बाइबल पात्र

मूसा का जीवन: दास से मुक्तिदाता बनने तक की कहानी

परिचय

एक सौ बीस साल का एक बूढ़ा आदमी नबो पहाड़ की चोटी पर खड़ा है। उसकी आँखें धुँधली नहीं हुईं, उसका बल भी नहीं घटा, और सामने दूर तक वह देश फैला हुआ है जिसके लिए उसने चालीस साल तक रेत, बगावत, भूख और शिकायतें झेलीं। वह देश उसे दिखाया जा रहा है, पर उसमें उसका पाँव कभी नहीं पड़ेगा। जो आदमी बीस लाख लोगों को दासता से बाहर ले आया, वह खुद बाहर ही रह गया।

यह मूसा की कहानी का अंत है, और शायद यही उसकी कहानी की सबसे गहरी बात भी। इस पृष्ठ पर हम मूसा के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे: नील नदी की टोकरी से लेकर फ़िरौन के महल तक, मिद्यान के सूनेपन से लेकर जलती झाड़ी तक, लाल समुद्र से सीनै तक, और मरीबा की चट्टान से नबो की चोटी तक। और हम देखेंगे कि उसकी हर सफलता और हर असफलता किस ओर इशारा करती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लेख मूसा को "चमत्कार करने वाला महान नेता" बताकर आगे बढ़ जाते हैं। हम यहाँ उसे एक अलग नज़र से पढ़ेंगे: मूसा वह आदमी है जो हमेशा बीच में खड़ा रहा। मिस्री और इब्री के बीच, फ़िरौन और परमेश्वर के बीच, परमेश्वर के क्रोध और लोगों के पाप के बीच, वादे और उसकी पूर्ति के बीच। उसका सबसे बड़ा काम समुद्र को चीरना नहीं था, बल्कि दरार में खड़े होना था। और उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यही थी कि बीच में खड़ा आदमी अक्सर दोनों तरफ़ से अकेला रह जाता है। इसी दृष्टिकोण से हम देखेंगे कि मूसा किस बेहतर मध्यस्थ की ओर उँगली उठाता है।

बाइबल मूसा के जीवन के बारे में क्या कहती है?

मूसा की कहानी एक सरकारी हत्या-आदेश से शुरू होती है। फ़िरौन ने हुक्म दिया था कि हर इब्री लड़के को नील नदी में डाल दिया जाए। लेवी के घराने के अम्राम और योकेबेद के घर एक बेटा जन्मा, और तीन महीने छिपाने के बाद उसकी माँ ने उसे सरकंडों की टोकरी में रखकर नदी के किनारे छोड़ दिया। जिस नदी को कब्र बनना था, वह पालना बन गई। फ़िरौन की बेटी ने उसे उठाया, नाम रखा मूसा, और विडम्बना देखिए: बच्चे को दूध पिलाने के लिए उसकी अपनी माँ को ही मज़दूरी पर रखा गया। वह लड़का महल में पला, मिस्र की सारी विद्या में शिक्षित हुआ, पर उसकी लोरियाँ इब्री थीं।

चालीस साल की उम्र में उसके भीतर का यह दोहरापन फट पड़ा। उसने एक मिस्री को एक इब्री पर अत्याचार करते देखा, इधर-उधर देखा, और उसे मार डाला। अगले ही दिन उसके अपने लोगों ने उसे ठुकरा दिया, और वह भागकर मिद्यान चला गया। इब्रानियों की पुस्तक इस चुनाव को कायरता नहीं, विश्वास कहती है: "विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया, इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन का सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना उत्तम लगा; और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं। विश्वास ही से उसने राजा के क्रोध से न डरकर मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा" (इब्रानियों 11:24-27)। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है: नया नियम मूसा के इस निर्णय को "मसीह के कारण निन्दित होना" कहता है। मूसा जानता भी नहीं था कि वह किसकी ओर चल रहा है, फिर भी उसका मुँह उसी दिशा में था।

अगले चालीस साल मूसा ने भेड़ें चराईं। राजकुमार से चरवाहा। यहीं, होरेब पहाड़ के पास, एक झाड़ी जलती रही पर भस्म न हुई, और वहाँ से बुलाहट आई: "अब आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी प्रजा इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आए" (निर्गमन 3:10)। ध्यान दीजिए, परमेश्वर यह नहीं कहते कि "जा और उन्हें छुड़ा"; वे कहते हैं "मैं तुझे भेजता हूँ"। मूसा का अधिकार उसकी योग्यता से नहीं, भेजने वाले से आता है। मूसा ने पाँच बहाने बनाए, और परमेश्वर ने हर बहाने का उत्तर अपने नाम से दिया: "मैं जो हूँ सो हूँ।"

फिर मिस्र लौटना, फ़िरौन से टकराव, दस विपत्तियाँ, और फसह की वह रात जब मेम्ने के लहू ने घरों को ढाँप लिया। और उसके बाद वह दृश्य जो पूरे पुराने नियम का दिल है: "तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया, और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाकर समुद्र को पीछे हटा दिया, और उसको सूखी भूमि कर दिया, और जल दो भाग हो गया। तब इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले, और उनके दाहिने और बाएँ हाथ पर जल दीवार का काम देता था" (निर्गमन 14:21-22)। हाथ मूसा का था, हवा परमेश्वर की। यही मूसा के जीवन का पूरा गणित है।

तीन महीने बाद वे सीनै पहुँचे, और वहाँ परमेश्वर ने अपने छुड़ाए हुए लोगों को अपनी वाचा दी। वहीं से चालीस साल की भटकन शुरू हुई, बारह भेदियों की रिपोर्ट के बाद, और वहीं मूसा की सेवा का असली रूप सामने आया: वह लगातार परमेश्वर और लोगों के बीच खड़ा रहा।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

मूसा पुराने नियम से कभी विदा नहीं होता। यहोशू की पुस्तक बार-बार "यहोवा के दास मूसा" की व्यवस्था की ओर लौटती है। भजनों में इस्राएल अपने इतिहास को गाता है, और हर बार लाल समुद्र और सीनै लौट आते हैं। भविष्यद्वक्ता जब लोगों को धिक्कारते हैं, तो निर्गमन की याद दिलाते हैं: तुम्हें छुड़ाया गया था, फिर तुम दासों जैसे क्यों जी रहे हो? पुराने नियम का आख़िरी पन्ना, मलाकी, इसी आदेश पर बंद होता है कि मूसा की व्यवस्था को स्मरण रखो। और मूसा ने खुद अपने बारे में आख़िरी शब्द नहीं कहा; उसने आगे इशारा किया: "तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे मध्य से, अर्थात् तेरे भाइयों में से मेरे समान एक नबी उत्पन्न करेगा; उसी की सुनना" (व्यवस्थाविवरण 18:15)।

व्यवस्थाविवरण का अंत ईमानदारी से लिखा गया शोक है: "और मूसा के तुल्य इस्राएल में ऐसा कोई नबी न उठा, जिससे यहोवा ने आमने-सामने बातें कीं" (व्यवस्थाविवरण 34:10)। यह वाक्य एक तारीफ़ है और एक खालीपन भी। सदियों बीत गईं और वह "मूसा के समान" नबी नहीं आया। इस्राएल इंतज़ार करता रहा।

फिर नया नियम खुलता है, और यीशु का बचपन अजीब तरह से जाना-पहचाना लगता है: एक राजा बच्चों को मार रहा है, एक बच्चा बच निकलता है, और मिस्र से बाहर बुलाया जाता है। यीशु पहाड़ पर चढ़कर व्यवस्था की व्याख्या करते हैं, जैसे सीनै का दृश्य दोबारा खेला जा रहा हो। और रूपान्तरण के पहाड़ पर मूसा स्वयं प्रकट होता है, एलिय्याह के साथ, और स्वर्ग से आवाज़ आती है कि इस पुत्र की सुनो। मूसा वहाँ बराबरी में नहीं, गवाही में खड़ा है।

