उत्पत्ति 1:26
पाठ
छह दिनों तक परमेश्वर बोलते हैं और चीज़ें हो जाती हैं। पर छब्बीसवें पद पर आकर लय बदल जाती है: अब आदेश नहीं, एक विचार-विमर्श सुनाई देता है। "हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ" और साथ ही एक ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है, कि वे मछलियों, पक्षियों, पशुओं और सारी पृथ्वी पर "अधिकार रखें"। सृष्टि का ताज कोई सूर्य या समुद्र नहीं, बल्कि मिट्टी से बना एक प्राणी है जिसे परमेश्वर अपनी छवि पहनाते हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पूरे अध्याय में परमेश्वर हर वस्तु को "जाति-जाति के अनुसार" बनाते हैं: पेड़ अपनी जाति के, पक्षी अपनी जाति के, पशु अपनी जाति के। केवल मनुष्य के समय यह सूत्र टूटता है। मनुष्य अपनी जाति के अनुसार नहीं, परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार बनाया जाता है। यही इस पद का विस्फोटक केंद्र है। मनुष्य की पहचान उसके जीव-वर्ग से नहीं, बल्कि उस संबंध से आती है जिसमें परमेश्वर उसे खड़ा करते हैं। और यह स्वरूप कोई सजावट नहीं, एक नियुक्ति है: अधिकार रखना। परमेश्वर पृथ्वी को अपने हाथ से चलाने के बजाय अपने प्रतिनिधि के हाथ में सौंपते हैं। यह भरोसा है, और भरोसा हमेशा जोखिम भरा होता है।
मुख्य धारा
भजन संहिता 8 इस पद को गाकर दोहराती है: मनुष्य क्या है कि परमेश्वर उसकी सुधि लें, फिर भी उसे महिमा और प्रताप का मुकुट पहनाया गया और सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया गया। पर इब्रानियों की पत्री इसी भजन को उठाकर एक कड़वी बात कहती है: हम अभी सब कुछ मनुष्य के अधीन नहीं देखते। स्वरूप टूटा है, अधिकार बिगड़कर शोषण बन गया। इसलिए नया नियम कहता है कि सच्चा स्वरूप मसीह हैं, अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप, और कुलुस्सियों 3:10 के अनुसार विश्वासी उसी सृजनहार के स्वरूप में नया किया जा रहा है। उत्पत्ति 1:26 इसलिए केवल आरंभ की बात नहीं; यह उस लक्ष्य का नक्शा है जिसकी ओर परमेश्वर हमें मसीह में लौटा रहे हैं।
दर्पण
याकूब 3:9 इस पद को सीधे हमारी जीभ पर रख देता है: उसी मुँह से हम परमेश्वर को धन्य कहते हैं और उसी से मनुष्यों को शाप देते हैं, जो परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं। यह वहाँ चुभता है जहाँ हम रहते हैं। उस सहकर्मी पर जिसकी नाकामी पर आप हँसते हैं। उस रिश्तेदार पर जिसे आपने मन में लिख-पढ़कर खारिज कर दिया है। उस मज़दूर पर जिसका नाम आपने कभी पूछा ही नहीं। स्वरूप कोई सैद्धांतिक बात नहीं, वह उस व्यक्ति की चमड़ी पर लिखा है जो अभी आपके सामने खड़ा है। और दूसरी ओर: यदि आप स्वयं को बेकार मानते हैं क्योंकि आपकी कमाई कम है या शरीर साथ नहीं देता, तो यह पद आपकी कीमत आपके प्रदर्शन से नहीं, परमेश्वर के निर्णय से जोड़ता है। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम ज़ोर से बोलिए जिसके बारे में आपने इस हफ़्ते कड़वी बात कही, और कहिए: "यह भी परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया है।"
मुख्य पात्र
यहाँ मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे अचानक अकेले नहीं बोलते: "हम बनाएँ।" यह बहुवचन सदियों से चर्चा का विषय रहा है, और पाठ स्वयं इसे खुला छोड़ता है। पर एक बात स्पष्ट है: सृष्टि करने वाला परमेश्वर बंद, एकाकी शक्ति नहीं है। उनके भीतर आपस में बात है, विचार है, संबंध है। और वे इस संबंध को बाहर की ओर बढ़ाते हैं, एक ऐसे प्राणी को बनाकर जिससे बात की जा सके। पहले पच्चीस पदों में परमेश्वर आदेश देते हैं; छब्बीसवें में वे सोचते हैं। यही परमेश्वर आगे चलकर बगीचे में मनुष्य को खोजते हैं और अंत में देह लेकर हमारे बीच आते हैं। रचयिता दूर से हुक्म चलाने वाला नहीं, पास आने वाला है।
संदर्भ
यह अध्याय उन लोगों को लिखा गया जो मिस्र और बाबेल की छाया में जीते थे, जहाँ "देवता का स्वरूप" एक राजनीतिक पदवी थी। फ़िरौन देवता की प्रतिमा कहलाता था; राजा अपनी मूर्तियाँ साम्राज्य के कोनों में खड़ी करते थे ताकि जनता जान ले कि यहाँ किसका शासन है। इस पृष्ठभूमि में उत्पत्ति 1:26 एक क्रांतिकारी वाक्य है: स्वरूप राजा का विशेषाधिकार नहीं, हर मनुष्य का जन्मसिद्ध सत्य है। और ध्यान दीजिए, सूर्य और चंद्रमा, जिन्हें आसपास की जातियाँ पूजती थीं, यहाँ केवल "दो बड़ी ज्योतियाँ" हैं, जिन्हें परमेश्वर ने बनाया और लटका दिया। पूजा की वस्तुएँ पदावनत हुईं, और साधारण मनुष्य पदोन्नत।
श्रोताओं का चेहरा
कल्पना कीजिए उन इस्राएलियों की, जिनकी पीठ पर मिस्र की ईंटों का बोझ रहा है या जो बाबेल में परायों के बीच बैठे हैं और सोचते हैं कि उनकी जाति का कोई मोल है भी या नहीं। उनके कानों में "अधिकार रखें" कोई पर्यावरणीय सिद्धांत नहीं था; वह गरिमा की घोषणा थी। गुलामों से कहा जा रहा था कि तुम राजसी प्रतिनिधि हो। और साथ ही उत्पत्ति 9:6 उन्हें याद दिलाता है कि इसी स्वरूप के कारण मनुष्य का खून बहाना अक्षम्य है। जिस समाज में जीवन सस्ता था, वहाँ यह वाक्य कानून बन गया। हम इसे धार्मिक भावुकता के रूप में पढ़ते हैं; उन्होंने इसे अपनी रीढ़ सीधी करने के आदेश के रूप में सुना।
चिंतन
आप किसे व्यवहार में परमेश्वर का स्वरूप मानने से इनकार करते हैं, और वह इनकार आपकी भाषा में कहाँ दिखाई देता है?
आपको सौंपा गया "अधिकार" इस समय किस पर है, घर, काम, पैसा, या लोग, और क्या वह देखभाल जैसा दिखता है या कब्ज़े जैसा?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Genesis 1:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
उत्पत्ति 1:26 का क्या अर्थ है?
उत्पत्ति 1:26 किस विषय में है?
उत्पत्ति 1:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
उत्पत्ति 1:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 1:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Genesis 1 में आपको क्या स्पर्श करता है?
इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें