहे थे और जहाँ आराधनालय के साथ तनाव बढ़ रहा था।
इसीलिए मत्ती यहूदी रीति-रिवाज़ों की व्याख्या नहीं करता, वह मान लेता है कि पाठक उन्हें जानते हैं; इसीलिए वह "परमेश्वर" नाम के प्रति यहूदी आदर के कारण अक्सर "स्वर्ग का राज्य" कहता है; और इसीलिए वह इतनी बार साबित करता है कि यीशु में पवित्रशास्त्र पूरा हुआ। उसके पाठक अपनी पहचान खो रहे थे, और वह उन्हें बताता है कि वे कुछ खो नहीं रहे, वे उस मंज़िल पर पहुँच गए हैं जिसकी ओर मूसा और भविष्यद्वक्ता इशारा करते थे।
रचना और मुख्य विषय
मत्ती का ढाँचा किसी संयोग से नहीं बना। पूरी पुस्तक कहानी और उपदेश के बदलते क्रम पर टिकी है: कुछ अध्यायों में घटनाएँ चलती हैं, फिर एक लम्बा भाषण आता है, और भाषण के अन्त में लगभग एक ही वाक्य दोहराया जाता है, "जब यीशु ये बातें कह चुका"। ऐसे पाँच बड़े भाषण हैं, और यही इस पुस्तक की रीढ़ है।
पहला है पहाड़ी उपदेश, अध्याय 5 से 7, जिसमें राजा अपनी प्रजा के जीवन का चरित्र खींचता है। दूसरा है अध्याय 10, जहाँ वह बारह चेलों को भेजते हुए मिशन और सताव की बात करता है। तीसरा है अध्याय 13, राज्य के दृष्टान्तों का गुच्छा, जहाँ राज्य को बीज, खमीर, छिपे हुए धन और जाल की तरह दिखाया जाता है, यानी कुछ ऐसा जो छोटा दिखता है पर सब कुछ बदल देता है। चौथा है अध्याय 18, कलीसिया के भीतर के जीवन पर, जहाँ छोटों की क़ीमत, भटके हुए की खोज और क्षमा की असीम माँग रखी जाती है। पाँचवाँ है अध्याय 23 से 25, जिसमें अन्त के दिनों और राजा के लौटने की बात है, और जो भेड़ों और बकरियों के उस दृश्य पर ख़त्म होता है जहाँ राजा कहता है, "जो कुछ तुम ने इन मेरे भाइयों में से किसी छोटे से छोटे के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया" (मत्ती 25:40)।
बहुत से पाठकों ने पहचाना है कि ये पाँच भाषण मूसा की पाँच पुस्तकों की याद दिलाते हैं। मत्ती अपने यहूदी पाठकों से कह रहा है: यहाँ एक नया मूसा है, बल्कि मूसा से बड़ा कोई है, जो व्यवस्था देने नहीं, उसे पूरा करने आया है।
इस ढाँचे के चारों ओर तीन बड़े हिस्से हैं। शुरुआत, अध्याय 1 से 4, राजा के आगमन और उसकी पहचान की है: वंशावली, जन्म, ज्योतिषियों का "यहूदियों का राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है", हेरोदेस का डर, बपतिस्मा और जंगल में परीक्षा। बीच का हिस्सा, अध्याय 4 से 16, गलील में राज्य के प्रकट होने का है: चंगाई, दुष्टात्माओं से छुटकारा, भीड़, विरोध, और अन्त में पतरस का अंगीकार। और अन्तिम हिस्सा, अध्याय 16 से 28, यरूशलेम की ओर बढ़ती यात्रा, क्रूस और पुनरुत्थान का है। पतरस के अंगीकार के तुरन्त बाद यीशु पहली बार अपने दुःखभोग की घोषणा करते हैं, और उसके बाद पुस्तक का ढलान लगातार गुलगुता की ओर जाता है।
विषयों की बात करें तो पाँच धागे हर पन्ने में बुने हुए हैं। पहला, यीशु दाऊद की सन्तान और वादा किया हुआ राजा है; मत्ती उसे नौ बार "दाऊद की सन्तान" कहता है, और क्रूस पर भी दोष-पत्र यही घोषित करता है, "यह यहूदियों का राजा यीशु है"। दूसरा, स्वर्ग का राज्य, जो यीशु में आ चुका है और उसके लौटने पर पूरा होगा। तीसरा, पवित्रशास्त्र की पूर्णता। चौथा, सच्चा धर्म, यानी वह धार्मिकता जो दिखावे से नहीं, हृदय से निकलती है; इसीलिए यीशु कहते हैं कि तुम्हारा धर्म शास्त्रियों और फरीसियों के धर्म से बढ़कर होना चाहिए, और इसीलिए वे दो बार होशे का वाक्य दोहराते हैं कि परमेश्वर बलिदान नहीं, दया चाहते हैं। पाँचवाँ धागा वही है जो इस पूरे पन्ने का दृष्टिकोण है: इम्मानुएल, परमेश्वर हमारे साथ। मत्ती अकेला सुसमाचार-लेखक है जो "कलीसिया" शब्द का प्रयोग करता है, और वह इसे उपस्थिति के वादे से जोड़ता है: "क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" (मत्ती 18:20)।
