गिदोन का जीवन: डरपोक किसान से परमेश्वर का शूरवीर योद्धा
परिचय
एक किसान अपने अंगूर के कुंड में छिपकर गेहूँ पीट रहा है। यह बात ही उलटी है: गेहूँ खुले खलिहान में पीटा जाता है, जहाँ हवा भूसी उड़ा ले जाए। मगर यह आदमी बंद गड्ढे में, दीवारों की ओट में, जल्दी-जल्दी काम कर रहा है, इस डर से कि कोई देख न ले। सात साल से मिद्यानी टिड्डियों की तरह आते हैं और फसल लूट ले जाते हैं। इस्राएल गुफाओं में रहता है। और ठीक इसी गड्ढे के किनारे, इस काँपते हुए आदमी के पास, परमेश्वर का दूत आकर बैठता है और उसे एक ऐसा नाम देता है जो उस पर बिलकुल फिट नहीं बैठता: शूरवीर।
इस पृष्ठ पर आप गिदोन के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे: उसका डर, उसकी बुलाहट, उसकी अजीब शर्तें, उसकी अविश्वसनीय जीत, और उसका दुखद ढलान। और आप देखेंगे कि उसकी कहानी की कुंजी उसकी तीन सौ की सेना नहीं, बल्कि उनके हाथों में टूटे हुए मिट्टी के घड़े हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
गिदोन को आमतौर पर "साहस का नायक" बनाकर पेश किया जाता है। हम यहाँ दूसरा रास्ता लेते हैं। गिदोन की कहानी एक टूटे घड़े की गवाही है। परमेश्वर पहले उसे वह नाम देते हैं जो वह नहीं है, फिर उसे इतना छोटा कर देते हैं कि जीत का श्रेय उसके हिस्से में आ ही न सके, और अंत में हमें दिखाते हैं कि जब घड़ा खुद दीपक बनने की कोशिश करता है तो क्या होता है। इस पृष्ठ का सूत्र यही है: रोशनी घड़े में से नहीं, घड़े के टूटने में से चमकती है। यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि यह हमें गिदोन की नकल करने के दबाव से छुड़ाता है और परमेश्वर की धीरज भरी कृपा के सामने खड़ा कर देता है।
बाइबल गिदोन के जीवन के बारे में क्या कहती है?
गिदोन की कहानी न्यायियों 6 से 8 तक फैली है, और उसका पहला परिचय ही निराशा से भरा है। न्यायियों 6:1 कहता है कि इस्राएलियों ने फिर यहोवा की दृष्टि में बुरा किया, और परमेश्वर ने उन्हें सात वर्ष तक मिद्यानियों के हाथ में कर दिया। मिद्यानी, अमालेकी और पूरब के लोग ऊँटों पर सवार होकर फसल के समय आते, खेत उजाड़ते, भेड़-बकरी और गधे तक हाँक ले जाते। इस्राएल गुफाओं, कन्दराओं और गढ़ों में छिपने लगा। यह दबाव बाहरी शत्रु से ज़्यादा भीतर की बेवफ़ाई का फल था; परमेश्वर ने एक भविष्यद्वक्ता भेजकर उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने उनकी बात नहीं मानी।
इसी अंधकार में योआश का बेटा गिदोन अपने पिता के अंगूर के कुंड में गेहूँ पीट रहा था। और वहाँ वह शब्द आता है जो इस पूरी कहानी को खोल देता है:
"उसको यहोवा के दूत ने दर्शन देकर कहा, हे शूरवीर, यहोवा तेरे संग है।" (न्यायियों 6:12)
ध्यान दें कि परमेश्वर उसके व्यवहार का वर्णन नहीं कर रहे, वे एक भविष्य की घोषणा कर रहे हैं। गिदोन उस समय शूरवीर नहीं था; वह छिपा हुआ था। परमेश्वर का वचन उसे वह नाम देता है जो वह अभी नहीं है, ताकि उस नाम के द्वारा वह बन जाए। यही कृपा की कार्यशैली है। परमेश्वर हमें हमारी योग्यता के हिसाब से नहीं, अपने वादे के हिसाब से पुकारते हैं।
