परमेश्वर दुःख क्यों आने देता है: कष्ट के समय में बाइबल का उत्तर
परिचय
रात के दो बजे अस्पताल का गलियारा बहुत लंबा लगता है। ट्यूबलाइट की ठंडी रोशनी, दवाइयों की गंध, और आईसीयू के दरवाज़े पर लगा वह छोटा सा शीशा जिसमें से आप अपने अपने ही आदमी को देख रहे हैं, नलियों और मशीनों से घिरा हुआ। उसी गलियारे में कोई बहन अपने आँचल में मुँह छिपाकर फुसफुसाती है, "परमेश्वर, मैंने तो आपकी सेवा की, फिर यह क्यों?"
यह सवाल किताबों में पैदा नहीं होता। यह अस्पतालों में, कब्रिस्तानों में, तलाक के कागज़ों पर, बेरोज़गारी के महीनों में और उन रातों में पैदा होता है जब प्रार्थना करते-करते आँसू सूख जाते हैं। परमेश्वर दुःख क्यों देता है, यह प्रश्न अविश्वास का सबूत नहीं; अक्सर यह सबसे गहरे विश्वास की चीख होती है।
इस पन्ने पर आप देखेंगे कि बाइबल इस प्रश्न को टालती नहीं, उसे दबाती भी नहीं। पर उसका उत्तर उस रूप में नहीं आता जिस रूप में हम माँगते हैं। और यही उसकी सबसे बड़ी राहत है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
यह पन्ना दुःख को एक पहेली की तरह नहीं, एक मुलाक़ात की जगह की तरह पढ़ता है। पवित्रशास्त्र में "क्यों" का उत्तर कोई दार्शनिक समीकरण नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति है, और वह व्यक्ति घायल है। परमेश्वर दुःख बाँटने वाला कोई दूर बैठा न्यायाधीश नहीं; वे मसीह में हमारे दुःख के भीतर उतर आए, उसे अपने शरीर पर ले लिया, और उसे व्यर्थ जाने से बचा लिया। इसलिए हम यहाँ "परमेश्वर दुःख क्यों देता है" से चलकर "कौन मेरे साथ इस अंधकार में खड़ा है" तक पहुँचेंगे। यह बदलाव सिद्धांत की चतुराई नहीं, कष्ट में जीने योग्य एकमात्र उत्तर है।
बाइबल दुःख और कष्ट के बारे में क्या कहती है?
सबसे पहले एक ईमानदार बात: बाइबल दुःख को सामान्य बताती है, विशेष नहीं। यीशु ने अपने चेलों से आख़िरी रात यही कहा, "मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (यूहन्ना 16:33)। ध्यान दीजिए, उन्होंने यह नहीं कहा कि क्लेश हो सकता है, उन्होंने कहा कि होता है। मसीही जीवन दुःख से बचने का बीमा नहीं है; वह दुःख के बीच में एक जीती हुई शान्ति का वादा है। जो लोग आपको सिखाते हैं कि सच्चा विश्वास आपको हर पीड़ा से बचा लेगा, वे यीशु के आख़िरी उपदेश की इस पंक्ति को काट देते हैं।
पतरस इसी बात को कलीसिया की भाषा में दोहराता है, "हे प्रियों, जो दुख की ज्वाला तुम्हारे परखने के लिये तुम में भड़की है, इससे अचम्भा न करो, कि यह कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है" (1 पतरस 4:12)। दुःख में हमें दोहरी चोट लगती है: एक तो पीड़ा, दूसरा यह अचंभा कि ऐसा मेरे साथ कैसे हो सकता है। पतरस दूसरी चोट को हटा देता है। आप किसी अपवाद में नहीं हैं, आप उस मार्ग पर हैं जिस पर कलीसिया शुरू से चलती आई है।
फिर बाइबल एक और बात कहती है जो सुनने में कठोर लग सकती है पर गहराई में करुणा से भरी है: परमेश्वर दुःख को बेकार नहीं जाने देते। याकूब लिखता है, "हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो" (याकूब 1:2)। वह यह नहीं कहता कि परीक्षा अच्छी है, वह कहता है कि परीक्षा फलदायी है, क्योंकि आगे की आयतों में वह समझाता है कि धीरज सिद्ध होकर हमें पूरा और सम्पूर्ण बनाता है। पौलुस भी वही तराज़ू उठाता है, "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है" (2 कुरिन्थियों 4:17)। जिस आदमी की पीठ पर कोड़ों के निशान थे, जिसे पत्थरवाह किया गया, जो जहाज़ टूटने पर समुद्र में रात-दिन बहा, वही अपने क्लेश को "हल्का सा" कहता है। यह पीड़ा का इनकार नहीं, तुलना है। उसने अनन्त महिमा को इतने पास से देखा कि उसके सामने यह बोझ पलड़े पर हल्का पड़ गया।
और सबसे अधिक कहा जाने वाला वचन, "और हम जानते हैं, कि जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं" (रोमियों 8:28)। यहाँ यह नहीं लिखा कि सब बातें भली हैं। कैंसर भला नहीं है, विश्वासघात भला नहीं है, बच्चे की मृत्यु भली नहीं है। लिखा है कि सब बातें मिलकर भलाई उत्पन्न करती हैं, जैसे कड़वी जड़ें और तीखे मसाले मिलकर एक दवा बनते हैं। और यह भलाई क्या है, उसे पौलुस अगली आयत में खोल देता है: कि हम मसीह के स्वरूप में ढल जाएँ। परमेश्वर का पहला लक्ष्य हमें आराम देना नहीं, हमें अपने पुत्र जैसा बनाना है।
दुःख कभी अच्छा नहीं होता; परमेश्वर उसे व्यर्थ नहीं छोड़ते।
इन सबके नीचे एक और वचन नींव की तरह पड़ा है, "यहोवा टूटे मनवालों के निकट रहता है, और पिसे हुओं का उद्धार करता है" (भजन संहिता 34:18)। बाइबल हमें दुःख की गुत्थी का पूरा नक्शा नहीं देती। वह हमें कुछ बेहतर देती है: टूटे हुए दिल के सबसे पास परमेश्वर की उपस्थिति।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
दुःख बाइबल के तीसरे अध्याय में घुसता है और अंतिम से दूसरे अध्याय में मरता है। उत्पत्ति 3 में मनुष्य के विद्रोह के बाद ज़मीन काँटे उगाने लगी, जन्म देना पीड़ा बन गया, और मृत्यु इतिहास में घुस आई। इसलिए बाइबल की पहली बात यह है कि दुःख परमेश्वर की मूल रचना का हिस्सा नहीं था। वह घुसपैठिया है। पौलुस इसी को कहता है कि "सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है" (रोमियों 8:22)। जब आपका मन कहता है "ऐसा नहीं होना चाहिए था", तो आपका मन झूठ नहीं बोल रहा। ऐसा वाक़ई नहीं होना चाहिए था।
पुराना नियम इस कराह को छिपाता नहीं। अय्यूब की पुस्तक अड़तीस अध्यायों तक एक धर्मी आदमी को चिल्लाने देती है और उसके धार्मिक मित्रों के सुव्यवस्थित उत्तरों को अंत में परमेश्वर स्वयं गलत ठहराते हैं। ध्यान दीजिए, अय्यूब को कभी यह नहीं बताया गया कि पर्दे के पीछे क्या हुआ था। उसे उत्तर के बजाय उत्तर देने वाला मिला, और वह इतना था कि उसने कहा, "मैं ने तेरा समाचार कान से सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं" (अय्यूब 42:5)। भजन संहिता में तो एक तिहाई भजन विलाप के हैं। "हे यहोवा, तू कब तक?" जैसी पुकार परमेश्वर ने अपनी ही प्रार्थना-पुस्तक में रख दी, ताकि हम जानें कि शिकायत भी उपासना का हिस्सा हो सकती है। यूसुफ़ की कहानी, दासता, झूठा आरोप और तेरह साल की जेल, अंत में उत्पत्ति 50:20 पर पहुँचती है, जहाँ वह कहता है कि भाइयों ने बुरा सोचा था पर परमेश्वर ने उसी बात में भलाई सोची थी। एक ही घटना, दो इरादे, और परमेश्वर का इरादा ऊपर।
फिर यशायाह 53 आता है और सूत्र अपनी चरम पर पहुँचता है। परमेश्वर का दास एक "दुखी पुरुष" के रूप में आता है, तुच्छ जाना गया, त्यागा हुआ, हमारे रोग उठाता हुआ। यह वह जगह है जहाँ दुःख का धर्मशास्त्र अपने घुटनों पर आ जाता है, क्योंकि यहाँ परमेश्वर दुःख के विषय में भाषण नहीं देते, वे उसमें प्रवेश करते हैं।
नया नियम इस प्रवेश की गवाही है। जो अपने मित्र की कब्र पर आँसू बहाता है (यूहन्ना 11:35), जो गतसमनी में लहू जैसा पसीना बहाता है, जो क्रूस पर भजन संहिता 22 के शब्द उठाकर चिल्लाता है, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?" (मत्ती 27:46), वही हमारा महायाजक है, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी हो सकता है (इब्रानियों 4:15)। इसलिए यूहन्ना 16:33 की शान्ति किसी ऐसे व्यक्ति की ओर से नहीं आती जिसने कष्ट को दूर से देखा हो। वह उसकी ओर से आती है जिसने संसार को भीतर से जीता।
और कहानी खुली कब्र और खाली क्रूस पर भी नहीं रुकती। वह प्रकाशितवाक्य 21:4 तक जाती है, "और वह उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; क्योंकि पहिली बातें जाती रहीं।" बाइबल का उत्तर आँसुओं को नकारना नहीं, उन्हें गिनना और फिर पोंछना है। और पोंछने वाला हाथ वही है जिसमें कीलों के निशान हैं।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: हर दुःख किसी पाप की सज़ा है। यह सोच पुरानी है और यीशु ने उसे साफ़ तोड़ा। जन्म से अंधे व्यक्ति के बारे में जब चेलों ने पूछा कि किसने पाप किया, तो "यीशु ने उत्तर दिया, कि न इस ने पाप किया था, न इसके माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों" (यूहन्ना 9:3)। लूका 13 में जब सिलोआम का गुम्मट गिरा और अठारह लोग मरे, तो यीशु ने कहा कि वे दूसरों से बड़े पापी नहीं थे। हाँ, बाइबल कहती है कि हमारे चुनाव के परिणाम होते हैं, और परमेश्वर प्रेम से ताड़ना भी देते हैं (इब्रानियों 12:6), पर पिता की ताड़ना और न्यायाधीश की सज़ा एक चीज़ नहीं है। मसीह के विश्वासी के लिए दंड की अदालत क्रूस पर बंद हो गई। जो अब आता है, वह किसी पिता के हाथ से आता है, जल्लाद के हाथ से नहीं।
दूसरी भ्रांति: अगर विश्वास पक्का हो तो चंगाई और सफलता निश्चित है। पौलुस ने तीन बार अपने शरीर के काँटे के लिए प्रार्थना की और उत्तर मिला, "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है, क्योंकि मेरी सामर्थ निर्बलता में सिद्ध होती है" (2 कुरिन्थियों 12:9)। परमेश्वर ने काँटा हटाया नहीं, उसे बदल दिया। जो सिखाते हैं कि आपकी बीमारी आपके कमज़ोर विश्वास का सबूत है, वे बीमार व्यक्ति की पीठ पर दूसरा बोझ रख देते हैं। बाइबल ऐसा कभी नहीं करती। तिमुथियुस का पेट कमज़ोर रहा, इपफ्रुदीतुस मरने के करीब पहुँचा, और यीशु का प्रिय मित्र लाज़र मर ही गया।
तीसरी भ्रांति: विश्वासी को दुःख में रोना या सवाल नहीं करना चाहिए। भजन संहिता 88 अंधकार में शुरू होकर अंधकार में ख़त्म होता है और वह भी परमेश्वर का वचन है। विलापगीत की पूरी पुस्तक एक शहर के मलबे पर बैठकर रोना है। पौलुस कहता है कि हम उनके समान शोक न करें जिन्हें आशा नहीं है, यानी शोक करें, पर आशा के साथ (1 थिस्सलुनीकियों 4:13)। मुस्कुराहट का मुखौटा आत्मिक परिपक्वता नहीं है। ईमानदार विलाप उपासना है।
चौथी भ्रांति: रोमियों 8:28 का मतलब है कि हर घटना में कोई तुरंत दिखने वाला अच्छा कारण छिपा है, जिसे हमें खोज निकालना है। यह वचन हमें जासूस नहीं बनाता, वह हमें भरोसा करना सिखाता है। पौलुस कहता है "हम जानते हैं", न कि "हम देख सकते हैं"। यूसुफ़ को तेरह साल बाद समझ आया, अय्यूब को कभी नहीं बताया गया। इसलिए किसी रोते हुए व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखकर यह आयत हथियार की तरह चलाना क्रूरता है। यह वचन आँसू पोंछने के बाद, धीरे से, समय आने पर कहा जाने वाला वचन है।
आज इसे जीवन में उतारना
जब आप ऐसे मोड़ पर होते हैं जहाँ रिपोर्ट अच्छी नहीं आई, तो सबसे पहला काम व्याख्या ढूँढ़ना नहीं, उपस्थिति में टिकना है। भजन संहिता 34:18 को उलटकर पढ़िए: आपका टूटा हुआ मन परमेश्वर को दूर नहीं करता, वह उन्हें खींच लाता है। इसलिए जो प्रार्थना आप उस हालत में कर सकते हैं, बस वही कीजिए। दो शब्द, "प्रभु, आप यहाँ हैं", भी प्रार्थना है। जब शब्द ही न बचें, तब भी पवित्र आत्मा आहें भरकर आपके लिए विनती करते हैं (रोमियों 8:26)।
दूसरा, अपने विलाप को परमेश्वर की दिशा में मोड़िए, उनके विरुद्ध नहीं। अंतर सूक्ष्म पर निर्णायक है। भजनकार परमेश्वर से शिकायत करता है, परमेश्वर के बारे में लोगों से शिकायत नहीं करता। एक कॉपी लीजिए और लिख डालिए कि आपके भीतर क्या चल रहा है, कच्चा और बिना सफ़ाई के, और उसे प्रार्थना बना दीजिए। इस एक आदत ने अनगिनत विश्वासियों को कड़वाहट से बचाया है।
तीसरा, अकेले मत रहिए। पौलुस कहता है कि परमेश्वर हमारे सब क्लेशों में शान्ति देते हैं, ताकि हम उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों (2 कुरिन्थियों 1:4)। इसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर आपकी शान्ति किसी और के हाथों से भेजते हैं। जो बहन रात को आपके लिए खाना बना लाई, जो भाई अस्पताल का बिल चुपचाप भर गया, वे आपके प्रति परमेश्वर की सेवकाई हैं। मदद लेने से इनकार करना विनम्रता नहीं, अभिमान है।
चौथा, समय की तराज़ू बदलिए। 2 कुरिन्थियों 4:17 को याद कीजिए और अपने दुःख के आगे "अनन्त" शब्द रखकर देखिए। यह दर्द कम नहीं करता, पर उसकी अवधि को उसकी असली नाप में रख देता है। पौलुस ठीक आगे कहता है कि हम देखी हुई वस्तुओं को नहीं, अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं।
और पाँचवाँ, छोटे-छोटे आज्ञाकारिता के कदम उठाते रहिए। दुःख में सबसे पहले प्रार्थना, संगति और वचन छूटता है, और यही वे तीन रस्सियाँ हैं जो आपको थामे रखती हैं। जब दिल न लगे तब भी बाइबल का एक भजन पढ़ लीजिए, रविवार को कलीसिया में जाकर पीछे बैठ जाइए और दूसरों को गाते हुए सुन लीजिए। विश्वास अक्सर भावना नहीं, आदत के रास्ते वापस आता है।
कभी-कभी विश्वास केवल इतना है: उठकर फिर आना।
दर्पण
