अंतिम समय के चिन्ह: यीशु के दूसरे आगमन की बाइबलीय भविष्यवाणियाँ
परिचय
रात के दो बजे किसी ने आपको एक वीडियो भेजा है। उसमें कोई घबराई हुई आवाज़ में बता रहा है कि आकाश में एक चिन्ह दिखा है, कि फ़लाँ युद्ध बाइबल की फ़लाँ भविष्यवाणी है, कि गिनती शुरू हो चुकी है। आप फ़ोन नीचे रखते हैं, पर नींद नहीं आती। दिल में एक अजीब सा मिश्रण है, थोड़ा डर, थोड़ी उत्सुकता, और एक सवाल जो कहीं गहरे में चुभता है, "क्या मैं तैयार हूँ?"
यह पन्ना उसी रात के लिए लिखा गया है। हम मिलकर देखेंगे कि यीशु मसीह ने स्वयं अंतिम समय के चिन्हों के बारे में क्या कहा, प्रेरितों ने उन्हें कैसे समझाया, और पूरी बाइबल में यह धारा उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे बहती है। आप यहाँ तारीखों का हिसाब नहीं पाएँगे, पर आपको कुछ बेहतर मिलेगा, एक स्थिर हृदय और एक जागती हुई आशा।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकांश लेख अंतिम समय के चिन्हों को एक घड़ी की तरह पढ़ते हैं, जैसे हर युद्ध और हर भूकंप उलटी गिनती का एक और अंक हो। यीशु ने उन्हें बिलकुल दूसरी तरह बताया। उन्होंने कहा, "ये सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी" (मत्ती 24:8), और यह शब्द प्रसव-पीड़ा का है। इसलिए इस पन्ने का दृष्टिकोण यही है: अंतिम समय के चिन्ह कैलेंडर नहीं, प्रसव-पीड़ा हैं। वे मृत्यु की गिनती नहीं, जन्म की सूचना हैं। दर्द असली है, पर उसकी दिशा नई सृष्टि की ओर है। जो इन चिन्हों को इस तरह पढ़ता है, वह न घबराता है, न लापरवाह होता है, बल्कि सिर उठाकर जीता है।
बाइबल अंतिम समय के चिन्हों के बारे में क्या कहती है?
सबसे लंबा और सीधा उत्तर स्वयं प्रभु यीशु के मुँह से आता है। जैतून पहाड़ पर उनके चेलों ने पूछा कि उनके आने और जगत के अंत का चिन्ह क्या होगा, और यीशु ने जो उत्तर दिया वह चौंकाने वाला है। उन्होंने पहले उन चीज़ों की सूची दी जो चिन्ह नहीं हैं, या यूँ कहिए, जो अंत का संकेत नहीं बल्कि अंत तक चलने वाली सामान्य स्थिति हैं।
मत्ती 24:6-14 में वे कहते हैं, "तुम लड़ाइयों और लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे; देखो घबरा न जाना क्योंकि इन बातों का हो जाना अवश्य है, परन्तु उस समय अन्त न होगा। क्योंकि जाति पर जाति और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह जगह अकाल पड़ेंगे, और भूईडोल होंगे। ये सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी। तब वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे, और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे। तब बहुतेरे ठोकर खाएंगे, और एक दूसरे को पकड़वाएंगे और एक दूसरे से बैर रखेंगे। और बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बहुतों को बहकाएंगे। और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा। परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा। और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा।"
ध्यान दीजिए यीशु किस बात पर ज़ोर देते हैं। युद्ध होंगे, पर "उस समय अन्त न होगा।" भूकंप और अकाल होंगे, पर वे "पीड़ाओं का आरम्भ" हैं। जो स्त्री प्रसव में है वह हर संकुचन को गिनकर यह नहीं कह सकती कि बच्चा ठीक कब जन्मेगा, पर वह यह ज़रूर जानती है कि जन्म आ रहा है। यही यीशु का लहजा है। वे हमें भयभीत नहीं करना चाहते, वे हमें भ्रमित होने से बचाना चाहते हैं।
फिर वे चार भीतरी चिन्हों की ओर मुड़ते हैं जो अख़बार में नहीं छपते: धोखा देने वाले झूठे भविष्यद्वक्ता, विश्वासियों पर सताव, आपसी विश्वासघात, और प्रेम का ठंडा पड़ जाना। यह आख़िरी बात सबसे भयानक है। अंत के दिनों का सबसे बड़ा संकट प्राकृतिक आपदा नहीं, ठंडा हुआ हृदय है। और इन सबके बीच एक चमकता हुआ वादा खड़ा है, राज्य का सुसमाचार सारे जगत में सुनाया जाएगा। पीड़ा के साथ-साथ मिशन बढ़ता है। अंधकार बढ़ता है, पर दीया बुझता नहीं।
पौलुस इसी चित्र को व्यक्तिगत और नैतिक स्तर पर खोलते हैं। 2 तीमुथियुस 3:1-5 में वे लिखते हैं, "पर यह जान रख, कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे। क्योंकि मनुष्य अपस्वार्थी, लोभी, डींगमार, अभिमानी, निन्दक, माता-पिता की आज्ञा टालने वाले, कृतघ्न, अपवित्र। और दयारिहत, क्षमारिहत, दोष लगानेवाले, असंयमी, कठोर, भले के बैरी। विश्वासघाती, ढीठ, घमण्डी, और परमेश्वर के नहीं वरन सुखविलास ही के चाहने वाले होंगे। वे भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उस की शक्ति को न मानेंगे; ऐसों से परे रहना।"
यह सूची राजनीति से नहीं, चरित्र से शुरू होती है। पौलुस ने युवा तीमुथियुस को यह नहीं कहा कि समाचार देखते रहो, बल्कि "ऐसों से परे रहना", यानी अपने जीवन की दिशा अलग रखो। और इस सूची का सबसे कड़वा वाक्य आख़िर में है, भक्ति का भेष तो होगा पर शक्ति नहीं। अंतिम दिनों का सबसे बड़ा ख़तरा नास्तिकता नहीं, खोखली धार्मिकता है।
लूका 21:25-28 में यीशु ब्रह्मांडीय स्तर पर बात करते हैं, "और सूरज और चान्द और तारों में चिन्ह दिखाई देंगे, और पृथ्वी पर, देश देश के लोगों को संकट होगा; क्योंकि वे समुद्र के गरजने और लहरों के कोलाहल से घबरा जाएंगे। और भय के कारण और संसार पर आनेवाली घटनाओं की बाट देखते देखते लोगों के जी में जी न रहेगा क्योंकि आकाश की शक्तियां हिलाई जाएंगी। तब वे मनुष्य के पुत्र को सामर्थ और बड़ी महिमा के साथ बादल पर आते देखेंगे। जब ये बातें होने लगें, तो सीधे होकर अपने सिर ऊपर उठाना; क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट होगा।"
पूरी दुनिया डर से झुक जाएगी, और विश्वासी सिर उठाएँगे। यही अंतर है। एक ही घटना कुछ लोगों के लिए अंत है और कुछ के लिए आरंभ। जब पीड़ा चरम पर होती है, तभी जन्म सबसे पास होता है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यह आशा यीशु के जैतून पहाड़ के उपदेश से शुरू नहीं होती। वह बाइबल के तीसरे अध्याय में ही बो दी जाती है। अदन में पाप के बाद परमेश्वर सर्प से कहते हैं, "और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा" (उत्पत्ति 3:15)। यहीं से इतिहास एक निर्णायक दिन की ओर बहने लगता है। और गौर कीजिए, यह पहला वादा भी एक जन्म का वादा है, स्त्री के वंश का। पीड़ा और जन्म, दोनों शुरू से साथ चलते हैं।
पुराने नियम के भविष्यद्वक्ता इसे "यहोवा का दिन" कहते हैं। योएल आकाश के चिन्हों की बात करते हैं, "सूर्य अन्धियारा होगा और चन्द्रमा रक्त सा हो जाएगा, यह यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहिले होगा" (योएल 2:31)। आमोस अपनी पीढ़ी को झकझोरते हैं, "हाय तुम पर जो यहोवा के दिन की अभिलाषा करते हो! यहोवा के दिन से तुम्हारा क्या लाभ होगा? वह तो उजियाला नहीं, अन्धियारा ही होगा" (आमोस 5:18)। यानी उस दिन की चाह रखना तब तक ख़तरनाक है जब तक आप उसके लिए तैयार न हों।
