योना का जीवन: भागते भविष्यद्वक्ता पर परमेश्वर की दया
परिचय
यापो के बंदरगाह पर एक आदमी खड़ा है। उसकी जेब में भाड़ा है, और उसके मन में एक ही बात: जितनी दूर जा सकूँ, चला जाऊँ। जहाज तर्शीश की ओर जा रहा है, यानी उस समय की जानी हुई दुनिया के बिलकुल दूसरे छोर की ओर। वह टिकट खरीदता है, नीचे उतरता है, और सो जाता है। तूफान उठता है, नाविक चिल्लाते हैं, माल समुद्र में फेंका जाता है, और परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता खर्राटे भर रहा है।
यह आदमी कोई नास्तिक नहीं था। यह परमेश्वर का बुलाया हुआ सेवक था, जिसने पहले भी परमेश्वर का वचन सुनाया था। तो फिर वह भाग क्यों रहा था? इस पृष्ठ पर हम योना के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे, उसकी ताकत और उसकी कड़वाहट दोनों को ईमानदारी से, और पाएँगे कि उसकी असली दौड़ किसी काम से नहीं, बल्कि किसी और चीज़ से थी।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लोग योना की कहानी को "आज्ञा मानो, वरना मछली निगल लेगी" की कहानी बना देते हैं। पर पुस्तक खुद यह नहीं कहती। योना खुद अध्याय 4 में बताता है कि वह क्यों भागा था: इसलिए नहीं कि काम कठिन था, बल्कि इसलिए कि उसे डर था कि परमेश्वर उसके शत्रुओं पर दया करेंगे। यानी योना कर्तव्य से नहीं, दया से भागा। इसी दृष्टिकोण से हम उसका जीवन पढ़ेंगे: एक ऐसे भविष्यद्वक्ता की कहानी जिसे नीनवे से ज़्यादा खुद अपने हृदय के मन फिराव की ज़रूरत थी, और जिससे परमेश्वर अंत तक प्रश्न पूछते रहे।
बाइबल योना के जीवन के बारे में क्या कहती है?
योना का नाम बाइबल में पहली बार उसकी अपनी पुस्तक में नहीं, बल्कि इस्राएल के इतिहास में आता है। 2 राजा 14:25 बताता है कि यारोबाम दूसरे के दिनों में इस्राएल की सीमाएँ फिर से बढ़ीं, और यह "अपने दास अम्मत्तै के पुत्र योना नामक भविष्यद्वक्ता" के द्वारा कहे गए वचन के अनुसार हुआ। योना गत्हेपेर का रहनेवाला था, गलील का एक छोटा गाँव। यानी वह कोई अनजान व्यक्ति नहीं था; वह एक सफल, राष्ट्रवादी भविष्यद्वक्ता था जिसने अपने देश के लिए अच्छी खबर सुनाई थी। उसका रिकॉर्ड शानदार था। और ठीक इसी आदमी से परमेश्वर ने कहा कि उठकर नीनवे जा।
नीनवे अश्शूर का महानगर था, उस साम्राज्य की राजधानी की ओर बढ़ता हुआ शहर जिसने आगे चलकर इस्राएल के दस गोत्रों को बंदी बनाकर ले जाना था। अश्शूरी अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात थे। योना के कानों में "नीनवे को जा" सुनना ऐसा था जैसे किसी से कहा जाए कि जाकर उन लोगों को चेतावनी दे जो तेरे परिवार को मार डालेंगे, ताकि वे बच जाएँ।
योना की प्रतिक्रिया एक ही पद में दर्ज है, और उस पद में एक शब्द बार-बार लौटता है: योना 1:3 कहता है, "परन्तु योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिये उठा, और यापो को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके संग होकर यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।" ध्यान दीजिए, "यहोवा के सम्मुख से" दो बार। योना काम से नहीं, परमेश्वर की उपस्थिति से भाग रहा था। और उसने इसके लिए भाड़ा दिया। परमेश्वर से भागने का किराया हमेशा हमीं चुकाते हैं।
पर भागना कहाँ तक चलेगा? भजन संहिता 139:7 यही प्रश्न पूछती है: "मैं तेरे आत्मा से भागकर किधर जाऊँ? वा तेरे साम्हने से किधर भागूँ?" दाऊद यह बात आराधना में लिखता है, योना इसे अनुभव में सीखता है। परमेश्वर ने समुद्र पर एक बड़ी आँधी भेजी, नाविक डर के मारे अपने-अपने देवताओं को पुकारने लगे, और अंत में योना ने कहा कि मुझे उठाकर समुद्र में फेंक दो। पानी में गिरते ही वह मरा नहीं; योना 1:17 कहता है कि "यहोवा ने एक बड़ा मच्छ ठहराया था कि योना को निगल ले।" मछली दंड नहीं, बचाव थी।
उसी अंधेरे पेट में योना की पहली सच्ची प्रार्थना निकली। योना 2:2 में वह कहता है, "मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है; अधोलोक के उदर में से मैं चिल्ला उठा, और तू ने मेरी सुन ली।" और उसकी प्रार्थना का शिखर है, "उद्धार यहोवा ही से होता है।" तीन दिन बाद मछली ने उसे सूखी भूमि पर उगल दिया, और परमेश्वर का वचन दूसरी बार आया।
इस बार योना गया। उसका संदेश छोटा था, बस एक वाक्य, और उसमें दया का कोई वादा नहीं था। फिर भी जो हुआ, वह पूरे पुराने नियम में अनोखा है। योना 3:5 लिखता है, "तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट पहिना।" राजा भी सिंहासन से उतरकर राख में बैठ गया। और परमेश्वर ने उन पर दया की।
अब कहानी का असली मोड़ आता है। नगर बचा, पर भविष्यद्वक्ता जल उठा। योना 4:2 में वह अपनी नाराज़गी का कारण खुद खोल देता है: "हे यहोवा जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तर्शीश को भाग जाने के लिये फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्वर है, विलम्ब से क्रोध करनेवाला और करुणानिधान है, और दु:ख देकर पछतानेवाला है।" यही पुस्तक की कुंजी है। योना अज्ञानता से नहीं भागा था, वह परमेश्वर के स्वभाव को जानकर भागा था।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
योना की पुस्तक अकेली खड़ी नहीं है। जिन शब्दों से वह अध्याय 4 में शिकायत करता है, वे निर्गमन 34:6 से उधार लिए गए हैं, जहाँ परमेश्वर स्वयं मूसा के सामने अपना नाम प्रकट करते हैं: "ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य।" इस्राएल ने सोने के बछड़े के बाद यही दया पाई थी। योना को आपत्ति इस बात से थी कि वही दया सीमा पार करके अश्शूरियों तक पहुँच रही है। यह पुराने नियम का एक गहरा सूत्र है: परमेश्वर ने अब्राहम को इसलिए चुना था कि उसके द्वारा "पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे," पर चुने हुए लोग बार-बार भूल गए कि उन्हें आशीष का पात्र नहीं, आशीष का माध्यम बनाया गया था।
दिलचस्प बात यह भी है कि नहूम की पुस्तक उसी नीनवे के विनाश की घोषणा करती है, लगभग सौ साल बाद। यानी योना के दिनों का मन फिराव सच्चा था, पर स्थायी नहीं। परमेश्वर की धीरज असीम नहीं, पर वह असली है। एक पीढ़ी की तौबा एक पीढ़ी को बचाती है।
नए नियम में योना अचानक केंद्र में आ जाता है, क्योंकि यीशु मसीह स्वयं उसका नाम लेते हैं। जब लोगों ने चिन्ह माँगा, तो प्रभु ने कहा, मत्ती 12:40, "क्योंकि जैसा योना तीन रात दिन महा मच्छ के पेट में रहा, वैसा ही मनुष्य का पुत्र तीन रात दिन पृथ्वी के भीतर रहेगा।" यहाँ दो बातें एक साथ हैं। पहली, यीशु योना की कहानी को एक वास्तविक घटना मानते हैं, कोई नैतिक कल्पना नहीं। दूसरी, वे खुद को उस अंधेरे और उस पुनरुत्थान से जोड़ते हैं। पर अंतर बहुत बड़ा है। योना अपनी बगावत के कारण गहराई में गया; यीशु मसीह हमारी बगावत के कारण गए। योना को समुद्र में फेंका गया ताकि नाविक बचें; मसीह ने स्वयं को दे दिया ताकि जगत बचे।
अगले ही पद में यीशु कहते हैं कि नीनवे के लोग न्याय के दिन खड़े होकर उस पीढ़ी को दोषी ठहराएँगे, क्योंकि उन्होंने योना के प्रचार से मन फिराया, "और देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है।" योना बेमन से गया और फिर भी नगर बदल गया; मसीह पूरे मन से आए और फिर भी उनके अपने नगर ने उन्हें ठुकराया।
और एक छोटा सा विवरण देखिए जो संयोग नहीं लगता। प्रेरितों के काम 10 में पतरस यापो नगर में, समुद्र किनारे एक छत पर, दर्शन देखता है कि अन्यजातियों को अशुद्ध न कहे। यह वही यापो है जहाँ से योना अन्यजातियों के पास जाने से बचने के लिए जहाज पर चढ़ा था। उसी बंदरगाह पर परमेश्वर ने एक दूसरे इब्री सेवक को उसी संकीर्णता से मुक्त किया, और इस बार वह गया। पतरस बाद में लिखता है, 2 पतरस 3:9, "प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।" योना की पुस्तक इसी वाक्य का जीता जागता नाटक है।
उसके जीवन का सार
योना के जीवन में तीन क्षण ऐसे हैं जिनके बिना उसे समझना असंभव है, और तीनों में वही प्रश्न लौटता है: क्या यह आदमी परमेश्वर की दया को स्वीकार करेगा, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी?
पहला क्षण यापो के बंदरगाह पर है, जब उसने भाड़ा दिया। यह जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला नहीं था; इसमें योजना थी, पैसा था, दिशा थी। बगावत आमतौर पर ऐसी ही दिखती है, अव्यवस्थित नहीं बल्कि सुनियोजित। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में योना कभी परमेश्वर से बहस नहीं करता, वह बस मुड़कर चल देता है। बहुत से विश्वासी परमेश्वर से लड़ते नहीं, वे चुपचाप विषय बदल देते हैं। तूफान में जब नाविक उसका परिचय पूछते हैं, तो वह अपने धर्मशास्त्र को बिलकुल ठीक दोहराता है, योना 1:9, "मैं इब्री हूँ; और स्वर्ग का परमेश्वर यहोवा जिसने जल स्थल दोनों को बनाया है, उसी का भय मानता हूँ।" जिसने आकाश और समुद्र बनाया, उससे समुद्र के रास्ते भागना; योना का सिद्धांत सही था, उसका हृदय पीछे रह गया था।
दूसरा क्षण मछली के पेट में है। वहाँ कोई दर्शक नहीं, कोई मंडली नहीं, कोई प्रतिष्ठा नहीं, सिर्फ अंधेरा और पानी और समय। योना 2:2 की पुकार, "मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी," किसी मंदिर से नहीं, कब्र जैसी जगह से उठी। यह प्रार्थना ज़्यादातर भजन संहिता के वाक्यों से बुनी हुई है, यानी उसने बचपन से याद किए हुए शब्दों को सबसे गहरे गड्ढे में जाकर सच माना। वहीं उसने कहा, "उद्धार यहोवा ही से होता है।" यह पुस्तक का धार्मिक शिखर है। दुख यह है कि जो सच उसने अपने लिए खुशी से गाया, वही सच दूसरों पर लागू होते ही उसे कड़वा लगने लगा।
तीसरा क्षण नीनवे के पूर्व में एक झोंपड़ी के नीचे है। नगर बच गया है, और भविष्यद्वक्ता बैठकर देख रहा है कि शायद अब भी कुछ भस्म हो जाए। परमेश्वर एक बेल उगाते हैं, फिर एक कीड़ा भेजते हैं, फिर गरम पूरवाई। योना पौधे के लिए रोता है और लोगों के लिए नहीं। परमेश्वर का आखिरी वाक्य एक प्रश्न है: क्या मैं उस बड़े नगर के लिए तरस न खाऊँ, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक लोग हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथ का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से पशु भी हैं? पुस्तक यहीं खत्म हो जाती है। योना का उत्तर दर्ज नहीं है, क्योंकि उत्तर पाठक को देना है।
योना से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ यह है कि परमेश्वर से दूरी हमेशा नीचे की ओर होती है। मूल पाठ में एक शब्द बार-बार लौटता है: योना यापो को "उतरा", जहाज में "उतरा", नीचे के भाग में "उतरा", और अंत में पहाड़ों की जड़ों तक उतर गया। बगावत कभी एक कदम में पूरी नहीं होती, वह सीढ़ी दर सीढ़ी होती है, और हर सीढ़ी पर नींद और गहरी हो जाती है। योना तूफान में सो रहा था जबकि मूर्तिपूजक नाविक प्रार्थना कर रहे थे। कभी-कभी परमेश्वर के जन दुनिया से ज़्यादा सुन्न होते हैं, और यही सबसे खतरनाक हालत है।
दूसरा पाठ यह है कि सही धर्मशास्त्र अपने आप हृदय को नहीं बदलता। योना का ज्ञान त्रुटिहीन था। वह जानता था कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं, जानता था कि वे अनुग्रहकारी और दयालु हैं, जानता था कि उद्धार यहोवा ही से होता है। योना 4:2 उसकी शिकायत है, पर वह शिकायत एक आराधना-गीत के शब्दों में लिखी है। यही हमें डराना चाहिए। आदमी बिलकुल सही बात मान सकता है और फिर भी चाह सकता है कि वह बात कुछ लोगों पर लागू न हो। अनुग्रह पर विश्वास और अनुग्रह से प्रेम एक चीज़ नहीं।
तीसरा पाठ यह है कि परमेश्वर संदेशवाहक का पीछा उतनी ही लगन से करते हैं जितनी नगर का। ध्यान दीजिए कि पुस्तक का चौथा अध्याय पूरी तरह अनावश्यक लगता है। मिशन पूरा हो चुका था, नीनवे बच चुका था, कहानी खत्म हो सकती थी। पर परमेश्वर ने कहानी खत्म नहीं होने दी, क्योंकि उनके लिए योना का हृदय नीनवे जितना ही कीमती था। वे उसके साथ तर्क करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, बेल उगाते हैं, धीरज रखते हैं। जो परमेश्वर एक लाख बीस हज़ार अनजान लोगों पर तरस खाते हैं, वे अपने उस नाराज़ सेवक पर भी तरस खाते हैं जो उनसे बहस कर रहा है। यही 2 पतरस 3:9 का धीरज है, और यही वह दया है जिससे योना भागा था और जिसने उसे पकड़ लिया।
दर्पण
अब सवाल आपसे। आपका "नीनवे" कौन है? वह नाम, वह चेहरा, वह समुदाय जिसके बारे में आप प्रार्थना नहीं करना चाहते, क्योंकि कहीं परमेश्वर सचमुच उन पर दया न कर बैठें? हो सकता है वह ससुराल का कोई रिश्तेदार हो जिसने आपकी शादी में अपमान किया। हो सकता है वह बॉस हो जिसने आपकी तरक्की रोक दी और अब खुद मुश्किल में है, और आपके भीतर एक चुपचाप संतोष उठता है। हो सकता है वह भाई हो जिसने पिता की संपत्ति में धोखा किया, या वह पुराना दोस्त जिसने आपकी बदनामी फैलाई, या वह पूरा समूह जिसके बारे में आपने तय कर लिया है कि "ऐसे लोग नहीं बदलते।"
योना की कहानी हमें इसलिए चुभती है क्योंकि हममें से अधिकतर ने कभी खुलकर परमेश्वर को मना नहीं किया। हमने बस टिकट खरीदा है। हम व्यस्तता के जहाज़ पर चढ़ गए हैं, या मनोरंजन के, या धार्मिक कामों के, ताकि उस एक बुलाहट का सामना न करना पड़े जो हमें असहज करती है। और वहाँ हम सो जाते हैं। सेवा चलती रहती है, प्रार्थनाएँ दोहराई जाती हैं, पर भीतर एक तूफान है जिसे हम स्वीकार नहीं करते।
सुनिए, अगर आज आपकी ज़िंदगी में कोई तूफान चल रहा है, तो हर तूफान दंड नहीं होता। पर कुछ तूफान परमेश्वर की दया के दूत होते हैं, जो आपको जगाने आए हैं, डुबाने नहीं। और अगर आपको लगता है कि आप बहुत नीचे गिर चुके हैं, तो योना 2:2 याद रखिए। उस आदमी की प्रार्थना मंदिर से नहीं, मछली के पेट से सुनी गई। कोई गहराई इतनी गहरी नहीं जहाँ से पुकार ऊपर न पहुँचे।
और आखिरी बात, जो सबसे कठिन है। परमेश्वर आपके काम से ज़्यादा आपके हृदय के पीछे हैं। वे आपकी सेवा को सफल बनाकर आपकी कड़वाहट को नज़रअंदाज़ नहीं करेंगे। पुस्तक के अंत का वह प्रश्न आज आपके नाम के साथ पूछा जा रहा है: क्या मैं उन पर तरस न खाऊँ?
