विषय

विश्वास क्या है: बाइबल के अनुसार विश्वास का अर्थ और शक्ति

परिचय

रात के दो बजे अस्पताल के गलियारे में एक माँ बैठी है। बेटे का ऑपरेशन चल रहा है। उसके हाथ में एक छोटी बाइबल है, पर वह पढ़ नहीं पा रही; अक्षर आँसुओं में तैर रहे हैं। वह बुदबुदाती है, "प्रभु, मुझे नहीं पता मेरा विश्वास काफी है या नहीं।"

यह वाक्य बहुत जाना-पहचाना है, नहीं? हम सब कभी अपने विश्वास को तराजू पर रखकर तोलते हैं, जैसे परमेश्वर की कृपा किसी न्यूनतम मात्रा पर टिकी हो। और यहीं बाइबल हमें चौंकाती है। पवित्रशास्त्र कहीं भी हमारे विश्वास के वजन को नहीं नापता; वह हमारा ध्यान बार-बार उस ओर मोड़ता है जिस पर विश्वास किया जा रहा है।

इस पृष्ठ पर आप विश्वास की बाइबल आधारित परिभाषा पाएँगे, देखेंगे कि यह सूत्र उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक कैसे बुना गया है, चार आम गलतफ़हमियों से मुक्त होंगे, और सीखेंगे कि सोमवार की सुबह विश्वास कैसा दिखता है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

इस मार्गदर्शिका का एक ही केंद्रबिंदु है: विश्वास की शक्ति विश्वास में नहीं, उसके विषय में है। राई के दाने जितना विश्वास पहाड़ हिला देता है, इसलिए नहीं कि दाना शक्तिशाली है, बल्कि इसलिए कि जिस परमेश्वर को वह थामता है वह सर्वशक्तिमान हैं। अधिकतर लेख सिखाते हैं कि "अपना विश्वास कैसे बढ़ाएँ", मानो विश्वास कोई मांसपेशी हो जिसे हम रोज़ भारी वज़न उठाकर मज़बूत करें। बाइबल दूसरी दिशा से आती है: विश्वास एक खाली हाथ है जो परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को पकड़ता है। इसलिए यहाँ हम बार-बार यही पूछेंगे: तुम्हारा विश्वास किस पर टिका है? क्योंकि कमज़ोर हाथ से पकड़ी हुई मज़बूत रस्सी बचा लेती है, और मज़बूत हाथ से पकड़ा हुआ सड़ा धागा टूट जाता है।

बाइबल विश्वास के बारे में क्या कहती है?

बाइबल विश्वास की सबसे सुस्पष्ट परिभाषा इब्रानियों 11:1 में देती है: "अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" ध्यान दीजिए, यहाँ दो शब्द हैं जो अदालत और व्यापार की भाषा से आते हैं: "निश्चय" और "प्रमाण"। विश्वास कोई धुँधली आशा नहीं है, "काश ऐसा हो जाए" जैसी कोई मनोकामना नहीं। यह एक ठोस आधार है, वह ज़मीन जिस पर आप पैर रखकर खड़े हो सकते हैं, इसके बावजूद कि आपकी आँखें अभी कुछ नहीं देख रहीं। और यह आधार हमारी कल्पना से नहीं, परमेश्वर की प्रतिज्ञा से बनता है।

यही बात इब्रानियों 11:6 आगे बढ़ाती है: "और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।" यह पद बताता है कि विश्वास का ढाँचा किस चीज़ से बना है: पहला, परमेश्वर हैं; दूसरा, वे अपने खोजनेवालों की ओर मुड़ते हैं। यानी विश्वास दो सच्चाइयों पर खड़ा होता है, परमेश्वर का अस्तित्व और उनका चरित्र। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के अस्तित्व को मान सकता है और फिर भी डर में जी सकता है, क्योंकि उसे भरोसा नहीं कि वे भले हैं। बाइबल का विश्वास दोनों को थामता है।

