बाइबल पात्र

मरियम यीशु की माता: एक विनम्र दासी की कहानी

परिचय

नासरत नाम का गाँव इतना छोटा था कि पुराने नियम में उसका ज़िक्र तक नहीं मिलता। मिट्टी के कुछ घर, एक कुआँ, चूने की चट्टानों पर बने अंगूर के खेत, और शायद दो-तीन सौ लोग। वहीं, किसी साधारण घर के भीतर, एक किशोरी लड़की अपने रोज़ के काम में लगी थी। उसकी मंगनी हो चुकी थी, उसका भविष्य तय था, उसकी ज़िंदगी का नक्शा किसी भी गाँव की लड़की जैसा ही था। और फिर एक स्वर्गदूत भीतर आया।

उस दिन के बाद मरियम का जीवन फिर कभी सामान्य नहीं रहा। पर जो बात अक्सर हमारी नज़रों से छूट जाती है, वह यह है कि मरियम की सबसे कठिन परीक्षा स्वर्गदूत के सामने नहीं आई। वह उन तीस सालों में आई जो उसके बाद आए, जब उसे अपने ही बेटे को धीरे-धीरे छोड़ना और उसे प्रभु मानकर उसके पीछे चलना सीखना पड़ा।

इस पन्ने पर हम मरियम के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे: नासरत की "हाँ" से लेकर ऊपरी कमरे की प्रार्थना तक। उसकी विनम्रता भी, और उसकी उलझनें भी।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लेख मरियम को या तो केवल एक पवित्र मूर्ति बना देते हैं, या फिर उसे जल्दी से एक "साधारण स्त्री" कहकर आगे बढ़ जाते हैं। हम यहाँ एक अलग रास्ता लेते हैं: मरियम की कहानी एक माता के शिष्या बनने की कहानी है। उसने यीशु को जन्म दिया, दूध पिलाया, चलना सिखाया, और फिर उसे धीरे-धीरे यह सीखना पड़ा कि यह बेटा उसका नहीं, बल्कि वह इस बेटे की है। गोद से लेकर क्रूस तक, और क्रूस से ऊपरी कमरे तक, हर कदम पर उससे कुछ छूटा और कुछ मिला। इसी सूत्र को पकड़कर हम उसके जीवन में उतरेंगे, क्योंकि हर विश्वासी को यही यात्रा तय करनी है।

बाइबल मरियम के बारे में क्या कहती है?

बाइबल मरियम के बारे में हमारी उत्सुकता से कहीं कम बताती है, और हमारी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा। हमें उसके माता-पिता का नाम नहीं मिलता, उसकी उम्र नहीं मिलती, उसका रूप-रंग नहीं मिलता। जो मिलता है, वह उसका चरित्र है।

पहली मुलाकात लूका के पहले अध्याय में होती है। स्वर्गदूत जिब्राईल उसके घर में आता है और कहता है: "आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है! प्रभु तेरे साथ है" (लूका 1:28)। इस एक वाक्य में मरियम के पूरे जीवन की कुंजी छिपी है। ध्यान दीजिए, स्वर्गदूत यह नहीं कहता कि "तू कितनी योग्य है" या "तूने कितनी तपस्या की है"। वह कहता है कि उस पर अनुग्रह हुआ है। यूनानी शब्द का अर्थ है "जिसे अनुग्रह दिया गया", "जिस पर कृपा की गई"। मरियम अनुग्रह की स्रोत नहीं, अनुग्रह की पात्र है। वह देने वाली नहीं, पाने वाली है। यहीं से मरियम को समझने की सही शुरुआत होती है, और यहीं से बहुत से लोग भटक भी जाते हैं।

मरियम का उत्तर उतना ही उल्लेखनीय है। स्वर्गदूत उसे बता चुका है कि वह कुँवारी होते हुए गर्भवती होगी, कि पवित्र आत्मा उस पर उतरेगा, कि जो जन्मेगा वह परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा। एक मँगेतर लड़की के लिए इसका मतलब था बदनामी, टूटी हुई सगाई, और शायद पत्थरों से मार डाला जाना। फिर भी वह कहती है: "देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो" (लूका 1:38)। यह अंधा समर्पण नहीं था; उसने सवाल पूछा था ("यह कैसे होगा?")। पर सवाल पूछने के बाद उसने अपने आप को परमेश्वर के हाथ में सौंप दिया। "दासी" शब्द वह खुद चुनती है, कोई उस पर थोपता नहीं।