फिर दानिय्येल को एक दर्शन मिलता है जो सीधे यीशु के शब्दों में लौटता है, "मैं ने रात को स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था" (दानिय्येल 7:13)। जब यीशु स्वयं को "मनुष्य का पुत्र" कहते हैं और बादलों पर आने की बात करते हैं, तो वे इसी दृश्य को अपने ऊपर लागू कर रहे हैं। साम्राज्य आते-जाते रहते हैं, पर एक राज्य आ रहा है जो कभी नष्ट न होगा।
नया नियम इस धारा को दो हिस्सों में बाँटता है, और यहीं बहुत लोग उलझते हैं। मसीह का पहला आगमन दीनता में हुआ, दूसरा महिमा में होगा। इब्रानियों 9:28 इसे सुंदरता से कहता है, "वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ और जो लोग उस की बाट जोहते हैं, उन के उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप के दिखाई देगा।" पहली बार वे हमारे पाप उठाने आए, दूसरी बार वे हमें घर ले जाने आएँगे।
स्वर्गारोहण के समय स्वर्गदूतों ने चेलों से कहा, "हे गलीली पुरूषो, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों के काम 1:11)। यही वादा प्रकाशितवाक्य में अपने चरम पर पहुँचता है। प्रकाशितवाक्य 1:7 पूरी पुस्तक का शीर्षक-वाक्य जैसा है, "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है; और हर एक आंख उसे देखेगी, वरन जिन्हों ने उसे बेधा था, वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे। हां। आमीन।"
यह आगमन गुप्त नहीं होगा। "हर एक आंख उसे देखेगी।" कोई अफ़वाह नहीं, कोई विवाद नहीं। और जिन्होंने उन्हें बेधा था वे भी देखेंगे, यानी क्रूस पर चढ़ाया गया मेम्ना ही न्यायी होकर लौटेगा।
और यह सारी कहानी कहाँ जाकर ठहरती है? विनाश पर नहीं, नवीनीकरण पर। 2 पतरस 3:13 कहता है, "पर उस की प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नए आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिन में धामिर्कता वास करेगी।" उत्पत्ति में एक बाग़ था, प्रकाशितवाक्य में एक नगर है, और बीच में क्रूस खड़ा है। यही पूरी बाइबल का सूत्र है, और अंतिम समय के चिन्ह उसी सूत्र के आख़िरी संकुचन हैं।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति यह है कि अंतिम समय अभी शुरू नहीं हुए। बहुत से विश्वासी "अंतिम दिनों" को किसी दूर के भविष्य में रखते हैं, जबकि नया नियम उन्हें वर्तमान में रखता है। पिन्तेकुस्त के दिन पतरस ने योएल की भविष्यवाणी को उद्धृत करके कहा कि यह "अन्तिम दिनों में" होने वाली बात अभी पूरी हो रही है (प्रेरितों के काम 2:17)। इब्रानियों 1:2 कहता है कि परमेश्वर ने "इन दिनों के अन्त में हम से पुत्र के द्वारा बातें कीं।" यानी अंतिम समय मसीह के पहले आगमन से शुरू हुआ और उनके दूसरे आगमन पर पूरा होगा। हम दो हज़ार साल से प्रसव-पीड़ा के बीच जी रही कलीसिया हैं। यह समझ बहुत मुक्त करती है, क्योंकि तब हर बुरी ख़बर आपके विश्वास को हिलाती नहीं, वह केवल उस बात की पुष्टि करती है जो प्रभु पहले ही बता चुके हैं।
दूसरी भ्रांति है तारीख का हिसाब लगाना। हर पीढ़ी में कोई न कोई उठता है और गणित करके तारीख बता देता है, और हर बार वह तारीख बीत जाती है, और हर बार कुछ लोगों का विश्वास टूट जाता है। पर प्रभु का वचन इस पर बिलकुल स्पष्ट है, "उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, और न पुत्र, परन्तु केवल पिता" (मत्ती 24:36)। जब स्वयं पुत्र ने अपनी देह की सीमा में यह कहा, तो कोई यूट्यूब चैनल इसे कैसे जान सकता है? तारीख बताने वाला व्यक्ति भविष्यवाणी नहीं कर रहा, वह अवज्ञा कर रहा है। यीशु ने हमें दिन नहीं, दिशा दी है।
तीसरी भ्रांति है कि दूसरा आगमन केवल भय की बात है। कई लोग इस विषय को टालते हैं क्योंकि उन्होंने बचपन में जितने उपदेश सुने वे सब डर पर बने थे। पर पौलुस इसे "धन्य आशा" कहते हैं (तीतुस 2:13)। और 1 थिस्सलुनीकियों 4:16-17 का पूरा उद्देश्य शोक करने वालों को दिलासा देना था: "क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान स्वर्गदूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्वर की तुरही फूंकी जाएगी, और जो मसीह में मरे हैं, वे पहिले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उन के साथ बादलों पर उठा लिए जाएंगे, कि प्रभु से हवा में मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" यह पद कब्रिस्तान में पढ़ा जाने वाला पद है, डराने वाला नहीं। इसका अंत किसी विपत्ति पर नहीं, "सदा प्रभु के साथ" पर होता है।
चौथी भ्रांति है कि अंत की प्रतीक्षा का अर्थ है दुनिया से हाथ खींच लेना। थिस्सलुनीके में कुछ लोगों ने काम छोड़ दिया था क्योंकि उन्हें लगा प्रभु आने ही वाले हैं, और पौलुस ने उन्हें कड़ी हिदायत दी कि चुपचाप काम करके अपनी रोटी खाएँ। इसी तरह 2 पतरस 3:10 का उद्धरण अक्सर आधा पढ़ा जाता है, "परन्तु प्रभु का दिन चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़े शब्द के साथ जाता रहेगा, और तत्व बहुत ही तप्त होकर पिघल जाएंगे, और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएंगे।" पर पतरस इसके तुरंत बाद पूछते हैं कि जब सब कुछ ऐसा है तो हमें कैसा होना चाहिए, और उत्तर देते हैं, पवित्र चालचलन और भक्ति में। यानी भविष्य का ज्ञान वर्तमान की पवित्रता के लिए दिया गया है। जो जन्म की प्रतीक्षा करता है वह पालना तैयार करता है, हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठता।
आज इसे जीवन में उतारना
तो सोमवार की सुबह इस सब का क्या अर्थ है?
सबसे पहले, समाचार को नई आँखों से देखिए। जब कहीं युद्ध छिड़ता है, जब कोई महामारी आती है, जब बाज़ार गिरता है, तो दो प्रतिक्रियाएँ संभव हैं। एक है डर की सर्पिल, जिसमें आप घंटों स्क्रॉल करते हैं और नींद खो देते हैं। दूसरी है वह जो यीशु ने सिखाई, "देखो घबरा न जाना।" मसीही होने का अर्थ यह नहीं कि दर्द आपको छूता नहीं, बल्कि यह कि आप दर्द को सही नाम देते हैं। यह प्रसव-पीड़ा है। इसका अंत मृत्यु नहीं, जीवन है। इसलिए अगली बार जब कोई भयावह शीर्षक दिखे, फ़ोन नीचे रखिए और लूका 21:28 को ज़ोर से पढ़िए, "सीधे होकर अपने सिर ऊपर उठाना।"
