मत्ती 5:13
पाठ
पहाड़ पर बैठे यीशु उन लोगों की ओर मुड़ते हैं जिन्हें उन्होंने अभी-अभी धन्य कहा है, वे जो मन के दीन हैं, शोक करते हैं, सताए जाते हैं, और उनसे कहते हैं: "तुम पृथ्वी के नमक हो।" यह कोई आदेश नहीं, एक घोषणा है। फिर तुरंत एक चेतावनी आती है जो कान में खटकती है: यदि नमक का अपना स्वाद ही बिगड़ जाए, तो उसे दोबारा नमकीन कौन करेगा? ऐसा नमक न रसोई के काम का रहता है, न खेत के; उसे बाहर फेंक दिया जाता है और लोग उस पर से चलते हुए निकल जाते हैं। एक वाक्य में सम्मान और खतरा, दोनों साथ-साथ रखे गए हैं।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यीशु यह नहीं कहते, "तुम्हें नमक बनना चाहिए।" वे कहते हैं, "तुम हो।" पहचान पहले, व्यवहार बाद में; यही राज्य का व्याकरण है। और यह पहचान उन्हीं लोगों को दी जाती है जिन्हें अभी पद 11 में गाली और झूठे आरोप का सामना करने वाला बताया गया था। परमेश्वर संसार को बचाने के लिए बहुमत नहीं, अल्पमत चुनते हैं, क्योंकि नमक कभी थाली भर नहीं होता, वह मुट्ठी भर होता है और फिर भी पूरे भोजन का स्वाद तय करता है। पर नमक का अर्थ ही उसका अलग स्वाद है; जो नमक स्वाद खो दे वह बुरा नहीं, बस निरर्थक हो जाता है। यीशु यहाँ नैतिक शुद्धता का नहीं, अस्तित्व की सार्थकता का प्रश्न उठा रहे हैं: यदि उनकी प्रजा संसार जैसी ही हो गई, तो संसार के पास चखने को कुछ बचा ही नहीं।
सूत्र
नमक बाइबल में केवल रसोई की चीज़ नहीं है। लैव्यव्यवस्था 2:13 में हर अन्नबलि पर नमक डालना अनिवार्य था, और उसे "अपने परमेश्वर की वाचा का नमक" कहा गया; नमक स्थायित्व का, न सड़ने वाले संबंध का चिह्न था। यीशु इसी परंपरा के भीतर बोल रहे हैं: तुम वह चिह्न हो जिससे संसार जान सके कि परमेश्वर ने अपनी वाचा नहीं तोड़ी। पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। जो व्यक्ति यह वाक्य कह रहा है, वही आगे चलकर नगर के बाहर फेंका जाएगा और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाएगा। जो दंड यीशु स्वादहीन नमक के लिए बताते हैं, वही उन्होंने स्वयं भोगा, यद्यपि उनका स्वाद कभी नहीं बिगड़ा। मसीह ही असली नमक हैं जो संसार को गलने से बचाते हैं; हम उधार का स्वाद लिए फिरते हैं, उन्हीं से मिला हुआ।
दर्पण
नमकीनपन की परीक्षा वहाँ होती है जहाँ आप अलग दिखने की कीमत चुकाते हैं। दफ़्तर में जब सब मिलकर एक अनुपस्थित सहकर्मी की खिल्ली उड़ा रहे हों और चुप रह जाना सबसे सस्ता विकल्प हो। परिवार की उस बातचीत में जहाँ पैसे को लेकर सुविधाजनक झूठ बोलना सामान्य मान लिया गया हो। पड़ोस में, जहाँ किसी की जाति या हैसियत को लेकर टिप्पणी पर आपकी हँसी भी शामिल हो जाती है। स्वाद बिगड़ना कोई नाटकीय पतन नहीं होता; वह धीरे-धीरे घुल जाने जैसा है, इतना कि कोई फ़र्क़ ही न रह जाए। और डर असली है: अलग रहने वाले को अकेलापन मिलता है। पर यीशु सांत्वना नहीं, ज़िम्मेदारी थमाते हैं। आज ही एक काम कीजिए: उस एक बातचीत को याद कीजिए जहाँ आपने पिछले हफ़्ते सुविधा के लिए चुप्पी चुनी थी, उस व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए, और उससे कहने के लिए एक सच्चा वाक्य तैयार करके ज़ोर से बोलिए।
मुख्य पात्र
पहाड़ पर बैठा यह शिक्षक हैरान करता है। वह भीड़ देखकर ऊपर जाता है, बैठता है, और मुँह खोलता है; यह किसी उत्तेजित प्रचारक की मुद्रा नहीं, अधिकार से बोलने वाले की मुद्रा है। और वह अधिकार अजीब ढंग से बरता जाता है: वह टूटे-फूटे, शोक करने वाले, बदनाम किए गए लोगों को देखता है और उन्हें पृथ्वी का नमक घोषित कर देता है। यह आशावाद नहीं, अनुग्रह है। साथ ही वह चापलूसी नहीं करता; उसी साँस में वह बता देता है कि व्यर्थ हो जाना संभव है। यीशु में यह दोनों हमेशा साथ रहते हैं, ऐसी करुणा जो हमारी क्षमता से नहीं हमारी ज़रूरत से शुरू होती है, और ऐसी सच्चाई जो हमें अपने भ्रम में सोने नहीं देती।
कठिन प्रश्न
रसायन शास्त्र कहता है कि शुद्ध नमक अपना स्वाद खो ही नहीं सकता। तो यीशु ऐसी बात क्यों कहते हैं जो असंभव लगती है? मृत सागर के आसपास मिलने वाला नमक अशुद्ध होता था; नमी में उसका असली अंश निकल जाता और बाक़ी सफ़ेद चूर्ण बचा रहता, दिखने में नमक, स्वाद में कुछ नहीं। पर असली चुभन यह है: क्या एक विश्वासी सचमुच व्यर्थ हो सकता है? यीशु इसका उत्तर सिद्धांत की तरह नहीं देते, चेतावनी की तरह देते हैं। और चेतावनी को सिद्धांत में बदलकर निष्क्रिय कर देना सबसे आसान बचाव है। मैं इसे खुला छोड़ता हूँ, जैसे पाठ छोड़ता है: यह प्रश्न सुलझाने के लिए नहीं, चौंकने के लिए दिया गया है।
पहले श्रोता
गलील के वे किसान और मछुआरे रोमी साम्राज्य के हाशिये पर जीते थे, कर के बोझ तले, धार्मिक केंद्र यरूशलेम से दूर, शास्त्रियों की नज़र में अधकचरे। उन्हें कोई यह कहे कि पूरी पृथ्वी का स्वाद तुम पर टिका है, यह लगभग हास्यास्पद लगा होगा। पर वे नमक की क़ीमत जानते थे: वह महँगा था, उसी से मछली सुरक्षित रखी जाती थी, उसी से बलिदान चढ़ता था। और वे यह भी जानते थे कि बेकार नमक सड़क पर बिखेर दिया जाता था, जहाँ लोग उस पर चलते थे। यानी यीशु का चित्र उनके लिए धुँधला नहीं, रोज़मर्रा का था, और इसीलिए और भी कड़ा।
चिंतन
पिछले महीने में वह कौन-सी जगह थी जहाँ मेरा "अलग स्वाद" दूसरों को साफ़ महसूस हुआ, और वह कौन-सी जगह जहाँ मैं पूरी तरह घुल गया?
यदि मेरी पहचान मेरे प्रदर्शन से नहीं बल्कि मसीह की घोषणा से आती है, तो इससे मेरे उस डर पर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Matthew 5:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 5:13 का क्या अर्थ है?
मत्ती 5:13 किस विषय में है?
मत्ती 5:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 5:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 5:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.
यीशु कहते हैं, "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" दाहिने गाल पर थप्पड़ उल्टे हाथ से पड़ता है, उसमें चोट कम और अपमान ज़्यादा होता है। यीशु तुझसे कह रहे हैं कि अपमान करनेवाला यह तय न करे कि तू कौन बनेगा। बदला लौटाना आसान है, पर उस पल में शांत खड़े रहना असली ताक़त है।
जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा।" सोचो, यीशु सबसे छोटी बिन्दु की भी चिंता करते हैं। जो परमेश्वर एक मात्रा को नहीं भूलता, क्या वह तेरी उस छोटी सी प्रार्थना को भूल जाएगा, जो तूने आँसुओं में फुसफुसाई थी? उसका वचन टलता नहीं, और न उसका प्रेम।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें