मलाकी 3:6
पाठ
सेनाओं के यहोवा न्याय करने के लिए निकट आ चुके हैं; पद 5 में उन्होंने टोन्हों, व्यभिचारियों, झूठी शपथ खानेवालों, मजदूर की मजदूरी दबानेवालों और विधवा-अनाथ पर अंधेर करनेवालों के विरुद्ध गवाही देने की घोषणा की है। ठीक इसी गर्जन के बाद पद 6 आता है, और वह धमकी नहीं, बल्कि जीवनदान है: "क्योंकि मैं यहोवा बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।" एक ही वाक्य में दो बातें जुड़ी हैं: परमेश्वर का न बदलना, और याकूब की सन्तान का अब तक जीवित रहना। उनके बचे रहने का कारण उनकी वफादारी नहीं है, क्योंकि अगला ही पद कहता है कि वे पुरखाओं के दिनों से विधियों से हटते आए हैं। कारण केवल यह है कि परमेश्वर वही हैं जो थे।
मूल मर्म
हम "परमेश्वर बदलते नहीं" को आम तौर पर एक दार्शनिक कथन की तरह पढ़ते हैं, जैसे किसी अचल पत्थर का वर्णन। मलाकी इसे वाचा की भाषा में कहते हैं। यहाँ अपरिवर्तनीयता का अर्थ है: जो वचन उन्होंने अब्राहम और याकूब से बाँधा, वह उनके मन बदलने से टूटता नहीं, और इसलिए एक बेवफा जाति भी मिट्टी में नहीं मिल गई। ध्यान दें कि तर्क कितना उलटा है। यदि परमेश्वर अपरिवर्तनीय रूप से पवित्र हैं और पद 5 की सूची सच है, तो निष्कर्ष यह होना चाहिए था: "इसलिए तुम नाश हो गए।" परंतु वे कहते हैं, "तुम नाश नहीं हुए।" अर्थात् उनकी स्थिरता का मुख कृपा की ओर है। यही कारण है कि सुनार की आग (पद 3) शुद्ध करने के लिए आती है, भस्म करने के लिए नहीं। परमेश्वर का न बदलना ही हमारे बदल पाने की एकमात्र संभावना है।
जोड़नेवाला धागा
पद 6 का "मैं बदलता नहीं" अधर में नहीं लटका; वह पद 1 के वादे को थामे हुए है। "प्रभु, जिसे तुम ढूँढ़ते हो, वह अचानक अपने मन्दिर में आ जाएगा; हाँ वाचा का वह दूत, जिसे तुम चाहते हो।" यदि परमेश्वर बदल जाते, तो चार सौ वर्ष की चुप्पी के बाद वह वादा रद्दी काग़ज़ बन जाता। पर वे नहीं बदले, और इसलिए एक दिन एक स्त्री अपने बच्चे को यरूशलेम के मन्दिर में ले आई, और प्रभु सचमुच अपने मन्दिर में आए, इतने चुपचाप कि अधिकांश लोगों को पता भी न चला। इब्रानियों की पत्री यीशु मसीह के बारे में जो कहती है, कि वे कल, आज और युगानुयुग एक से हैं, वह मलाकी के इसी वाक्य की गूँज है। और सुनार की आग अंततः स्वयं उन्हीं पर पड़ी: जिसने शुद्ध किया, वही क्रूस पर तपाया गया। याकूब की सन्तान का नाश न होना उस कीमत पर टिका है।
दर्पण
आप अपनी असफलताओं की एक निजी सूची लिए घूमते हैं। वह वैवाहिक झगड़ा जो हर छह महीने में उसी बिंदु पर लौट आता है। वह आदत जिसे आपने पाँच बार छोड़ा और पाँच बार पकड़ा। वह प्रार्थना जो अब आदत भर लगती है, ठीक वैसे ही जैसे मलाकी के श्रोता कहते थे, "परमेश्वर की सेवा करना व्यर्थ है।" और भीतर एक चुपचाप डर बैठा रहता है कि परमेश्वर का धैर्य किसी दिन चुक जाएगा, कि कहीं कोई सीमा है जिसके पार वे आपसे ऊब जाएँगे। पद 6 उस डर के सामने खड़ा होकर कहता है: तुम आज साँस ले रहे हो, यह तुम्हारी पकड़ का नहीं, उनकी पकड़ का प्रमाण है। आज ही एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसके कारण आपको लगता है कि परमेश्वर ने अब तक आपको छोड़ दिया होगा, और उसके ठीक नीचे लिखिए, "मैं यहोवा बदलता नहीं," फिर उसे ऊँची आवाज़ में पढ़िए।
कठिन प्रश्न
यदि परमेश्वर बदलते नहीं, तो अगला ही पद क्यों कहता है, "तुम मेरी ओर फिरो, तब मैं भी तुम्हारी ओर फिरूँगा"? यह तो बदलाव जैसा ही सुनाई देता है। और यदि उनका न बदलना याकूब की सन्तान को बचाए रखता है, तो निर्वासन क्यों हुआ, मन्दिर क्यों जलाया गया, पीढ़ियाँ क्यों मिट गईं? ईमानदारी से कहें तो मलाकी इसका हिसाब नहीं देते। वे केवल इतना कहते हैं कि पूरी तरह मिटाया जाना नहीं हुआ। परमेश्वर की अपरिवर्तनीयता का अर्थ यह नहीं कि वे निष्क्रिय हैं या कि उनके साथ हमारा रिश्ता निर्जीव गणित है; उनका मुड़ना उनके स्वभाव के विरुद्ध नहीं, उसी के अनुरूप है। पर यह प्रश्न बना रहता है कि कृपा और न्याय की सीमा कहाँ खिंचती है। मलाकी उसे पद 18 तक, उस "ठहराए हुए दिन" तक टाल देते हैं। हमें भी वहीं तक धैर्य रखना होगा।
मुख्य पात्र
इस पद में बोलनेवाला "मैं" ही केंद्र है, और उसका भावजगत सपाट नहीं है। पूरी पुस्तक में परमेश्वर थके हुए पिता की तरह बहस करते सुनाई देते हैं, बार-बार उद्धृत करते हुए कि लोग क्या पलटकर पूछते हैं: "हम किस बात में फिरें?", "हमने किस बात में तुझे लूटा है?" यह वह परमेश्वर हैं जिन्हें उनके अपने लोग बहस में घसीटते हैं। फिर भी उनकी प्रतिक्रिया प्रलय नहीं, संरक्षण है। वे स्वयं को "याकूब" के नाम से जुड़े रहने देते हैं, उस छलिये पुरखे के नाम से, मानो कह रहे हों कि उन्हें पता है वे किस परिवार से बँधे हैं। और पद 17 में वही आवाज़ अचानक कोमल हो जाती है: "मैं उनसे ऐसी कोमलता करूँगा जैसी कोई अपने सेवा करनेवाले पुत्र से करे।" यह स्थिरता पत्थर की नहीं, प्रेम की है।
अंतर्पाठ
पौलुस रोमियों 11 में इसी तर्क को उठाते हैं जब वे इस्राएल के भविष्य पर विचार करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परमेश्वर अपने वरदानों और बुलाहट से पीछे नहीं हटते; वहाँ भी बचे रहने का आधार मनुष्य की वफादारी नहीं, परमेश्वर का चरित्र है। और इसी अध्याय के भीतर पद 16 एक छोटी-सी खिड़की खोलता है: "जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके सामने एक पुस्तक लिखी जाती थी।" वह पुस्तक उसी अपरिवर्तनीयता का दूसरा पहलू है, क्योंकि जो बदलते नहीं वे भूलते भी नहीं। संशयवादी कहते हैं सेवा व्यर्थ है; परमेश्वर चुपचाप नाम दर्ज कर रहे हैं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा आज इसलिए खड़ा है कि आप मज़बूत रहे, और कौन-सा इसलिए कि परमेश्वर बदले नहीं?
यदि सुनार की आग नष्ट करने नहीं, शुद्ध करने आती है, तो आपकी वर्तमान कठिनाई में वह क्या जलाना चाह रही हो सकती है?
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Malachi 3:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मलाकी 3:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Malachi 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धन्यवाद कि आप धर्मी और दुष्ट के बीच का भेद भूलते नहीं। जब लगता है कि आपकी सेवा करने से कुछ नहीं बदला, तब भी आप सब देख रहे हैं। आपका यह वचन कि हम फिरकर यह भेद जान लेंगे, मेरे थके मन को थाम लेता है। आपकी सेवा व्यर्थ नहीं।
धन्यवाद, कि आप हमें अपनी परीक्षा करने का न्योता देते हैं और कहते हैं, "सारे दशमांश भण्डार में ले आओ।" हमारा थोड़ा सा देना भी आपकी नज़र से नहीं छूटता। धन्यवाद कि आप आकाश के झरोखे खोलकर अपरम्पार आशीष बरसाते हैं, और हमारी ज़रूरतें आज तक अधूरी नहीं रहीं।
जिस समय चारों ओर लोग कह रहे थे कि परमेश्वर की सेवा करना व्यर्थ है, कुछ लोग चुपचाप आपस में बातें कर रहे थे। और लिखा है, "यहोवा ध्यान धरकर उनकी सुनता था।" उनकी फुसफुसाहट स्वर्ग में दर्ज हो गई। तेरी वे प्रार्थनाएँ जो किसी ने नहीं सुनीं, तेरा वह विश्वास जो किसी को दिखा नहीं, परमेश्वर की पुस्तक में लिखा जा चुका है।
परमेश्वर ने टिड्डी को डाँटने और आकाश के झरोखे खोलने का वादा किया, और उसके बाद कहा, "तब सब जातियाँ तुमको धन्य कहेंगी।" गौर कर, आशीष वहाँ रुकती नहीं जहाँ तू है। तेरा भरा हुआ घर, तेरा चंगा मन, तेरी थमी हुई चिंता, ये पड़ोसियों के सामने परमेश्वर की गवाही बन जाते हैं। तो जो तुझे मिला है, वह छिपाने के लिए है या दिखाने के लिए?
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