दूसरा, अपने प्रेम की जाँच कीजिए, अपने कैलेंडर की नहीं। यीशु ने कहा कि अधर्म बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठंडा हो जाएगा। यह चिन्ह किसी वेधशाला में नहीं, आपके घर में दिखता है। क्या आपने उस भाई को माफ़ किया जिसने आपको ठगा? क्या आपकी पत्नी या पति के प्रति आपकी कोमलता वैसी ही है? क्या आप अब भी उस पड़ोसी की परवाह करते हैं जिसका नाम आप जानते तक नहीं? ठंडा प्रेम धीरे-धीरे आता है, जैसे कमरा शाम को ठंडा होता है और आपको पता ही नहीं चलता। अंतिम समय में जागते रहने का सबसे व्यावहारिक तरीक़ा यही है कि अपने हृदय की गर्मी की रक्षा करें।
तीसरा, पैसे और समय के साथ अपने रिश्ते को ढीला कीजिए। यदि "पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएंगे", तो जिस चीज़ को आप कसकर पकड़े हुए हैं उसकी अंतिम क़ीमत क्या है? यह वैराग्य का बुलावा नहीं है, बल्कि खुले हाथों का बुलावा है। जो लोग सचमुच अनंतकाल में विश्वास करते हैं वे इस जीवन में सबसे उदार लोग होते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनका असली ख़ज़ाना कहीं और सुरक्षित है।
चौथा, कल का काम आज कीजिए। किसी से क्षमा माँगनी है? आज माँगिए। किसी को मसीह के बारे में बताना है? आज बताइए। मत्ती 24:14 कहता है कि सुसमाचार सब जातियों तक पहुँचेगा और तब अंत आएगा। इसका अर्थ है कि आपकी गवाही, आपका दान, आपकी प्रार्थना इस महान घड़ी का हिस्सा है। आप दर्शक नहीं हैं, आप उस जन्म में दाई की भूमिका में हैं।
और अंत में, मृत्यु के सामने अलग तरह से खड़े होइए। जब आप किसी विश्वासी की क़ब्र पर खड़े हों, तो 1 थिस्सलुनीकियों 4:16-17 आपके होंठों पर हो। दुख होगा, आँसू होंगे, पर वह दुख निराशा नहीं होगी। तुरही बजेगी, और जो मसीह में सो गए हैं वे पहले जी उठेंगे।
दर्पण
अब मैं सीधे आपसे बात करना चाहता हूँ।
आप शायद इस लेख को इसलिए खोल कर बैठे हैं क्योंकि आप जानना चाहते हैं कि कितना समय बचा है। पर सच बताइए, अगर आपको पता चल जाए कि प्रभु अगले मंगलवार आ रहे हैं, तो आप इस हफ़्ते क्या बदलेंगे? वह सूची बना लीजिए, क्योंकि यीशु का यही मुद्दा है। वे कहते हैं, "इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (मत्ती 24:44)। जो चीज़ें आप उस सूची में लिखेंगे, वे ठीक वही चीज़ें हैं जिन्हें आप आज टाल रहे हैं।
शायद आपके दफ़्तर में कोई समझौता है जिसे आपने "व्यावहारिकता" कहकर स्वीकार कर लिया है। शायद आपके फ़ोन में कुछ है जिसे आप किसी को दिखाना नहीं चाहेंगे। शायद घर में कोई ऐसा है जिससे आप बरसों से ठीक से बोले नहीं। शायद आपका बटुआ आपके विश्वास से ज़्यादा सच बोलता है। पौलुस की सूची में सबसे डरावना वाक्य याद है? "वे भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उस की शक्ति को न मानेंगे।" रविवार को हाथ उठाना आसान है। सोमवार को ईमानदार रहना कठिन है।
पर यहीं पर मुझे रुककर कुछ और कहना है, क्योंकि यह पन्ना आपको शर्मिंदा करने के लिए नहीं लिखा गया। जो वापस आ रहे हैं, वे वही हैं जो पहले आपके लिए मरे। जो आपका न्याय करेंगे, वे वही हैं जिनके हाथों में आज भी कीलों के निशान हैं। "जिन्हों ने उसे बेधा था, वे भी उसे देखेंगे।" यह डर की बात है यदि आप उनसे दूर हैं, और सबसे बड़ी सांत्वना यदि आप उनके हैं। आपका न्यायी ही आपका उद्धारकर्ता है।