गिदोन का जवाब आदरपूर्ण मगर कड़वा है। वह पूछता है कि अगर यहोवा हमारे संग हैं तो यह सब विपत्ति क्यों आई, और मिस्र से निकालने वाले वे आश्चर्यकर्म कहाँ गए। न्यायियों 6:15 में वह अपनी हैसियत गिनाता है: उसका कुल मनश्शे में सबसे कंगाल है और वह अपने पिता के घर में सबसे छोटा है। परमेश्वर इस तर्क को खंडन करके नहीं हटाते; वे उसे एक वादे से ढक देते हैं: "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" गिदोन की सुरक्षा उसकी शक्ति में नहीं, उस संगति में है।
फिर गिदोन चिन्ह माँगता है, भोजन लाता है, और चट्टान से आग निकलकर बलि को भस्म कर देती है। डरकर वह वेदी बनाता है और उसका नाम यहोवाशालोम रखता है, अर्थात् "यहोवा शान्ति है"। यह उस आदमी का पहला धर्मशास्त्र है: शान्ति उसकी बहादुरी से नहीं, परमेश्वर से आती है।
उसी रात उसे पहला काम सौंपा जाता है, और वह बाहरी युद्ध नहीं बल्कि घर की सफ़ाई है: अपने पिता की बाल की वेदी ढाओ, अशेरा का खम्भा काटो, और सच्चे परमेश्वर के लिए बलि चढ़ाओ। गिदोन आज्ञा मानता है, मगर पाठ ईमानदारी से बताता है कि उसने यह काम रात में किया, क्योंकि वह अपने घराने और नगर के लोगों से डरता था। आज्ञाकारिता और डर एक ही आदमी में साथ रह सकते हैं। सुबह नगर भड़क उठता है, और उसके पिता उसकी ढाल बनते हैं; वहीं से उसका दूसरा नाम पड़ता है, यरुब्बाल, "बाल उससे झगड़ा करे"।
इसके बाद परमेश्वर का आत्मा गिदोन पर उतरता है, वह नरसिंगा फूँकता है और बत्तीस हज़ार लोग इकट्ठे हो जाते हैं। और ठीक उसी क्षण, जब सेना खड़ी है, गिदोन फिर काँपने लगता है और वह मशहूर शर्त रखता है:
"तब गिदोन ने परमेश्वर से कहा, यदि तू अपने कहने के अनुसार इस्राएल को मेरे द्वारा छुड़ाना चाहता है," (न्यायियों 6:36)
यह वाक्य अधूरा छोड़ा गया है, क्योंकि आगे ऊन और ओस की वह दोहरी परीक्षा आती है जिसे हम सब जानते हैं। यहाँ जो सबसे चौंकाने वाली बात है, वह गिदोन की माँग नहीं, परमेश्वर का धीरज है। वे नाराज़ नहीं होते, वे उसे झिड़कते नहीं, वे दो बार ओस को अपने हाथ से नापते हैं। परमेश्वर कमज़ोर विश्वास को तोड़ते नहीं, सहारा देते हैं। मगर साथ ही ध्यान रखिए: यह गिदोन की कहानी का शिखर नहीं, उसकी दुर्बलता का दस्तावेज़ है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
गिदोन की जीत इस्राएल की याद में इतनी गहरी धँस गई कि सदियों बाद भी उसे दोहराया जाता रहा। भजन 83 में आसाप दुश्मनों के विरुद्ध प्रार्थना करते हुए ओरेब और जेब, सेबह और सल्मुन्ना का नाम लेता है, यानी वह परमेश्वर से कहता है: जैसा आपने मिद्यान के दिन किया था, वैसा ही फिर कीजिए। और यशायाह उस दिन को सीधे मसीह की भविष्यवाणी से जोड़ देता है। यशायाह 9:4 में वह लिखता है कि परमेश्वर ने बोझ का जुआ और कंधे पर का सोंटा "मिद्यान के दिन के समान" तोड़ दिया है, और दो पद बाद वही अध्याय कहता है, "हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ है, हमें एक पुत्र दिया गया है"। यह जोड़ अचानक नहीं है। जिस तरह मिद्यान की सेना तलवार के बल से नहीं, नरसिंगों और टूटे घड़ों से हारी, उसी तरह अंधकार का साम्राज्य एक चरनी में रखे बालक और एक क्रूस पर टूटे शरीर से हारेगा।