यूहन्ना इसे एक वाक्य में कह देता है: "इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई, परन्तु अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची" (यूहन्ना 1:17)। यह मूसा का अपमान नहीं है। व्यवस्था पवित्र और भली है, पर वह हमें बदल नहीं सकती; वह हमें आईना दिखाती है। यीशु ने कहा कि मूसा ने उनके बारे में लिखा है (यूहन्ना 5:46)। इब्रानियों 3 समझाता है कि मूसा घर में विश्वासयोग्य सेवक था, पर मसीह उस घर पर पुत्र हैं। और प्रकाशितवाक्य में छुड़ाए हुए लोग "मूसा का गीत और मेम्ने का गीत" एक साथ गाते हैं, क्योंकि लाल समुद्र और क्रूस दो अलग कहानियाँ नहीं हैं, एक ही कहानी के दो अध्याय हैं।

यहीं हमारा दृष्टिकोण फिर लौटता है। मूसा बीच में खड़ा रहा, पर उसका बीच में खड़ा होना अस्थायी था; वह लोगों को मिस्र से बाहर ले आया, भीतर नहीं ले जा सका। यीशु मसीह वह मध्यस्थ हैं जो केवल बाहर नहीं निकालते, भीतर भी ले जाते हैं। मूसा दरवाज़े तक ले आया, मसीह भीतर ले जाते हैं।

उसके जीवन का सार

पहला निर्णायक पल: जलती झाड़ी। अस्सी साल की उम्र में, जब हर मानवीय हिसाब से मूसा का करियर ख़त्म था, परमेश्वर बोले। मूसा का पहला जवाब बहादुरी नहीं था: "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?" (निर्गमन 3:11)। परमेश्वर उसे उसकी योग्यता याद नहीं दिलाते; वे कहते हैं, "मैं निश्चय तेरे संग रहूँगा।" चालीस साल पहले मूसा में जोश था और बुलाहट नहीं थी, इसलिए उसने एक आदमी को मारा। अब बुलाहट थी और जोश नहीं था, इसलिए वह भेजा जा सका। परमेश्वर ने मूसा को तैयार नहीं, खाली पाया। यहीं मूसा पहली बार सचेत रूप से बीच में खड़ा हुआ: एक तरफ़ अत्याचारी साम्राज्य, दूसरी तरफ़ थकी हुई भीड़, और बीच में एक हकलाता हुआ चरवाहा जिसके हाथ में लाठी थी।

दूसरा निर्णायक पल: सोने का बछड़ा और वह प्रार्थना। सीनै पर परमेश्वर ने अपनी वाचा दी थी। मूसा चालीस दिन ऊपर रहा, और नीचे लोगों ने सोने का बछड़ा गढ़ लिया। मूसा उतरा, पटियाएँ तोड़ दीं, बछड़ा जलाया, और फिर वह हुआ जो उसके जीवन का सबसे ऊँचा शिखर है। परमेश्वर ने कहा कि वे इस जाति को मिटाकर मूसा से एक बड़ी जाति बना देंगे। यह किसी भी नेता के लिए सबसे बड़ा प्रलोभन था: लोगों से छुटकारा और अपनी विरासत। मूसा ने ठीक उलटा किया। वह लौटकर बोला, "अब तू उनका पाप क्षमा कर, नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरा नाम काट दे" (निर्गमन 32:32 का भाव)। यह आदमी अपने लोगों के साथ नष्ट होने को तैयार था, बिना उनके बचने को नहीं। यहाँ मूसा सबसे साफ़ तौर पर मसीह जैसा दिखता है, और यही उसकी असली महानता है, न कि विपत्तियाँ और चमत्कार।

तीसरा निर्णायक पल: मरीबा की चट्टान। चालीस साल की शिकायतों के बाद, कादेश में पानी नहीं था। परमेश्वर ने कहा चट्टान से बात कर। मूसा ने भीड़ से कहा, "हे विद्रोहियों, सुनो; क्या हमें इस चट्टान में से तुम्हारे लिये पानी निकालना चाहिये?" और लाठी से चट्टान पर दो बार मारा। पानी निकला, लोगों ने पिया, पर परमेश्वर का उत्तर कठोर था: "तुमने जो मुझ पर विश्वास नहीं किया, और मुझे इस्राएलियों की दृष्टि में पवित्र नहीं ठहराया, इसलिये तुम इस मण्डली को उस देश में पहुँचाने न पाओगे" (गिनती 20:12)। बहुत लोगों को यह सज़ा बड़ी लगती है। लेकिन मूसा ने वह किया जो हर थका हुआ सेवक करने को तरसता है: उसने परमेश्वर की जगह ले ली, "क्या हमें निकालना चाहिये", और अपने गुस्से को परमेश्वर का गुस्सा बना दिया। जो आदमी बीच में खड़ा था, वह एक पल के लिए बीच से हट गया और खुद को केंद्र में रख बैठा। नबो की चोटी इसी पल का परिणाम है।