तो अपना सिर उठाइए। और आज ही, इस हफ़्ते ही, वह एक काम कीजिए जिसे आप उस सूची में लिख चुके हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों से अंतिम समय की बात करते हुए माता-पिता अक्सर घबरा जाते हैं, क्योंकि डर है कि कहीं बच्चा रात को सो न पाए। पर सच यह है कि बच्चे यह विषय बड़ों से बेहतर समझ सकते हैं, बशर्ते हम इसे सही सिरे से पकड़ें।
सबसे सरल तरीक़ा वादे का है। बच्चे इंतज़ार समझते हैं। जब पापा कहीं दूर काम पर जाते हैं और कहते हैं "मैं ज़रूर लौटूँगा", तो बच्चा दरवाज़े की घंटी सुनता रहता है। यीशु ने भी ठीक यही कहा, "और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा, कि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:3)। बच्चे को बताइए कि यीशु दूर नहीं गए, वे तैयारी करने गए हैं, और वे लौटेंगे। दूसरा चित्र जन्म का है, जो बड़े बच्चों के लिए बहुत असरदार है। जब घर में नया बच्चा आने वाला होता है तो माँ को दर्द होता है, पर वह दर्द किसी बुरी बात की नहीं, किसी सुंदर बात की निशानी है।
जो बात हमें टालनी चाहिए वह है डरावने चित्रों और अटकलों से भरी बातें। बच्चों को कैलेंडर नहीं, भरोसा चाहिए। उन्हें यह जानना चाहिए कि दुनिया की सबसे बुरी ख़बर के ऊपर भी यीशु राजा हैं।
हमारी वेबसाइट पर इस विषय की अलग-अलग उम्र के अनुसार व्याख्याएँ भी उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह वर्ष), स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए (सात से बारह वर्ष) और किशोरों के लिए (बारह वर्ष से ऊपर)। हर उम्र के लिए भाषा और गहराई अलग है, ताकि आप अपने बच्चे के साथ बैठकर बिना डर के, आशा के साथ यह बातचीत कर सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अंतिम समय के चिन्ह असल में क्या हैं?
अंतिम समय के चिन्ह वे घटनाएँ और स्थितियाँ हैं जिनके बारे में यीशु मसीह और प्रेरितों ने बताया कि वे मसीह के दूसरे आगमन से पहले पूरी अवधि में दिखाई देंगी। इनमें युद्ध, अकाल, भूकंप, झूठे भविष्यद्वक्ता, विश्वासियों पर सताव, आपसी विश्वासघात, प्रेम का ठंडा पड़ना और सुसमाचार का सब जातियों तक फैलना शामिल है। यीशु ने इन्हें "पीड़ाओं का आरम्भ" कहा, यानी ये उलटी गिनती के अंक नहीं बल्कि प्रसव-पीड़ा जैसी लहरें हैं जो बताती हैं कि नई सृष्टि आ रही है।
क्या हम अभी अंतिम समय में जी रहे हैं?
बाइबल के अनुसार हाँ, और यह बात दो हज़ार साल से सच है। पिन्तेकुस्त के दिन पतरस ने पवित्र आत्मा के उंडेले जाने को "अन्तिम दिनों" की पूर्ति बताया, और इब्रानियों 1:2 कहता है कि परमेश्वर ने इन दिनों के अंत में पुत्र के द्वारा बात की। यानी अंतिम समय मसीह के पहले आगमन से शुरू हुआ और उनके लौटने पर समाप्त होगा। इसलिए सवाल यह नहीं कि क्या हम अंतिम दिनों में हैं, बल्कि यह कि क्या हम उन दिनों में जागते हुए जी रहे हैं।
क्या बाइबल यीशु के आने की तारीख बताती है?
बिलकुल नहीं, और वह इस बात पर इतनी स्पष्ट है कि इससे स्पष्ट होना संभव नहीं। यीशु ने कहा, "उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, और न पुत्र, परन्तु केवल पिता" (मत्ती 24:36)। पतरस भी कहते हैं कि प्रभु का दिन चोर के समान आएगा, यानी अघोषित। जो कोई गणनाओं से तारीख निकालने का दावा करता है, वह मसीह के स्पष्ट शब्दों के विरुद्ध जा रहा है। परमेश्वर ने हमें दिन नहीं दिया, उन्होंने हमें तैयारी का बुलावा दिया।
क्या युद्ध, भूकंप और महामारियाँ अंत के पक्के संकेत हैं?
ये चिन्ह ज़रूर हैं, पर उलटी गिनती के नहीं। यीशु ने युद्धों की चर्चा के बाद तुरंत कहा, "परन्तु उस समय अन्त न होगा" (मत्ती 24:6)। इतिहास में हर सदी ने युद्ध, अकाल और भूकंप देखे हैं, और हर सदी में लोगों ने सोचा कि अंत आ गया। इनका उद्देश्य तारीख बताना नहीं, बल्कि हमें याद दिलाना है कि यह टूटी हुई सृष्टि अपने छुटकारे के लिए कराह रही है। इसलिए ऐसी घटनाओं का सही जवाब घबराहट नहीं, प्रार्थना, सेवा और दृढ़ विश्वास है।
उठा लिए जाने का क्या अर्थ है?
1 थिस्सलुनीकियों 4:17 में लिखा है कि जीवित विश्वासी "बादलों पर उठा लिए जाएंगे, कि प्रभु से हवा में मिलें।" यह चित्र उस समय की एक प्रथा से लिया गया है जब नगर के लोग आते हुए राजा का स्वागत करने बाहर निकलते थे और उन्हें आदर के साथ नगर में ले आते थे। पौलुस का ज़ोर इस पर नहीं है कि हम कहाँ जाएँगे, बल्कि इस पर कि "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" मसीही इसके समय को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं, पर वादा एक ही है, अनंत संगति।
महाक्लेश क्या है और क्या कलीसिया उससे गुज़रेगी?
महाक्लेश उस विशेष कष्ट की अवधि है जिसका ज़िक्र यीशु मत्ती 24 में और प्रकाशितवाक्य विस्तार से करती है। सच्चे विश्वासियों के बीच इस पर मतभेद है कि कलीसिया उससे पहले उठा ली जाएगी या उसमें से होकर गुज़रेगी, और यह मतभेद उद्धार का प्रश्न नहीं है। जो बात निर्विवाद है वह यह कि यीशु ने अपने चेलों को क्लेश का वादा किया और साथ ही यह भी कि जो अंत तक धीरज धरे रहेगा उसका उद्धार होगा। इसलिए तैयारी बहस से नहीं, धीरज और पवित्रता से होती है।
मसीह-विरोधी कौन है और क्या उसे पहचाना जा सकता है?
नया नियम एक अंतिम मसीह-विरोधी की बात करता है जो धोखे और शक्ति के साथ उठेगा, पर 1 यूहन्ना यह भी कहता है कि पहले से ही बहुत से मसीह-विरोधी आ चुके हैं। बाइबल का ज़ोर किसी नाम की पहचान पर नहीं, बल्कि उस आत्मा की पहचान पर है जो यीशु मसीह के देहधारी होने और उनके प्रभुत्व को नकारती है। इतिहास में अनगिनत बार लोगों ने ग़लत व्यक्तियों को मसीह-विरोधी घोषित किया और शर्मिंदा हुए। सुरक्षित रहने का तरीक़ा अटकल नहीं, वचन की गहरी जानकारी है।
प्रभु का दिन और यीशु के दूसरे आगमन में क्या अंतर है?
"प्रभु का दिन" पुराने नियम का पद है जो परमेश्वर के निर्णायक हस्तक्षेप, न्याय और छुटकारे के समय को दर्शाता है, और नया नियम इसे मसीह के लौटने से जोड़ देता है। 2 पतरस 3:10 कहता है, "परन्तु प्रभु का दिन चोर के समान आ जाएगा", और वहीं सृष्टि के शुद्धिकरण की बात होती है। इसलिए दोनों अलग घटनाएँ नहीं, एक ही महान घटना के दो पहलू हैं। दूसरा आगमन उस व्यक्ति पर ध्यान देता है जो आ रहे हैं, और प्रभु का दिन उस कार्य पर जो वे करेंगे।
क्या यीशु के लौटने से पहले सारे जगत में सुसमाचार का प्रचार ज़रूरी है?
यीशु ने साफ़ कहा, "और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा" (मत्ती 24:14)। यह वादा भी है और ज़िम्मेदारी भी। यह हमें यह गिनने का अधिकार नहीं देता कि कितनी जातियाँ बाक़ी हैं, पर यह हमें बताता है कि मिशन का काम अंत की कहानी के केंद्र में है। हर प्रार्थना, हर दान और हर साहसी गवाही उस दिन की ओर बढ़ने वाला क़दम है, इसलिए प्रतीक्षा कभी निष्क्रिय नहीं होनी चाहिए।
अंतिम समय के चिन्हों के बारे में सोचकर मुझे डर लगता है, मैं क्या करूँ?
आपका डर स्वाभाविक है, पर वह इन पदों का उद्देश्य नहीं है। लूका 21:28 में यीशु कहते हैं, "जब ये बातें होने लगें, तो सीधे होकर अपने सिर ऊपर उठाना; क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट होगा।" जो व्यक्ति मसीह में है, उसके लिए यह दिन सज़ा का नहीं, घर लौटने का दिन है। यदि डर बना रहे, तो अटकलों वाली सामग्री देखना कम कीजिए और सीधे वचन में समय बिताइए, प्रार्थना कीजिए, और अपने पासबान या किसी परिपक्व विश्वासी से खुलकर बात कीजिए। भय शैतान का औज़ार है, आशा परमेश्वर की देन।
क्या इस्राएल का दोबारा राष्ट्र बनना भविष्यवाणी की पूर्ति है?
मसीही इस पर एकमत नहीं हैं। कुछ इसे भविष्यवाणी की स्पष्ट पूर्ति मानते हैं, तो कुछ मानते हैं कि नया नियम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को मसीह और उनके लोगों में पूरा होते देखता है। दोनों पक्षों के पास गंभीर बाइबलीय तर्क हैं, और यह ऐसा प्रश्न नहीं जिस पर संगति तोड़ी जाए। जो निश्चित है वह यह कि परमेश्वर अपने वादों के प्रति विश्वासयोग्य हैं और वे यहूदी और अन्यजाति दोनों को मसीह में एक करना चाहते हैं। इसलिए राजनीति के विश्लेषण से ज़्यादा ज़रूरी है प्रार्थना और सुसमाचार।
क्या भविष्यवाणी की व्याख्या करने वाले वीडियो और शिक्षकों पर भरोसा करना चाहिए?
सावधानी बरतिए। यीशु ने चेतावनी दी थी कि "बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बहुतों को बहकाएंगे" (मत्ती 24:11)। एक अच्छा शिक्षक आपको वचन में ले जाता है, विनम्रता से बोलता है, अनिश्चित बातों को अनिश्चित कहता है और आपके जीवन में पवित्रता, प्रेम और मिशन जगाता है। एक ख़तरनाक शिक्षक सनसनी बेचता है, तारीखें बताता है, डर से आपका ध्यान खींचता है और अक्सर पैसे या प्रसिद्धि की ओर ले जाता है। हर बात को खुली बाइबल के साथ जाँचिए और किसी स्थानीय कलीसिया की जवाबदेही में रहिए।
अंत में
अगर इस पूरे पन्ने से आपको केवल एक बात याद रहे, तो यह हो कि यीशु ने अंतिम समय के चिन्हों को घड़ी की सुइयाँ नहीं, प्रसव की पीड़ाएँ कहा। पीड़ा असली है। युद्ध असली हैं, धोखा असली है, ठंडे पड़ते हृदय असली हैं, और वह क़ब्र भी असली है जिसके सामने आप कभी खड़े हुए हैं। पर इन सबकी दिशा विनाश नहीं, जन्म है। नया आकाश और नई पृथ्वी आ रही है, "जिन में धामिर्कता वास करेगी।"
इसलिए इस विषय को डर के साथ मत पढ़िए, और जिज्ञासा के खेल के तौर पर तो बिलकुल नहीं। इसे उस दुल्हन की तरह पढ़िए जो दूल्हे की राह देख रही है। मत्ती 24 और 25 पूरा पढ़िए, फिर 1 थिस्सलुनीकियों 4 और 5, फिर 2 पतरस 3, और अंत में प्रकाशितवाक्य 21 और 22। इन्हें प्रार्थना के साथ पढ़िए, अकेले नहीं बल्कि अपने परिवार या छोटे समूह के साथ।
और जब पढ़ चुकें, तो बाइबल के आख़िरी शब्दों में से एक को अपनी प्रार्थना बना लीजिए, "हे प्रभु यीशु आ!" यही उस हृदय की आवाज़ है जो सिर उठाकर जी रहा है।