इसके बाद एलीशिबा के घर में मरियम के मुँह से एक गीत फूट पड़ता है, जिसे कलीसिया सदियों से गाती आई है: "मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है" (लूका 1:46)। यह गीत खुद की तारीफ़ नहीं है। अगली ही पंक्ति में वह परमेश्वर को "मेरा उद्धारकर्ता" कहती है, यानी वह खुद को बचाए जाने की ज़रूरत रखने वाली पापी मानती है। और फिर वह गाती है कि परमेश्वर ने "अपनी दासी की दीनता पर दृष्टि की है" (लूका 1:48)। पूरा गीत ऊँचों के गिराए जाने और दीनों के ऊँचे किए जाने का गीत है। मरियम की धर्मशास्त्र-समझ किसी शास्त्री से कम नहीं थी।

मत्ती हमें दूसरी तरफ़ से यही कहानी दिखाता है, यूसुफ़ की आँखों से, और वह इसे पुराने नियम की भविष्यवाणी से जोड़ता है: "देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा, जिसका अर्थ है, परमेश्वर हमारे साथ" (मत्ती 1:23)। यह पद बताता है कि मरियम की कोख में जो हुआ, वह किसी अचानक चमत्कार का नतीजा नहीं था। यशायाह ने सात सौ साल पहले इसकी ओर इशारा किया था। मरियम एक लंबी कहानी के बीच में खड़ी है, और उस कहानी की नायिका वह नहीं, बल्कि वह बच्चा है जिसे वह जन्म देगी।

वह अनुग्रह की खान नहीं थी; वह अनुग्रह की खिड़की थी।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

मरियम को समझने के लिए हमें बहुत पीछे जाना पड़ता है, अदन की वाटिका तक। वहाँ, मनुष्य के पहले पाप के तुरंत बाद, परमेश्वर साँप से कहते हैं: "और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा" (उत्पत्ति 3:15)। बाइबल की पहली सुसमाचार-ध्वनि यहीं सुनाई देती है, और उसमें एक "स्त्री के वंश" का वादा है। उसी क्षण से पूरा पुराना नियम एक बच्चे की प्रतीक्षा में है।

फिर देखिए कि परमेश्वर बार-बार किन स्त्रियों को चुनते हैं। बाँझ सारा, जो हँस पड़ी। रिबका, राहेल, हन्ना, मनोह की पत्नी: बार-बार वे कोखें जो खाली थीं और असंभव थीं, परमेश्वर के वादे को आगे बढ़ाती हैं। हन्ना ने भी शमूएल पाने के बाद एक गीत गाया था (1 शमूएल 2), और मरियम का गीत उसी की गूँज है। परमेश्वर हमेशा वहीं से काम शुरू करते हैं जहाँ मनुष्य के पास कुछ नहीं होता। बाँझपन से भी बड़ी असंभवता कौन-सी है? कुँवारीपन। मरियम की कोख उस लंबी शृंखला की आख़िरी और सबसे गहरी कड़ी है।

राजा दाऊद से परमेश्वर ने वादा किया था कि उसके वंश से एक ऐसा राजा आएगा जिसका राज्य सदा बना रहेगा। यशायाह ने इम्मानुएल की भविष्यवाणी दी। मीका ने बेतलेहेम का नाम लिया। मलाकी के बाद चार सौ साल तक स्वर्ग चुप रहा। और फिर, उस चुप्पी को तोड़ते हुए, एक स्वर्गदूत गलील के एक अनजान गाँव में एक साधारण लड़की के पास आता है। पौलुस इसे एक वाक्य में समेट देता है: "परन्तु जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन जन्मा" (गलातियों 4:4)।