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को योना की कहानी बताते समय सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह सिर्फ "बड़ी मछली" की कहानी बनकर रह जाए, और सीख यह निकले कि "आज्ञा नहीं मानोगे तो सज़ा मिलेगी।" यह अधूरा है, और डर पर बना विश्वास टिकता नहीं। बेहतर यह है कि कहानी को दो सवालों के आसपास बुना जाए: योना क्यों भागा, और परमेश्वर ने क्या किया?
बहुत सरल भाषा में आप कह सकते हैं कि योना परमेश्वर का संदेश देनेवाला था, और परमेश्वर ने उससे कहा कि एक ऐसे शहर में जाकर बात करे जहाँ बहुत बुरे लोग रहते थे। योना नहीं गया, क्योंकि उसे डर था कि परमेश्वर उन बुरे लोगों को माफ कर देंगे, और वह नहीं चाहता था कि वे माफ हों। पर परमेश्वर ने योना को नहीं छोड़ा। उन्होंने उसे समुद्र में डूबने नहीं दिया, उसे बचाया, और फिर से मौका दिया। और जब शहर के लोगों ने माफी माँगी, तो परमेश्वर ने सचमुच माफ कर दिया, क्योंकि वे ऐसे ही हैं।
छोटे बच्चों के लिए मछली का हिस्सा डरावना नहीं, बचाव वाला होना चाहिए। बड़े बच्चों के साथ आप चौथे अध्याय की बात कर सकते हैं और पूछ सकते हैं कि क्या कभी उन्हें भी बुरा लगा जब किसी "गलत" बच्चे को माफी मिल गई। किशोरों के साथ मत्ती 12:40 खोलिए और दिखाइए कि यीशु मसीह ने खुद को योना से जोड़ा, पर वे स्वेच्छा से अंधेरे में उतरे।
फेथ नेटवर्क पर इस कहानी की अलग-अलग उम्र के अनुसार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के स्कूली बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए, ताकि हर उम्र अपनी भाषा में इसी दया से मिल सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
योना कौन था और वह कब जीवित था?
योना अम्मत्तै का पुत्र था और गलील के गत्हेपेर गाँव का रहनेवाला था। वह इस्राएल के उत्तरी राज्य में राजा यारोबाम दूसरे के दिनों में, लगभग आठवीं सदी ईसा पूर्व में सेवा करता था। 2 राजा 14:25 बताता है कि उसने इस्राएल की सीमाओं के पुनः विस्तार की भविष्यवाणी की थी, जो पूरी हुई। यानी योना अपनी पुस्तक से पहले ही एक स्थापित और सम्मानित भविष्यद्वक्ता था। यही बात उसके भागने को और चौंकाने वाला बनाती है, क्योंकि यह किसी नए या अनुभवहीन व्यक्ति की गलती नहीं थी।
योना नीनवे जाने से क्यों भागा?
लोग अक्सर सोचते हैं कि योना डर गया था या काम बहुत कठिन था, पर पुस्तक खुद दूसरा कारण देती है। योना 4:2 में वह परमेश्वर से कहता है कि वह इसलिए तर्शीश भागा क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर अनुग्रहकारी, दयालु और विलम्ब से क्रोध करनेवाले हैं। अश्शूर इस्राएल का क्रूर शत्रु था, और योना नहीं चाहता था कि उसके दुश्मन बचें। यह कर्तव्य से भागना नहीं था, यह दया से भागना था। उसका विरोध परमेश्वर के आदेश से ज़्यादा परमेश्वर के स्वभाव से था।
क्या योना सचमुच एक बड़ी मछली के पेट में तीन दिन रहा?