पुराने नियम का न्यायियों काल अपने आप में एक दोहराव है: लोग भटकते हैं, दबाए जाते हैं, चिल्लाते हैं, परमेश्वर छुड़ानेवाला भेजते हैं, और फिर वे भटक जाते हैं। हर न्यायी आधा उद्धारक है, और हर न्यायी की मृत्यु के बाद जनता फिर गिर जाती है। पुस्तक का अंतिम पद इस खालीपन को नाम देता है: उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा न था, जो कुछ जिसको भाता था वही वह करता था। गिदोन इस कमी को भरने से इनकार करता है, और ठीक वहीं वह एक भविष्यवक्ता बन जाता है: राजा उसके वंश से नहीं, परमेश्वर की ओर से आएगा।
नया नियम गिदोन को भूलता नहीं। इब्रानियों का लेखक विश्वास के गवाहों की सूची बनाते हुए लिखता है:
"अब मैं और क्या कहूँ? क्योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन, और बाराक, और शिमशोन, और यिप्तह, और दाऊद, और शमूएल, और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूँ।" (इब्रानियों 11:32)
यह पद हमें साँस लेने की जगह देता है। इस सूची में एक भी बेदाग आदमी नहीं है। शिमशोन का अनुशासनहीन जीवन, यिप्तह की भयानक मन्नत, दाऊद का पाप, और गिदोन की शर्तें तथा उसका एफोद, सब इस सूची के बाहर नहीं, भीतर हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर पाप को हल्का समझते हैं; इसका अर्थ है कि वे विश्वास को वहीं पहचान लेते हैं जहाँ वह मिट्टी में मिला हुआ है।
और यहीं हमारा सूत्र अपने चरम पर पहुँचता है। पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को लिखता है कि परमेश्वर का धन "मिट्टी के बरतनों में" रखा है, ताकि यह असीम सामर्थ्य हमारी ओर से न, वरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे (2 कुरिन्थियों 4:7)। गिदोन के तीन सौ लोगों के हाथ में वही धर्मविज्ञान मिट्टी की शकल में था। पौलुस आगे कहता है कि परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया, कि बलवानों को लज्जित करे, ताकि कोई प्राणी उनके सामने घमंड न करे (1 कुरिन्थियों 1:27-29)। यीशु मसीह इस पैटर्न को पूरा करते हैं: वे भीड़ से राजमुकुट लेने से इनकार करते हैं, टूटते हैं, और उसी टूटन में संसार की सबसे बड़ी जीत मिलती है।
उसके जीवन का सार
गिदोन के पूरे जीवन को तीन निर्णायक क्षणों में पढ़ा जा सकता है, और तीनों का संबंध उस घड़े से है।
पहला क्षण अंगूर के कुंड में है, जहाँ घड़े को नाम मिलता है। जिस आदमी को परमेश्वर शूरवीर कहते हैं, वह छिपा हुआ है, शिकायत कर रहा है, अपनी नगण्यता गिना रहा है, और चिन्ह माँग रहा है। परमेश्वर उसे बदलकर बुलाते नहीं, बुलाकर बदलते हैं। बाल की वेदी रात में ढहाना छोटी बात लगती है, मगर वह असली युद्ध की शुरुआत है, क्योंकि इस्राएल का सबसे बड़ा शत्रु मिद्यानी नहीं, उसके अपने आँगन की मूर्ति थी। जो आदमी अपने पिता के घर की वेदी नहीं तोड़ सकता, वह घाटी में सेना के सामने खड़ा नहीं हो सकता।
दूसरा क्षण हारोद के सोते पर है, जहाँ घड़ा खाली किया जाता है। बत्तीस हज़ार आदमी आए हैं, और परमेश्वर कहते हैं कि ये बहुत ज़्यादा हैं। पहले डरनेवाले बाईस हज़ार घर भेजे जाते हैं, फिर पानी पीने के तरीके से दस हज़ार में से भी छँटाई होती है, और अंत में यह फ़ैसला आता है:
"तब यहोवा ने गिदोन से कहा, इन तीन सौ चाटने वालों के द्वारा मैं मिद्यानियों पर जय पाकर तुम लोगों को छुड़ाऊँगा; और सब लोगों को अपने अपने स्थान को जाने दे।" (न्यायियों 7:7)