तो यह विश्वास कहाँ से आता है? रोमियों 10:17 उत्तर देता है: "सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है।" यह पद पूरे विषय का ताला खोलता है। विश्वास कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे आप अपने भीतर से पैदा करें, दाँत भींचकर, ज़ोर लगाकर। वह वचन सुनने से जन्म लेता है। जब मसीह का सुसमाचार सुनाया जाता है, पवित्र आत्मा उसी वचन के द्वारा हृदय में भरोसा उत्पन्न करते हैं। इसीलिए जिन दिनों आपका विश्वास डोलता है, समाधान अपने भीतर और गहरे खोदना नहीं, बल्कि बाहर से आती हुई उस आवाज़ को सुनना है।

विश्वास भीतर से नहीं उगता, वह सुनने से जन्मता है।

यरूशलेम की सड़क पर सूखे अंजीर के पेड़ के सामने खड़े होकर यीशु ने चेलों से कहा, जैसा मरकुस 11:22 में लिखा है: "यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि परमेश्वर पर विश्वास रखो।" उन्होंने यह नहीं कहा, "विश्वास रखो।" उन्होंने कहा, "परमेश्वर पर विश्वास रखो।" चार शब्दों में हमारे पूरे दृष्टिकोण का सार है। विश्वास एक बर्तन है; उसकी कीमत बर्तन की चमक में नहीं, उसमें भरे पानी में है। जब चेले पहाड़ हिलाने की बात सुनकर अचंभित हुए, यीशु ने उनका ध्यान उनकी क्षमता की ओर नहीं, पिता की सामर्थ्य की ओर मोड़ा।

और यह विश्वास हमें कैसे मिलता है? इफिसियों 2:8 में पौलुस लिखता है: "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।" उद्धार अनुग्रह से है, और विश्वास वह हाथ है जिससे हम अनुग्रह ग्रहण करते हैं, और वह हाथ भी परमेश्वर का ही दिया हुआ है। इसलिए विश्वास कभी घमंड का कारण नहीं बन सकता। भिखारी अपने खाली हाथों पर गर्व नहीं करता।

अंत में, यह विश्वास दैनिक चाल बन जाता है। 2 कुरिन्थियों 5:7 कहता है: "क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं।" "चलना" रोज़मर्रा का शब्द है, बाज़ार जाना, नौकरी करना, बच्चों को पालना। विश्वास रविवार की एक भावना नहीं, चलने का ढंग है। और याकूब 2:17 इस चाल की जाँच करता है: "वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" जीवित विश्वास हिलता-डुलता है, बोलता है, देता है, क्षमा करता है। जो विश्वास कभी कुछ नहीं करता, वह विश्वास नहीं, केवल एक राय है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

विश्वास का धागा बाइबल के तीसरे अध्याय के बाद ही दिखने लगता है, जब आदम और हव्वा परमेश्वर के वचन पर भरोसा खो देते हैं और सर्प की बात मान लेते हैं। पाप की जड़ में अविश्वास है। इसके बाद पूरा पवित्रशास्त्र परमेश्वर की उस लंबी परियोजना का ब्यौरा है जिसमें वे मनुष्य के भरोसे को फिर बहाल करते हैं।

नूह ने वह जहाज़ बनाया जिसकी ज़रूरत आँखों को नहीं दिख रही थी। अब्राहम को घर छोड़कर निकलना पड़ा, और कहाँ जा रहा है, यह उसे नहीं बताया गया। उत्पत्ति 15:6 में सुसमाचार का बीज छिपा है: "तब उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इसका लेखा उसके लिये धर्म गिना।" ध्यान दें, अब्राहम को धर्मी उसकी उपलब्धियों से नहीं, उसके भरोसे से गिना गया, और वह भी खतना और व्यवस्था से सदियों पहले। पौलुस रोमियों 4 में इसी पद पर पूरा भवन खड़ा करता है।

फिर इस्राएल लाल समुद्र के किनारे खड़ा है, आगे पानी और पीछे रथ। मूसा उन्हें नहीं कहता, "अपने भीतर शक्ति खोजो।" वह कहता है, स्थिर रहो और यहोवा का उद्धार देखो। यशायाह भविष्यद्वक्ता राजा आहाज़ से कहता है, यदि तुम विश्वास न करोगे तो निश्चय तुम स्थिर न रहोगे (यशायाह 7:9)। और हबक्कूक 2:4 वह वाक्य लिखता है जो बाद में नए नियम में तीन बार गूँजेगा: "परन्तु धर्मी जन अपने विश्वास से जीवित रहेगा।" यहाँ भी हमारा दृष्टिकोण दिखता है: राहाब का विश्वास धर्मशास्त्र में परिपक्व नहीं था, वह एक कनानी वेश्या थी जिसने सिर्फ इतना सुना था कि इस्राएल का परमेश्वर सच्चा है। छोटा विश्वास, विशाल परमेश्वर, और उसका पूरा घराना बच गया।

नया नियम इस धागे को यीशु मसीह के हाथ में सौंप देता है। सुसमाचारों में जब यीशु किसी की तारीफ करते हैं, तो लगभग हर बार विश्वास की करते हैं: रोमी सूबेदार, लहू बहने वाली स्त्री, कनानी माँ, अंधा भिखारी। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कोई भी धार्मिक विशेषज्ञ नहीं था। उन्होंने केवल यह जाना कि यीशु के पास सामर्थ्य है, और वे उसके पास आ गए। बीमार स्त्री ने पीछे से केवल वस्त्र का छोर छुआ, बहुत डरते-डरते, और चंगी हो गई। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं; मसीह नहीं काँप रहे थे।

इसके बाद पौलुस के पत्र इस विश्वास की व्याख्या करते हैं: मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, यीशु मसीह पर विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है। इब्रानियों 11 विश्वास के गवाहों की एक पूरी बारात प्रस्तुत करता है, और फिर अध्याय 12 उन सबकी आँखें एक ही दिशा में मोड़ देता है, "विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर।" यही चरम बिंदु है। विश्वास की शुरुआत भी वे करते हैं और पूर्णता भी वे ही देते हैं। और प्रकाशितवाक्य में, जब इतिहास अपने अंत पर पहुँचता है, संतों की पहचान यही रहती है कि वे "यीशु पर विश्वास रखते हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:12)। शुरू से आख़िर तक कहानी एक ही है: परमेश्वर बोलते हैं, और उनके लोग उन पर भरोसा करते हैं।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति: विश्वास सकारात्मक सोच है। आजकल यह सबसे आम गड़बड़ है। "जो बोलोगे वही होगा", "अपने शब्दों में शक्ति है", "मन में शंका न आने दो"। यह विश्वास को एक आध्यात्मिक तकनीक बना देता है जिसमें परमेश्वर एक मशीन हैं और हमारा विश्वास सिक्का। पर मरकुस 11:22 कहता है, "परमेश्वर पर विश्वास रखो", हमारे विश्वास पर नहीं। सकारात्मक सोच स्वयं को थपथपाती है; बाइबल का विश्वास स्वयं से हटकर मसीह की ओर देखता है। और सकारात्मक सोच के पास गतसमनी के लिए कोई जगह नहीं, जहाँ यीशु ने कहा, "मेरी इच्छा नहीं, पर तेरी इच्छा पूरी हो।" वह सबसे शुद्ध विश्वास था, और वह समर्पण में व्यक्त हुआ, न कि आत्म-घोषणा में।

दूसरी भ्रांति: विश्वास का मतलब है कभी संदेह न होना। अगर यह सच होता, तो बाइबल में लगभग कोई विश्वासी बचता ही नहीं। अब्राहम हँसा, सारा ने ताना मारा, गिदोन ने दो बार चिह्न माँगा, यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने जेल से पूछवाया, "आने वाला तू ही है क्या?" और थोमा ने कीलों के छेद देखने की शर्त रखी। यीशु ने इनमें से किसी को ठुकराया नहीं। सबसे ईमानदार प्रार्थना उस पिता की है जिसने कहा, "मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर" (मरकुस 9:24)। संदेह विश्वास का उल्टा नहीं है; उलटा तो कठोरता और मुँह फेर लेना है। संदेह के साथ भी जो मसीह के पास आता रहता है, वही विश्वास कर रहा है।