यही मरियम का असली महत्व है। वह अपने आप में मंज़िल नहीं, बल्कि वह दरवाज़ा है जिससे होकर परमेश्वर हमारी दुनिया में आए। मत्ती 1:23 का "इम्मानुएल" कोई भावुक उपाधि नहीं; यह देहधारण का धर्मशास्त्र है। परमेश्वर ने दूर से हमें नहीं बचाया। वे भीतर आए, एक स्त्री की कोख में नौ महीने रहे, उसका दूध पिया, उसकी गोद में सोए। जो अनंत हैं वे नौ महीने तक बँध गए।

और यह सूत्र नए नियम में भी चलता रहता है। प्रकाशितवाक्य 12 में हमें फिर एक स्त्री दिखती है जो एक पुत्र जनती है, और एक अजगर जो उसे निगलना चाहता है। चाहे उस अध्याय की व्याख्या जो भी हो, उसका संदेश साफ़ है: उत्पत्ति 3:15 का युद्ध अब भी चल रहा है, और उस बच्चे ने साँप का सिर कुचल दिया है। मरियम इस पूरी कहानी में एक विनम्र दासी है, जिसने अपनी देह परमेश्वर की योजना के लिए खोल दी, और फिर पीछे हट गई ताकि उसका बेटा सामने आ सके।

उसके जीवन का सार

मरियम के जीवन के तीन निर्णायक क्षण हैं, और तीनों में एक ही चीज़ होती है: उसे कुछ छोड़ना पड़ता है।

पहला क्षण: नासरत में "हाँ" कहना। जब उसने कहा, "देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो" (लूका 1:38), तो उसने केवल एक गर्भ स्वीकार नहीं किया। उसने अपनी प्रतिष्ठा छोड़ी। गाँव में गिनती के लोग थे और सब एक-दूसरे को जानते थे; उसका पेट किसी से छिपा नहीं रह सकता था। यूसुफ़ का पहला विचार यही था कि "उसे त्याग दे" (मत्ती 1:19)। अगर स्वर्गदूत यूसुफ़ के स्वप्न में न आता, तो मरियम की ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी होती। उसने अपनी सुरक्षा परमेश्वर के हाथ में डाल दी, बिना यह जाने कि आगे क्या होगा। यह "हाँ" कहने का क्षण था, और यह उसके जीवन का सबसे सरल क्षण था।

दूसरा क्षण: मंदिर में तलवार की भविष्यवाणी और बेटे का फिसलना। जन्म के चालीस दिन बाद जब वे यीशु को मंदिर में ले गए, तो बूढ़े शमौन ने आशीष के बीच में एक चौंकाने वाली बात कही: "वरन् तेरा प्राण भी तलवार से आर-पार छिद जाएगा" (लूका 2:35)। यह वादा माँ को दिया गया था, और यह पूरा हुआ। बारह साल की उम्र में यीशु यरूशलेम में पीछे छूट गया, और जब तीन दिन बाद वे उसे मंदिर में मिले, तो मरियम ने वही कहा जो कोई भी माँ कहती: "तेरे पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूँढ़ते थे।" यीशु का उत्तर उसके दिल पर पहली हल्की चोट रहा होगा: "क्या तुम नहीं जानते कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?" (लूका 2:49)। लूका ईमानदारी से जोड़ता है कि "जो बात उसने उनसे कही, उसे वे न समझे" (लूका 2:50)। मरियम सब कुछ समझ नहीं पाई। पर उसने वह किया जो सच्चे शिष्य करते हैं: "उसकी माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं" (लूका 2:51)।

तीसरा क्षण: क्रूस के नीचे खड़े रहना। सेवकाई के वर्षों में मरियम को बार-बार पीछे हटाया गया। मरकुस 3 में उसका परिवार यीशु को पकड़ने आता है, यह सोचकर कि "उसका चित्त ठिकाने नहीं"। जब उसे बताया गया कि उसकी माता और भाई बाहर खड़े हैं, तो यीशु ने कहा: "मेरी माता और मेरे भाई ये ही हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं" (लूका 8:21)। यह ठुकराना नहीं था, यह ऊँचा उठाना था, पर मरियम के लिए यह दर्दनाक रहा होगा। और फिर गुलगुता। बाकी चेले भाग गए, पर वह वहीं खड़ी रही। शमौन की तलवार अब उसके प्राण के आर-पार जा चुकी थी।

मरियम से हम क्या सीखते हैं

पहला, समर्पण का अर्थ है खुद को परमेश्वर के हाथ में सौंप देना, तब भी जब आगे का रास्ता दिखाई न दे। "मुझे तेरे वचन के अनुसार हो" कहते समय मरियम को नहीं पता था कि आगे बेतलेहेम का चरनी, मिस्र की भागदौड़, और क्रूस के नीचे का सन्नाटा इंतज़ार कर रहा है। वह सिर्फ़ इतना जानती थी कि जिसने बुलाया है, वह भरोसे के लायक़ है। हम अक्सर परमेश्वर से पहले पूरा नक्शा माँगते हैं, फिर हाँ कहते हैं। मरियम ने उल्टा किया। उसका समर्पण सूचना पर नहीं, चरित्र पर टिका था।

दूसरा, विनम्रता खुद को छोटा समझना नहीं, बल्कि खुद को सही जगह पर रखना है। मरियम ने अपने आप को "दासी" कहा, फिर भी उसने गाया कि "अब से सब युग युग के लोग मुझे धन्य कहेंगे" (लूका 1:48)। यह विरोधाभास नहीं है। वह जानती थी कि उसे बड़ी बुलाहट मिली है, पर वह यह भी जानती थी कि वह बुलाहट उसकी अपनी योग्यता का इनाम नहीं थी। सच्ची विनम्रता अपनी कीमत को नकारती नहीं; वह अपनी कीमत का स्रोत पहचानती है। जब हम अपने काम, अपने वरदान, अपनी सफलता को इसी नज़र से देखते हैं, तो घमंड की जड़ अपने आप सूखने लगती है।

तीसरा, और शायद सबसे महत्वपूर्ण, विश्वास का सफ़र समझ से नहीं, ठहरने से बनता है। लूका दो बार कहता है कि मरियम बातों को अपने मन में रखकर सोचती रही (लूका 2:19 और लूका 2:51)। वह हर बात को तुरंत नहीं समझ पाई। वह उलझी, वह घबराई, वह कभी-कभी गलत भी रही। पर उसने परमेश्वर की बातों को फेंका नहीं; उन्हें संभालकर रखा और उन पर सोचती रही, जब तक कि समय ने उनका अर्थ खोल न दिया।

यहीं हमारा दृष्टिकोण फिर लौटता है। मरियम माता से शिष्या बनी, और शिष्य वह होता है जो पूरी समझ के बिना भी चलता रहता है। जिस दिन आपको परमेश्वर की कोई बात समझ नहीं आती, उस दिन आपके पास दो रास्ते होते हैं: नाराज़ होकर मुड़ जाना, या मरियम की तरह उस बात को दिल में रखकर चलते रहना।

दर्पण

आप शायद कह रहे हैं कि मरियम की कहानी और आपकी ज़िंदगी में कोई तुलना नहीं है। आपके पास कोई स्वर्गदूत नहीं आया। आपके घर का किराया बकाया है, आपके ऑफ़िस में कोई आपकी क़दर नहीं करता, आपकी शादी में वह गर्मजोशी नहीं बची जो पहले थी, और रात को जब सब सो जाते हैं तो आप छत को घूरते हुए सोचते हैं कि क्या परमेश्वर ने आपको भुला दिया है।

पर ठीक यही मरियम की जगह थी। नासरत में कोई कीर्तन नहीं गूँज रहा था। वह एक ऐसे गाँव की अनजान लड़की थी जिसके बारे में लोग कहते थे कि वहाँ से कोई अच्छी चीज़ नहीं निकल सकती। परमेश्वर की सबसे बड़ी योजना उस पते पर पहुँची जहाँ किसी ने डाक की उम्मीद नहीं की थी।

अब ईमानदारी से पूछिए: आप अपनी ज़िंदगी में किस चीज़ पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते? मरियम को अपने बेटे पर से पकड़ ढीली करनी पड़ी, और यह एक ही झटके में नहीं हुआ। बारह साल की उम्र में मंदिर में, काना की शादी में, भीड़ के बीच जब उसे बाहर खड़ा रहना पड़ा, और आख़िरकार क्रूस के नीचे। हर बार उसे थोड़ा और छोड़ना पड़ा।

आपके हाथ में क्या है? शायद वह बच्चा जिसकी हर चुनाव को आप नियंत्रित करना चाहते हैं। शायद वह पद जिसके छिन जाने से आपको लगता है कि आप कुछ भी नहीं रहेंगे। शायद वह पैसा जिसे गिनकर ही आपको नींद आती है। शायद वह पुराना घाव जिसे आपने अपनी पहचान बना लिया है।

परमेश्वर आपसे वह माँगते हैं जिसे पकड़कर आप डूब रहे हैं।

मरियम का "मुझे तेरे वचन के अनुसार हो" कोई एक बार का समर्पण नहीं था। यह उसके पूरे जीवन का ढाँचा बन गया। और यही आपसे भी माँगा जा रहा है: आज सुबह, इस हफ़्ते, इस साल। बड़ी बात यह नहीं कि आपकी बुलाहट कितनी बड़ी है, बल्कि यह कि आपने अपने हाथ खोले हैं या नहीं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को मरियम की कहानी सुनाना सरल है, बशर्ते हम उसे "क्रिसमस की नाटक वाली मरियम" से आगे ले जाएँ। छोटे बच्चों के लिए कहानी की जड़ यह है: परमेश्वर ने एक छोटे-से गाँव में रहने वाली एक साधारण लड़की को चुना, क्योंकि परमेश्वर बड़े और महान लोगों को ही नहीं, बल्कि उन लोगों को भी देखते हैं जिन्हें कोई नहीं देखता। मरियम ने कहा, "जी हाँ, जैसा आप कहेंगे वैसा ही हो", और उसी "हाँ" से होकर यीशु हमारी दुनिया में आए।

थोड़े बड़े बच्चों के साथ आप एक कदम और आगे जा सकते हैं: मरियम ने यीशु को बड़ा होते देखा, और धीरे-धीरे समझा कि यह बेटा सिर्फ़ उसका नहीं है, यह सारे संसार का उद्धारकर्ता है। बच्चे इस बात को अच्छी तरह पकड़ते हैं कि माँ को अपने बेटे के पीछे चलना पड़ा। किशोरों के साथ आप मरियम की उम्र पर बात कर सकते हैं। वह शायद तेरह-चौदह साल की थी, यानी उन्हीं की उम्र की, और परमेश्वर ने उसे कुछ बहुत बड़ा सौंपा। यह उन्हें यह समझने में मदद करता है कि विश्वास की ज़िंदगी बड़े होने का इंतज़ार नहीं करती।

हमारी वेबसाइट पर अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए बिलकुल सरल कहानी, सात से बारह साल के बच्चों के लिए सवाल-जवाब के साथ गहरी बातचीत, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए ऐसी सामग्री जो उनके अपने संघर्षों और सवालों से जुड़ती है। उम्र के अनुसार सही व्याख्या चुनिए, और कहानी को अपने घर की मेज़ तक ले आइए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मरियम कौन थी और वह कहाँ रहती थी?

मरियम गलील प्रदेश के नासरत नाम के एक छोटे गाँव में रहने वाली एक यहूदी लड़की थी, जो संभवतः तेरह से सोलह वर्ष की रही होगी जब स्वर्गदूत जिब्राईल उसके पास आया। उसकी मंगनी यूसुफ़ नाम के एक बढ़ई से हो चुकी थी, जो दाऊद के घराने का था। लूका 1:27 उसे "कुँवारी" कहता है। उसका रिश्ता एलीशिबा से भी था, जो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की माता थी। बाइबल उसके माता-पिता का नाम नहीं देती; परंपरा में आने वाले नाम बाद के गैर-बाइबलीय स्रोतों से हैं।

क्या मरियम सचमुच कुँवारी थी जब यीशु का जन्म हुआ?

