बाइबल व्याख्या

रोमियों 7:15

बाइबल

पाठ

पौलुस एक ऐसा वाक्य लिखते हैं जो आत्मकथा जैसा लगता है और निदान जैसा भी: "जो मैं करता हूँ उसको नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिससे मुझे घृणा आती है, वही करता हूँ।" यह कोई नैतिक कमज़ोरी की शिकायत नहीं, बल्कि अपने ही भीतर एक अजनबी से सामना है। मैं अपने कामों का लेखक हूँ, फिर भी उनका अर्थ मुझसे छूट जाता है। इच्छा एक दिशा में खड़ी है, हाथ दूसरी दिशा में चल पड़ते हैं। और ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि वे बुराई चाहते हैं; वे कहते हैं कि जिस काम से उन्हें घृणा है, वही उनसे हो जाता है। चाहत सही है, पर चाहत ही पर्याप्त नहीं निकलती।

मूल मर्म

यहाँ पाप केवल गलत कामों की सूची नहीं, बल्कि एक सत्ता है। पद 14 में पौलुस कहते हैं कि वे "पाप के हाथ बिका हुआ" हैं, यानी यह गुलामी की भाषा है, बाज़ार की भाषा है, किसी और के अधिकार में चले जाने की भाषा है। इसीलिए व्यवस्था, जो "पवित्र, धर्मी, और अच्छी है", इस दशा को बदल नहीं सकती। वह सही दिशा दिखाती है, पर चलने की शक्ति नहीं देती; वह रोग का नाम बता देती है, इलाज नहीं करती। यही सुसमाचार की नींव है: मनुष्य की समस्या सूचना की कमी नहीं, बल्कि बंधन है। और बंधन से कोई आज्ञा नहीं, केवल एक छुड़ानेवाला मुक्त करता है। कृपा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि नैतिक प्रयास अपनी ही जड़ तक नहीं पहुँच पाता।

जोड़ने वाला सूत्र

यह फटा हुआ "मैं" अचानक प्रकट नहीं हुआ। अदन में मनुष्य को एक ही आज्ञा मिली थी, और वहीं पहली बार इच्छा और आज्ञा आपस में टकराईं। तब से पूरी बाइबल एक ही कहानी कहती है: परमेश्वर अपनी वाचा में मनुष्य को अपने पास बुलाते हैं, और मनुष्य हाँ कहकर भी नहीं पहुँच पाता। सीनै पर दी गई व्यवस्था इस दूरी को नापती है, मिटाती नहीं। इसीलिए भविष्यद्वक्ता नई वाचा की बात करते हैं, जिसमें व्यवस्था पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी। पद 15 उस वादे की ज़रूरत को नंगा कर देता है, और पद 25 उसका उत्तर देता है। मसीह केवल क्षमा नहीं देते; वे उस स्वामी को ही हटा देते हैं जिसके हाथ हम बिक चुके थे, और पवित्र आत्मा के द्वारा "आत्मा की नई रीति" शुरू होती है।

दर्पण

आप जानते हैं यह कैसा लगता है। सुबह आपने तय किया था कि आज बच्चों पर नहीं चिल्लाएँगे, और शाम सात बजे तक वही आवाज़ फिर घर में गूँज रही थी। आपने तय किया था कि उस सहकर्मी के बारे में एक भी व्यंग्य नहीं करेंगे, और चाय के समय सबसे तीखा वाक्य आपके ही मुँह से निकला। फ़ोन, पैसा, नज़र, ज़बान; जिस चीज़ से आपको सचमुच घृणा है, वही आपसे फिर हो जाती है। पौलुस यहाँ आपको बहाना नहीं देते, पर एक राहत ज़रूर देते हैं: आपकी हार यह साबित नहीं करती कि आपकी चाहत झूठी थी। वह साबित करती है कि आपको किसी बाहरी शक्ति की ज़रूरत है। आज एक काम कीजिए: जो एक काम आपने कल किया और जिससे आपको सचमुच घृणा है, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए, उसके नीचे पद 24 और 25 का प्रश्न और उत्तर लिखिए, और वह कागज़ उस जगह रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।

अन्य धर्मग्रंथों की गूँज

पद 18 के साथ उत्पत्ति 6:5 का हवाला देना संयोग नहीं है: जलप्रलय से पहले परमेश्वर ने देखा कि मनुष्य के मन की कल्पना लगातार बुरी ही होती है। पौलुस कोई नई खोज नहीं कर रहे, वे बाइबल के सबसे पुराने निदान को अपने ऊपर लागू कर रहे हैं। दूसरी ओर गलातियों 5 में वे यही संघर्ष दोबारा वर्णित करते हैं, पर वहाँ लड़ाई शरीर और पवित्र आत्मा के बीच है, न कि अकेले मनुष्य के भीतर। यह तुलना महत्वपूर्ण है। रोमियों 7 में जो आवाज़ अकेली और हताश है, वह अगले अध्याय में अकेली नहीं रहती। एक ही अनुभव, दो दृष्टिकोण: व्यवस्था के नीचे यह जेल है, आत्मा के अधीन यह युद्ध है, और युद्ध में जीत संभव होती है।

कठिन प्रश्न

सबसे टेढ़ा प्रश्न यह है: क्या पौलुस यहाँ विश्वास से पहले की अपनी दशा बता रहे हैं, या मसीही जीवन की रोज़मर्रा सच्चाई? वर्तमान काल की क्रियाएँ और "भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न" रहने की बात विश्वासी की ओर इशारा करती है; "पाप के हाथ बिका हुआ" होना उससे टकराता है। ईमानदारी यही है कि पाठ इसे पूरी तरह सुलझाता नहीं। और शायद यही इसकी शक्ति है। अगर यह केवल अतीत होता, तो हम अपनी आज की हार को छिपाते। अगर यह केवल वर्तमान होता, तो अध्याय 8 की स्वतंत्रता खोखली लगती। हम दोनों के बीच जीते हैं: छुड़ाए जा चुके हैं, पर अभी पूरी तरह छुड़ाए नहीं गए। यह असुविधा मिटाने की चीज़ नहीं, सहने की चीज़ है।

पहले सुननेवाले

रोम की कलीसिया में यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी एक साथ बैठे थे, और व्यवस्था का प्रश्न उनके बीच जलता हुआ अंगारा था। यहूदी विश्वासियों के लिए व्यवस्था पहचान थी, गर्व थी, परमेश्वर की देन थी; उसे छोड़ देना विश्वासघात जैसा लगता। पौलुस उनसे व्यवस्था की निंदा नहीं करवाते, बल्कि उसे "पवित्र, धर्मी, और अच्छी" कहते हैं, और फिर दिखाते हैं कि अच्छी चीज़ भी बीमार शरीर में दवा नहीं बन पाती। गैर-यहूदी सुननेवालों के लिए यह दूसरी तरह से चुभा होगा, क्योंकि यूनानी-रोमी नैतिक शिक्षा मानती थी कि सही ज्ञान सही आचरण पैदा करता है। पौलुस दोनों की नींव हिला देते हैं और दोनों को एक ही जगह लाकर खड़ा करते हैं: मसीह के सामने, खाली हाथ, एक जैसे ज़रूरतमंद।

चिंतन के प्रश्न

किस बात में आपकी चाहत और आपका व्यवहार सबसे ज़्यादा अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं, और आप अब तक उसे किस तरह समझाते आए हैं?

अगर मसीह ने आपको उस स्वामी से छुड़ाया है जिसके हाथ आप बिके थे, तो यह आपके कल के पहले घंटे को ठोस रूप से कैसे बदलेगा?

Romans में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Romans 1-7 For You

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Keller opens Paul's masterpiece with clarity and pastoral warmth.

Romans 8-16 For You

Timothy Keller

The second half: assurance, election and everyday Christian living.

