बाइबल के अनुसार विवाह: पति-पत्नी का रिश्ता कैसा होना चाहिए
परिचय
शादी के कार्ड पर उत्पत्ति 2:24 छपा था। मंडप सजा था, रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे, और दोनों ने परमेश्वर के सामने वचन दिया कि "जीवन भर साथ रहेंगे।" सात साल बाद वही दो लोग एक ही कमरे में बैठे हैं, एक-दूसरे से बात किए बिना। बिजली का बिल, सास का ताना, बच्चों की फीस, और वह पुरानी बात जिसे कोई माफ़ नहीं कर पाया। कोई तीसरा व्यक्ति नहीं आया उनके बीच; बस ख़ामोशी आ गई।
ऐसे घरों में सबसे ज़्यादा ज़रूरत नियमों की नहीं, बल्कि यह समझने की होती है कि परमेश्वर ने विवाह बनाया ही क्यों। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि बाइबल विवाह को क्या कहती है, यह विषय उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे चलता है, कौन-सी ग़लतफ़हमियाँ घरों को तोड़ती हैं, और कल सुबह से आप क्या अलग कर सकते हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लेख विवाह को "दो लोगों का रिश्ता" मानकर सलाह देते हैं। यह पृष्ठ एक अलग जगह से शुरू होता है: बाइबल में विवाह कोई अनुबंध नहीं, बल्कि एक वाचा है, और हर वाचा अपने से बड़ी किसी चीज़ की ओर इशारा करती है। पति-पत्नी का रिश्ता परमेश्वर का बनाया हुआ एक जीवित चिह्न है, जिसमें दुनिया को मसीह और कलीसिया का प्रेम दिखाई देना चाहिए। इसका मतलब यह है कि विवाह की मरम्मत पहले नियमों से नहीं, क्रूस से होती है। जहाँ अनुबंध पूछता है "मुझे क्या मिल रहा है", वहाँ वाचा पूछती है "मैं क्या दे सकता हूँ।" यही फ़र्क़ पूरे पृष्ठ में बार-बार लौटेगा।
बाइबल विवाह के बारे में क्या कहती है?
बाइबल की पहली किताब के दूसरे ही अध्याय में, जब सब कुछ "बहुत अच्छा" था, परमेश्वर ने एक चीज़ को "अच्छा नहीं" कहा: "फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उससे मेल खाए" (उत्पत्ति 2:18)। ध्यान दीजिए, यह पाप के बाद की बात नहीं है। अकेलापन कोई सज़ा नहीं था, वह मनुष्य की बनावट में छिपी एक पुकार थी। परमेश्वर ने उस पुकार का उत्तर एक साथी देकर दिया, और इस तरह मानव इतिहास की पहली संस्था बनी, कोई सरकार या मंदिर नहीं, बल्कि एक घर।
इसी अध्याय में वह वचन आता है जिसे यीशु और पौलुस दोनों ने बाद में दोहराया: "इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बनें रहेंगे" (उत्पत्ति 2:24)। इस एक वाक्य में विवाह की पूरी बनावट है। छोड़ना: एक नया घर बनता है, पुराने घर का आदर बना रहता है पर पहली वफ़ादारी बदल जाती है। भारतीय संदर्भ में यह सबसे कठिन और सबसे ज़रूरी शब्द है, क्योंकि यहाँ विवाह दो परिवारों का मेल माना जाता है, और अक्सर पति-पत्नी के बीच फ़ैसले कोई तीसरा करता है। मिला रहना: मूल भाषा में यह शब्द गोंद की तरह चिपके रहने का भाव रखता है, यानी एक निर्णय जो रोज़ दोहराया जाता है। एक तन होना: यह केवल शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि पूरे जीवन का एक हो जाना है, पैसा, समय, योजनाएँ, दुख, इज़्ज़त, सब साझा।