तीसरी भ्रांति: चमत्कार न होने का कारण हमेशा विश्वास की कमी है। यह भ्रांति सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाती है। बीमार व्यक्ति चंगा नहीं हुआ, और लोग उसे बताते हैं कि उसका विश्वास कमज़ोर था। पौलुस ने तीन बार अपने शरीर के काँटे के लिए प्रार्थना की और उत्तर मिला, "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है।" तीमुथियुस को अपने पेट की बीमारी थी। इब्रानियों 11 का अंत ही यह दिखाता है कि विश्वास से कुछ लोगों ने राज्य जीते, और उसी विश्वास से कुछ आरे से चीरे गए और तलवार से मारे गए। दोनों सूची में एक ही अध्याय में हैं। विश्वास परमेश्वर को हमारी शर्तों पर नहीं झुकाता; वह हमें उनकी भलाई पर टिका देता है, चाहे उत्तर हाँ हो, नहीं हो, या अभी नहीं।

चौथी भ्रांति: विश्वास केवल दिमागी सहमति है। कई लोग सोचते हैं कि सही सिद्धांत मान लेना ही विश्वास है। याकूब 2:17 इस पर ठंडा पानी डालता है: "वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" याकूब यह नहीं कह रहा कि उद्धार कामों से मिलता है; वह इफेसियों 2:8 का खंडन नहीं कर रहा। वह कह रहा है कि जीवित विश्वास के लक्षण होते हैं, जैसे जीवित शरीर की साँस होती है। भूखे भाई को "शांति से जा" कहकर विदा कर देना विश्वास नहीं है। उसी तरह इसका उलटा भी सही है: विश्वास बुद्धि के खिलाफ़ अंधी छलांग भी नहीं है। लूका अपना सुसमाचार "ठीक-ठीक जाँच" के बाद लिखता है, और पौलुस पुनरुत्थान के गवाहों की गिनती करता है। विश्वास प्रमाण के बिना नहीं, पूर्ण दृष्टि के बिना चलता है।

आज इसे जीवन में उतारना

2 कुरिन्थियों 5:7 का शब्द "चलना" हमें ज़मीन पर उतार देता है, क्योंकि चलना छोटे-छोटे कदमों से होता है। तो विश्वास व्यवहार में कैसा दिखता है?

जब पैसा कम पड़ता है। महीने के आख़िरी हफ़्ते में जब हिसाब नहीं बैठता, विश्वास इनकार नहीं करता कि समस्या है। विश्वास कैलकुलेटर तोड़ता नहीं, वह उस पिता के सामने खाता खोलता है जो आकाश के पक्षियों को खिलाते हैं। और यहीं व्यावहारिक चीज़ें बदलती हैं: विश्वास रिश्वत के प्रस्ताव को मना कर देता है, दान देना बंद नहीं करता, और उधार के आतंक में झूठ नहीं बोलता। क्योंकि जो मानता है कि उसका भविष्य परमेश्वर के हाथ में है, उसे आज बेईमानी से बीमा खरीदने की ज़रूरत नहीं।

जब निदान आता है। रिपोर्ट में वह शब्द जिससे आप डरते थे। विश्वास इस मौके पर दो काम करता है: वह पूरी ईमानदारी से चंगाई माँगता है, और साथ ही यह भी कहता है कि यदि उत्तर वैसा न हो, तो भी मैं आपके हाथ से नहीं छूटूँगा। यह दोहरापन नहीं, परिपक्वता है। रोमियों 10:17 के अनुसार, ऐसे दिनों में सबसे बुद्धिमानी यह है कि आप अपने डर को अपने भीतर मथते न रहें, बल्कि किसी से कहें कि मेरे लिए पवित्रशास्त्र पढ़ो। विश्वास सुनने से पुष्ट होता है, आत्मविश्लेषण से नहीं।

जब घर में तनाव है। पति-पत्नी के बीच वही पुराना झगड़ा, या बेटा जो अब चर्च नहीं आता। विश्वास यहाँ धैर्य का रूप लेता है, वह लंबी दौड़ की प्रार्थना जो सालों तक जारी रहती है। मोनिका ने अगस्तीन के लिए सत्रह साल प्रार्थना की। विश्वास पत्थर के मुँह पर तुरंत परिणाम की मांग नहीं रखता, वह हर सुबह वही नाम परमेश्वर के सामने रखता चला जाता है।

