जक्कई कौन था: गूलर के पेड़ से उद्धार तक की कहानी
परिचय
यरीहो की धूल भरी सड़क पर उस दिन भीड़ इतनी थी कि साँस लेने की जगह नहीं थी। खजूर के पेड़ों वाले उस समृद्ध शहर से होकर एक यात्री गुज़र रहा था, और हर कोई उसे देखना चाहता था। उसी भीड़ के पीछे, कंधों और पीठों की दीवार के पीछे, एक आदमी खड़ा था जिसके पास शहर का सबसे मोटा बटुआ था और सबसे छोटा कद। पैसा उसे आगे की जगह नहीं दिला सका। इज़्ज़त उसके पास थी ही नहीं। तो उसने वह किया जो उस समय का कोई भी प्रतिष्ठित आदमी कभी न करता: अपना लंबा चोगा समेटा, दौड़ा, और एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया।
इस पन्ने पर आप जक्कई की पूरी कहानी क्रम से देखेंगे: वह कौन था, उसने क्या खोया, उसे किसने ढूँढ़ा, और उसके बदले हुए जीवन का असली रहस्य क्या था।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
ज़्यादातर जगहों पर जक्कई को "सुधरे हुए आदमी" के रूप में पढ़ाया जाता है: उसने पैसा लौटाया, इसलिए उद्धार पाया। यह पन्ना उसे उल्टी दिशा से पढ़ता है, क्योंकि लूका ने उसे उसी क्रम में लिखा है। जक्कई पहले ढूँढ़ा गया, फिर बदला। यीशु मसीह ने उसके घर में आने की घोषणा उसकी आधी सम्पत्ति दान करने से पहले की थी। इसलिए हमारा सूत्र यह है: जक्कई की उदारता उद्धार की कीमत नहीं, उद्धार की रसीद है। यह फ़र्क छोटा लगता है, मगर यही फ़र्क धर्म और सुसमाचार के बीच की पूरी दूरी है, और यही फ़र्क आपके अपने पश्चाताप को डर से नहीं, आनन्द से भर देता है।
बाइबल जक्कई के बारे में क्या कहती है?
जक्कई का नाम पूरी बाइबल में केवल एक ही जगह आता है: लूका 19। चारों सुसमाचारों में से सिर्फ़ लूका ने यह घटना दर्ज की, और यह कोई संयोग नहीं। लूका वही लेखक है जो बार-बार हमें चुंगी लेनेवालों, स्त्रियों, कंगालों और बाहर खड़े लोगों के पास ले जाता है। उसकी कलम में परमेश्वर की कृपा हमेशा हाशिये की ओर चलती है।
कहानी की शुरुआत ही बताती है कि यह आदमी कौन था: "वह यरीहो में प्रवेश करके जा रहा था। और वहाँ जक्कई नाम का एक मनुष्य था, जो चुंगी लेनेवालों का सरदार और धनी था। वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन है? परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था; क्योंकि वह नाटा था। तब वह उसे देखने के लिये आगे दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया; क्योंकि यीशु उसी मार्ग से जानेवाला था" (लूका 19:1-4)।
इन चार पदों में चार बातें छिपी हैं। पहली, उसका पद: वह मामूली चुंगी लेनेवाला नहीं, "सरदार" था, यानी यरीहो के इलाके में रोमी कर-वसूली का ठेकेदार, जिसके नीचे और भी वसूली करनेवाले काम करते थे। दूसरी, उसकी दौलत: यरीहो उन दिनों बालसम और खजूर के व्यापार का बड़ा केंद्र था और यरदन पार से यरूशलेम जाने के रास्ते पर पड़ता था, इसलिए वहाँ की चुंगी-चौकी सोने की खान थी। तीसरी, उसकी भूख: "वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन है?" यह ठंडी उत्सुकता नहीं थी, क्योंकि ठंडी उत्सुकता दौड़ती नहीं। चौथी, उसकी शर्मिंदगी: पूरब में बुज़ुर्ग और रईस दौड़ते नहीं थे, और पेड़ पर तो बिल्कुल नहीं चढ़ते थे। वह पेड़ उसके लिए इज़्ज़त की सीढ़ी नहीं, इज़्ज़त की कुर्बानी था।