कारण पहले ही बता दिया गया था: कहीं इस्राएल यह डींग न मारे कि "अपने ही भुजबल के द्वारा हम बच गए"। परमेश्वर जीत छोटी नहीं करते, वे सेना छोटी करते हैं। और जब गिदोन का दिल फिर डूबने लगता है, तो वे उसे रातों-रात शत्रु के डेरे तक ले जाते हैं, जहाँ वह एक मिद्यानी को जौ की रोटी के लुढ़कने का सपना सुनाते हुए सुनता है। गिदोन वहीं, दुश्मन के कैम्प के बाहर, मुँह के बल गिरकर दंडवत करता है। यह उसके जीवन का सबसे ऊँचा पल है: हथियार उठाने से पहले घुटने टेकना।
तीसरा क्षण रात के अंधेरे में है, जहाँ घड़ा टूटता है।
"तब तीनों झुंडों ने नरसिंगे फूँके और घड़े तोड़ डाले, और मशालों को बाएँ हाथों में और नरसिंगों को दाहिने हाथों में लेकर फूँकते हुए पुकार उठे, यहोवा की तलवार और गिदोन की तलवार!" (न्यायियों 7:20)
तीन सौ आदमी, और तीन सौ हाथ भरे हुए: एक हाथ में मशाल, दूसरे में नरसिंगा। तलवार पकड़ने के लिए हाथ ही खाली नहीं था। वे लड़े नहीं, वे खड़े रहे, और मिद्यानी अपनी ही तलवारों से एक दूसरे पर टूट पड़े। रोशनी उसी पल चमकी जिस पल मिट्टी टूटी। यही इस जीवन का सार है, और यही उस पूरी बाइबल का सार है जो एक टूटे हुए शरीर और बहाए हुए लहू पर टिकी है।
गिदोन से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ यह है कि परमेश्वर की बुलाहट हमारी आत्म-छवि से बड़ी होती है। गिदोन अपने बारे में जो जानता था, वह सच था: वह छोटा था, उसका कुल कमज़ोर था, वह डरता था। परमेश्वर ने उस सच्चाई को झुठलाया नहीं, उसे अपने वादे के नीचे रख दिया। अगर आप अपनी बुलाहट को अपनी क्षमता के पैमाने पर नापेंगे, तो आप कुंड में ही रह जाएँगे। परमेश्वर पूछते हैं, क्या मैं ने तुझे नहीं भेजा। भेजने वाले का अधिकार भेजे जाने वाले की कमज़ोरी से बड़ा है।
दूसरा पाठ यह है कि परमेश्वर हमारी संसाधनों की कमी नहीं, उनकी अधिकता से सावधान रहते हैं। हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर हमें और लोग, और पैसा, और समय, और प्रभाव दें; और परमेश्वर कभी-कभी घटाकर उत्तर देते हैं। बत्तीस हज़ार से तीन सौ तक की यात्रा एक आत्मिक सर्जरी थी, ताकि जीत के बाद कोई सीना न फुलाए। जब आपकी ज़िंदगी में कुछ छिन जाता है, तो हमेशा यह श्राप नहीं होता; कई बार यह वह खाली हाथ होता है जिसमें परमेश्वर मशाल थमा सकते हैं।
तीसरा पाठ सबसे चुभने वाला है: जीत के बाद का समय कुंड के अंधेरे से ज़्यादा ख़तरनाक होता है। गिदोन डर में वफ़ादार रहा और सफलता में लड़खड़ा गया। उसने ताज ठुकराया, मगर लूट का सोना माँग लिया; उसने बाल की वेदी तोड़ी, मगर अपने हाथों से एक एफोद बनवा दिया जो उसके घराने के लिए फंदा ठहरा। जब घड़ा टूटकर चमक चुका होता है, तब उसे यह भ्रम होने लगता है कि रोशनी उसकी थी। इसलिए जीत के बाद का पहला काम आराम नहीं, समर्पण होना चाहिए। गिदोन ने दुश्मन के डेरे के बाहर दंडवत करना सीख लिया था, मगर अपने ही घर में उपासना का अनुशासन खो दिया।
दर्पण
आप भी किसी कुंड में बैठे हो सकते हैं। दफ़्तर में आप वह बात नहीं कहते जो कहनी चाहिए, क्योंकि नौकरी जाने का डर है। घर में आप बच्चों के साथ प्रार्थना शुरू नहीं करते, क्योंकि आपको लगता है कि आपका जीवन इस लायक नहीं है। पैसे के मामले में आप हिसाब लगाते रह जाते हैं और देना टालते चले जाते हैं। शरीर थक चुका है, कैलेंडर भरा है, और भीतर एक अकेलापन बैठा है जिसे आप किसी को दिखाते नहीं। और इसी बीच परमेश्वर आपके पास आकर आपको एक ऐसा नाम देते हैं जो आपको खुद पर फ़बता नहीं लगता: प्रिय, क्षमा किया हुआ, भेजा हुआ, शूरवीर।
अब ईमानदार सवाल। आप किस चिन्ह की प्रतीक्षा कर रहे हैं? गिदोन ने ऊन बिछाया था, हम आज परिस्थितियों को बिछाते हैं: अगर वह फ़ोन आ जाए, अगर वह रिश्ता सुधर जाए, अगर वह डर पूरी तरह चला जाए, तब मैं आज्ञा मानूँगा। परमेश्वर ऐसे कमज़ोर विश्वास को धीरज से सहते हैं, मगर वे उसे आदर्श नहीं बनाते। किसी बिंदु पर ओस गिरना बंद होगी और नरसिंगा उठाना पड़ेगा।
और दूसरी तरफ़ एक और सवाल है, जो उन लोगों के लिए है जिनकी ज़िंदगी में अभी सब ठीक चल रहा है। गिदोन कुंड में नहीं, महल जैसे आराम में फिसला। अगर परमेश्वर ने आपको जीत दी है, तो पूछिए: वह सोना कहाँ जा रहा है जो जीत के साथ आया? वह प्रतिष्ठा किसके नाम की सेवा कर रही है? आपका एफोद क्या है, वह अच्छी चीज़ जो चुपचाप आपकी उपासना का केंद्र बन गई है?
परमेश्वर आपकी तीन सौ जितनी छोटी ताक़त से शर्मिंदा नहीं हैं। वे आपके भरे हुए हाथों से परेशान हैं। मशाल थामने के लिए हाथ खाली करना पड़ेगा, और घड़ा टूटने के लिए राज़ी होना पड़ेगा।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को गिदोन की कहानी सुनाना आसान है, क्योंकि इसमें छिपना, रात, तुरही, मशालें और एक बहुत बड़ा शोर है। मगर सबसे ज़रूरी बात कहानी का नाटक नहीं, उसका दिल है। बच्चों से यह कहिए कि गिदोन बहादुर आदमी नहीं था; वह डरता था और छिप गया था। फिर परमेश्वर आए और उसे कहा, "हे शूरवीर", और बच्चों से पूछिए कि किसी को ऐसा नाम देना कैसा लगता है जो अभी सच न हो। यहीं से आप समझा सकते हैं कि परमेश्वर हमें हमारे डर के हिसाब से नहीं, अपने प्यार के हिसाब से देखते हैं।
दूसरी बात सिखाइए: परमेश्वर ने सैनिकों की संख्या घटा दी, क्योंकि वे चाहते थे कि सब जानें कि जीत किसने दी। बच्चे बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि छोटा होना कोई कमी नहीं है। और तीसरी बात, घड़े तोड़े गए तभी रोशनी दिखी। एक मिट्टी का बर्तन और भीतर एक छोटी टॉर्च रखकर यह दिखाना बच्चों को कभी नहीं भूलता।
साथ ही ईमानदार रहिए। गिदोन ने बाद में गलती की, और उसका परिवार दुख में पड़ा। बड़े बच्चों को यह बताना उनके विश्वास को मज़बूत करता है, कमज़ोर नहीं, क्योंकि बाइबल के नायक हमें अपनी ओर नहीं, मसीह की ओर इशारा करते हैं।
Faith.network पर गिदोन के जीवन की अलग-अलग उम्र के अनुसार तैयार की गई व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह वर्ष) एक सरल, चित्रमय कहानी; प्राथमिक उम्र के बच्चों के लिए (सात से बारह वर्ष) सवाल-जवाब और गतिविधियों के साथ; और किशोरों के लिए (बारह वर्ष से ऊपर) डर, पहचान और सफलता के दबाव पर केंद्रित एक गहरी बातचीत। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वही संस्करण चुनें और उसे बाइबल खोलकर साथ पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गिदोन कौन था और वह किस समय में जीया?
गिदोन मनश्शे के गोत्र में अबीएजेर कुल का, योआश का बेटा था, और ओप्रा नगर में रहता था। वह न्यायियों के काल का पाँचवाँ प्रमुख न्यायी था, दबोरा के बाद और यिप्तह से पहले, यानी इस्राएल में राजाओं के आने से कई पीढ़ियाँ पहले। उसकी कहानी न्यायियों 6 से 8 तक फैली है, और उसका काल मिद्यानियों के सात वर्ष के दमन से शुरू होकर चालीस वर्ष की शान्ति तक चलता है। उसका दूसरा नाम यरुब्बाल था, जो उसे बाल की वेदी ढाने के बाद मिला।
न्यायियों 6:12 में परमेश्वर गिदोन को "हे शूरवीर" क्यों कहते हैं जबकि वह डरा हुआ था?
क्योंकि परमेश्वर का वचन केवल वर्णन नहीं करता, वह रचता भी है। जिस पल गिदोन कुंड में छिपा था, उस पल वह शूरवीर नहीं था; मगर परमेश्वर उसे उस अंत से देख रहे थे जो वे खुद उसमें पूरा करने वाले थे। यह वही कृपा है जिससे पौलुस पापियों को "पवित्र लोग" कहकर पत्र लिखता है। परमेश्वर हमें हमारी पिछली हार के आधार पर नाम नहीं देते, बल्कि अपने वादे के आधार पर, और फिर उस नाम को सच करने का काम स्वयं करते हैं।
गिदोन ने ऊन का चिन्ह क्यों माँगा, और क्या हमें भी ऐसा करना चाहिए?
न्यायियों 6:36 से आगे गिदोन दो बार ऊन और ओस के द्वारा पुष्टि माँगता है, यह जानते हुए भी कि परमेश्वर ने उसे साफ़ बुलावा और आग का चिन्ह पहले ही दे दिया था। पाठ इसे आदर्श के रूप में पेश नहीं करता; यह कमज़ोर विश्वास का दस्तावेज़ है जिसे परमेश्वर ने धीरज से सहा। आज हमारे पास पूरा लिखित वचन, मसीह का क्रूस और पवित्र आत्मा हैं। मार्गदर्शन के लिए परिस्थितियों को "ऊन" बनाना विश्वास का विकल्प नहीं हो सकता, हालाँकि परमेश्वर की सहनशीलता आज भी वैसी ही है।
परमेश्वर ने बत्तीस हज़ार में से केवल तीन सौ सैनिक क्यों चुने?
कारण न्यायियों 7:2 में साफ़ दिया गया है: इतने लोगों के साथ जीत मिलती तो इस्राएल यह डींग मारता कि उसने अपने ही भुजबल से छुटकारा पाया। पहले डरनेवाले बाईस हज़ार लौट गए, फिर पानी पीने की परीक्षा से संख्या तीन सौ रह गई, और न्यायियों 7:7 में परमेश्वर ने इसी छोटे दल के द्वारा छुड़ाने का वचन दिया। परमेश्वर जीत की गारंटी घटाते नहीं, वे मनुष्य के घमंड की गुंजाइश घटाते हैं, ताकि महिमा उन्हीं की रहे।
पानी चाटने वाली परीक्षा का क्या मतलब था?
बाइबल इस परीक्षा की व्याख्या नहीं करती, और यही ईमानदार उत्तर है। कुछ लोग कहते हैं कि चाटने वाले सतर्क थे, दूसरे कहते हैं कि घुटने टेककर पीनेवाले ज़्यादा सावधान थे; दोनों अनुमान हैं। असल बात यह है कि परमेश्वर ने संख्या घटाने के लिए एक ऐसा मापदंड चुना जो सैन्य योग्यता से बिलकुल जुड़ा नहीं था। यही उसकी सुंदरता है: चुनाव का आधार गिदोन की समझ में नहीं आया, ताकि जीत का श्रेय किसी रणनीति को न दिया जा सके।
न्यायियों 7:20 में घड़े तोड़ने का क्या अर्थ है?