The Message of Romans

John Stott

A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

F.F. Bruce

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Romans

Douglas Moo

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Romans 7:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 7:15 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक ऐसा वाक्य लिखते हैं जो आत्मकथा जैसा लगता है और निदान जैसा भी: "जो मैं करता हूँ उसको नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिससे मुझे घृणा आती है, वही करता हूँ।" यह कोई नैतिक कमज़ोरी की शिकायत नहीं, बल्कि अपने ही भीतर एक अजनबी से सामना है। मैं अपने कामों का लेखक हूँ, फिर भी उनका अर्थ मुझसे छूट जाता है। इच्छा एक दिशा में खड़ी है, हाथ दूसरी दिशा में चल पड़ते हैं। और ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि वे बुराई चाहते हैं; वे कहते हैं कि जिस काम से उन्हें घृणा है, वही उनसे हो जाता है। चाहत सही है, पर चाहत ही पर्याप्त नहीं निकलती।
रोमियों 7:15 किस विषय में है?
यह फटा हुआ "मैं" अचानक प्रकट नहीं हुआ। अदन में मनुष्य को एक ही आज्ञा मिली थी, और वहीं पहली बार इच्छा और आज्ञा आपस में टकराईं। तब से पूरी बाइबल एक ही कहानी कहती है: परमेश्वर अपनी वाचा में मनुष्य को अपने पास बुलाते हैं, और मनुष्य हाँ कहकर भी नहीं पहुँच पाता। सीनै पर दी गई व्यवस्था इस दूरी को नापती है, मिटाती नहीं। इसीलिए भविष्यद्वक्ता नई वाचा की बात करते हैं, जिसमें व्यवस्था पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी। पद 15 उस वादे की ज़रूरत को नंगा कर देता है, और पद 25 उसका उत्तर देता है। मसीह केवल क्षमा नहीं देते; वे उस स्वामी को ही हटा देते हैं जिसके हाथ हम बिक चुके थे, और पवित्र आत्मा के द्वारा "आत्मा की नई रीति" शुरू होती है।
रोमियों 7:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 18 के साथ उत्पत्ति 6:5 का हवाला देना संयोग नहीं है: जलप्रलय से पहले परमेश्वर ने देखा कि मनुष्य के मन की कल्पना लगातार बुरी ही होती है। पौलुस कोई नई खोज नहीं कर रहे, वे बाइबल के सबसे पुराने निदान को अपने ऊपर लागू कर रहे हैं। दूसरी ओर गलातियों 5 में वे यही संघर्ष दोबारा वर्णित करते हैं, पर वहाँ लड़ाई शरीर और पवित्र आत्मा के बीच है, न कि अकेले मनुष्य के भीतर। यह तुलना महत्वपूर्ण है। रोमियों 7 में जो आवाज़ अकेली और हताश है, वह अगले अध्याय में अकेली नहीं रहती। एक ही अनुभव, दो दृष्टिकोण: व्यवस्था के नीचे यह जेल है, आत्मा के अधीन यह युद्ध है, और युद्ध में जीत संभव होती है।
रोमियों 7:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोम की कलीसिया में यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी एक साथ बैठे थे, और व्यवस्था का प्रश्न उनके बीच जलता हुआ अंगारा था। यहूदी विश्वासियों के लिए व्यवस्था पहचान थी, गर्व थी, परमेश्वर की देन थी; उसे छोड़ देना विश्वासघात जैसा लगता। पौलुस उनसे व्यवस्था की निंदा नहीं करवाते, बल्कि उसे "पवित्र, धर्मी, और अच्छी" कहते हैं, और फिर दिखाते हैं कि अच्छी चीज़ भी बीमार शरीर में दवा नहीं बन पाती। गैर-यहूदी सुननेवालों के लिए यह दूसरी तरह से चुभा होगा, क्योंकि यूनानी-रोमी नैतिक शिक्षा मानती थी कि सही ज्ञान सही आचरण पैदा करता है। पौलुस दोनों की नींव हिला देते हैं और दोनों को एक ही जगह लाकर खड़ा करते हैं: मसीह के सामने, खाली हाथ, एक जैसे ज़रूरतमंद।
रोमियों 7:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर मसीह ने आपको उस स्वामी से छुड़ाया है जिसके हाथ आप बिके थे, तो यह आपके कल के पहले घंटे को ठोस रूप से कैसे बदलेगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Romans 7 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 20

पिता, तू जानता है कि मैं अच्छा करना चाहता हूँ, फिर भी बार बार वही कर बैठता हूँ जो नहीं चाहता। इस भीतर की लड़ाई से मैं थक गया हूँ। मुझे छिपाना नहीं, तेरे सामने खुलकर रखना है। तू ही मुझे इस बंधन से छुड़ा सकता है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 11

पिता, धन्यवाद कि आपने मेरी आँखें खोलीं और दिखाया कि पाप कैसे अवसर पाकर आज्ञा के द्वारा मुझे बहकाता है। धन्यवाद कि उसका छल अब मुझसे छिपा नहीं रहता, और जहाँ पाप मारता है, वहाँ मसीह में आपने मुझे जीवन दिया है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि वह समय बीत गया जब हम शरीर के अधीन थे और पाप की अभिलाषाएँ हमारे अंगों में मृत्यु का फल लाने के लिये काम करती थीं। आपने मसीह में हमें उस बंधन से छुड़ाया, और अब हमारा जीवन आपके लिये फल लाता है। इस बदलाव के लिये हृदय से आपका आभार।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

पौलुस अपनी हार में भी एक गवाही ढूँढ़ लेता है: "यदि मैं वह करता हूँ जो मैं नहीं चाहता, तो मैं मान लेता हूँ कि व्यवस्था भली है।" सोचो, जो बेचैनी पाप करने के बाद तुम्हारे भीतर उठती है, वही सबूत है कि परमेश्वर की आज्ञा तुम्हें अब भी सुंदर लगती है। वह कसक दुश्मन नहीं, गवाह है। उसे दबाओ मत, उसे लेकर मसीह के पास जाओ।

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