बाइबल इसे एक वास्तविक घटना के रूप में प्रस्तुत करती है, और सबसे मजबूत प्रमाण यीशु मसीह के अपने शब्द हैं। मत्ती 12:40 में वे कहते हैं, "क्योंकि जैसा योना तीन रात दिन महा मच्छ के पेट में रहा, वैसा ही मनुष्य का पुत्र तीन रात दिन पृथ्वी के भीतर रहेगा।" प्रभु ने अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान की तुलना एक कल्पित कथा से नहीं की। योना 1:17 यह भी स्पष्ट करता है कि मछली को परमेश्वर ने ही "ठहराया" था, यानी यह चमत्कार स्वाभाविक संयोग नहीं, बल्कि परमेश्वर का सीधा हस्तक्षेप था।
क्या मछली योना के लिए सज़ा थी या बचाव?
पहली नज़र में मछली दंड लगती है, पर पाठ इसे बचाव के रूप में दिखाता है। योना समुद्र में फेंका जा चुका था और डूब रहा था; मछली उसे मौत से निकालने का साधन बनी। इसीलिए अध्याय 2 की प्रार्थना शिकायत नहीं, धन्यवाद है। योना 2:2 में वह कहता है कि उसने संकट में पुकारा और परमेश्वर ने सुन लिया। परमेश्वर का अनुशासन अक्सर ऐसा ही दिखता है: बाहर से अंधेरा और असुविधाजनक, पर भीतर से जीवन बचाने वाला। यह गुस्सा नहीं, पीछा करती हुई दया है।
योना की पुस्तक का मुख्य संदेश क्या है?
पुस्तक का केंद्र मछली नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया की सीमाओं का प्रश्न है। नीनवे बच जाता है, पर कहानी वहाँ खत्म नहीं होती; चौथा अध्याय दिखाता है कि परमेश्वर उस भविष्यद्वक्ता के हृदय के भी पीछे हैं जो इस दया से नाराज़ है। पुस्तक एक अनुत्तरित प्रश्न पर समाप्त होती है, जिसमें परमेश्वर पूछते हैं कि क्या वे उस बड़े नगर पर तरस न खाएँ। यह प्रश्न जानबूझकर खुला छोड़ा गया है, ताकि हर पाठक को अपने भीतर के योना का सामना करना पड़े।
भजन संहिता 139:7 का योना की कहानी से क्या संबंध है?
भजन संहिता 139:7 पूछती है, "मैं तेरे आत्मा से भागकर किधर जाऊँ? वा तेरे साम्हने से किधर भागूँ?" दाऊद यह बात आश्चर्य और आराधना में कहता है। योना ने इसी सच्चाई को कठिन रास्ते से सीखा। योना 1:3 दो बार दोहराता है कि वह "यहोवा के सम्मुख से" भागा, पर समुद्र, आँधी, मछली और गहराई सब परमेश्वर के हाथ में निकले। परमेश्वर की सर्वव्यापकता उस व्यक्ति के लिए भय है जो छिपना चाहता है, और उसी के लिए आराम है जो पाया जाना चाहता है।
नीनवे के लोगों ने सचमुच मन फिराया या केवल दिखावा किया?
योना 3:5 कहता है, "तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट पहिना।" यह विश्वास से शुरू हुआ और व्यवहार में दिखा, राजा तक सिंहासन छोड़कर राख में बैठ गया। परमेश्वर ने उनके कामों को देखकर घोषित विनाश टाल दिया। यीशु ने बाद में कहा कि नीनवे के लोग न्याय के दिन उस पीढ़ी को दोषी ठहराएँगे, जो प्रमाणित करता है कि उनका मन फिराव सच्चा था, भले ही आगे की पीढ़ियों में वह टिका नहीं।
योना बेल के सूख जाने पर इतना गुस्सा क्यों हुआ?
बेल ने योना को छाया दी थी, और जब कीड़े ने उसे सुखा दिया तो योना ने कहा कि जीने से मरना उसके लिए भला है। परमेश्वर इसी के द्वारा उसे आईना दिखाते हैं: वह एक पौधे पर तरस खा रहा था जिसे उसने न लगाया, न बढ़ाया, और उसी समय एक लाख बीस हज़ार से अधिक लोगों के नाश पर खुश था। यह प्रकरण बताता है कि योना की करुणा अपनी सुविधा तक सीमित थी। परमेश्वर उसकी नाराज़गी को डाँटते नहीं, वे उससे प्रश्न पूछते हैं, जो अपने आप में दया है।
यीशु ने खुद को "योना का चिन्ह" क्यों कहा?
