बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:25

बाइबल
यह वचन Chhuria Pali Church द्वारा समर्पित है

पाठ

रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ है, यही इस वचन की पूरी ताकत है। यीशु एक ऐसा दृश्य खींचते हैं जो उनके सुननेवालों के लिए रोज़मर्रा का था: एक आदमी अपने मुद्दई के साथ कचहरी की ओर जा रहा है, मुकदमा दायर हो चुका है, फैसला अभी बाकी है। और ठीक इसी बीच की दूरी में, धूल भरे उस रास्ते पर, यीशु कहते हैं: “जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग में है, उससे झटपट मेल मिलाप कर ले।” क्योंकि आगे जो है वह एक श्रृंखला है जिसे रोकना फिर तेरे हाथ में नहीं रहेगा: मुद्दई न्यायाधीश को सौंपेगा, न्यायाधीश सिपाही को, और सिपाही बन्दीगृह को। चेतावनी कठोर है, पर उसका लहजा जल्दबाजी का नहीं, दया का है।

मूल मर्म

यह वचन शिष्टाचार की सलाह नहीं, बल्कि समय के बारे में एक धर्मशास्त्रीय दावा है। बाइबल में परमेश्वर का न्याय कोई अचानक गिरनेवाली गाज नहीं; उससे पहले हमेशा एक अवधि होती है, एक “मार्ग”, जिसमें मेल की संभावना खुली रहती है। यही अवधि अनुग्रह है। परमेश्वर न्यायी हैं, और इसलिए हिसाब सचमुच चुकाया जाएगा, अगला पद इसे बेरहमी से साफ कर देता है: “जब तक तू पाई-पाई चुका न दे।” पर वही परमेश्वर धीरज रखनेवाले हैं, और इसलिए फैसले से पहले का यह ठहराव उनकी करुणा का ही रूप है। यीशु यहाँ नैतिकता को कालावधि से जोड़ते हैं: जिस भाई से तेरा झगड़ा है, उसके साथ तेरा रिश्ता परमेश्वर के सामने तेरी स्थिति से कटा हुआ नहीं है। राज्य अंदर से इंसान को बदलता है, और उस बदलाव की पहली परीक्षा अदालत की ओर जाते उस रास्ते पर होती है, न कि वेदी पर।

सामान्य सूत्र

बाइबल की पूरी कहानी इसी ढाँचे पर चलती है: परमेश्वर फैसला सुनाने से पहले रास्ता देते हैं। नूह के दिनों में सन्दूक बनने तक का समय, निनवे को दिए गए चालीस दिन, भविष्यद्वक्ताओं की वह थकाऊ, बार-बार दोहराई गई पुकार कि लौट आओ, इससे पहले कि बँधुआई आ जाए। हर बार वही संरचना: न्याय सचमुच आ रहा है, और ठीक इसीलिए अभी लौटने का अवसर खुला है। यीशु इस पुराने नमूने को एक गली की अदालत जितना छोटा कर देते हैं, और इस तरह उसे हमारे हाथ में थमा देते हैं। पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। जो मेल हम आपस में नहीं कर पाते, उसे मसीह ने क्रूस पर स्वयं करके दिखाया; वे वही “मेल करवानेवाले” हैं जिनके बारे में इसी पहाड़ी उपदेश में कहा गया कि वे “परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।” हम मेल करते हैं क्योंकि हमारे साथ पहले मेल किया गया है।

दर्पण

वह नाम आपको अभी याद आ गया होगा। जिस देवर से ज़मीन का हिस्सा अटका है, वह सहकर्मी जिसने आपकी मेहनत पर अपना नाम लिखवा लिया, वह दोस्त जिससे तीन साल से बात बंद है और अब चुप्पी खुद एक आदत बन चुकी है। हम इंतज़ार करते हैं कि पहल वह करे, क्योंकि पहल करना हार मान लेने जैसा लगता है। हमें डर है कि माफी माँगने का मतलब है यह मान लेना कि पूरा दोष हमारा था। यीशु इस हिसाब-किताब को तोड़ते हैं: सवाल यह नहीं कि कौन सही है, सवाल यह है कि रास्ता कितना बचा है। और रास्ता हमेशा हमारे अंदाज़े से छोटा होता है। आज ही, अगले दस मिनट में, उस व्यक्ति को एक वाक्य का संदेश भेजिए: “मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ, कब समय मिलेगा?” बस इतना, कोई सफाई नहीं, कोई शर्त नहीं।

शास्त्र की प्रतिध्वनि

ठीक पहले के पद इसी बात को उल्टी दिशा से कहते हैं: “तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर।” वहाँ आप उपासना के बीच में खड़े हैं, यहाँ अदालत के रास्ते पर; वहाँ नाराज़ दूसरा है, यहाँ मुकदमा आप पर है। यीशु दोनों तरफ से घेरते हैं ताकि कोई बहाना न बचे। दूसरी ओर, भजन संहिता 32 में दाऊद उस समय का वर्णन करता है जब उसने चुप रहकर अपना अपराध छिपाया और भीतर से सूखता गया, जब तक उसने मान न लिया। वही अनुभव यहाँ सामाजिक रूप ले लेता है: अनसुलझा झगड़ा भी भीतर से सुखाता है, और जितना टालिए उतना महँगा होता जाता है।

पहले सुननेवाले

गलील के उन किसानों और मज़दूरों के लिए यह कोई रूपक नहीं था। कर्ज़ आम था, और कर्ज़ न चुका पाने पर बन्दीगृह सचमुच होता था, जहाँ से छूटने का एकमात्र रास्ता यह था कि परिवार कहीं से पैसा जुटाए। अदालतें आम तौर पर ताकतवर के पक्ष में झुकी होती थीं, इसलिए यीशु की सलाह उनके कानों में व्यावहारिक समझदारी भी थी: लड़ने से पहले सोच, तेरे पास जीतने का साधन नहीं है। और वे ऐसे गाँवों में रहते थे जहाँ गुमनामी संभव नहीं थी; जिस मुद्दई के साथ वे रास्ते पर चल रहे थे, वह पड़ोसी था, शायद रिश्तेदार। झगड़ा निपटाना कोई कानूनी औपचारिकता नहीं, पूरे गाँव के सामने अपनी इज़्ज़त का सवाल था। यीशु उनसे ठीक वही माँग रहे हैं जो सबसे महँगा है।

एक बारीकी

“मार्ग में।” यूनानी में यह शब्द है होदोस, रास्ता, और शुरुआती मसीहियों ने अपने विश्वास को ही “मार्ग” कहा था। यहाँ यह शब्द एक जगह नहीं, एक अवधि है: दोनों अभी चल रहे हैं, फैसला अभी किसी और के हाथ में नहीं गया। यही पूरी बात का केंद्र है। जैसे ही आप कचहरी के दरवाज़े से भीतर जाते हैं, बातचीत खत्म और कार्यवाही शुरू; फिर आपकी इच्छा का कोई मोल नहीं रह जाता। जीवन भी ऐसा ही है, और यीशु इसे छिपाते नहीं। अभी हम मार्ग में हैं। यह वाक्य डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है: जिस क्षण में आप यह पढ़ रहे हैं, वह अनुग्रह का क्षण है, और वह खुला है।

चिंतन के प्रश्न

किस रिश्ते में आप यह मानकर चल रहे हैं कि “अभी बहुत समय है”, और यह भरोसा आपको किस चीज़ से बचा रहा है?