अब मैं सीधे आपसे बात करना चाहता हूँ। आप यह पन्ना खोजकर यहाँ तक आए हैं, इसका मतलब है कि कुछ है जो दुख रहा है। हो सकता है वह नौकरी हो, जिसके इंटरव्यू के बाद फिर कभी फ़ोन नहीं आया, और घर में हर महीने की पहली तारीख़ एक अपमान की तरह आती है। हो सकता है वह आपका शरीर हो, जो अब वह नहीं कर पाता जो पहले करता था, और आपने दर्जनों चंगाई सभाओं में हाथ उठाया पर लौटे वैसे ही। हो सकता है वह घर की खामोशी हो, जहाँ आप और आपका जीवनसाथी एक ही कमरे में रहते हुए अजनबी हो गए हैं। या शायद वह बच्चा जो चला गया, और जिसका नाम लेते ही आपकी आवाज़ टूट जाती है।
मैं आपको यह नहीं कहूँगा कि सब ठीक है। सब ठीक नहीं है। बाइबल भी आपसे यह नहीं कहती। पर एक सवाल मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ: आप परमेश्वर से एक सफ़ाई माँग रहे हैं या एक साथ? क्योंकि सफ़ाई मिल भी जाए तो वह आपके घाव पर पट्टी नहीं बाँधेगी। इसे परखने का एक तरीका है। जब आप प्रार्थना करते हैं, तो क्या आप केवल परिस्थिति के बदलने की बात करते हैं, या आप उन्हें अपना दर्द भी दिखाते हैं? बहुत से लोग परमेश्वर से बात करते हैं और अपने दिल को बाहर ताला लगाकर छोड़ देते हैं।
और एक चुभने वाली बात। दुःख हमें दो में से एक बनाता है: कड़वा या कोमल। वही आग जो मिट्टी को पत्थर कर देती है, मोम को पिघला देती है। यह फ़र्क परिस्थिति नहीं, आपका जवाब तय करता है। आज आप जो चुनेंगे, वह पाँच साल बाद आपके चेहरे पर दिखेगा। इसलिए एक काम आज ही कीजिए: किसी एक व्यक्ति को बताइए कि आप कहाँ टूटे हैं। और उसी टूटे हुए मन के साथ उस परमेश्वर के पास जाइए जो भजन संहिता 34:18 के अनुसार ठीक वहीं, सबसे निकट, खड़े हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चे भी यह प्रश्न पूछते हैं, और अक्सर हमसे ज़्यादा सीधे पूछते हैं। जब दादी बीमार पड़ती हैं, जब पालतू कुत्ता मर जाता है, जब स्कूल में कोई उन्हें चिढ़ाता है, तो वे पूछते हैं कि परमेश्वर ने रोका क्यों नहीं। यहाँ सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम उन्हें आधा-सच पकड़ा देते हैं, जैसे "परमेश्वर को यह फूल चाहिए था" या "परमेश्वर ने तुम्हें सबक सिखाया"। ऐसे वाक्य बड़े होकर परमेश्वर से डर पैदा करते हैं।
बच्चों को दो बातें सरल शब्दों में बताई जा सकती हैं। पहली, दुनिया टूट गई है, और परमेश्वर को भी यह टूटन पसंद नहीं है; वे इसे ठीक करने का काम कर रहे हैं और एक दिन पूरा कर देंगे। दूसरी, यीशु स्वयं रोए और स्वयं दर्द सहे, इसलिए जब तुम रोते हो तो वे अच्छी तरह जानते हैं कि तुम्हें कैसा लग रहा है। इन दोनों बातों के साथ यह भी जोड़िए कि आपको भी हर सवाल का जवाब नहीं मालूम, और यह मानना ईमानदारी है, कमज़ोरी नहीं। बच्चा आपके भरोसे को आपके तर्क से ज़्यादा याद रखेगा।
उम्र के हिसाब से भाषा बदलनी चाहिए। तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए चित्र और गोद की सुरक्षा ज़रूरी है, सात से बारह साल के बच्चों के लिए कहानियाँ और सीधे सवाल-जवाब काम करते हैं, और बारह साल से ऊपर के किशोरों को नकली उत्तर तुरंत पकड़ में आ जाते हैं, इसलिए उनके साथ अय्यूब और भजनों की ईमानदारी पर बात कीजिए। हमारी वेबसाइट पर इन तीनों उम्र के लिए अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, जिन्हें आप परिवारिक आराधना या सोने से पहले की बातचीत में इस्तेमाल कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
परमेश्वर दुःख क्यों देता है?
बाइबल दुःख के हर व्यक्तिगत मामले का कारण नहीं बताती, पर वह ढाँचा साफ़ रखती है: दुःख मनुष्य के पाप से टूटी हुई सृष्टि का फल है, परमेश्वर की मूल रचना का हिस्सा नहीं। परमेश्वर कभी बुराई के लेखक नहीं होते, पर वे बुराई को अपने हाथ से बाहर भी नहीं जाने देते। रोमियों 8:28 कहता है कि सब बातें मिलकर उनकी भलाई उत्पन्न करती हैं जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं। इसलिए सही प्रश्न यह नहीं है कि परमेश्वर ने यह क्यों भेजा, बल्कि यह कि वे इसमें से क्या रचने वाले हैं और वे इस समय कहाँ खड़े हैं।
क्या मेरा दुःख मेरे पाप की सज़ा है?
आमतौर पर नहीं, और मसीह के विश्वासी के लिए दंड के अर्थ में कभी नहीं। यूहन्ना 9:3 में यीशु ने जन्म से अंधे व्यक्ति के बारे में साफ़ कहा कि न उसने पाप किया था, न उसके माता-पिता ने। हाँ, गलत चुनावों के स्वाभाविक परिणाम होते हैं, और परमेश्वर प्रेम से सुधारते भी हैं, पर वह पिता की ताड़ना है, अदालत का फ़ैसला नहीं। यदि आपके दुःख में कोई पाप शामिल है, तो पवित्र आत्मा उसे कोमलता और स्पष्टता से दिखाएँगे, कुचलने के लिए नहीं, लौटाने के लिए।
अगर परमेश्वर सर्वशक्तिमान और प्रेमी हैं, तो वे बुराई रोक क्यों नहीं देते?
बाइबल का उत्तर यह है कि परमेश्वर ने बुराई को रोकने का निर्णय टाला नहीं, उसे क्रूस पर पूरा किया और उसकी पूर्ण समाप्ति एक निश्चित दिन के लिए रखी है। वे बुराई के साथ समझौता नहीं कर रहे, वे धीरज धर रहे हैं, ताकि और लोग पश्चाताप करके बचें। प्रकाशितवाक्य 21:4 उस दिन की घोषणा है जब मृत्यु, शोक, विलाप और पीड़ा सब समाप्त हो जाएँगे। इस बीच का समय परमेश्वर की उदासीनता नहीं, उनकी सहनशीलता है, और यह सहनशीलता हमारे लिए ही है।
रोमियों 8:28 का सही अर्थ क्या है?
इस वचन का अर्थ यह नहीं है कि हर घटना अपने आप में अच्छी है, बल्कि यह कि परमेश्वर सब घटनाओं को मिलाकर एक भलाई बुनते हैं। अगली आयत बताती है कि यह भलाई क्या है: कि हम उनके पुत्र के स्वरूप में ढल जाएँ। इसलिए यह आयत कैंसर या अन्याय को अच्छा नहीं कहती, वह कहती है कि उन पर भी परमेश्वर का हाथ ऊपर है। और ध्यान रखिए, पौलुस "हम जानते हैं" कहता है, "हम देख लेते हैं" नहीं। यह भरोसे का वचन है, तुरंत समझ में आने वाली व्याख्या का नहीं।
याकूब 1:2 कहता है कि परीक्षाओं को पूरे आनन्द की बात समझो, यह व्यावहारिक रूप से कैसे संभव है?
याकूब हमें दर्द का आनंद लेने के लिए नहीं कहता, वह हमें परिणाम पर नज़र रखने के लिए कहता है। वह लिखता है कि परीक्षा धीरज पैदा करती है और धीरज हमें पूरा और सिद्ध बनाता है। यह वैसा ही है जैसे कोई खिलाड़ी कठिन अभ्यास से नफ़रत करते हुए भी उसे खुशी से स्वीकार करता है, क्योंकि वह जानता है कि वह उसे बना रहा है। इसलिए आनन्द भावना नहीं, चुनाव है: यह विश्वास करना कि यह पीड़ा किसी शून्य में नहीं गिर रही।
1 पतरस 4:12 में "दुख की ज्वाला" का क्या मतलब है?