जब अकेलापन काटता है। शहर में कमरा, फ़ोन में सैकड़ों नंबर, और बात करने वाला कोई नहीं। विश्वास आपको भावना के भरोसे नहीं छोड़ता; यह आपको संगति में खींचता है, कलीसिया के लोगों के बीच, जहाँ वचन सुना जाता है और रोटी तोड़ी जाती है। परमेश्वर ने अपने वचन और अपनी देह, दोनों को विश्वास के पोषण का साधन बनाया है।

जब आज्ञाकारिता का छोटा कदम सामने है। क्षमा माँगने का वह फ़ोन, वह गवाही जो आप सहकर्मी को देना टाल रहे हैं, वह आदत जो छोड़नी है। याकूब 2:17 यहीं लागू होता है। विश्वास बड़े संकल्पों में नहीं, अगले एक कदम में साबित होता है।

विश्वास आम दिनों की छोटी आज्ञाकारिता में दिखाई देता है।

दर्पण

अब मैं सीधे आपसे बात करना चाहता हूँ। आप वर्षों से चर्च जा रहे होंगे, गीत गाते होंगे, और भीतर एक थकान लिए बैठे होंगे: "मेरा विश्वास कमज़ोर है।" मैं आपसे पूछता हूँ, आपने यह कैसे नापा? किसी और के जोश से तुलना करके? किसी प्रचारक के आत्मविश्वास से? या इसलिए कि आपकी आँखें प्रार्थना में गीली हो जाती हैं और आपके घुटने काँपते हैं?

सुनिए, यीशु ने कभी नहीं कहा कि पहाड़ हिलाने के लिए महान विश्वास चाहिए। उन्होंने राई के दाने का उदाहरण दिया, सबसे छोटा बीज। समस्या आपके विश्वास के आकार में नहीं है; समस्या यह है कि आप उसे लगातार देख रहे हैं, जिस तरह पतरस ने पानी पर चलते हुए अपने पैरों और लहरों को देखा और डूबने लगा। जब तक उसकी आँखें मसीह पर थीं, पानी उसे संभाल रहा था।

और अब एक कड़ी बात। कहीं आपका "विश्वास" वास्तव में नियंत्रण की इच्छा नहीं बन गया है? कई बार हम प्रार्थना में एक सौदा रखते हैं: मैं ठीक से विश्वास करूँगा, आप ठीक से काम कर देंगे। जब काम नहीं होता, तो हम चुपचाप कड़वे हो जाते हैं। यह विश्वास नहीं, बातचीत है। सच्चा विश्वास हथियार डाल देता है। वह कहता है, आप भले हैं, और मैं आपको समझ नहीं पा रहा, और फिर भी मैं यहीं आपके सामने रुका हूँ।

अपनी नौकरी के बारे में सोचिए, जहाँ ईमानदारी से आपको नुकसान होता है। अपने शरीर के बारे में, जो पहले जैसा नहीं है। अपने समय के बारे में, जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा घट रहा है। इन सबमें एक ही प्रश्न खड़ा है: आप किसे थामे हुए हैं, या ठीक कहूँ, कौन आपको थामे हुए है? आपकी पकड़ ढीली हो सकती है। उनकी नहीं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को विश्वास समझाना उतना कठिन नहीं जितना हम सोचते हैं, क्योंकि बच्चे रोज़ विश्वास करके ही जीते हैं। वे भरोसा करते हैं कि खाना मिलेगा, कि स्कूल बस उन्हें लेने आएगी, कि हाथ पकड़ने वाला उन्हें सड़क पार करा देगा।

सबसे साफ़ चित्र यही है: जब पिता बच्चे को सीढ़ी की ऊँचाई से कहते हैं, "कूद जाओ, मैं पकड़ लूँगा", तो बच्चा नीचे हवा नहीं देखता, वह पिता की बाँहें देखता है। बच्चे का कूदना उसकी ताकत नहीं दिखाता, पिता की भरोसेमंदी दिखाता है। ठीक ऐसे ही विश्वास परमेश्वर की बाँहों पर भरोसा है, जिन्होंने यीशु मसीह को हमारे लिए भेजा। और बच्चों से यह कहना ज़रूरी है कि उनका डर लगना गलत नहीं है; बहादुरी का मतलब डर का न होना नहीं, बल्कि डर के बीच पिता का हाथ पकड़ना है।

