1 राजाओं 2
पाठ
मरणासन्न दाऊद अपने पुत्र सुलैमान को अंतिम निर्देश देते हैं: परमेश्वर की व्यवस्था पर चलो, पर साथ ही कुछ पुराने हिसाब चुकता करो, योआब और शिमी को मरने दो, बर्जिल्लै के पुत्रों पर कृपा करो। दाऊद की मृत्यु के बाद सुलैमान एक-एक करके अपने विरोधियों, अदोनिय्याह, एब्यातार, योआब और अंत में शिमी को ठिकाने लगाते हैं। अध्याय इस वाक्य से समाप्त होता है: "सुलैमान के हाथ में राज्य दृढ़ हो गया।"
मर्म
यह अध्याय असहज करता है। एक ओर दाऊद व्यवस्था और सच्चाई की बात करते हैं (पद 3-4), दूसरी ओर तुरंत ही रक्तपात की सूची सौंप देते हैं। यह विरोधाभास संयोग नहीं है; यह पुराने नियम के राज्य की असली प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर का राज्य मानवीय राजनीति के भीतर काम करता है, स्वच्छ हाथों से नहीं। सुलैमान का सिंहासन "दृढ़" तभी होता है जब खून बहा दिया जाता है। यहाँ एक गहरी सच्चाई है: दाऊद का घराना, जिससे मसीह आएँगे, स्वयं अपनी शुद्धता से नहीं टिकता। इसे टिकाए रखने के लिए किसी और की आवश्यकता है, कोई ऐसा राजा जो अपने ही लहू से राज्य स्थिर करे।
सूत्र
पद 4 में दाऊद उस वाचा को दोहराते हैं जो 2 शमूएल 7 में परमेश्वर ने उनसे बाँधी थी: "इस्राएल की राजगद्दी पर विराजनेवाले की, तेरे कुल परिवार में घटी कभी न होगी।" यह वादा सुलैमान से आगे बढ़ता है। मत्ती 1 दाऊद के वंश की सूची देकर यीशु तक पहुँचता है, और लूका 1:32-33 में स्वर्गदूत मरियम से कहते हैं कि उनका पुत्र "अपने पिता दाऊद के सिंहासन पर" बैठेगा। सुलैमान का राज्य तलवार से दृढ़ हुआ; मसीह का राज्य क्रूस से। दोनों में विरोधियों का न्याय होता है, पर मसीह में न्याय पहले स्वयं पर पड़ता है, ताकि विरोधी बचाए जा सकें।
दर्पण
दाऊद की मृत्यु-शय्या की सूची हमें बेचैन करती है क्योंकि हम उसे पहचानते हैं। मरते समय भी वे उन लोगों को नहीं भूले जिन्होंने उन्हें चोट पहुँचाई। "उस पक्के बाल वाले को अधोलोक में शान्ति से उतरने न देना" (पद 6) एक बूढ़े आदमी की आवाज़ है जो दशकों बाद भी नहीं भूला। क्या आपके भीतर भी ऐसी कोई सूची है? वह सहकर्मी जिसने आपकी पीठ पीछे बात की, वह भाई जिसने पिता की संपत्ति में धोखा दिया, वह मित्र जो कठिन समय में गायब हो गया। हम इन्हें "बुद्धि" कहकर सजाते हैं, जैसे दाऊद ने किया, पर यह अक्सर अनसुलझा क्रोध होता है जो धर्म के वस्त्र पहन लेता है। मसीह की क्रूस पर की गई प्रार्थना, "हे पिता, इन्हें क्षमा कर," दाऊद की अंतिम इच्छा के ठीक विपरीत खड़ी है।
अन्तर्पाठ
पद 27 स्पष्ट संकेत देता है: एब्यातार का पदच्युत होना 1 शमूएल 2:31-35 में एली के वंश के विरुद्ध बोले गए वचन को पूरा करता है। सैकड़ों वर्षों बाद परमेश्वर का वचन अपना काम करता है, यह पाठ ठंडी सटीकता से दिखाता है। योआब का वेदी के सींगों को पकड़ना (पद 28) निर्गमन 21:14 को गूँजाता है, जहाँ लिखा है कि जो जानबूझकर हत्या करे उसे वेदी से भी घसीटकर लाया जाए। योआब जानते हैं व्यवस्था क्या कहती है, इसलिए वे कहते हैं, "नहीं, मैं यहीं मर जाऊँगा" (पद 30)। और शिमी की कहानी उस शाप को गूँजाती है जो उसने 2 शमूएल 16 में दाऊद पर बरसाया था; परमेश्वर के समय में हर शब्द का हिसाब होता है। इब्रानियों 6:18 में लेखक कहते हैं कि हमारा शरणस्थान वेदी नहीं, स्वयं मसीह हैं, वह शरण जो योआब को नहीं मिली।
प्रसंग
यह लगभग 970 ईसा पूर्व है। दाऊद चालीस वर्ष राज कर चुके हैं, और सत्ता-हस्तांतरण प्राचीन निकट पूर्व में सबसे खतरनाक क्षण होता था। भाई भाइयों को मारते थे, सेनापति तख्तापलट करते थे। अदोनिय्याह पहले ही एक बार राजा बनने का प्रयास कर चुके हैं (1 राजा 1)। अबीशग को माँगना निर्दोष नहीं है; राजा की स्त्रियाँ राज्य का प्रतीक थीं, उन्हें माँगना सिंहासन पर दावा था। सुलैमान इसे तुरंत समझ जाते हैं (पद 22)। योआब दाऊद के सबसे शक्तिशाली और सबसे खूनी सेनापति थे, जिन्होंने अब्नेर और अमासा को धोखे से मारा था। एब्यातार पुरोहित थे जो शमूएल के समय से चले आ रहे एली-वंश के अंतिम प्रतिनिधि थे। यह अध्याय राजनीतिक सफाई है, पर उसके भीतर परमेश्वर का न्याय भी चल रहा है।
प्रश्न
क्या दाऊद के अंतिम शब्द परमेश्वर के मार्ग हैं, या मनुष्य के? पाठ स्वयं इसका सीधा उत्तर नहीं देता। पद 3 में दाऊद व्यवस्था की बात करते हैं, पर व्यवस्था तो कहती है, "पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा" (व्यवस्थाविवरण 32:35)। फिर भी पाठ सुलैमान की निंदा नहीं करता; इसके विपरीत यह कहता है कि एब्यातार का पदच्युत होना यहोवा के वचन को पूरा करता है (पद 27)। शायद उत्तर यह है: परमेश्वर मनुष्यों के अपूर्ण न्याय के भीतर से भी अपना न्याय पूरा कर
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1 Kings 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
बतशेबा राजा सुलैमान के पास अदोनिय्याह के लिए एक छोटी सी विनती लेकर आती है। सुलैमान उठकर उससे मिलता है, उसे दण्डवत करता है, और अपनी माँ के लिये सिंहासन के दाहिनी ओर आसन रखवाता है। फिर कहता है, "हे मेरी माता, माँग, क्योंकि मैं तेरी बात न टालूँगा।"
सोचिए, राजा होकर भी उसने माँ के सामने सिर झुकाया। ऊँचे पद पर पहुँचकर हम अक्सर उन्हें भूल जाते हैं जिन्होंने हमें गढ़ा। आज किसे आपकी विनम्रता की ज़रूरत है?
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