हर सैनिक के पास एक नरसिंगा और एक मिट्टी के घड़े में छिपी मशाल थी। जब तीन सौ लोगों ने एक साथ घड़े तोड़े, तो अंधेरी घाटी में अचानक तीन सौ मशालें जल उठीं और नरसिंगों का शोर गूँज गया; मिद्यानियों को लगा कि एक बड़ी सेना चारों ओर से आ गई है और वे आपस में ही कट मरे। आत्मिक रूप से यह पूरी बाइबल का चित्र है: रोशनी बर्तन के सुरक्षित रहने से नहीं, उसके टूटने से चमकती है, ठीक जैसे 2 कुरिन्थियों 4:7 कहता है।
गिदोन ने राजा बनने से इनकार क्यों किया?
जीत के बाद इस्राएल के पुरुषों ने उससे कहा कि वह, उसका बेटा और पोता उन पर राज करे। गिदोन का उत्तर था: "मैं तुम्हारे ऊपर प्रभुता न करूँगा, और न मेरा पुत्र तुम्हारे ऊपर प्रभुता करेगा; यहोवा ही तुम पर प्रभुता करेगा।" (न्यायियों 8:23) यह उसके जीवन का सबसे परिपक्व वाक्य है, क्योंकि उसने समझ लिया था कि जीत उसकी नहीं थी। दुखद बात यह है कि जिस ताज को उसने ठुकराया, उसका असर उसने सोने और एफोद के ज़रिए फिर भीतर आने दिया।
एफोद बनाना पाप क्यों था?
गिदोन ने लूट का सोना माँगा और उससे एक एफोद बनवाया, और न्यायियों 8:27 कहता है कि सारे इस्राएली उसके कारण उस एफोद के पीछे हो लिए और वह गिदोन तथा उसके घराने के लिए फंदा ठहरा। एफोद अपने आप में याजक का वस्त्र था, बुरी वस्तु नहीं; मगर ओप्रा में, मिलापवाले तम्बू से अलग, यह एक वैकल्पिक उपासना-केंद्र बन गया। जिस आदमी ने बाल की वेदी तोड़ी थी, उसी ने एक नई वेदी खड़ी कर दी। यही चेतावनी है कि अच्छी चीज़ें भी मूर्ति बन सकती हैं।
गिदोन के सत्तर बेटों का क्या हुआ और अबीमेलेक कौन था?
गिदोन की बहुत पत्नियाँ थीं और उसके सत्तर बेटे हुए; शेकेम में उसकी एक दासी से अबीमेलेक पैदा हुआ। गिदोन की मृत्यु के बाद अबीमेलेक ने शेकेम के लोगों से पैसा लेकर अपने सत्तर भाइयों को एक ही पत्थर पर मार डाला, और केवल सबसे छोटा योताम बच निकला। न्यायियों 9 में योताम काँटेदार झाड़ी का दृष्टान्त सुनाता है, और अबीमेलेक का तीन साल का शासन खून और आग में ख़त्म होता है। गिदोन का घर उसकी जीत नहीं, उसके समझौतों का फल भुगतता है।
जब गिदोन ने इतनी गलतियाँ कीं, तो इब्रानियों 11:32 में उसे विश्वास का नायक क्यों कहा गया?
इब्रानियों 11:32 गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिप्तह, दाऊद और शमूएल को एक ही साँस में गिनता है, और इनमें कोई निर्दोष नहीं है। यह सूची मनुष्यों के चरित्र-प्रमाण-पत्र नहीं, परमेश्वर की कृपा की सूची है। गिदोन को इसमें उसके एफोद के कारण नहीं, उस क्षण के कारण जगह मिली जब उसने तीन सौ लोगों के साथ नरसिंगा उठाया और परमेश्वर के वचन पर भरोसा किया। यही सुसमाचार है: परमेश्वर अधूरे विश्वास को भी देखते हैं और उसे अपने बेटे की धार्मिकता से ढक देते हैं।
गिदोन और यीशु मसीह में क्या संबंध है?