हाँ, और यह मसीही विश्वास की बुनियादी बातों में से एक है। लूका 1:34 में मरियम खुद कहती है कि वह किसी पुरुष को नहीं जानती, और स्वर्गदूत उत्तर देता है कि पवित्र आत्मा उस पर उतरेगा। मत्ती 1:23 इसे यशायाह की भविष्यवाणी की पूर्ति बताता है: "देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी।" कुँवारी से जन्म कोई सजावटी चमत्कार नहीं है; यह दिखाता है कि यीशु मानव योजना का नहीं, बल्कि परमेश्वर की सीधी पहल का फल हैं, और वे पूरी तरह मनुष्य होते हुए भी पूरी तरह परमेश्वर के पुत्र हैं।

क्या मरियम पाप रहित थी?

बाइबल ऐसा कहीं नहीं सिखाती। इसके उलट, मरियम खुद परमेश्वर को "मेरा उद्धारकर्ता" कहती है (लूका 1:47), और उद्धारकर्ता की ज़रूरत सिर्फ़ उसे होती है जिसे बचाए जाने की ज़रूरत है। रोमियों 3:23 कहता है कि सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं, और यीशु मसीह को छोड़कर पवित्रशास्त्र किसी को इस नियम से बाहर नहीं रखता। मरियम असाधारण रूप से विश्वासयोग्य थी, पर वह अनुग्रह पाने वाली पापी थी, अनुग्रह देने वाली नहीं। यही बात उसे हमारे लिए अनुकरणीय बनाती है।

क्या हमें मरियम से प्रार्थना करनी चाहिए?

पवित्रशास्त्र हमें कहीं भी मरियम या किसी संत से प्रार्थना करने का निर्देश नहीं देता। 1 तीमुथियुस 2:5 स्पष्ट है कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक ही मध्यस्थ है, मसीह यीशु। इब्रानियों 4:16 हमें बुलाता है कि हम साहस के साथ सीधे अनुग्रह के सिंहासन के पास आएँ। मरियम का सम्मान करना और मरियम से प्रार्थना करना दो अलग बातें हैं। दिलचस्प बात यह है कि सुसमाचारों में मरियम की आख़िरी दर्ज बात लोगों को यीशु की ओर मोड़ती है, न कि अपनी ओर: "जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना" (यूहन्ना 2:5)।

क्या यीशु के भाई-बहन थे?

सुसमाचार इसका सीधा उत्तर देते हैं। मत्ती 13:55-56 में गाँव के लोग यीशु के भाइयों के नाम गिनाते हैं, याकूब, यूसुफ़, शमौन और यहूदा, और उसकी बहनों का भी ज़िक्र करते हैं। मत्ती 1:25 कहता है कि यूसुफ़ ने उसे तब तक नहीं जाना जब तक उसने पुत्र न जन्मा, जिससे संकेत मिलता है कि उसके बाद उनका सामान्य वैवाहिक जीवन रहा। यीशु का भाई याकूब बाद में यरूशलेम की कलीसिया का अगुवा बना और उसने याकूब की पत्री लिखी। मरियम के आजीवन कुँवारी रहने की धारणा बाइबल से नहीं, बाद की परंपरा से आती है।

लूका 1:28 में "जिस पर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है" का क्या अर्थ है?

मूल यूनानी शब्द का अर्थ है "जिसे अनुग्रह दिया गया है" या "जिस पर कृपा की गई है"। यह मरियम के भीतर किसी विशेष योग्यता का वर्णन नहीं करता, बल्कि परमेश्वर के उस चुनाव का जो उस पर उंडेला गया। यह वही अनुग्रह है जिसकी बात इफिसियों 1:6 में हर विश्वासी के बारे में की गई है। इसीलिए यह पद मरियम को हमसे दूर नहीं करता, बल्कि हमारे बहुत क़रीब ले आता है: वह भी उसी अनुग्रह से जीती थी जिससे आप और मैं जीते हैं, बस उसकी बुलाहट अनोखी थी।

यीशु ने क्रूस पर मरियम को "हे नारी" क्यों कहा? क्या यह अपमान था?

