यूहन्ना 8:56
पाठ
बहस अपने चरम पर है। यीशु के सामने खड़े लोग अपनी वंशावली पर अड़े हैं, "हमारा पिता तो अब्राहम है," और वे यह मानने को तैयार नहीं कि कोई गलील का बढ़ई उस पितामह से बड़ा हो सकता है जिसकी कब्र सदियों से हेब्रोन में है। तब यीशु एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो पूरी बातचीत का रुख पलट देता है: "तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देखने की आशा से बहुत मगन था; और उसने देखा, और आनन्द किया।" यानी जिस अब्राहम को वे ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, वह असल में यीशु के पक्ष का गवाह है। अब्राहम ने दूर से कुछ देखा था, और जो देखा उससे वह आनन्दित हुआ, जबकि उसकी संतान होने का दावा करने वाले लोग उसी दिन के सामने खड़े होकर पत्थर उठा रहे हैं।
मूल बात
यहाँ विश्वास की परिभाषा ही बदल जाती है। अब्राहम का विश्वास कोई धार्मिक पहचान-पत्र नहीं था, वह एक दिशा में देखना था: किसी ऐसी चीज़ की ओर जो अभी हाथ में नहीं आई, फिर भी जिसके भरोसे उसने तम्बू उखाड़े, इसहाक को पहाड़ पर ले गया, और जीवन के फैसले लिए। यीशु कहते हैं कि उस देखने का लक्ष्य वे स्वयं हैं। "मेरा दिन" कोई तारीख नहीं, वह परमेश्वर के बचाने वाले काम का पूरा होना है। इसका नैतिक किनारा तीखा है: परमेश्वर के लोगों में गिने जाना विरासत से नहीं, बल्कि उसी दिशा में देखने और उसी आनन्द में जीने से तय होता है। जो मसीह को देखकर आनन्दित नहीं होता, उसकी वंशावली उसे नहीं बचाती, चाहे वह कितनी ही पुरानी और सम्मानित क्यों न हो।
जोड़ने वाला सूत्र
अब्राहम की कहानी शुरू से ही एक ऐसे वादे पर टिकी है जिसका पूरा होना उसकी आँखों के सामने नहीं आया: एक देश जो उसे मिला नहीं, एक संतान जो देर से आई, और एक आशीष जो "पृथ्वी के सारे कुल" तक पहुँचनी थी। मोरिय्याह पर्वत पर जब उसने चाकू उठाया और परमेश्वर ने एक मेढ़ा दिया, तब उसने उस जगह का नाम ही रख दिया कि यहोवा देख लेगा। वह देखना और दिखाया जाना पूरे उद्धार-इतिहास की धड़कन बन गया: एक पिता, एक पुत्र, एक पर्वत, और परमेश्वर का प्रबंध। यीशु यहाँ यही जोड़ रहे हैं। अब्राहम ने किसी सिद्धांत की झलक नहीं देखी, उसने उस दिन की झलक देखी जिसमें परमेश्वर अपने ही पुत्र को नहीं बचाएगा ताकि हम बच जाएँ। पुराना नियम मसीह की ओर देखता है; मसीह पीछे मुड़कर कहते हैं, हाँ, वह मुझे ही देख रहा था।
दर्पण
यह वचन उस चीज़ पर हाथ रखता है जिस पर हमें बड़ा भरोसा है: विरासत। तीसरी पीढ़ी की कलीसिया-सदस्यता, बपतिस्मा का प्रमाणपत्र, दादा-दादी की प्रार्थनाएँ, वह घर जहाँ हर रविवार आराधना होती थी। ये सब आशीषें हैं, ढाल नहीं। यीशु के सामने खड़े लोगों के पास सही वंशावली थी और हाथ में पत्थर भी। हमारे साथ भी यही होता है: हम सही मंडली में बैठे रहते हैं और दफ़्तर में उस सहकर्मी को गिरा देते हैं जो हमारे रास्ते में है; हम विश्वास की भाषा बोलते हैं और पैसे के फ़ैसले पूरी तरह डर से लेते हैं। दूसरी बात और चुभती है: अब्राहम "बहुत मगन" था, उस चीज़ के लिए जो उसे इस जीवन में नहीं मिली। हम अक्सर वही चुनते हैं जिसका फल इसी महीने दिख जाए। आज दस मिनट लीजिए, कागज़ पर वह एक फ़ैसला लिखिए जिसे आप इसलिए टाल रहे हैं कि उसका लाभ दिखाई नहीं देता, उसके नीचे लिखिए "उसने देखा, और आनन्द किया", और उसी कागज़ को हाथ में लेकर प्रार्थना कीजिए।
अंतर्पाठ
इब्रानियों 11 कहता है कि विश्वास के लोग वादों को दूर ही से देखकर आनन्दित हुए और परदेशी की तरह जीते रहे; यह लगभग यूहन्ना 8:56 की व्याख्या है, क्योंकि वहाँ भी देखना और उसी देखने के आधार पर जीवन का ढाँचा बदलना साथ-साथ चलते हैं। दूसरी ओर, इसी अध्याय की शुरुआत में वह स्त्री खड़ी है जिस पर पत्थर उठाए जाने थे और जिसे यीशु ने जाने दिया। एक ही अध्याय में दो तस्वीरें: जिसके पास कोई वंशावली, कोई नैतिक पूँजी नहीं, वह मसीह के सामने खड़ी रह जाती है और जीवन पाती है; और जिनके पास अब्राहम का नाम है, वे अंत में पत्थर उठाकर बाहर जाते हैं। पहचान बचाती नहीं; मसीह के सामने ठहरना बचाता है।