इस पुस्तक के मुख्य पद
तीन पद इस सुसमाचार का पूरा भार उठाते हैं, और तीनों उसी कोष्ठक की कहानी कहते हैं जिससे हमने शुरुआत की थी।
पहला, "वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। यहूदी नामों में अर्थ होता था, और "यीशु" का अर्थ है "यहोवा उद्धार करते हैं"। ध्यान दीजिए कि उद्धार किससे है: रोम से नहीं, ग़रीबी से नहीं, बल्कि "उनके पापों से"। और ध्यान दीजिए कि यह किनके लिए है: "अपने लोगों" के लिए, यानी वे जो उसके अपने ठहराए गए हैं, और मत्ती के अन्त तक हम देखेंगे कि उस झुंड में बाबुल के वंश से लेकर रोमी सूबेदार और कनानी स्त्री तक शामिल हो जाते हैं। यह पद मत्ती के हर अध्याय के नीचे बहती हुई धारा है। जब वह पापियों के साथ खाता है, जब वह लकवे के मारे हुए से पहले "तेरे पाप क्षमा हुए" कहता है, जब वह कटोरा उठाकर कहता है कि यह लहू "बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त" बहाया जाता है, तब वही नाम अपना अर्थ पूरा कर रहा होता है।
दूसरा, "इसलिए पहले तुम उसके राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी" (मत्ती 6:33)। इस पद को अक्सर सफलता का फ़ॉर्मूला बना दिया जाता है, मानो परमेश्वर को पहले रखने से चीज़ें अपने आप बरसने लगेंगी। पर संदर्भ देखिए: यीशु उन लोगों से बोल रहे हैं जिनके पास कल के भोजन की गारंटी नहीं थी। "ये सब वस्तुएँ" का मतलब रोटी, कपड़ा और वह न्यूनतम है जिसकी चिन्ता में हम रातें काटते हैं। यीशु चिन्ता का इलाज संसाधन नहीं, प्राथमिकता बताते हैं। जब राजा और उसकी धार्मिकता जीवन के केन्द्र में आ जाती है, तो बाक़ी सब चीज़ें अपनी सही जगह पर, यानी परिधि पर, चली जाती हैं। यह लापरवाही की नहीं, भरोसे की शिक्षा है, क्योंकि जो पिता आकाश के पक्षियों को खिलाते हैं, वे अपने बच्चों को भूल नहीं सकते।
तीसरा, वह वाक्य जिससे यह सुसमाचार बन्द होता है और कलीसिया शुरू होती है: "यीशु ने उनके पास आकर कहा, 'स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिए तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ; और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ'" (मत्ती 28:18-20)। यह आज्ञा तीन कोनों पर टिकी है: राजा का अधिकार, चेला बनाने का काम, और उसकी उपस्थिति का वादा। बीच में जो आज्ञा है, वह असंभव लगती है; पर वह पहले और आख़िरी वाक्य के बीच रखी गई है, जैसे कोई कमज़ोर पुल दो मज़बूत खम्भों पर टिका हो। और सबसे प्यारी बात यह है कि जिस पहाड़ पर वे यह कहते हैं, वहाँ कुछ चेले अब भी सन्देह कर रहे थे, फिर भी उन्हीं को भेजा गया।
मत्ती पढ़ने की एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका
मत्ती को धीरे पढ़िए, पर एक बार पूरा ज़रूर पढ़िए। अट्ठाईस अध्याय हैं, और अगर आप रोज़ एक अध्याय पढ़ें तो एक महीने में यह पुस्तक ख़त्म हो जाती है। पहली बार पढ़ते समय टिप्पणियों में मत उलझिए; बस कहानी के बहाव के साथ चलिए और हर अध्याय के बाद एक वाक्य लिखिए कि आज राजा के बारे में क्या नया दिखा।
अगर आप बिलकुल नए हैं, तो शुरुआत अध्याय 5 से 7 यानी पहाड़ी उपदेश से मत कीजिए, वरना बोझ के नीचे दब जाएँगे। पहले अध्याय 8 और 9 पढ़िए, जहाँ यीशु कोढ़ी को छूते हैं, तूफ़ान को शान्त करते हैं, और मत्ती को चुंगी की चौकी से बुलाते हैं। जब आप राजा की करुणा देख लेंगे, तब उसकी माँगें अलग स्वाद में सुनाई देंगी।
दूसरे चरण में पाँच भाषणों को अलग से पढ़िए, एक-एक सप्ताह देकर: अध्याय 5 से 7, फिर 10, फिर 13, फिर 18, फिर 24 और 25। हर भाषण के बाद ख़ुद से एक ही सवाल पूछिए: इस भाषण में राजा अपनी प्रजा से किस तरह का हृदय माँग रहा है?