पेड़ पर चढ़ना इज़्ज़त नहीं, भूख का सबूत था।
और फिर वह पल आता है जो पूरी कहानी का केंद्र है: "जब यीशु उस जगह पहुँचा, तो ऊपर दृष्टि करके उससे कहा, 'हे जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।' वह तुरन्त उतरकर आनन्द से उसे अपने घर में ले गया" (लूका 19:5-6)।
ध्यान दीजिए, यहाँ पहल किसकी है। जक्कई ने प्रार्थना नहीं की थी, पुकारा नहीं था, अपनी ज़िंदगी सुधारने का वादा नहीं किया था। वह सिर्फ़ पत्तों के पीछे छिपकर देख रहा था। मगर यीशु ने ऊपर दृष्टि की और उसका नाम लिया। किसी ने यीशु को उसका नाम बताया नहीं था। और उन्होंने यह नहीं कहा, "क्या मैं तेरे घर आ सकता हूँ?" उन्होंने कहा, "मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।" यूनानी शब्द का भाव है एक दैवीय ज़रूरत, वही "अवश्य" जो यीशु अपने दुख उठाने और मरने के बारे में इस्तेमाल करते हैं। उस दिन यरीहो में एक चोर के घर में ठहरना परमेश्वर की योजना का हिस्सा था।
भीड़ को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया: "वह तो एक पापी मनुष्य के यहाँ गया है" (लूका 19:7)। उनकी गणित साफ़ थी, और उसी गणित का जवाब यीशु बहुत पहले दे चुके थे: "इसलिये तुम जाकर इसका अर्थ सीख लो कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूँ; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूँ" (मत्ती 9:13)। यह पद जक्कई की कहानी की चाबी है। यीशु पापियों के घर इसलिए नहीं जाते कि वे पाप से सहमत हैं, बल्कि इसलिए कि डॉक्टर बीमार के बिस्तर तक जाता है। यरीहो की भीड़ अपने आप को स्वस्थ समझती थी, इसलिए उनके घर खाली रह गए।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
जक्कई अचानक आसमान से नहीं टपका। उसके पीछे पूरे पुराने नियम की एक लंबी कहानी खड़ी है।
शुरुआत उसके नाम से कीजिए। "जक्कई" इब्रानी "ज़क्काई" से है, जिसका अर्थ है "शुद्ध" या "निर्दोष"। किसी यहूदी माता-पिता ने उम्मीद से यह नाम रखा होगा, और शहर भर उसे इसी नाम से बुलाता था: शुद्ध। सोचिए कि वह नाम उसके कानों में कितना चुभता होगा, जब हर माँ अपने बच्चे को उसके पास से गुज़रते हुए खींच लेती होगी। यीशु ने जब कहा "हे जक्कई", तो उन्होंने एक टूटे हुए नाम को उठाकर सच कर दिया।
फिर उस शहर को देखिए। यरीहो वह पहला शहर था जो इस्राएल को कनान में मिला, और वह शापित शहर था (यहोशू 6)। मगर उसी शापित शहर से एक वेश्या, राहाब, कृपा से बचाई गई और मसीह की वंशावली में जुड़ गई। परमेश्वर की आदत पुरानी है: वे यरीहो में से ऐसे लोगों को चुनते हैं जिन्हें धर्म की दुनिया ने लिख-पढ़कर खारिज कर दिया हो।
जक्कई का "चौगुना फेर देता हूँ" भी हवा में नहीं कहा गया। मूसा की व्यवस्था में अगर कोई धोखे से कुछ ले लेता और अपने आप मान लेता, तो उसे मूलधन के साथ पाँचवाँ हिस्सा जोड़कर लौटाना था (लैव्यव्यवस्था 6:1-5, गिनती 5:6-7)। चौगुना लौटाना चोर की सज़ा थी, जो पकड़े जाने पर भेड़ चुराने वाले पर लगती थी (निर्गमन 22:1)। जक्कई ने सबसे कम नहीं, सबसे ज़्यादा चुना। कृपा ने उसे कानून की न्यूनतम सीमा पर मोलभाव करने नहीं दिया।
सबसे गहरा सूत्र भविष्यद्वक्ताओं से आता है। यहेजकेल 34 में परमेश्वर इस्राएल के भाड़े के चरवाहों पर क्रोधित होते हैं और कहते हैं कि अब वे स्वयं अपनी भेड़ों को ढूँढ़ेंगे, खोई हुई को खोजेंगे और निकाली हुई को लौटा लाएँगे। यरीहो की सड़क पर वह वचन हड्डी और माँस पहनकर चल रहा था। इसीलिए कहानी का अंत यीशु के अपने शब्दों में होता है: "तब यीशु ने उससे कहा, 'आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है।' क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया है" (लूका 19:9-10)।
"खोया हुआ" लूका का प्रिय शब्द है। अध्याय 15 में खोई भेड़, खोया सिक्का और खोया बेटा, तीनों ढूँढ़े जाते हैं। जक्कई चौथी कहानी है, मगर मिसाल नहीं, सच्चा आदमी। और यह सूत्र मसीह में ही पूरा होता है, क्योंकि यरीहो से निकलकर यीशु सीधे यरूशलेम जाते हैं, जहाँ खोए हुओं को ढूँढ़ने की कीमत क्रूस पर चुकाई जाती है। जक्कई ने अपनी सम्पत्ति का आधा दिया; मसीह ने अपना सब कुछ दिया।
उसके जीवन का सार
जक्कई के जीवन के तीन निर्णायक पल हैं, और तीनों का क्रम समझना ज़रूरी है।
पहला पल: पेड़ पर चढ़ना, यानी बेचैनी का इकरार। इस पल तक जक्कई के पास सब कुछ था जो दुनिया सफलता कहती है। घर बड़ा था, तिजोरी भरी थी, नीचे काम करने वाले थे। मगर वह भीड़ के पीछे खड़ा था, और भीड़ ने उसके लिए रास्ता नहीं छोड़ा। यह सिर्फ़ कद की बात नहीं थी; यरीहो जानबूझकर उसे पीछे रखता था। धन आदमी को ऊँची कुर्सी देता है, मगर ऊँचा कद नहीं। उसकी दौड़ और उसका पेड़ पर चढ़ना इस बात का खुला इकरार था कि उसके भीतर एक खालीपन है जिसे वह अब और नहीं छिपा सकता। हमारे यहाँ इसे "खोजना" कहते हैं, मगर ध्यान रखिए, वह मसीह को नहीं खोज रहा था; वह सिर्फ़ देखना चाहता था कि यीशु कौन है। कृपा ने उसकी आधी-अधूरी उत्सुकता को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया।
दूसरा पल: नाम से पुकारा जाना, यानी कृपा का आगमन। यही कहानी का धुरी-बिंदु है। यीशु रुके, ऊपर देखा, और उस आदमी को नाम से बुलाया जिसे पूरा शहर सिर्फ़ "पापी" कहता था। पूरे प्रकरण में जक्कई ने एक भी शर्त पूरी नहीं की थी। उसने कोई मन्नत नहीं मानी थी, कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाया था। यीशु ने उसकी तिजोरी का हिसाब नहीं माँगा, उसके घर की चाबी माँगी। और जक्कई "तुरन्त उतरकर आनन्द से" उन्हें ले गया। उस घर में उस दिन जो खाना परोसा गया, वह चुंगी के पैसों से ही खरीदा गया होगा; यीशु फिर भी बैठे। कृपा कीमत नहीं माँगती, कृपा रसीद लिखवाती है।
तीसरा पल: खड़े होकर घोषणा करना, यानी पश्चाताप का फल। "जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा, 'हे प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूँ, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया हो तो उसे चौगुना फेर देता हूँ'" (लूका 19:8)। यह कोई निजी, मन-ही-मन की प्रार्थना नहीं थी। वह मेज़ से उठकर खड़ा हुआ, शायद उन्हीं मेहमानों और पड़ोसियों के सामने जो अभी-अभी कुड़कुड़ा रहे थे। उसका पश्चाताप ठोस था, नापा-तौला था, और महँगा था। उसने पैसे को "आत्मिक मामलों से अलग" नहीं रखा। जिसका दिल बदलता है, उसका बहीखाता बदलता है। और फिर भी यीशु का जवाब सुनिए: उन्होंने यह नहीं कहा, "अब तूने उद्धार कमा लिया।" उन्होंने कहा, "आज इस घर में उद्धार आया है।" उद्धार जक्कई के इरादों में से नहीं उगा, वह दरवाज़े से भीतर चलकर आया था, और उसका नाम यीशु था।
जक्कई से हम क्या सीखते हैं
पहला, मसीह हमें ढूँढ़ने में हमसे आगे हैं। जक्कई की कहानी का असली नायक जक्कई नहीं है। लूका 18 में एक धनी सरदार यीशु के पास खुद आया था, सही सवाल पूछे थे, और उदास लौट गया था; उसके बाद चेलों ने पूछा, "तो फिर किस का उद्धार हो सकता है?" और यीशु ने कहा, "जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है" (लूका 18:27)। अगला ही धनी आदमी जक्कई है, और वह बच जाता है। लूका हमें जोड़-घटाव सिखा रहा है: फ़र्क आदमी की कोशिश में नहीं, परमेश्वर की पहल में है। अगर आज आपके मन में मसीह की हल्की-सी भूख भी है, तो समझिए कि वे पहले से आपकी गली में चल रहे हैं।
दूसरा, सच्चा पश्चाताप हमेशा ठोस होता है। जक्कई ने यह नहीं कहा कि "मुझे अपने पापों का बहुत अफ़सोस है।" उसने रकम बताई, प्रतिशत बताया, और तरीका बताया। पश्चाताप का पता आँसुओं से नहीं, पते-ठिकानों से चलता है: किससे माफ़ी माँगनी है, किसका पैसा लौटाना है, कौन-सी आदत छोड़नी है। मगर यह फल है, जड़ नहीं। आप अपनी उदारता से यीशु को अपने घर नहीं बुला सकते; आप उन्हें भीतर आने देते हैं, और फिर उदारता अपने आप सामान बाँधने लगती है।
तीसरा, कृपा पाए हुए लोगों की पहचान नई हो जाती है। यीशु ने जक्कई को "इब्राहीम का एक पुत्र" कहा, वही पहचान जो भीड़ ने उससे छीन ली थी। यहीं पौलुस की बात गहराई पाती है: "इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गई हैं" (2 कुरिन्थियों 5:17)। जक्कई को सिर्फ़ माफ़ी नहीं मिली, उसे नया नाम-पत्र मिला। और वह शांति जो उसके भीतर उतरी, उसका गीत दाऊद पहले ही लिख चुका था: "क्या ही धन्य है वह, जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँप दिया गया हो। क्या ही धन्य है वह मनुष्य, जिसके अधर्म का लेखा यहोवा न ले, और जिसके मन में कपट न हो" (भजन संहिता 32:1-2)। जिस आदमी ने ज़िंदगी भर दूसरों का लेखा रखा, उसका अपना लेखा परमेश्वर ने फाड़ दिया।
दर्पण
अब थोड़ी देर जक्कई को छोड़िए और अपने आप को देखिए।
आपके पास भी एक भीड़ है जो आपको आगे नहीं आने देती। किसी के लिए वह असली भीड़ है, दफ़्तर के लोग, रिश्तेदार, मोहल्ले की फुसफुसाहट। किसी के लिए वह भीतर की भीड़ है: वह आवाज़ जो कहती है कि तुम्हारी फ़ाइल बहुत गंदी है, तुम्हारे जैसे लोग प्रार्थना-सभा में शोभा नहीं देते, तुमने जो किया है उसके बाद तुम बस पीछे खड़े रहने लायक हो। और इसलिए आप पिछली पंक्ति में बैठते हैं, गवाही नहीं देते, किसी को अपने घर नहीं बुलाते, क्योंकि घर में सामान वह है जिसका हिसाब आप खुद नहीं दे सकते।
सवाल सीधा है: आपकी तिजोरी में क्या ऐसा कुछ है जिसे यीशु के सामने निकालना पड़ेगा? वह अतिरिक्त कमीशन, वह झूठा बिल, वह रकम जो आपने भाई के हिस्से से दबा ली, वह घंटा जो आपने कंपनी से चुराया, वह वादा जो आपने पत्नी से किया और तोड़ दिया? कृपा इन चीज़ों को अनदेखा नहीं करती, वह इन्हें मेज़ पर रखवा देती है। मगर वह ऐसा तब करती है जब मसीह पहले से आपके कमरे में बैठे हों, मुँह फेरकर जाने के लिए नहीं, खाने के लिए।
और शायद आपका दर्द उल्टा है। शायद आप भीड़ में खड़े हैं, कुड़कुड़ाते हुए, क्योंकि परमेश्वर ने उस आदमी पर दया की जिसने आपका नुकसान किया था। आपने वर्षों से चर्च का काम किया, और वह "पापी" एक ही शाम में घर में बुला लिया गया। यह कहानी आपको भी चुभती है, क्योंकि वह बताती है कि अंदर आने का दरवाज़ा योग्यता नहीं, दया है।
आज यीशु किसी और यरीहो से नहीं गुज़र रहे। वे आपके नाम से पुकार रहे हैं, उसी नाम से जिसे आप खुद शर्म से बोलते हैं। झट उतर आइए। वे जल्दी में हैं, और उनकी जल्दी आपके घर की ओर है।
बच्चों के लिए समझाया गया
जक्कई की कहानी बच्चों के लिए सबसे प्यारी कहानियों में से एक है, क्योंकि इसमें वह सब कुछ है जो बच्चों के मन में आसानी से बैठ जाता है: एक नाटा आदमी, एक पेड़, एक भीड़, और एक मेहमान जो सबसे अनचाहे घर में खाना खाने चला गया। छोटे बच्चों से इसे इतना ही कहिए कि जक्कई के पास बहुत पैसा था, मगर कोई दोस्त नहीं था, क्योंकि उसने लोगों का पैसा चुराया था। एक दिन यीशु उसके शहर आए। जक्कई उन्हें देखना चाहता था, मगर वह छोटा था, तो वह पेड़ पर चढ़ गया। और यीशु रुक गए, ऊपर देखा और उसका नाम लेकर बुलाया। यीशु उसका नाम जानते थे।
यही सबसे बड़ी बात है जो बच्चों के दिल में उतरनी चाहिए: यीशु ने जक्कई को पहले प्यार किया, और उसके बाद जक्कई अच्छा बना। उल्टा नहीं। बड़े बच्चों के साथ आप यह जोड़ सकते हैं कि जक्कई ने चोरी का पैसा चौगुना लौटाया, और उनसे पूछ सकते हैं कि अगर उन्होंने किसी का कुछ लिया है या किसी को दुख दिया है, तो वे उसे कैसे ठीक कर सकते हैं।
उम्र के हिसाब से इस कहानी को कहने का तरीका बदलता है, इसलिए हमारे पास अलग-अलग आयु-वर्ग के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए सरल चित्र-कथा जैसी बात, सात से बारह साल के बच्चों के लिए सवाल-जवाब और गतिविधि के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए पैसे, पहचान, साथियों के दबाव और सच्चे पश्चाताप पर गहरी बातचीत। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वह पन्ना चुनिए और उसे घर की प्रार्थना में इस्तेमाल कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जक्कई कौन था और वह क्या काम करता था?
जक्कई यरीहो शहर का रहनेवाला एक यहूदी था जो रोमी सरकार के लिए चुंगी यानी कर वसूलने वालों का सरदार था। लूका 19:2 उसे "चुंगी लेनेवालों का सरदार और धनी" कहता है, यानी वह खुद वसूली करने के अलावा दूसरे वसूली करने वालों का प्रमुख भी था। ऐसे लोग तय रकम रोम को देकर बाकी सब अपने पास रख लेते थे, इसलिए उनकी कमाई अक्सर अन्याय से भरी होती थी। यही कारण है कि यहूदी समाज उन्हें देशद्रोही और धार्मिक रूप से अशुद्ध मानता था।
जक्कई की कहानी बाइबल में कहाँ मिलती है?
पूरी कहानी सिर्फ़ लूका के सुसमाचार के उन्नीसवें अध्याय के पहले दस पदों में मिलती है, और बाइबल में जक्कई का नाम कहीं और नहीं आता। मत्ती, मरकुस और यूहन्ना ने यह घटना दर्ज नहीं की। लूका इसे यरीहो से यरूशलेम की उस आख़िरी यात्रा के बीच में रखता है जो क्रूस पर खत्म होती है, और इसे अंधे भिखारी बरतिमाई के चंगे होने के ठीक बाद और मुहरों के दृष्टांत के ठीक पहले रखता है, ताकि हम देखें कि खोए हुए लोग, चाहे गरीब हों या अमीर, एक ही कृपा से मिलते हैं।
जक्कई किस पेड़ पर चढ़ा था और उसका क्या महत्व है?
हिंदी बाइबल में इसे गूलर का पेड़ कहा गया है, जिसे अंग्रेज़ी में सिकेमोर-फ़िग कहते हैं। यह पेड़ फ़िलिस्तीन में आम था, इसकी डालियाँ नीची और चौड़ी होती थीं, इसलिए एक नाटे आदमी के लिए भी उस पर चढ़ना आसान था और उसके घने पत्तों में छिपकर देखना भी। पुराने नियम में आमोस भविष्यद्वक्ता अपने आप को गूलर के वृक्षों की देखभाल करनेवाला बताता है, यानी यह गरीबों का पेड़ था। एक रईस का इस साधारण पेड़ पर चढ़ना उसकी बेचैनी और उसकी टूटी हुई इज़्ज़त, दोनों का चिह्न है।
जक्कई नाम का अर्थ क्या है?
"जक्कई" इब्रानी शब्द से बना है जिसका अर्थ है "शुद्ध", "निर्दोष" या "साफ़"। यह एज्रा 2:9 और नहेम्याह 7:14 में एक परिवार के नाम के रूप में भी मिलता है। इस नाम में एक गहरी विडंबना है, क्योंकि यरीहो में हर कोई जानता था कि यह "शुद्ध" आदमी असल में कितना अशुद्ध है। जब यीशु ने पेड़ के नीचे खड़े होकर कहा "हे जक्कई, झट उतर आ", तो उन्होंने एक ऐसा नाम पुकारा जो अब तक झूठ था और जिसे वे उस दिन सच करने आए थे।
क्या जक्कई ने अपने अच्छे कामों से उद्धार कमाया?
नहीं, और कहानी का क्रम ही इसका प्रमाण है। यीशु ने उसके घर आने की घोषणा लूका 19:5 में की, जबकि जक्कई की आधी सम्पत्ति देने की घोषणा लूका 19:8 में आती है। कृपा पहले आई, उदारता बाद में। यीशु ने यह भी नहीं कहा कि "तूने उद्धार कमा लिया", बल्कि कहा "आज इस घर में उद्धार आया है", यानी उद्धार एक व्यक्ति के रूप में दरवाज़े से भीतर आया। जक्कई का पैसा लौटाना उद्धार की कीमत नहीं, उसकी रसीद थी, वह बाहरी सबूत कि भीतर कुछ सचमुच बदल गया है।
यीशु ने जक्कई को "इब्राहीम का पुत्र" क्यों कहा?
क्योंकि यरीहो की भीड़ उसे यहूदी समाज से बाहर का आदमी मान चुकी थी, एक ऐसा देशद्रोही जिसने अपनी विरासत बेच दी थी। यीशु ने लूका 19:9 में उसकी पहचान लौटा दी। मगर इसका मतलब सिर्फ़ खून का रिश्ता नहीं है, क्योंकि यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने चेताया था कि इब्राहीम की संतान होने का दावा बचा नहीं सकता। जक्कई इब्राहीम का सच्चा पुत्र इसलिए बना कि उसने इब्राहीम की तरह विश्वास किया और परमेश्वर के बुलावे पर उठ खड़ा हुआ।
चुंगी लेनेवालों से यहूदी लोग इतनी नफ़रत क्यों करते थे?
इसके दो कारण थे। पहला राजनीतिक: वे अपने ही देशवासियों से रोम के लिए पैसा वसूलते थे, यानी कब्ज़ा करनेवाली ताकत के नौकर थे। दूसरा नैतिक: कर-वसूली का पूरा ढाँचा ही वसूली करनेवाले को तय रकम से ज़्यादा लेने की छूट देता था, इसलिए उनकी कमाई आमतौर पर लूट मानी जाती थी। धार्मिक दृष्टि से उन्हें अशुद्ध समझा जाता था, उनकी गवाही अदालत में नहीं मानी जाती थी, और उनके साथ खाना खाना भी अपने आप को गंदा करना समझा जाता था। इसीलिए भीड़ का कुड़कुड़ाना उनके लिए बिल्कुल स्वाभाविक था।
जक्कई ने चौगुना लौटाने की बात क्यों कही?
क्योंकि उसने व्यवस्था की सबसे कड़ी धारा अपने ऊपर लगा ली। लैव्यव्यवस्था 6:1-5 के अनुसार जो व्यक्ति धोखे का पाप खुद मान लेता था, उसे मूलधन के साथ उसका पाँचवाँ हिस्सा जोड़कर लौटाना था, यानी बीस प्रतिशत अतिरिक्त। चौगुना लौटाना चोर की सज़ा थी, जैसा निर्गमन 22:1 में भेड़ चुराने वाले के बारे में लिखा है। जक्कई ने अपने आप को "गलती करनेवाला व्यापारी" नहीं, बल्कि "पकड़ा गया चोर" माना, और कम से कम की जगह ज़्यादा से ज़्यादा चुना। यही सच्चे पश्चाताप की उदारता है।
क्या जक्कई ने सचमुच अपनी सारी सम्पत्ति दे दी?
नहीं, उसने आधी सम्पत्ति कंगालों को देने और चोरी की हुई रकम चौगुनी लौटाने की बात कही। बाकी आधे में से ही वह चौगुना लौटाना था, इसलिए व्यावहारिक रूप से उसके पास बहुत कम बचा होगा। दिलचस्प बात यह है कि यीशु ने उससे "अपना सब कुछ बेच दे" नहीं कहा, जैसा उन्होंने धनी सरदार से कहा था। मसीह हर व्यक्ति से एक ही रकम नहीं माँगते; वे हर व्यक्ति से वह चीज़ माँगते हैं जो उसके दिल पर बैठी हुई है।
जक्कई और लूका 18 के धनी सरदार में क्या अंतर है?
दोनों धनी थे, मगर एक खुद को धर्मी समझता था और दूसरा खुद को खोया हुआ जानता था। धनी सरदार ने गिनाया कि उसने सारी आज्ञाएँ बचपन से मानी हैं, और जब यीशु ने उसके पैसे पर हाथ रखा तो वह उदास होकर चला गया। जक्कई के पास गिनाने को कुछ नहीं था, सिर्फ़ शर्म थी, और उसने बिना माँगे ही अपना पैसा खोल दिया। बीच में यीशु का वाक्य खड़ा है कि जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है। जक्कई उसी वाक्य का जीता-जागता उत्तर है।
क्या यह सच है कि पद में "नाटा" यीशु के लिए भी हो सकता है?
व्याकरण की दृष्टि से यूनानी वाक्य में "वह छोटे कद का था" किसके लिए है, इसमें हल्की अस्पष्टता है, और प्राचीन काल में कुछ ही लोगों ने इसे यीशु पर लागू किया। मगर वाक्य का पूरा प्रवाह साफ़ है: जक्कई भीड़ के कारण देख नहीं पा रहा था, इसलिए वह पेड़ पर चढ़ा, जो तभी समझ आता है जब छोटा कद उसी का हो। लगभग सभी अनुवाद और व्याख्याकार इसे जक्कई के लिए ही पढ़ते हैं, और यह कहानी के भाव से भी मेल खाता है।
जक्कई के साथ इसके बाद क्या हुआ?
बाइबल इस पर चुप है, और यही चुप्पी ईमानदारी से मानी जानी चाहिए। लूका उसे उसी शाम छोड़ देता है, जहाँ उद्धार उसके घर में बैठा हुआ है। बाद की मसीही परंपराओं में, जैसे क्लेमेंट के नाम से जुड़े कुछ प्राचीन लेखों में, कहा गया है कि वह आगे चलकर कैसरिया की कलीसिया का अगुवा बना, मगर इसका कोई पक्का ऐतिहासिक या बाइबलीय प्रमाण नहीं है। हमारे लिए काफ़ी है कि उसका नाम उस दिन स्वर्ग की पुस्तक में लिखा गया, और परमेश्वर उसकी आगे की कहानी अच्छी तरह जानते हैं।
जक्कई की कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
इसका मुख्य संदेश कहानी के आख़िरी वाक्य में खुद यीशु ने दे दिया: मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया है। यह कहानी किसी आदमी के सुधरने की नहीं, परमेश्वर के ढूँढ़ने की कहानी है। जक्कई केवल देखना चाहता था, मगर यीशु उसके घर में रहने आए। जहाँ धर्म कहता है "पहले साफ़ हो जा, फिर पास आ", वहाँ सुसमाचार कहता है "झट उतर आ, क्योंकि मुझे आज तेरे घर में रहना अवश्य है", और यही बुलावा आदमी को भीतर से साफ़ कर देता है।
क्या आज भी कोई मेरे जैसा पापी बदल सकता है?
हाँ, और जक्कई की कहानी इसी भरोसे के लिए लिखी गई है। यीशु ने मत्ती 9:13 में साफ़ कहा कि वे धर्मियों को नहीं, पापियों को बुलाने आए हैं, इसलिए आपकी गंदी फ़ाइल आपको अयोग्य नहीं, बल्कि ठीक उसी श्रेणी में रखती है जिसके लिए वे आए हैं। पौलुस कहता है कि मसीह में होने वाला व्यक्ति नई सृष्टि है और पुरानी बातें बीत जाती हैं। बदलाव आपकी ताकत से नहीं, उनके भीतर आने से शुरू होता है; आपको बस पेड़ से उतरकर दरवाज़ा खोलना है।
अंत में
यरीहो की उस सड़क पर जो हुआ, वह एक धनी आदमी के नैतिक सुधार की कहानी नहीं है। वह एक खोए हुए आदमी के ढूँढ़े जाने की कहानी है, और उस क्रम को उलटते ही सुसमाचार मर जाता है। जक्कई ने पहले पैसा नहीं लौटाया और फिर यीशु को पाया; उसने पहले यीशु को पाया, और फिर पैसा अपने आप हाथ से फिसलने लगा। पहले कृपा, फिर बहीखाता। इसीलिए दाऊद का वह गीत उसके घर पर भी लिखा जा सकता था: धन्य है वह, जिसका पाप ढाँप दिया गया हो।
अगर यह कहानी आपके भीतर कुछ हिला रही है, तो उसे वहीं मत छोड़िए। लूका 19 को पूरा पढ़िए, और फिर उसके ठीक पहले का अध्याय, लूका 18, ताकि आप धनी सरदार और इस चुंगी लेनेवाले को आमने-सामने देख सकें। उसके बाद लूका 15 की तीन खोई हुई चीज़ों पर जाइए, और अंत में 2 कुरिन्थियों 5 को धीरे-धीरे पढ़िए, जहाँ नई सृष्टि की बात खुलती है। और पढ़ते समय एक सवाल साथ रखिए: मेरे घर में वे किस चीज़ के लिए आना चाहते हैं? जो उत्तर आए, उसे टालिए मत। जक्कई ने देर नहीं की; वह तुरन्त उतरा, और आनन्द से।