मुख्य पात्र
इस वचन में यीशु अब्राहम को गवाह के कठघरे में बुलाते हैं, लेकिन ध्यान दें कि वे उसे हराने के लिए नहीं, उसे सही जगह पर रखने के लिए बुलाते हैं। वे अब्राहम का अपमान नहीं करते, वे उसका आनन्द उजागर करते हैं। यह यीशु का स्वभाव है: वे अपनी महिमा खुद नहीं मांगते, यह वे दो पद पहले कह चुके हैं, फिर भी वे पीछे नहीं हटते जब बात सच की हो। यहाँ एक अकेला व्यक्ति है जो मन्दिर के आँगन में, पत्थरों से कुछ मिनट की दूरी पर, शांत भाव से कहता है कि सदियों का इतिहास उसकी ओर मुड़ता है। कोई घबराहट नहीं, कोई अतिरिक्त सबूत नहीं; सिर्फ़ पिता को जानने की वह गहरी निश्चिंतता जिसकी वजह से वे भीड़ के गुस्से को झेल सकते हैं।
एक बारीकी
"बहुत मगन था" वाला शब्द यहाँ यूनानी में उछल पड़ने वाली खुशी है, नाचने जैसा आनन्द, न कि शांत संतोष। और यीशु दो क्रियाएँ अलग-अलग रखते हैं: वह आशा से मगन था, और फिर "उसने देखा, और आनन्द किया।" पहला आनन्द प्रतीक्षा का था, दूसरा दर्शन का। इसका अर्थ है कि विश्वास का आनन्द दो चरणों में आता है और दोनों असली हैं। जो अभी दिखाई नहीं देता, उसकी प्रतीक्षा में भी नाचा जा सकता है। यह हमारे उस भाव को चुनौती देती है जो कहता है, जब सब सुलझ जाएगा तब खुश होऊँगा। अब्राहम तम्बू में रहते हुए, बिना नक्शे, बिना शहर, आनन्दित था, क्योंकि उसने उस दिन की दिशा में देखना सीख लिया था।
चिंतन
आपकी कौन-सी धार्मिक विरासत आपके लिए चुपके से ढाल बन गई है, ऐसी चीज़ जिसके भरोसे आप मसीह के सामने ठहरने से बच निकलते हैं?
पिछले महीने आपने कोई एक फ़ैसला ऐसा लिया जो केवल तभी समझ में आता है यदि "उसका दिन" सच है? यदि नहीं, तो इस हफ़्ते वह फ़ैसला क्या हो सकता है?
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John 8:56 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 8:56 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 8:56 किस विषय में है?
यूहन्ना 8:56 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 8:56 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 8:56 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कई बार मैं सुनता तो हूँ, पर सच में सुन नहीं पाता। मेरे भीतर का शोर, मेरे अपने विचार, मेरी जिद, ये सब तेरी आवाज़ को दबा देते हैं। मेरे कान खोल, मेरा मन नरम कर, ताकि तेरी बात मुझ तक पहुँचे और मैं उसे समझ सकूँ।
यीशु ने कहा, "तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं।" बात सिर्फ जगह की नहीं, जड़ की है। जो जिससे निकला है, उसी की सोच बोलता है। इसलिए वे उसकी बात समझ नहीं पा रहे थे। आज खुद से पूछ: मेरी चिंताएँ, मेरी इच्छाएँ, मेरे फैसले किस मिट्टी से उगते हैं? और अगर मसीह मुझमें है, तो कुछ तो ऊपर का दिखना चाहिए।
मंदिर में यीशु के चारों ओर विरोधी खड़े थे, ताने और आरोप लग रहे थे, और उसी बीच वे कहते हैं, "मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।" भीड़ के बीच भी अकेलापन आता है, और अकेले भी संगति मिलती है। ध्यान दो, वे इसे पिता की प्रसन्नता से जोड़ते हैं। जिस काम में तुम इस समय हो, क्या वह पिता को भाता है? शायद तुम्हारा सूनापन दूर होने की शुरुआत यहीं से हो।
यीशु बार बार "पिता" कहते रहे, और वे सुनते रहे, फिर भी लिखा है, "वे न समझे कि हम से पिता के विषय में कहता है।" सबसे साफ बातें भी उस दिल तक नहीं पहुँचतीं जो पहले से तय कर चुका है कि इस आदमी में कुछ नहीं रखा। और यीशु ने बहस नहीं बढ़ाई, उन्होंने क्रूस की ओर इशारा किया। कुछ बातें समझ में तब आती हैं जब हम उन्हें उठाए हुए देखते हैं। तेरी कौन सी उलझन उस दिन तक ठहरी है?
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