तीसरे चरण में पूर्णता के पदों पर निशान लगाइए। जब भी "यह इसलिए हुआ कि वचन पूरा हो" जैसा वाक्य आए, हाशिये पर पुराने नियम का संदर्भ लिख दीजिए और वहाँ जाकर पढ़िए। यह अभ्यास आपकी बाइबल को एक ही किताब बना देगा।
चौथे चरण में अध्याय 26 से 28 को एक ही बैठक में, बिना रुके पढ़िए, अगर हो सके तो पवित्र सप्ताह के दिनों में। और अन्त में वंशावली पर लौटिए। जिन नामों को आपने पहली बार छोड़ दिया था, अब उन्हें पढ़िए, और गिनिए कि उस सूची में कितने टूटे हुए लोग हैं। वहीं आपको अपनी जगह मिलेगी।
एक आख़िरी सुझाव: मत्ती को अकेले नहीं, किसी के साथ पढ़िए। यह पुस्तक चेलों के लिए लिखी गई थी, और चेलापन कभी अकेले नहीं होता।
दर्पण
आप जानते हैं कि यीशु प्रभु हैं। पर सोमवार सुबह जब आपका बजट बिगड़ता है, जब आपकी नौकरी की सुरक्षा हिलती है, जब घर में वही पुराना झगड़ा फिर उठ खड़ा होता है, तब आपके भीतर कौन राज करता है? मत्ती 6:33 आपसे सफलता का वादा नहीं करता, वह आपसे सिंहासन माँगता है। और यह माँग बहुत असुविधाजनक है, क्योंकि हममें से ज़्यादातर लोग यीशु को सलाहकार बनाकर रखना चाहते हैं, राजा बनाकर नहीं। सलाहकार की बात न मानो तो कुछ नहीं होता; राजा की बात न मानो तो आप विद्रोही हैं।
अब दूसरी तरफ़ देखिए। अगर आप आज थके हुए हैं, अगर आपके भीतर वह अकेलापन है जिसे आप किसी को बता नहीं पाते, अगर आपका शरीर आपका साथ नहीं दे रहा, अगर आपने वही पाप फिर किया जिसे आपने कसम खाकर छोड़ा था, तो इस पुस्तक के दोनों कोष्ठक आपके लिए ही खुले हैं। "परमेश्वर हमारे साथ" का मतलब यह नहीं कि परमेश्वर आपके सुधरने का इन्तज़ार कर रहे हैं। इसका मतलब है कि वे उस चुंगी की चौकी तक चलकर आए, उस मेज़ पर बैठे, और उन्होंने कहा, "मेरे पीछे हो ले।"
मत्ती आपको दोनों चीज़ें एक साथ देता है: एक ऐसा राजा जिसकी माँगें आपकी हर सुविधा को चुनौती देती हैं, और एक ऐसा उद्धारकर्ता जो आपके पापों से आपको बचाने के लिए परदा फाड़ देता है। इन दोनों को अलग मत कीजिए। अगर आप केवल माँगें सुनेंगे, तो टूट जाएँगे। अगर आप केवल कृपा सुनेंगे, तो सस्ते हो जाएँगे।
आज एक ही सवाल अपने आप से पूछिए। मत्ती 16:16 में पतरस से पूछा गया था, "तुम मुझे क्या कहते हो?" वह सवाल किसी सिद्धान्त की परीक्षा नहीं था। वह सवाल आज आपके नाम के साथ पूछा जा रहा है, और आपका जवाब आपके कैलेंडर और आपके बैंक खाते में लिखा जाएगा, आपकी डायरी में नहीं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को मत्ती का सुसमाचार समझाना आसान है, क्योंकि बच्चे राजाओं और राज्यों की भाषा तुरन्त पकड़ लेते हैं। आप उनसे कह सकते हैं कि परमेश्वर ने बहुत, बहुत पहले वादा किया था कि वे एक ऐसा राजा भेजेंगे जो कभी बुरा नहीं होगा, कभी झूठ नहीं बोलेगा, और किसी को डराएगा नहीं। लोग सैकड़ों साल इन्तज़ार करते रहे। और फिर वह राजा आया, पर महल में नहीं, एक छोटे-से गाँव की चरनी में; सोने के मुकुट के साथ नहीं, काँटों के मुकुट के साथ। यह राजा बीमारों को छूता था, बच्चों को अपने पास बुलाता था, और उन लोगों के साथ खाना खाता था जिनके साथ कोई नहीं खाता था।
फिर उन्हें दो वाक्य याद कराइए, एक किताब के शुरू का और एक अन्त का: "परमेश्वर हमारे साथ" और "मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ"। बच्चों के लिए यह सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी है, क्योंकि उनका सबसे बड़ा डर अकेले छूट जाना होता है। राजा यीशु अकेला नहीं छोड़ते।
अलग-अलग उम्र के बच्चों को अलग तरीक़े चाहिए। छोटे बच्चों को, तीन से छह साल के, चित्रों और छोटी कहानियों की ज़रूरत होती है; सात से बारह साल के बच्चे नक्शा, कहानी का क्रम और सवाल-जवाब पसन्द करते हैं; और बारह साल से ऊपर के किशोर पहाड़ी उपदेश की सचमुच की चुनौतियों से जूझना चाहते हैं, जैसे क्षमा, दिखावा और पैसे का लालच। इसी वेबसाइट पर इन तीनों आयु-वर्गों के लिए अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, ताकि आप अपने बच्चे की उम्र के अनुसार सही सामग्री चुन सकें और परिवार के साथ मत्ती को पढ़ना एक बोझ नहीं, एक साझा खोज बन जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मत्ती का सुसमाचार किसने लिखा?
पुस्तक स्वयं अपने लेखक का नाम नहीं बताती, पर आरम्भिक कलीसिया की सर्वसम्मत गवाही यह है कि इसे मत्ती ने लिखा, जो यीशु के बारह चेलों में से एक और पहले चुंगी लेनेवाला था। पापियास, इरेनियस और अन्य प्राचीन साक्षी उसी नाम पर सहमत हैं, और सभी प्राचीन हस्तलिपियों में शीर्षक "मत्ती के अनुसार" ही मिलता है। यह भी उल्लेखनीय है कि लेखक अपने चेलों की सूची में अपने नाम के साथ "चुंगी लेनेवाला" जोड़ता है, जो आत्म-प्रशंसा नहीं, आत्म-स्वीकृति है।
मत्ती का सुसमाचार कब लिखा गया?
निश्चित तारीख़ किसी को मालूम नहीं। कई विद्वान इसे सन् 60 के दशक में रखते हैं, यानी यरूशलेम के मन्दिर के नाश से कुछ पहले, और कई इसे सन् 70 के बाद के दो दशकों में रखते हैं, क्योंकि पुस्तक में मन्दिर के विनाश की गूँज सुनाई देती है। दोनों संभावनाएँ पुस्तक के अधिकार को कम नहीं करतीं। जो बात निश्चित है वह यह है कि यह पहली सदी की रचना है, प्रत्यक्षदर्शियों के जीवनकाल के भीतर लिखी गई, और दूसरी सदी के आरम्भ से ही कलीसियाओं में व्यापक रूप से पढ़ी जाती थी।
"स्वर्ग का राज्य" और "परमेश्वर का राज्य" में क्या अंतर है?
व्यावहारिक रूप से इनमें कोई अन्तर नहीं है; ये एक ही सच्चाई के दो नाम हैं। मत्ती अपने यहूदी पाठकों को ध्यान में रखते हुए "स्वर्ग" शब्द का प्रयोग करता है, क्योंकि यहूदी परमेश्वर के नाम को आदरवश सीधे नहीं बोलते थे। जहाँ मरकुस और लूका "परमेश्वर का राज्य" लिखते हैं, वहीं समानान्तर वचनों में मत्ती अक्सर "स्वर्ग का राज्य" लिखता है। दोनों का अर्थ है परमेश्वर का राजपद, उनका शासन और उनकी उपस्थिति, जो यीशु में इस धरती पर आ चुकी है और उनके लौटने पर पूर्ण होगी।
मत्ती का सुसमाचार वंशावली से क्यों शुरू होता है?
क्योंकि मत्ती एक क़ानूनी दावा पेश कर रहा है। यहूदी पाठक के लिए यह सवाल सबसे पहले था कि यीशु के पास दाऊद के सिंहासन का अधिकार है या नहीं, और वंशावली उसी अधिकार का दस्तावेज़ है। पर मत्ती केवल राजवंश नहीं दिखाता; वह उस सूची में तामार, राहाब, रूत और उरिय्याह की पत्नी को भी जोड़ देता है, यानी वे नाम जिनकी कहानियाँ बदनामी, विदेशीपन और पाप से जुड़ी हैं। पहली ही पंक्ति से यह सुसमाचार घोषणा कर देता है कि राजा शुद्ध लोगों की नहीं, टूटे हुए लोगों की सन्तान बनकर आया।
मत्ती, मरकुस और लूका इतने मिलते-जुलते क्यों हैं?
इन तीनों को "समदर्शी सुसमाचार" कहा जाता है, क्योंकि ये यीशु के जीवन को एक ही दृष्टिकोण से देखते हैं और कई घटनाएँ लगभग समान शब्दों में बताते हैं। इसका सीधा कारण यह है कि तीनों एक ही सच्ची कहानी सुना रहे हैं और आरम्भिक कलीसिया में यीशु के वचन और कार्य मौखिक तथा लिखित रूप में साझा रूप से प्रचलित थे। साथ ही हर लेखक की अपनी दृष्टि है: मत्ती राजा और पूर्णता पर ज़ोर देता है, मरकुस गति और सेवकाई पर, और लूका करुणा तथा हाशिये के लोगों पर।
क्या मत्ती का सुसमाचार केवल यहूदियों के लिए लिखा गया था?
मुख्य पाठक निश्चय ही यहूदी पृष्ठभूमि के विश्वासी थे, पर सन्देश कभी सीमित नहीं था। यही सुसमाचार पूर्व से आए ज्योतिषियों को सबसे पहले राजा को प्रणाम करते दिखाता है, यही रोमी सूबेदार के विश्वास की प्रशंसा करता है, यही कनानी स्त्री की प्रार्थना सुनी जाती दिखाता है, और यही सबसे व्यापक आज्ञा पर समाप्त होता है कि सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ। मत्ती इस्राएल की मिट्टी में जड़ें जमाता है ताकि पूरी दुनिया तक शाखाएँ फैला सके।
पहाड़ी उपदेश क्या है और क्या उसे सचमुच जीना संभव है?
पहाड़ी उपदेश मत्ती 5 से 7 तक फैला यीशु का सबसे लम्बा भाषण है, जिसमें राज्य की प्रजा का चरित्र, प्रार्थना, पैसा, क्रोध, वासना, क्षमा और शत्रु-प्रेम पर उनकी शिक्षा है। इसे अपनी शक्ति से पूरा करना असंभव है, और यही उसका उद्देश्य भी है: वह हमें अपनी असमर्थता के आमने-सामने खड़ा करता है। पर वह असम्भव आदर्श नहीं, नए जीवन का वर्णन है। जो व्यक्ति कृपा से नया जन्म पाता है और पवित्र आत्मा के सहारे चलता है, उसमें ये गुण धीरे-धीरे उगने लगते हैं।
मत्ती 27:51 में मन्दिर का परदा फटने का क्या अर्थ है?
वह भारी परदा परम पवित्र स्थान को बाकी मन्दिर से अलग करता था, और वर्ष में केवल एक बार, केवल महायाजक ही उसके पीछे जा सकता था। जब यीशु ने प्राण त्यागे, वह परदा ऊपर से नीचे तक फट गया, यानी इंसान ने नहीं, परमेश्वर ने उसे फाड़ा। इसका अर्थ है कि पाप की वह दीवार, जो परमेश्वर की उपस्थिति और हमारे बीच खड़ी थी, मसीह के बलिदान से गिरा दी गई। अब हर विश्वासी, बिना किसी मध्यस्थ के, पिता के पास आ सकता है।
महान आज्ञा आज मेरे लिए क्या मायने रखती है?
मत्ती 28:18-20 केवल मिशनरियों के लिए नहीं है। मूल आज्ञा "चेला बनाओ" है, और "जाकर", "बपतिस्मा देकर" तथा "सिखाकर" उसी के तरीक़े हैं। इसका मतलब है कि आप जहाँ भी रखे गए हैं, दफ़्तर में, कक्षा में, रसोई में, वहीं लोगों को यीशु के पीछे चलना सिखाना आपका बुलावा है। और यह आज्ञा अकेले नहीं दी गई; उसके आगे राजा का सारा अधिकार खड़ा है और उसके पीछे उसकी उपस्थिति का वादा, इसलिए यह बोझ नहीं, साझेदारी है।
मत्ती का सुसमाचार नए नियम में सबसे पहले क्यों रखा गया है?
यह लिखे जाने के क्रम में शायद पहला न हो, पर स्थान के हिसाब से इसका पहले होना बहुत अर्थपूर्ण है। मत्ती पुराने और नए नियम के बीच का पुल है: वह इब्राहीम और दाऊद से शुरू करता है, बार-बार भविष्यद्वक्ताओं को उद्धृत करता है, और दिखाता है कि इस्राएल की पूरी कहानी यीशु में आकर पूरी होती है। जो पाठक मलाकी बन्द करके मत्ती खोलता है, उसे लगता है कि कहानी टूटी नहीं, बस चार सौ साल की खामोशी के बाद फिर शुरू हो गई है।
मत्ती में "दाऊद की सन्तान" और "मनुष्य का पुत्र" का क्या अर्थ है?
"दाऊद की सन्तान" उस वादे की ओर इशारा करता है कि दाऊद के वंश से एक राजा उठेगा जिसका राज्य सदा रहेगा; मत्ती में अक्सर बीमार और हाशिये के लोग ही यीशु को इस नाम से पुकारते हैं, यानी वे धर्मगुरुओं से पहले पहचान लेते हैं कि वे कौन हैं। "मनुष्य का पुत्र" यीशु का अपने लिए सबसे प्रिय नाम है, जो दानिय्येल 7 से आता है, जहाँ मनुष्य के पुत्र जैसा एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने लाया जाता है और उसे सारी जातियों पर अधिकार दिया जाता है। यह नाम दीनता और महिमा, दोनों एक साथ कहता है।
मत्ती को पहली बार पढ़ूँ तो कहाँ से शुरू करूँ?
अगर आप बाइबल में नए हैं, तो अध्याय 8 और 9 से शुरू कीजिए, जहाँ यीशु के काम और करुणा तेज़ी से आपके सामने खुलते हैं, और फिर अध्याय 1 पर लौटकर पूरी पुस्तक क्रम से पढ़िए। रोज़ एक अध्याय के हिसाब से यह लगभग एक महीने में पूरी हो जाती है। पढ़ते समय हर बार अपने आप से यही सवाल पूछिए कि इस पन्ने पर राजा कैसा दिखाई देता है और वह मुझसे क्या माँग रहा है। अन्तिम तीन अध्याय एक ही बैठक में पढ़िए।
अंत में
मत्ती की पूरी पुस्तक दो वाक्यों के बीच बंद है, और वे दोनों वाक्य एक ही बात कहते हैं। शुरुआत में बालक का नाम इम्मानुएल रखा जाता है, "परमेश्वर हमारे साथ"; अन्त में जी उठा हुआ राजा कहता है, "मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ"। बीच में वंशावली है, पहाड़ का उपदेश है, दृष्टान्त हैं, विरोध है, आँसू हैं, काँटों का मुकुट है और फटा हुआ परदा है। पर धागा एक ही है: वादा किया हुआ राजा दूर से हुकूमत नहीं करता, वह पास आकर बसता है।
वह राजा जो साथ रहता है, वही सचमुच का राजा है।
इसलिए इस सुसमाचार को केवल जानकारी की तरह मत पढ़िए। इसे उस आदमी की तरह पढ़िए जो अपनी चुंगी की चौकी पर बैठा था और जिसने एक दिन अपनी क़लम उठाकर यह सब लिखा, ताकि आप भी वही आवाज़ सुनें: "मेरे पीछे हो ले।" अगली बार जब आप मत्ती खोलें, तो एक अध्याय पढ़िए और एक सवाल लिखिए, फिर उसी सवाल के साथ प्रार्थना में बैठिए। पहाड़ी उपदेश से, या पाँच भाषणों में से किसी एक से शुरुआत कीजिए, और देखिए कि यह पुस्तक आपके सोमवार को कैसे बदलती है। राजा आ चुका है, और वह आपके साथ है।
