लूका 12:13
पाठ
भीड़ इतनी घनी है कि लोग एक दूसरे पर गिरे पड़ रहे हैं, और यीशु अभी-अभी शहादत, नरक, स्वर्गदूतों और पवित्र आत्मा की बात कह चुके हैं। ठीक उसी क्षण, इस गर्म और भरे हुए माहौल में, एक आदमी हाथ उठाकर चिल्लाता है: "हे गुरु, मेरे भाई से कह, कि पिता की सम्पत्ति मुझे बाँट दे।" वह न शिष्य बनना चाहता है, न सत्य सुनना। उसे एक रब्बी की ज़रूरत है जो उसके पक्ष में फैसला सुना दे। पिता मर चुका है, ज़मीन का बँटवारा अटका है, और भाई शायद बड़ा है, जिसे व्यवस्था के अनुसार दोगुना हिस्सा मिलना है। यह आदमी यीशु की भीड़ में अपनी अदालत खोल रहा है।
मर्म
पहली सदी के गलील में यह माँग बिल्कुल सामान्य थी। रब्बी केवल उपदेशक नहीं थे, वे व्यवस्था के जानकार थे, और गाँवों में ज़मीन-जायदाद के झगड़े अक्सर उन्हीं के सामने आते थे। धूल भरे चौक में, गवाहों के बीच, कोई प्रतिष्ठित शिक्षक कह देता कि किसका हक कितना है, और मामला निपट जाता। इसलिए इस आदमी की बात गुस्ताख़ी नहीं, रिवाज़ है। असली चोट यह है कि यीशु अभी-अभी कह चुके हैं कि "कुछ ढँपा नहीं, जो खोला न जाएगा", और इस आदमी के भीतर जो ढँका है वह खुल गया है: वह परमेश्वर के राज्य के ऐलान को अपनी निजी फाइल के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। यही मनुष्य की सबसे पुरानी चालाकी है, परमेश्वर को अपने पक्ष का वकील बना लेना। और परमेश्वर इनकार करते हैं, क्योंकि वे उससे कुछ बड़ा देना चाहते हैं।
सूत्र
जब यीशु जवाब देते हैं, "किसने मुझे तुम्हारा न्यायी या बाँटनेवाला नियुक्त किया है?", तो वे सदियों पीछे एक मिस्री रेत के मैदान की ओर इशारा कर रहे हैं। वहाँ मूसा ने दो झगड़ते इब्रानियों को छुड़ाना चाहा था और उन्होंने यही ताना मारा था: तुझे किसने हमारा न्यायी ठहराया? मूसा को उसके अपने लोगों ने न्यायी मानने से इनकार किया। यहाँ उलटा हुआ है: लोग यीशु को न्यायी बनाना चाहते हैं और वे इनकार करते हैं। क्यों? क्योंकि वे छोटी अदालत में बैठने नहीं, बड़ी विरासत बाँटने आए हैं। इसी अध्याय में थोड़ी देर बाद वे कहते हैं, "तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।" आदमी पिता की सम्पत्ति का टुकड़ा माँग रहा है; पिता पूरा राज्य देने को तैयार खड़े हैं।
दर्पण
यह आदमी हममें से बहुतों के भीतर बैठा है। वसीयत खुलने के बाद जो चुप्पी भाई-बहनों के बीच पसर जाती है, वह घर की दीवारों से ज़्यादा मज़बूत होती है। माँ के गहने, पिता का मकान, खेत का वह टुकड़ा जिस पर किसी ने कब्ज़ा कर लिया, और बीस साल तक चलता हुआ मुकदमा। हम प्रार्थना में भी वही करते हैं जो इस आदमी ने किया: परमेश्वर से कहते हैं कि वे सामने वाले को समझाएँ, उसे झुकाएँ, उसे गलत साबित करें। हम अपने हक के बारे में इतने निश्चित होते हैं कि यह सवाल ही नहीं उठता कि हमारे लोभ का क्या होगा। आज दस मिनट निकालिए: एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके साथ पैसे या हक का मामला अटका है, और उसके नीचे वह एक वाक्य लिखिए जो आप चाहते हैं कि परमेश्वर उससे कहें। फिर उसे ज़ोर से पढ़कर अपने आप से पूछिए: यह प्रार्थना है या मुकदमा?
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि वह क्या नहीं कहता। वह यह नहीं पूछता, "गुरु, क्या मेरा दावा सही है?" वह यह भी नहीं कहता, "हमारे बीच फैसला कीजिए।" वह कहता है, "मेरे भाई से कह।" फैसला वह पहले ही सुना चुका है; उसे सिर्फ़ एक आवाज़ चाहिए जो उसके फैसले को वज़न दे। यीशु उसके लिए गुरु नहीं, लाउडस्पीकर हैं। और फिर वह शब्द जो सबसे ज़्यादा चुभता है: "मेरे भाई"। वह उसे भाई कहता है, पर जिस लहजे में कहता है वह किसी प्रतिवादी का नाम लेने जैसा है। खून का रिश्ता बचा हुआ है, भाईपन मर चुका है। लोभ यही करता है: वह रिश्ते का नाम तो रहने देता है, उसकी आत्मा निकाल लेता है।
मुख्य पात्र
इस आदमी का नाम नहीं है, और वह दोबारा कभी नहीं बोलता। हम नहीं जानते कि वह झूठा था या सचमुच ठगा गया था, और लूका यह जानबूझकर नहीं बताता। बहुत मुमकिन है कि वह सही था, कि बड़े भाई ने उसका हिस्सा दबा रखा था, कि उसके पास न ताकत थी न पैसा कि रोमी अदालत तक जाए। यीशु उसके दावे की जाँच ही नहीं करते। वे सीधे उसके भीतर हाथ डालते हैं और कहते हैं, "हर प्रकार के लोभ से अपने आपको बचाए रखो।" यह कठोर लगता है, और है भी। पर इसमें एक अजीब करुणा छिपी है: यीशु उसे वह नहीं देते जो उसके हक में था, क्योंकि वे उसकी ज़मीन से ज़्यादा उसके प्राण की चिंता करते हैं। वह खेत माँगने आया था और एक सवाल लेकर लौटा।
प्रसंग
यीशु यरूशलेम की ओर जा रहे हैं, और यह पूरा अध्याय यात्रा के बीच की भीड़भाड़ में कहा गया है: धूल, पसीना, धक्का-मुक्की, इतनी भीड़ कि लोग "एक दूसरे पर गिरे पड़ते थे"। गाँव के झगड़े गाँव में ही निपटते थे; रोमी अदालत आम किसान के लिए न पहुँच में थी, न भरोसे की। इसलिए कोई घूमता हुआ प्रसिद्ध रब्बी गाँव से गुज़रे तो यह मौका था। और दाँव छोटा नहीं था। ज़मीन सिर्फ़ सम्पत्ति नहीं, परिवार की पहचान थी, पुरखों की विरासत, नाम का आधार। भाई अक्सर खेत बिना बाँटे साथ जोतते थे, क्योंकि बँटवारे के बाद टुकड़े इतने छोटे हो जाते कि कोई भी ज़िंदा न रह पाता। यानी यह आदमी जो माँग रहा है, वह शायद पूरे परिवार की रोटी तोड़ देगा। और वह यह माँग सबके सामने, इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती के खुले बाज़ार में रख रहा है।
चिंतन
पिछली बार जब आपने किसी झगड़े में परमेश्वर से प्रार्थना की थी, तो आपने उनसे न्याय माँगा था या अपने पक्ष में गवाही?
यीशु ने इस आदमी को वह नहीं दिया जो उसने माँगा। आपके जीवन में वह कौन-सी माँग है जिसका जवाब शायद इसलिए नहीं मिला क्योंकि परमेश्वर उससे बड़ा कुछ देना चाहते हैं?
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Luke 12:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 12:13 का क्या अर्थ है?
लूका 12:13 किस विषय में है?
लूका 12:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका 12:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 12:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मैं यह करूँगा: मैं अपनी बखारियाँ तोड़कर उनसे बड़ी बनाऊँगा, और वहाँ अपना सब अनाज और अपनी संपत्ति रखूँगा।" इस एक वाक्य में "मैं" और "अपना" के सिवा कोई नहीं है। न परमेश्वर, न पड़ोसी, न वह भूखा जो पास ही रहता है। जो तेरे पास ज़रूरत से ज़्यादा है, क्या वह सचमुच रखने के लिए है, या बाँटने के लिए?
पिता, मैं नहीं जानता कल क्या लेकर आएगा, पर तू जानता है। मुझे सोते हुए नहीं, जागते हुए पा, ताकि जब तू आए तो मेरा मन तैयार मिले। मेरी लापरवाही को क्षमा कर और हर दिन तेरी ओर ध्यान लगाए रखने में मेरी मदद कर।
पिता, जब तुझे चुनने की कीमत मेरे अपने घर में चुकानी पड़ती है, तब मुझे थाम ले। जिनसे मेरा मन नहीं मिलता, उनके लिए भी मेरे दिल में कड़वाहट न आए। मुझे सच्चाई में दृढ़ रख, पर प्रेम में कोमल भी। तू ही मेरे रिश्तों को संभाल।
पिता, मैं अक्सर छोटी-छोटी ज़रूरतों की चिंता में उलझ जाता हूँ, जैसे सब कुछ मेरे ही हाथ में हो। याद दिला कि मेरा जीवन खाने और कपड़े से कहीं बढ़कर है, और उसे थामने वाले आप हैं। मेरे मन को शांत कर, ताकि मैं भरोसे के साथ आज का दिन जी सकूँ।
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