मूसा से हम क्या सीखते हैं

पहला, नम्रता कमज़ोरी नहीं होती। बाइबल मूसा के बारे में एक चौंकाने वाला वाक्य लिखती है, ठीक उस समय जब उसका भाई और बहन उसके विरुद्ध बोल रहे थे: "मूसा तो पृथ्वी भर के रहनेवाले सब मनुष्यों से बहुत ही नम्र स्वभाव का था" (गिनती 12:3)। यह वही आदमी है जिसने फ़िरौन के सामने खड़े होकर आँख नहीं झपकाई और जिसने बगावत करने वाली भीड़ को डाँटा। तो नम्रता का मतलब दबकर जीना नहीं है। इब्री शब्द का भाव है: अपनी शक्ति को अपने हाथ में न रखना, उसे परमेश्वर के हाथ में सौंप देना। मूसा ने अपनी बहन मरियम के लिए ही प्रार्थना की जब वह कोढ़ी हो गई। नम्रता का अर्थ है अपनी लड़ाई परमेश्वर को सौंप देना।

दूसरा, परमेश्वर अधूरे लोगों को भेजते हैं, परिपूर्ण लोगों को नहीं। मूसा ने हत्या की, भागा, बहाने बनाए, गुस्से में पटियाएँ तोड़ीं, और अंत में परमेश्वर की आज्ञा से हटकर चट्टान पर लाठी मारी। और यही आदमी बाइबल का सबसे बड़ा भविष्यद्वक्ता कहलाया, और उसका नाम इब्रानियों 11 के विश्वास के अध्याय में लिखा गया। यह लापरवाही की छूट नहीं है; मरीबा की सज़ा दिखाती है कि परमेश्वर हल्के में नहीं लेते। पर यह उम्मीद है: आपकी बुलाहट आपके अतीत पर नहीं, परमेश्वर के "मैं तुझे भेजता हूँ" पर टिकी है।

तीसरा, सबसे बड़ी सेवा दरार में खड़े होना है। मूसा का जीवन इस बात की गवाही है कि नेतृत्व का मतलब मंच नहीं, मध्यस्थता है। जब लोग बड़बड़ाए, उसने प्रार्थना की। जब उन्होंने पत्थर उठाए, उसने परमेश्वर के सामने मुँह के बल गिरकर विनती की। भजन 106:23 कहता है कि परमेश्वर उन्हें नाश करने वाले थे, पर उनका चुना हुआ मूसा दरार में खड़ा हुआ। आज भी परमेश्वर ऐसे लोगों को खोजते हैं जो अपने परिवार, अपने कलीसिया, अपने मुहल्ले और अपने देश के लिए दरार में खड़े हों। यह काम अकेला और अनदेखा होता है, लेकिन स्वर्ग में इसका हिसाब रखा जाता है।

दर्पण

आप जानते हैं दरार में खड़े होना कैसा लगता है। शायद आप अपने परिवार में वही व्यक्ति हैं जिसे सब कुछ जोड़कर रखना पड़ता है: माता-पिता की चिंता, भाई-बहनों की नाराज़गी, बच्चों की ज़रूरतें, और सबके बीच आपकी थकान जिसकी किसी को ख़बर नहीं। आप ऑफ़िस में सच बोलने वाले अकेले आदमी हैं और इसका मोल आपको तनख़्वाह और पदोन्नति से चुकाना पड़ता है। आप घर में अकेले विश्वासी हैं और हर रविवार को कीमत देते हैं।