इस विषय पर विशेष रूप से तैयार व्याख्याएँ अलग-अलग उम्र के लिए उपलब्ध हैं। छोटे बच्चों (तीन से छह वर्ष) के लिए कहानी और चित्र के रूप में, जहाँ नूह के जहाज़ या अंधे व्यक्ति की चंगाई जैसी सरल घटनाओं से बात शुरू होती है। प्राथमिक उम्र (सात से बारह वर्ष) के लिए इब्रानियों 11 के नायकों के साथ, जहाँ प्रश्न-उत्तर के ज़रिए वे स्वयं खोजते हैं कि विश्वास क्या करता है। और किशोरों (बारह वर्ष से ऊपर) के लिए वे कठिन सवाल भी उठाए जाते हैं जो वे दोस्तों से सुनते हैं: क्या विश्वास बुद्धि के खिलाफ़ है, और संदेह के साथ क्या करें? माता-पिता के लिए सबसे बड़ी सलाह यही है, बच्चों को अपने संघर्ष छिपाकर न दिखाएँ; उन्हें दिखाएँ कि आप कठिन दिनों में भी परमेश्वर के पास लौटते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बाइबल के अनुसार विश्वास क्या है?

इब्रानियों 11:1 इसे इस तरह कहता है: "अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" यानी विश्वास परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर ऐसा ठोस भरोसा है कि वह जीवन का आधार बन जाता है, इसके बावजूद कि परिणाम अभी आँखों से दिखाई नहीं देते। यह अनुमान या मनोकामना नहीं, बल्कि परमेश्वर के चरित्र पर टिका निश्चय है। और बाइबल इस भरोसे को हमेशा एक व्यक्ति से जोड़ती है, यीशु मसीह, न कि किसी विचार या सिद्धांत से।

विश्वास और भरोसे में क्या अंतर है?

व्यवहार में इन दोनों को अलग करना कठिन है, क्योंकि बाइबल की मूल भाषाओं में एक ही शब्द दोनों अर्थ रखता है। फर्क शायद यह है कि विश्वास में किसी सत्य को स्वीकार करना भी शामिल है, जैसे यह मानना कि मसीह मरे और जी उठे, जबकि भरोसा उस सत्य पर अपना पूरा वजन डाल देना है। शैतान भी जानता है कि परमेश्वर हैं, पर वह उन पर अपना जीवन नहीं सौंपता। सच्चा विश्वास जानकारी से शुरू होकर समर्पण तक पहुँचता है।

विश्वास कैसे बढ़ता है?

रोमियों 10:17 सीधा उत्तर देता है: "सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है।" विश्वास अपने भीतर ज़ोर लगाने से नहीं, बाहर से आती परमेश्वर की आवाज़ सुनने से बढ़ता है। इसका मतलब है नियमित रूप से पवित्रशास्त्र पढ़ना, प्रचार सुनना, कलीसिया की संगति में बैठना, और परमेश्वर की पिछली विश्वासयोग्यता को याद करना। परीक्षाएँ भी विश्वास को पुष्ट करती हैं, क्योंकि वे हमारे सहारे एक-एक कर हटाती हैं जब तक केवल परमेश्वर बाकी रह जाते हैं।

क्या विश्वास परमेश्वर का दान है या मेरा निर्णय?

बाइबल दोनों बातें कहती है, और उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन नहीं बनाती। इफिसियों 2:8 स्पष्ट है: "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।" साथ ही सुसमाचार हमें विश्वास करने का असली न्योता देता है, और वह निर्णय हमारा होता है। सबसे अच्छा तरीका इसे इस तरह समझना है: पवित्र आत्मा हमारे मरे हुए हृदय को जीवित करते हैं, और जीवित हृदय स्वयं मसीह की ओर मुड़ जाता है।

क्या छोटा विश्वास भी काम करता है?

हाँ, और यही सुसमाचार की सुंदरता है। यीशु ने राई के दाने का उदाहरण दिया, जो सबसे छोटा बीज था, और कहा कि उतने विश्वास से पहाड़ हट सकता है। इसका कारण यह है कि सामर्थ्य विश्वास में नहीं, उसके विषय में है। जो पिता कहता है, "मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर" (मरकुस 9:24), उसका बेटा चंगा हो जाता है। परमेश्वर काँपते हाथ से पकड़े जाने पर भी वही परमेश्वर रहते हैं।

याकूब कहता है विश्वास कर्मों के बिना मरा है, तो क्या उद्धार कामों से है?

नहीं। याकूब 2:17 कहता है, "वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है", पर याकूब उद्धार का साधन नहीं, बल्कि विश्वास की जीवंतता की जाँच कर रहा है। पौलुस बताता है कि हम किस चीज़ से बचाए जाते हैं, और याकूब बताता है कि बचाया हुआ विश्वास कैसा दिखता है। दोनों अब्राहम का उदाहरण देते हैं और दोनों सही हैं: वह विश्वास से धर्मी ठहरा, और उसका विश्वास आज्ञाकारिता में प्रकट हुआ।

क्या संदेह होना पाप है?

संदेह अपने आप में पाप नहीं है, विशेषकर वह संदेह जो सवाल लेकर परमेश्वर के पास आता है। थोमा ने प्रमाण माँगा और यीशु ने उसे ठुकराया नहीं, बल्कि अपने हाथ दिखाए। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने जेल से सवाल भेजा और यीशु ने उसकी प्रशंसा की। खतरनाक वह कठोरता है जो पहले ही तय कर लेती है कि परमेश्वर पर भरोसा नहीं करेगी। ईमानदार संदेह को दबाइए नहीं; उसे प्रार्थना और वचन के सामने रखिए।

अगर मेरी प्रार्थना का उत्तर नहीं मिला तो क्या मेरा विश्वास कम था?

ज़रूरी नहीं, और अक्सर यह आरोप गलत होता है। पौलुस ने तीन बार अपने काँटे के लिए प्रार्थना की, और परमेश्वर ने उसे हटाया नहीं, बल्कि अनुग्रह दिया। इब्रानियों 11 में उन लोगों का भी नाम है जिन्होंने प्रतिज्ञाएँ अपने जीवनकाल में पूरी होती नहीं देखीं, फिर भी वे विश्वास के नायक कहलाते हैं। विश्वास परमेश्वर को हमारी योजना मानने के लिए बाध्य नहीं करता; वह हमें उनकी बुद्धि पर टिका देता है, तब भी जब उत्तर "नहीं" या "अभी नहीं" हो।

"विश्वास से चलना" रोज़ के जीवन में कैसा दिखता है?

2 कुरिन्थियों 5:7 कहता है, "क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं।" यह चाल बड़े नाटकीय कामों में नहीं, छोटे फ़ैसलों में दिखती है: ऑफ़िस में झूठा बहाना न बनाना, हिसाब सामने होने पर भी दान देना, उस व्यक्ति को क्षमा करना जिससे बदला लेना आसान होता, और परिणाम दिखने से पहले आज्ञा मानना। विश्वास से चलना आँखें बंद करना नहीं है; इसका अर्थ है परिस्थिति को पूरी तरह देखते हुए भी परमेश्वर के वचन को अंतिम शब्द मानना।

मरकुस 11:22 में "परमेश्वर पर विश्वास रखो" का असली मतलब क्या है?

यीशु ने यह वाक्य सूखे अंजीर के पेड़ और पहाड़ हटाने की बात के बीच कहा: "यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि परमेश्वर पर विश्वास रखो।" यहाँ ज़ोर विश्वास की मात्रा पर नहीं, उसके लक्ष्य पर है। चेलों को अपने भीतर आत्मशक्ति खोजने के लिए नहीं कहा गया, बल्कि पिता की सामर्थ्य पर निर्भर रहने के लिए। इसका अर्थ यह भी है कि प्रार्थना का उद्देश्य अपनी इच्छा थोपना नहीं, परमेश्वर के राज्य के साथ मिलकर काम करना है, जैसा अगले पद क्षमा की शर्त जोड़कर स्पष्ट करते हैं।

क्या विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना संभव है?

इब्रानियों 11:6 इसे बहुत सीधा कहता है: "और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।" इसका कारण साफ़ है। जो परमेश्वर पर भरोसा नहीं करता, वह अपने अच्छे काम भी अपने ही नाम के लिए करता है। परमेश्वर को खुशी उस हृदय से होती है जो उन्हें भला और सच्चा मानकर उनके पास आता है, खाली हाथ, पर पूरे भरोसे से।

विश्वास और अंधविश्वास में क्या फ़र्क है?

अंधविश्वास वस्तुओं, संख्याओं या अनुष्ठानों में शक्ति खोजता है और डर से चलता है; बाइबल का विश्वास एक जीवित व्यक्ति पर भरोसा करता है और प्रेम से चलता है। अंधविश्वास कहता है, यह काम करो नहीं तो अनहोनी होगी; विश्वास कहता है, मेरा पिता मुझे थामे हुए हैं। इसके अलावा बाइबल का विश्वास इतिहास पर आधारित है, उन गवाहों पर जिन्होंने जी उठे मसीह को देखा। इसीलिए पौलुस कहता है कि यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा विश्वास व्यर्थ है।

अंत में

अगर इस पूरे पृष्ठ से आप एक ही बात ले जाएँ, तो वह यह हो: अपनी नज़र अपने विश्वास से हटाकर उस पर लगाइए जिस पर आप विश्वास करते हैं। बाइबल हमें कहीं भी अपने भरोसे की मात्रा नापने के लिए नहीं बुलाती। वह बार-बार परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की ओर उँगली उठाती है, और कहती है, देखो, वे कभी नहीं बदलते। इसीलिए इब्रानियों का लेखक विश्वास के नायकों की लंबी सूची के बाद हमारी आँखें एक ही व्यक्ति पर टिकाता है, यीशु मसीह, जो विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले हैं। जिस विश्वास की शुरुआत उन्होंने की है, उसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी भी उनकी है।

आगे के लिए एक सुझाव: इस हफ़्ते इब्रानियों 11 को धीरे-धीरे पढ़िए, एक बैठक में नहीं, बल्कि रोज़ थोड़ा। हर नाम पर रुककर पूछिए, इस व्यक्ति ने परमेश्वर के बारे में क्या सच माना था? और फिर अपनी परिस्थिति के लिए वही प्रश्न पूछिए। साथ में रोमियों 4 और याकूब 2 को पास-पास रखकर पढ़िए, ताकि आप देख सकें कि अनुग्रह और आज्ञाकारिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

आपकी पकड़ ढीली हो सकती है; उनका हाथ मज़बूत है।

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

प्रार्थना संपादकीय पर यशायाह 37:27

पिता, जो ताकतें मुझे डराती हैं, वे तेरे सामने छत पर उगी घास जैसी हैं, जो पकने से पहले ही…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर प्रकाशितवाक्य 1:9

यूहन्ना अपने आप को "प्रेरित" नहीं, पहले "तुम्हारा भाई" कहता है, और फिर "क्लेश और राज्य और धीरज में तुम्हारा…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर आमोस 6:8

परमेश्वर को महल की दीवारों से नहीं, उस घमंड से घृणा है जो उन दीवारों के भीतर पलता है। आमोस…

प्रार्थना संपादकीय पर यशायाह 57:12

पिता, मैं अपने अच्छे कामों की गिनती करके खुद को सही ठहराना चाहता हूँ, पर तू जानता है कि उनमें…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर यशायाह 26:4

यहोवा पर सदा भरोसा रखो, क्योंकि यहोवा ही सनातन चट्टान है।" यह गीत तब गाया गया जब ऊँचे नगर धूल…

धन्यवाद संपादकीय पर उत्पत्ति 5:13

पिता, धन्यवाद कि आपने केनान को महललेल के जन्म के बाद आठ सौ चालीस वर्ष दिए और उसके और भी…

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