पतरस उस समय की कलीसिया को लिख रहा था जो मसीह के नाम के कारण सताई जा रही थी, और वह आग की भट्ठी का चित्र उठाता है जिसमें सोना तपाया जाता है। इसका अर्थ है कि कष्ट परखता है, यानी वह दिखा देता है कि हमारे विश्वास में असली क्या है और नकली क्या। पतरस की मुख्य बात यह है कि इस पर अचंभा न करो, क्योंकि यह कोई अनोखी बात नहीं है। दुःख को अपवाद मानने से हमारी पीड़ा दोगुनी हो जाती है; उसे अपेक्षित मानने से हम उसमें टिक सकते हैं।
2 कुरिन्थियों 4:17 में पौलुस क्लेश को "हल्का सा" कैसे कह सकता है?
पौलुस दर्द को छोटा नहीं कर रहा, वह तराज़ू के दूसरे पलड़े पर कुछ रख रहा है। जिस आदमी ने कोड़े, पत्थरवाह, कैद और जहाज़ का टूटना सहा, वह अपने अनुभव को कम करके नहीं आँक सकता था। पर उसने आने वाली अनन्त महिमा को इतने पास से देखा कि उसके मुक़ाबले यह बोझ हल्का पड़ गया और यह अवधि पल भर की लगी। यह आयत आपके दुःख को नकारने के लिए नहीं दी गई, उसे अनन्तता की नाप में रखने के लिए दी गई है।
दुःख में परमेश्वर से नाराज़ होना या सवाल करना पाप है?
नहीं। परमेश्वर ने अपनी ही प्रार्थना-पुस्तक में विलाप के दर्जनों भजन रखे हैं, जिनमें भजनकार पूछता है कि परमेश्वर कब तक और क्यों। यीशु ने स्वयं क्रूस पर "तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया" पुकारा। अंतर परमेश्वर से बात करने और परमेश्वर से मुँह मोड़ लेने में है। अपने गुस्से और भ्रम को उनके सामने खोल देना विश्वास की निशानी है; उसे भीतर सड़ने देना कड़वाहट की शुरुआत। परमेश्वर आपके सवालों से डरते नहीं; वे आपकी चुप्पी के लिए तरसते हैं कि वह टूटे।
क्या शैतान मेरे दुःख का कारण है?
बाइबल शैतान को असली शत्रु मानती है, पर उसे स्वतंत्र शासक नहीं। अय्यूब की पुस्तक में शैतान परमेश्वर की अनुमति की सीमा के भीतर ही कुछ कर पाता है, और उस सीमा से एक कदम बाहर नहीं जाता। इसका अर्थ है कि आपके जीवन में कुछ भी परमेश्वर की जानकारी और नियंत्रण से बाहर नहीं। इसलिए हम हर चीज़ में दुष्टात्माओं की तलाश किए बिना, सतर्क रहकर प्रार्थना में लड़ते हैं। भरोसे की जगह शैतान की ताक़त नहीं, मसीह की विजय है, जिसे उन्होंने यूहन्ना 16:33 में घोषित किया।
परीक्षा और परमेश्वर की ताड़ना में क्या अंतर है?
परीक्षा वह है जो हमारे विश्वास को परखकर मज़बूत करती है, जैसे याकूब 1:2 में; ताड़ना वह है जिसमें परमेश्वर हमें किसी गलत रास्ते से लौटाते हैं, जैसे इब्रानियों 12 में। दोनों का स्रोत एक ही है, पिता का प्रेम, और दोनों का लक्ष्य एक ही है, हमारी परिपक्वता। व्यावहारिक तौर पर पहचान इस तरह होती है: ताड़ना में पवित्र आत्मा किसी विशेष पाप पर स्पष्ट रूप से उँगली रखते हैं, जबकि परीक्षा में कोई विशेष पाप सामने नहीं आता और बुलावा केवल धीरज और भरोसे का होता है।
किसी के दुःख में मैं क्या कहूँ, क्या न कहूँ?
अय्यूब के मित्रों ने सात दिन चुप बैठकर सबसे अच्छा काम किया, और जब उन्होंने बोलना शुरू किया तब सब बिगाड़ दिया। इसलिए पहले उपस्थित रहिए, फिर सुनिए, और व्याख्या देने की जल्दी मत कीजिए। "परमेश्वर की कोई योजना होगी" या "और भी बुरा हो सकता था" जैसे वाक्य घाव पर नमक हैं। इसके बदले कहिए, "मुझे बहुत दुःख है, मैं आपके साथ हूँ", और कुछ ठोस कीजिए, खाना, सफ़र, बच्चों की देखभाल, बिल। 2 कुरिन्थियों 1:4 के अनुसार परमेश्वर हमें शान्ति देते हैं ताकि हम वही शान्ति दूसरों तक पहुँचाएँ।
प्रिय व्यक्ति की मृत्यु के बाद मैं परमेश्वर पर फिर भरोसा कैसे करूँ?
धीरे-धीरे, और अकेले नहीं। भरोसा एक बार में नहीं लौटता, वह छोटे-छोटे कदमों से लौटता है: एक भजन पढ़ना, एक वाक्य की प्रार्थना, एक व्यक्ति को सच बताना, एक रविवार कलीसिया में चुपचाप बैठना। शोक को टालिए मत, उसे परमेश्वर के सामने कीजिए, क्योंकि 1 थिस्सलुनीकियों 4:13 हमें शोक करने से नहीं, आशाहीन शोक से रोकता है। और उस एक तथ्य पर टिकिए जिसे भावना हिला नहीं सकती: मसीह जी उठे हैं, इसलिए कब्र आख़िरी शब्द नहीं है।
कैसे जानूँ कि परमेश्वर ने मुझे छोड़ नहीं दिया?
अपनी भावनाओं से नहीं, उनके वादों और उनके किए हुए काम से। भजन संहिता 34:18 कहता है कि यहोवा टूटे मनवालों के निकट रहता है, यानी आपकी टूटन उनकी निकटता की शर्त को पूरा करती है, उसे तोड़ती नहीं। इससे बड़ा सबूत क्रूस है: जिसने अपने पुत्र को आपके लिए दे दिया, वह अब आपको छोड़ने का कोई कारण नहीं रखता। कभी परमेश्वर की उपस्थिति महसूस नहीं होती, पर यीशु ने भी अंधकार में पिता को "हे मेरे परमेश्वर" कहकर पुकारा। वह पुकार ही विश्वास है।
अंत में
अगर आप इस पन्ने पर इस उम्मीद से आए थे कि आपके दुःख का कारण समझ में आ जाएगा, तो शायद आप कुछ अधूरा लेकर जा रहे हैं। बाइबल अय्यूब को भी कारण नहीं बताती। पर वह जो देती है, वह किसी व्याख्या से बड़ा है: एक परमेश्वर जो दुःख को दूर से देखकर टिप्पणी नहीं करते, बल्कि उसमें उतरकर, उसे अपने शरीर पर लेकर, उसे भीतर से जीतकर वापस आते हैं। यही यूहन्ना 16:33 की ढाढ़स है, यही 2 कुरिन्थियों 4:17 की तराज़ू है, यही रोमियों 8:28 का आधार है।
इसलिए आज जो प्रश्न आपके सीने में भारी है, उसे छोड़िए मत, उसे उनके पास ले जाइए। और उसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी जोड़ लीजिए: प्रभु, आप इस अंधकार में मुझे अपने बारे में क्या दिखाना चाहते हैं? आगे के अध्ययन के लिए अय्यूब की पुस्तक धीरज के साथ पढ़िए, भजन संहिता के विलाप के भजनों को अपनी प्रार्थना बना लीजिए, और रोमियों 8 पूरा, शुरू से अंत तक, एक बैठक में पढ़िए। वहीं वह वाक्य मिलेगा जो हर कब्र से आगे जाता है: कोई भी चीज़ हमें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकती।