जब लोगों ने स्वर्ग से चिन्ह माँगा, तो यीशु ने कहा कि उन्हें योना के चिन्ह के सिवा कोई चिन्ह नहीं दिया जाएगा, और मत्ती 12:40 में उन्होंने इसे तीन रात दिन पृथ्वी के भीतर रहने से जोड़ा। योना की मछली से वापसी उसके देश के लिए एक जीवित प्रमाण थी; यीशु मसीह का पुनरुत्थान पूरी दुनिया के लिए वही प्रमाण है, पर कहीं अधिक महान। अंतर यह है कि योना अपनी बगावत के कारण गहराई में गया, जबकि मसीह हमारी बगावत को उठाकर स्वेच्छा से कब्र में उतरे।
2 पतरस 3:9 योना की कहानी को कैसे समझाता है?
2 पतरस 3:9 कहता है, "प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।" योना की पूरी पुस्तक इसी वाक्य का जीवंत उदाहरण है। परमेश्वर ने नीनवे को चालीस दिन दिए, और उन्होंने उसका उपयोग किया। वही धीरज परमेश्वर ने अपने नाराज़ भविष्यद्वक्ता के साथ भी दिखाया, उसे समझाते हुए, प्रश्न पूछते हुए, छोड़े बिना।
योना के बाद उसका क्या हुआ?
बाइबल योना के बाद के जीवन के बारे में कुछ नहीं बताती। पुस्तक परमेश्वर के प्रश्न पर अचानक समाप्त हो जाती है, और योना का उत्तर दर्ज नहीं है। यह चुप्पी अधूरापन नहीं, बल्कि साहित्यिक और आत्मिक रूप से जानबूझकर है। चूँकि यह पुस्तक लिखी गई और इस्राएल में सहेजी गई, कई विद्वान मानते हैं कि योना ने अंततः अपनी कहानी खुद, अपनी शर्म समेत, सुनाई होगी। अगर यह सच है, तो उसका मन फिराव पुस्तक के भीतर नहीं, पुस्तक के अस्तित्व में लिखा हुआ है।
क्या योना की कहानी आज मिशन और सुसमाचार प्रचार से जुड़ी है?
बहुत गहराई से जुड़ी है। योना पहला भविष्यद्वक्ता है जिसे इस्राएल के बाहर एक अन्यजाति नगर में भेजा गया, और यह उस बुलाहट का पूर्वाभास है जो आगे चलकर कलीसिया को दी गई। दिलचस्प बात यह है कि पतरस ने उसी यापो नगर में दर्शन पाया जहाँ से योना भागा था, और इस बार वह अन्यजातियों के पास गया। कहानी हमें चेतावनी देती है कि प्रचार का सबसे बड़ा रोड़ा अक्सर बाहर का विरोध नहीं, बल्कि हमारे भीतर यह भावना होती है कि कुछ लोग दया के योग्य नहीं।
अंत में
योना की कहानी को अगर सिर्फ आज्ञाकारिता का पाठ बना दिया जाए, तो उसकी सबसे बड़ी बात छूट जाती है। यह उस आदमी की कहानी है जो अपने परमेश्वर की दया से इतना असहज था कि उसने समुद्र पार करने की कीमत चुका दी, और जिसे उसी दया ने तूफान में, मछली के पेट में, नगर के बाहर की झुलसाती धूप में खोज निकाला। योना 1:3 में वह भागा, योना 2:2 में वह पुकारा, योना 3:5 में एक पूरा नगर बदला, और योना 4:2 में उसका असली दिल खुल गया। परमेश्वर ने न नगर को छोड़ा, न भविष्यद्वक्ता को।
आगे पढ़ने के लिए योना की चारों अध्याय एक बैठक में पढ़िए, यह बीस मिनट का काम है, और हर अध्याय के अंत में रुककर पूछिए कि इस दृश्य में परमेश्वर क्या कर रहे हैं। फिर मत्ती 12:38 से 42 खोलिए और देखिए कि "योना से भी बड़ा" कौन है। और अंत में उस अनुत्तरित प्रश्न के साथ थोड़ी देर बैठिए। परमेश्वर आपसे भी वही पूछ रहे हैं, और आपका उत्तर आपकी प्रार्थनाओं में लिखा जाएगा, किसी किताब में नहीं।