अगर आपको सचमुच यह यकीन हो जाए कि मसीह में परमेश्वर ने आपके साथ पहले मेल कर लिया है, तो उस अटके हुए झगड़े में आपका पहला कदम क्या बदल जाएगा?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 5:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:25 का क्या अर्थ है?
रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ है, यही इस वचन की पूरी ताकत है। यीशु एक ऐसा दृश्य खींचते हैं जो उनके सुननेवालों के लिए रोज़मर्रा का था: एक आदमी अपने मुद्दई के साथ कचहरी की ओर जा रहा है, मुकदमा दायर हो चुका है, फैसला अभी बाकी है। और ठीक इसी बीच की दूरी में, धूल भरे उस रास्ते पर, यीशु कहते हैं: “जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग में है, उससे झटपट मेल मिलाप कर ले।” क्योंकि आगे जो है वह एक श्रृंखला है जिसे रोकना फिर तेरे हाथ में नहीं रहेगा: मुद्दई न्यायाधीश को सौंपेगा, न्यायाधीश सिपाही को, और सिपाही बन्दीगृह को। चेतावनी कठोर है, पर उसका लहजा जल्दबाजी का नहीं, दया का है।
मत्ती 5:25 किस विषय में है?
बाइबल की पूरी कहानी इसी ढाँचे पर चलती है: परमेश्वर फैसला सुनाने से पहले रास्ता देते हैं। नूह के दिनों में सन्दूक बनने तक का समय, निनवे को दिए गए चालीस दिन, भविष्यद्वक्ताओं की वह थकाऊ, बार-बार दोहराई गई पुकार कि लौट आओ, इससे पहले कि बँधुआई आ जाए। हर बार वही संरचना: न्याय सचमुच आ रहा है, और ठीक इसीलिए अभी लौटने का अवसर खुला है। यीशु इस पुराने नमूने को एक गली की अदालत जितना छोटा कर देते हैं, और इस तरह उसे हमारे हाथ में थमा देते हैं। पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। जो मेल हम आपस में नहीं कर पाते, उसे मसीह ने क्रूस पर स्वयं करके दिखाया; वे वही “मेल करवानेवाले” हैं जिनके बारे में इसी पहाड़ी उपदेश में कहा गया कि वे “परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।” हम मेल करते हैं क्योंकि हमारे साथ पहले मेल किया गया है।
मत्ती 5:25 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
ठीक पहले के पद इसी बात को उल्टी दिशा से कहते हैं: “तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर।” वहाँ आप उपासना के बीच में खड़े हैं, यहाँ अदालत के रास्ते पर; वहाँ नाराज़ दूसरा है, यहाँ मुकदमा आप पर है। यीशु दोनों तरफ से घेरते हैं ताकि कोई बहाना न बचे। दूसरी ओर, भजन संहिता 32 में दाऊद उस समय का वर्णन करता है जब उसने चुप रहकर अपना अपराध छिपाया और भीतर से सूखता गया, जब तक उसने मान न लिया। वही अनुभव यहाँ सामाजिक रूप ले लेता है: अनसुलझा झगड़ा भी भीतर से सुखाता है, और जितना टालिए उतना महँगा होता जाता है।
मत्ती 5:25 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
“मार्ग में।” यूनानी में यह शब्द है होदोस, रास्ता, और शुरुआती मसीहियों ने अपने विश्वास को ही “मार्ग” कहा था। यहाँ यह शब्द एक जगह नहीं, एक अवधि है: दोनों अभी चल रहे हैं, फैसला अभी किसी और के हाथ में नहीं गया। यही पूरी बात का केंद्र है। जैसे ही आप कचहरी के दरवाज़े से भीतर जाते हैं, बातचीत खत्म और कार्यवाही शुरू; फिर आपकी इच्छा का कोई मोल नहीं रह जाता। जीवन भी ऐसा ही है, और यीशु इसे छिपाते नहीं। अभी हम मार्ग में हैं। यह वाक्य डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है: जिस क्षण में आप यह पढ़ रहे हैं, वह अनुग्रह का क्षण है, और वह खुला है।
मत्ती 5:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर आपको सचमुच यह यकीन हो जाए कि मसीह में परमेश्वर ने आपके साथ पहले मेल कर लिया है, तो उस अटके हुए झगड़े में आपका पहला कदम क्या बदल जाएगा?
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Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

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