मूसा का जीवन आपसे दो बातें कहता है, और दोनों चुभती हैं।

पहली: आपकी बुलाहट का बोझ आपके कंधों के लिए नहीं बना है। मूसा जब पूरी भीड़ का न्याय अकेले करने बैठा था, तब उसके ससुर ने कहा था कि तू अकेला थक जाएगा, यह काम तेरे लिए भारी है। बहुत मसीही लोग इसी अकेलेपन को आत्मिकता समझ लेते हैं। परमेश्वर ने मूसा को हारून दिया, यहोशू दिया, सत्तर पुरनिये दिए। आप अगर सब कुछ अकेले उठा रहे हैं, तो यह विश्वास नहीं, थकान की ओर बढ़ता एक कदम है।

दूसरी, और यह ज़्यादा कड़वी है: मरीबा की चट्टान आपके भीतर भी है। वह पल जब आपका सही गुस्सा आपकी ज़ुबान से परमेश्वर का न्याय बनकर निकलता है। जब आप अपने जीवनसाथी, अपने बच्चे या अपने सहकर्मी से बात करते हैं और भीतर से एक आवाज़ कहती है, "मैं ठीक हूँ, ये विद्रोही हैं।" उस पल आप बीच से हटकर केंद्र में आ जाते हैं। मूसा भी वहीं फिसला, चालीस साल की वफ़ादारी के बाद।

तो आज रुककर पूछिए: मैं किसके लिए दरार में खड़ा हूँ, और किस पर लाठी उठा रहा हूँ? नबो की चोटी पर खड़ा वह बूढ़ा आदमी आपको यह याद दिलाता है कि आख़िरी मुक्ति आपके प्रदर्शन पर नहीं, एक बेहतर मध्यस्थ पर टिकी है, और वे आपको भीतर तक ले जाएँगे।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को मूसा बहुत जल्दी अच्छा लगता है, क्योंकि उसकी कहानी में टोकरी, नदी, राजकुमार, जलती झाड़ी, मेंढक, चीरा हुआ समुद्र और पत्थर की पटियाएँ हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इस रोमांच के नीचे बच्चा क्या समझकर उठे।

सबसे सरल रूप में कहानी यह है: परमेश्वर के लोग मिस्र में गुलाम थे और रोते थे। परमेश्वर ने उनका रोना सुना और एक आदमी को भेजा जो खुद को बिलकुल काबिल नहीं समझता था। परमेश्वर ने कहा, "तू जा, मैं तेरे साथ रहूँगा।" मूसा गया, और परमेश्वर ने अपने लोगों को छुड़ाया। बाद में मूसा हर बार, जब लोग गलती करते थे, परमेश्वर के सामने खड़ा होकर उनके लिए विनती करता था। और आगे चलकर परमेश्वर ने यीशु को भेजा, जो मूसा से भी बड़े मुक्तिदाता हैं, क्योंकि वे हमें पाप की गुलामी से छुड़ाते हैं।

छोटे बच्चों के साथ एक बात ज़रूर जोड़िए: मूसा हीरो नहीं था, परमेश्वर हीरो थे। बच्चे बहुत आसानी से यह सीख लेते हैं कि "बहादुर बनो", और वह बात उन्हें दबाव देती है। इसके बजाय उन्हें यह बताइए कि परमेश्वर डरने वालों को भी भेजते हैं और साथ चलते हैं।

उम्र के हिसाब से यह कहानी अलग-अलग तरह से कहनी पड़ती है। तीन से छह साल के बच्चों के लिए टोकरी, झाड़ी और समुद्र की तस्वीरों पर ज़ोर रहेगा। सात से बारह साल के बच्चों के लिए मूसा के चुनाव, दस आज्ञाएँ और उसकी गलतियाँ समझने लायक बन जाती हैं। और बारह साल से ऊपर के किशोर उस सवाल तक पहुँच सकते हैं जो हम सबको चुभता है: परमेश्वर ने मूसा को वादे के देश में क्यों नहीं जाने दिया? हमारी वेबसाइट पर इन तीनों उम्र-वर्गों के लिए अलग-अलग सरल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, ताकि आप अपने बच्चे की समझ के अनुसार यही कहानी बता सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मूसा कौन थे और वे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

मूसा लेवी के घराने में जन्मे एक इब्री थे, जो मिस्र में फ़िरौन की बेटी के घर पले और आगे चलकर इस्राएल को दासता से बाहर निकालने के लिए परमेश्वर के द्वारा भेजे गए। वे भविष्यद्वक्ता, अगुवा, न्यायी और सबसे बढ़कर मध्यस्थ थे, जिनके द्वारा परमेश्वर ने सीनै पर अपनी वाचा और व्यवस्था दी। पुराने नियम की पहचान उनके नाम से जुड़ी है, और नया नियम उन्हें यीशु मसीह की ओर इशारा करने वाली सबसे बड़ी छाया के रूप में पेश करता है।

मूसा कितने साल जीवित रहे और उनका जीवन कैसे बँटा हुआ था?

बाइबल कहती है कि मूसा एक सौ बीस वर्ष के थे जब उनकी मृत्यु हुई, और उनकी आँखें धुँधली नहीं हुई थीं। प्रेरितों के काम 7 के आधार पर उनका जीवन तीन बराबर हिस्सों में बँटा दिखता है: पहले चालीस साल मिस्र के महल में, अगले चालीस साल मिद्यान में भेड़ें चराते हुए, और आख़िरी चालीस साल इस्राएल को मिस्र से निकालकर जंगल में अगुवाई करते हुए। हर हिस्से में परमेश्वर कुछ और काम कर रहे थे: शिक्षा, तोड़ाई, और फिर सेवा।

मूसा को वादे के देश में जाने से क्यों रोका गया?

गिनती 20 में परमेश्वर ने मूसा से कहा था कि चट्टान से बात करे, पर मूसा ने गुस्से में भीड़ को विद्रोही कहकर लाठी से चट्टान पर दो बार मारा और कहा, "क्या हमें इस चट्टान में से तुम्हारे लिये पानी निकालना चाहिये?" परमेश्वर का कारण साफ़ है: मूसा ने उन पर विश्वास नहीं किया और उन्हें लोगों की दृष्टि में पवित्र नहीं ठहराया। जो आदमी परमेश्वर का प्रतिनिधि था, उसने एक पल के लिए परमेश्वर की जगह ले ली। यह हमें दिखाता है कि परमेश्वर अपने अगुवों को हल्के में नहीं लेते।

क्या मूसा ने वाकई बाइबल की पहली पाँच पुस्तकें लिखीं?

यहूदी और मसीही परम्परा एक स्वर से मूसा को पंचग्रंथ, यानी उत्पत्ति से व्यवस्थाविवरण तक की पुस्तकों का मुख्य लेखक मानती है, और बाइबल स्वयं इसकी गवाही देती है, क्योंकि यीशु और प्रेरित भी "मूसा की व्यवस्था" और "मूसा ने लिखा" जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। कुछ हिस्से, जैसे मूसा की मृत्यु का विवरण, स्पष्ट रूप से बाद में किसी और के द्वारा जोड़े गए। इससे लेखकत्व की गवाही कमज़ोर नहीं होती; परमेश्वर का वचन एक समुदाय के भीतर, पर एक ही आत्मा की अगुवाई में लिखा गया।

मूसा और यीशु मसीह में क्या अंतर है?

दोनों के बीच बहुत समानताएँ हैं: दोनों बचपन में एक हत्यारे राजा से बचाए गए, दोनों मिस्र से बुलाए गए, दोनों ने पहाड़ पर से परमेश्वर की इच्छा सुनाई, दोनों अपने लोगों के लिए बीच में खड़े हुए। पर अंतर निर्णायक है। मूसा सेवक था, मसीह पुत्र हैं। मूसा ने व्यवस्था दी, मसीह ने अनुग्रह और सच्चाई पहुँचाई। मूसा लोगों को मिस्र से बाहर लाया पर देश में भीतर न ले जा सका, वहीं मसीह अपने लोगों को अन्त तक ले जाते हैं और स्वयं उनकी विश्रामभूमि हैं।

जलती झाड़ी में परमेश्वर ने अपना नाम क्या बताया?

जब मूसा ने पूछा कि लोगों से क्या कहूँ कि किसने भेजा है, तब परमेश्वर ने उत्तर दिया, "मैं जो हूँ सो हूँ", और कहा कि इस्राएलियों से कहना, "मैं हूँ" ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है (निर्गमन 3:14)। इस नाम का अर्थ है कि परमेश्वर किसी और पर निर्भर नहीं हैं, वे सदा हैं, और अपनी वाचा में सदा वही रहते हैं। यीशु ने यूहन्ना 8:58 में इसी नाम को अपने ऊपर लिया, "इब्राहीम के जन्म से पहले से मैं हूँ", और इसीलिए सुनने वालों ने पत्थर उठाए।

निर्गमन 14:21-22 का समुद्र पार होना कैसे समझें?

यह पद बताता है कि मूसा ने अपना हाथ बढ़ाया और परमेश्वर ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाकर जल को दो भाग कर दिया, और इस्राएली सूखी भूमि पर चले जबकि जल उनके दाएँ-बाएँ दीवार जैसा खड़ा रहा। बाइबल इसे परमेश्वर का काम कहती है, जिसमें उन्होंने हवा जैसे साधारण साधन का उपयोग किया। मूसा का हाथ केवल आज्ञा मानने का चिन्ह था। नया नियम इसी घटना को बपतिस्मा और छुटकारे की तस्वीर के रूप में पढ़ता है: दासता पीछे छूट गई और नया जीवन आगे खुल गया।

दस आज्ञाएँ क्या हैं और वे आज हमारे लिए क्यों मायने रखती हैं?

निर्गमन 20:1-17 में परमेश्वर ने सीनै पर अपनी वाचा की दस बातें दीं। शुरुआत आज्ञा से नहीं, अनुग्रह से होती है: "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है।" इसके बाद पहली चार बातें परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते को छूती हैं, यानी दूसरे देवता न मानना, मूर्ति न बनाना, उनका नाम व्यर्थ न लेना और विश्रामदिन को पवित्र मानना; और बाकी छह पड़ोसी के साथ हमारे रिश्ते को, यानी माता-पिता का आदर, हत्या, व्यभिचार, चोरी, झूठी साक्षी और लालसा। ये नियम छुड़ाए हुए लोगों के लिए जीने का ढाँचा हैं, छुटकारा कमाने की सीढ़ी नहीं।

गिनती 12:3 में मूसा को सबसे नम्र कहा गया है, तो क्या उन्होंने अपनी ही तारीफ़ लिखी?

यह पद कहता है कि मूसा पृथ्वी भर के सब मनुष्यों से बहुत ही नम्र स्वभाव का था, और कई पाठकों को यह अजीब लगता है। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य तारीफ़ के लिए नहीं, अदालत के गवाह की तरह रखा गया है: मरियम और हारून ने उस पर आरोप लगाया था, और परमेश्वर स्वयं उसका बचाव कर रहे हैं। पवित्र आत्मा की प्रेरणा में लिखा गया यह वाक्य मूसा की अपनी घोषणा नहीं, बल्कि परमेश्वर का प्रमाणपत्र है, और यह बताता है कि नम्रता का अर्थ अपनी लड़ाई परमेश्वर के हाथ में छोड़ देना है।

मूसा की मृत्यु कहाँ हुई और उनकी कब्र कहाँ है?

व्यवस्थाविवरण 34 बताता है कि मूसा मोआब देश में नबो पहाड़ की चोटी पर परमेश्वर के वचन के अनुसार मरा, और परमेश्वर ने ही उसे मोआब की तराई में गाड़ा, पर आज तक कोई नहीं जानता कि उसकी कब्र कहाँ है। यह छिपाव जान-बूझकर लगता है, क्योंकि इस्राएल आसानी से मूसा की कब्र को पूजा का स्थान बना लेता। यहूदा 9 में मूसा की देह के विषय में एक विवाद का ज़िक्र भी आता है। मरने से पहले उसने यहोशू पर हाथ रखकर अगुवाई सौंपी।

व्यवस्थाविवरण 34:10 का क्या मतलब है कि मूसा जैसा कोई नबी न उठा?

यह पद कहता है कि मूसा के तुल्य इस्राएल में ऐसा कोई नबी न उठा, जिससे परमेश्वर ने आमने-सामने बातें कीं। दूसरे भविष्यद्वक्ताओं को दर्शन और स्वप्न मिले, पर मूसा से परमेश्वर सीधे बोले, जैसे कोई मित्र से बात करे। यह वाक्य एक तारीफ़ भी है और एक अधूरी प्रतीक्षा भी, क्योंकि मूसा ने खुद कहा था कि परमेश्वर उसके समान एक नबी उत्पन्न करेंगे। नया नियम बताता है कि वह प्रतीक्षा यीशु मसीह में पूरी हुई, जो केवल परमेश्वर से बात नहीं करते, स्वयं परमेश्वर का वचन हैं।

इब्रानियों 11:24-27 मूसा के बारे में क्या सिखाता है?

यह हिस्सा मूसा के जीवन के सबसे बड़े निर्णय को विश्वास कहता है: उसने फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया और पाप के थोड़े दिन के सुख से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना उत्तम समझा। इससे और भी आगे बढ़कर पाठ कहता है कि उसने "मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा", क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं। विश्वास का अर्थ यही है: अनदेखे को देखने वाली आँख, जो आज के नुकसान को कल के इनाम के सामने तोलती है।

अंत में

मूसा को याद करने के दो तरीके हैं। एक तरीका है उसे उस आदमी के रूप में देखना जिसने समुद्र चीरा, विपत्तियाँ ऐलान कीं और पत्थर की पटियाएँ उतारीं। दूसरा तरीका, और मुझे लगता है बाइबल का तरीका, यह है कि उसे उस आदमी के रूप में देखें जो अपने लोगों और परमेश्वर के बीच खड़ा रहा, तब भी जब उसके लोग उसे नहीं चाहते थे, और तब भी जब खड़े रहने की कीमत उसके अपने भविष्य से चुकानी पड़ी। उसकी लाठी नहीं, उसकी विनती उसे बड़ा बनाती है।

और यही जगह है जहाँ हमारी कहानी शुरू होती है। मूसा नबो की चोटी पर रुक गया, ताकि हमारी आँखें उससे आगे उठें। जिस मध्यस्थ की हमें ज़रूरत थी, उसने अपना नाम पुस्तक से कटवाने की पेशकश नहीं की, उसने अपना लहू दे दिया, और वह जीवित होकर आज भी हमारे लिए विनती करता है।

अगर आप आगे पढ़ना चाहें, तो निर्गमन के पहले बीस अध्याय धीरे-धीरे पढ़िए और हर बार पूछिए कि यहाँ मूसा क्या कर रहा है और परमेश्वर क्या कर रहे हैं। फिर इब्रानियों 3 और 11 पढ़िए। आप पाएँगे कि पुराना नियम का सबसे बड़ा आदमी भी घुटनों पर बैठकर एक बेहतर मुक्तिदाता की ओर इशारा कर रहा है।

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पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

प्रार्थना संपादकीय पर यहेजकेल 11:1

पिता, तेरा आत्मा मुझे वहाँ ले चले जहाँ तू देखना चाहता है, भले ही वह दृश्य मेरे मन को बेचैन…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर एज्रा 4:12

दुश्मनों की चिट्ठी में भी सच छिपा था, "वे शहरपनाह बना चुके हैं और नेव की मरम्मत कर रहे हैं।"…

धन्यवाद संपादकीय पर दानिय्येल 2:11

ज्योतिषियों ने कहा था कि देवताओं का निवास मनुष्यों के संग नहीं है, पर पिता, आप हमारे बीच उतर आए…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर आमोस 4:9

तो भी तुम मेरी ओर न फिरे," यहोवा की यह वाणी है। यही एक वाक्य अध्याय में बार-बार लौटता है,…

प्रार्थना संपादकीय पर भजन संहिता 12:4

पिता, कई बार मुझे लगता है कि मेरे शब्द मेरे अपने हैं और मैं जो चाहूँ कह सकता हूँ। पर…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 राजाओं 20:19

यशायाह अभी अभी कह चुका था कि सब कुछ बाबेल ले जाया जाएगा, यहाँ तक कि तेरे बेटे भी। और…

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