नहीं, यह अपमान बिलकुल नहीं था। उस समय की भाषा में "हे नारी" एक आदरसूचक संबोधन था, जैसे "देवी" या "माते"। यीशु ने यही शब्द काना में भी इस्तेमाल किया था और क्रूस पर भी: "हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है" (यूहन्ना 19:26)। इस संबोधन में एक गहरा संकेत भी है, कि अब रिश्ता केवल माँ-बेटे का नहीं रह गया। वह अपनी माता को शारीरिक रिश्ते से निकालकर विश्वास के नए परिवार में रख रहे थे, और मरने से पहले उसकी देखभाल का इंतज़ाम कर रहे थे।

यीशु ने अपनी माता को यूहन्ना के हवाले क्यों किया?

यूहन्ना 19:26-27 में यीशु अपनी माता से कहते हैं कि यह चेला अब तेरा पुत्र है, और उस चेले से कहते हैं कि यह तेरी माता है। इसमें दो बातें हैं। पहली, बेटे की ज़िम्मेदारी: तड़पते हुए भी यीशु ने अपनी विधवा माँ की व्यावहारिक ज़रूरत का ध्यान रखा, जो पाँचवीं आज्ञा का जीवित उदाहरण है। दूसरी, नए परिवार की स्थापना: उस समय यीशु के अपने भाई विश्वास नहीं करते थे (यूहन्ना 7:5), और वे मरियम को खून के रिश्ते से नहीं, विश्वास के रिश्ते से जोड़ रहे थे।

मरियम का गीत, जिसे मैग्निफ़िकैट कहते हैं, क्या है?

यह लूका 1:46-55 में दर्ज मरियम का स्तुतिगीत है, जो इन शब्दों से शुरू होता है: "मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है" (लूका 1:46)। यह गीत हन्ना के गीत (1 शमूएल 2) की गूँज है और पुराने नियम के भजनों से भरा हुआ है, जो दिखाता है कि यह किशोरी पवित्रशास्त्र में डूबी हुई थी। गीत का मुख्य विषय उलटफेर है: परमेश्वर घमंडियों को तितर-बितर करते हैं, बलवानों को सिंहासनों से गिराते हैं, और दीनों को ऊँचा करते हैं। यह एक कोमल लोरी नहीं, बल्कि परमेश्वर के राज्य की क्रांतिकारी घोषणा है।

क्या मरियम को "परमेश्वर की माता" कहा जा सकता है?

यह पदवी सुनने में चौंकाने वाली लगती है, पर आरंभिक कलीसिया ने इसे मरियम के बारे में नहीं, यीशु के बारे में कुछ कहने के लिए इस्तेमाल किया। इसका अर्थ यह नहीं कि मरियम त्रिएकता से पहले थी या उसने परमेश्वर की उत्पत्ति की। इसका अर्थ केवल इतना है कि जिस बच्चे को उसने जन्म दिया, वह सचमुच परमेश्वर है, न कि कोई ऐसा मनुष्य जिसमें बाद में परमेश्वर आ बसे। मत्ती 1:23 यही कहता है: "परमेश्वर हमारे साथ।" फिर भी, व्यवहार में यह पदवी अक्सर गलत समझी जाती है, इसलिए बाइबल की सीधी भाषा "यीशु की माता मरियम" ज़्यादा सुरक्षित और स्पष्ट है।

मरियम की मृत्यु कब और कैसे हुई?

बाइबल इस बारे में पूरी तरह चुप है। नए नियम में मरियम का आख़िरी उल्लेख प्रेरितों के काम 1:14 में है, जहाँ वह यरूशलेम के ऊपरी कमरे में चेलों के साथ प्रार्थना कर रही है, यानी पिन्तेकुस्त से ठीक पहले। इसके बाद उसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता। उसके शरीर सहित स्वर्ग उठाए जाने की धारणा पवित्रशास्त्र में कहीं नहीं है, वह बहुत बाद की परंपरा है। पवित्रशास्त्र की यह चुप्पी अपने आप में एक संदेश है: कहानी का केंद्र मरियम नहीं, उसका पुत्र है।

काना की शादी में मरियम ने क्या किया और वह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

जब शादी में दाखरस ख़त्म हो गया, तो मरियम ने यह बात यीशु को बताई। यीशु का उत्तर दूरी बनाने वाला लगता है, फिर भी मरियम सेवकों से कहती है: "जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना" (यूहन्ना 2:5)। यह सुसमाचारों में दर्ज उसका अंतिम कथन है, और यह किसी भी उपदेश से बड़ा है। वह ज़ोर नहीं डालती, वह निर्देश नहीं देती; वह लोगों को अपने बेटे के आज्ञापालन की ओर मोड़ देती है और खुद पीछे हट जाती है। मरियम की पूरी शिष्यता इसी एक वाक्य में सिमट आती है।

क्या मरियम हमेशा यीशु पर विश्वास करती थी?

पवित्रशास्त्र ईमानदार है। लूका 2:50 कहता है कि वह और यूसुफ़ यीशु की बात नहीं समझ पाए। मरकुस 3:21 में उसका परिवार उसे पकड़ने आता है, यह सोचकर कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है, और मरकुस 3:31 में मरियम भी उस समूह के साथ है। यूहन्ना 7:5 कहता है कि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे। पर मरियम पीछे नहीं हटी। वह क्रूस के नीचे खड़ी रही और पुनरुत्थान के बाद ऊपरी कमरे में प्रार्थना करती मिली (प्रेरितों के काम 1:14)। उसका विश्वास एक झटके में नहीं, बरसों में पका।

अंत में

मरियम की कहानी नासरत के एक कमरे में "हाँ" से शुरू होती है और यरूशलेम के ऊपरी कमरे में प्रार्थना पर आकर रुकती है। बीच में तीस से ज़्यादा साल हैं, और उन सालों में वह लगातार एक ही चीज़ सीखती रही: अपने बेटे को छोड़ना, ताकि उसे प्रभु के रूप में पा सके। प्रेरितों के काम 1:14 का चित्र इसीलिए इतना सुंदर है। वहाँ वह किसी विशेष सिंहासन पर नहीं बैठी है, न ही उसे कोई पदवी दी गई है। वह बाकी चेलों के बीच, कई स्त्रियों और अपने बेटों के साथ, एक चित्त होकर प्रार्थना कर रही है। जिस माता ने उद्धारकर्ता को जन्म दिया, वह अंत में उसी उद्धारकर्ता की कलीसिया की एक सदस्या बनकर बैठी है।

यही उसकी सबसे बड़ी महिमा है, और यही उसका सबसे बड़ा उपदेश।

अगर आप आगे पढ़ना चाहते हैं, तो लूका के पहले दो अध्याय धीरे-धीरे, रुक-रुककर पढ़िए, और हर बार पूछिए कि मरियम ने उस पल में क्या खोया और क्या पाया। फिर यूहन्ना 19 और प्रेरितों के काम 1 पढ़िए और देखिए कि परमेश्वर ने उस टूटी हुई माँ को कहाँ पहुँचाया। और अंत में अपने आप से वही सवाल पूछिए जो हर पन्ने पर लौटता है: क्या मैं भी कह सकता हूँ, "मुझे तेरे वचन के अनुसार हो"?

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

प्रार्थना संपादकीय पर यहेजकेल 11:1

पिता, तेरा आत्मा मुझे वहाँ ले चले जहाँ तू देखना चाहता है, भले ही वह दृश्य मेरे मन को बेचैन…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर एज्रा 4:12

दुश्मनों की चिट्ठी में भी सच छिपा था, "वे शहरपनाह बना चुके हैं और नेव की मरम्मत कर रहे हैं।"…

धन्यवाद संपादकीय पर दानिय्येल 2:11

ज्योतिषियों ने कहा था कि देवताओं का निवास मनुष्यों के संग नहीं है, पर पिता, आप हमारे बीच उतर आए…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर आमोस 4:9

तो भी तुम मेरी ओर न फिरे," यहोवा की यह वाणी है। यही एक वाक्य अध्याय में बार-बार लौटता है,…

प्रार्थना संपादकीय पर भजन संहिता 12:4

पिता, कई बार मुझे लगता है कि मेरे शब्द मेरे अपने हैं और मैं जो चाहूँ कह सकता हूँ। पर…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 राजाओं 20:19

यशायाह अभी अभी कह चुका था कि सब कुछ बाबेल ले जाया जाएगा, यहाँ तक कि तेरे बेटे भी। और…

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