गिदोन एक अधूरा छुड़ानेवाला है जो पूरे छुड़ानेवाले की ओर इशारा करता है। यशायाह 9:4 मिद्यान के दिन की याद दिलाता है और उसी अध्याय में वह बालक आता है जिसका नाम अद्भुत, युक्ति करनेवाला, शान्ति का राजकुमार है। गिदोन ने कहा कि यहोवा तुम पर प्रभुता करेंगे; यीशु मसीह वही प्रभुता देह में लेकर आए। गिदोन के आदमियों ने घड़े तोड़े और रोशनी चमकी; मसीह का शरीर तोड़ा गया और जगत की ज्योति चमकी। गिदोन डर में भेजा गया; मसीह स्वेच्छा से आए।
"यहोवाशालोम" का क्या अर्थ है और गिदोन ने यह नाम क्यों रखा?
जब गिदोन ने समझा कि उसने यहोवा के दूत को देखा है, तो वह मृत्यु के डर से काँप उठा, और परमेश्वर ने उसे शान्ति का वचन दिया। उसने वहाँ एक वेदी बनाकर उसका नाम यहोवाशालोम रखा, यानी "यहोवा शान्ति है"। यह नाम इसलिए खास है क्योंकि वह युद्ध से पहले रखा गया, जीत के बाद नहीं। गिदोन की शान्ति उसकी परिस्थितियों के बदलने पर नहीं, परमेश्वर की उपस्थिति पर टिकी थी, और यही शान्ति मसीह में हमें दी गई है।
मिद्यानी कौन थे और उन्होंने इस्राएल को क्यों सताया?
मिद्यानी अब्राहम के वंश से जुड़े एक घुमंतू लोग थे जो अरब के रेगिस्तानी इलाक़ों में रहते थे। न्यायियों 6 में वे अमालेकियों और "पूरब के लोगों" के साथ मिलकर ऊँटों पर सवार होकर हर फसल के समय इस्राएल पर टूट पड़ते और खेत, पशु तथा अन्न उजाड़ देते थे। बाइबल इस दमन का कारण केवल राजनीति में नहीं देखती: इस्राएल ने परमेश्वर की वाचा तोड़ी थी, और यह सात वर्ष का कष्ट उन्हें पुकारने पर मजबूर करने वाला अनुशासन था।
गिदोन की मृत्यु कैसे हुई और उसकी विरासत क्या रही?
न्यायियों 8:28 कहता है कि गिदोन के जीवन भर, अर्थात चालीस वर्ष तक देश में शान्ति रही, और वह बहुत बूढ़ा होकर मरा तथा ओप्रा में अपने पिता योआश की क़ब्र में गाड़ा गया। मगर अध्याय का अंत भारी है: उसकी मृत्यु के तुरंत बाद इस्राएल फिर बाल की उपासना में लौट गया और यरुब्बाल के घराने के साथ वफ़ादारी नहीं दिखाई। उसकी विरासत दोहरी है: एक शानदार छुटकारा, और एक ऐसा परिवार जिसने उसके समझौतों की कीमत चुकाई।
अंत में
गिदोन का जीवन हमें बहादुर बनने का नुस्खा नहीं देता। वह हमें एक मिट्टी का घड़ा थमाता है। कहानी की शुरुआत में परमेश्वर एक डरपोक किसान को शूरवीर कहकर पुकारते हैं, बीच में उसकी सेना घटाकर तीन सौ कर देते हैं, फिर उन तीन सौ हाथों को इतना भर देते हैं कि तलवार के लिए जगह ही न बचे, और आख़िर में घड़े टूटते हैं और घाटी रोशनी से भर जाती है। और अंत में, जब सब कुछ जीत लिया गया है, हम उसी आदमी को लूट के सोने पर हाथ रखते देखते हैं। यह कहानी हमें अपनी ओर नहीं, उस सच्चे छुड़ानेवाले की ओर धकेलती है जिसने ताज को पकड़ा नहीं, स्वयं को खाली किया, और टूटकर हमें बचाया।
आगे पढ़ने के लिए न्यायियों 6 से 9 को एक ही बैठक में पढ़िए, और उसके बाद यशायाह 9 और 2 कुरिन्थियों 4 खोलिए; आप देखेंगे कि मिद्यान की वह रात कलवरी की ओर इशारा कर रही थी। और फिर एक छोटी प्रार्थना कीजिए: प्रभु, मेरे हाथ खाली कर दीजिए, और यदि आवश्यक हो तो मुझे तोड़कर भी अपनी ज्योति चमकाइए।