पुराने नियम का ज्ञान-साहित्य इस रिश्ते को एक वरदान की तरह देखता है: "जिसने स्त्री ब्याह ली, उसने उत्तम पदार्थ पाया, और यहोवा का अनुग्रह उस पर हुआ है" (नीतिवचन 18:22)। यहाँ पत्नी को "पाया हुआ उत्तम पदार्थ" कहा गया है, यानी कोई अधिकार नहीं जिसे जीता गया हो, बल्कि एक अनुग्रह जो दिया गया हो। जो पति अपनी पत्नी को परमेश्वर का उपहार मानता है, वह उसके साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकता जैसा मालिक नौकर के साथ करता है।
नए नियम में यीशु ने जब तलाक के बारे में सवाल सुना, तो उन्होंने नियम-पुस्तक नहीं खोली, बल्कि सृष्टि की शुरुआत की ओर लौटकर कहा: "इसलिये वे अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे" (मत्ती 19:6)। यह वाक्य विवाह को इंसानी समझौते से उठाकर परमेश्वर के काम के स्तर पर रख देता है। जोड़ने वाले वे हैं; इसलिए तोड़ने का अधिकार हमारा नहीं।
इसी नींव पर नया नियम दोनों साथियों को अलग-अलग बुलाहट देता है। पति से कहा गया: "हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आपको उसके लिये दे दिया" (इफिसियों 5:25)। यहाँ प्रेम का नाप भावना नहीं, क्रूस है। और पतरस जोड़ता है: "वैसे ही हे पतियो, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिससे तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ" (1 पतरस 3:7)। "वारिस" शब्द बराबरी की घोषणा है, और चेतावनी बहुत गंभीर है: जो आदमी घर में अपनी पत्नी का आदर नहीं करता, उसकी प्रार्थना ऊपर नहीं पहुँचती।
अंत में, विवाह की सीमा भी पवित्र है: "विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निष्कलंक रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा" (इब्रानियों 13:4)। बाइबल शरीर को गंदा नहीं कहती; वह शरीर को इतना पवित्र मानती है कि उसे वाचा के भीतर सुरक्षित रखती है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
विवाह का धागा पवित्रशास्त्र के पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने तक बुना हुआ है। उत्पत्ति में परमेश्वर स्त्री और पुरुष को अपने स्वरूप में रचते हैं: "नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की" (उत्पत्ति 1:27)। दोनों मिलकर परमेश्वर की छवि दिखाते हैं। फिर पाप आता है, और सबसे पहले जो टूटता है वह रिश्ता ही है: आदम हव्वा पर दोष डालता है, और तब से हर घर में वही आवाज़ गूँजती है, "यह मेरी नहीं, उसकी ग़लती है।"
पुराने नियम का इतिहास विवाह की तस्वीर को साफ़ और धुंधला, दोनों तरह से दिखाता है। अब्राहम, याकूब, दाऊद और सुलैमान की कहानियों में बहुविवाह है, पर बाइबल उसे कभी आशीष के रूप में पेश नहीं करती; हर ऐसी कहानी जलन, साज़िश और टूटे बच्चों पर जाकर ख़त्म होती है। बाइबल जो वर्णन करती है, वह हमेशा वह नहीं जिसे वह ठीक ठहराती है। वहीं दूसरी ओर रूत और बोअज़ की वफ़ादारी, और सभोपदेशक की वह पंक्ति कि दो का एक से भला है, विवाह की सुंदरता दिखाते हैं।
सबसे गहरी बात यह है कि परमेश्वर अपने और अपनी प्रजा के रिश्ते को समझाने के लिए विवाह की भाषा चुनते हैं। सीनै पर्वत पर बनी वाचा को भविष्यद्वक्ता एक ब्याह की तरह देखते हैं। यशायाह इस्राएल से कहते हैं कि उनका रचनेवाला ही उनका पति है। होशे को परमेश्वर एक बेवफ़ा स्त्री से विवाह करने को कहते हैं, ताकि पूरा देश देख सके कि जब उसकी प्रजा मूरतों के पीछे भागती है तो परमेश्वर के हृदय पर क्या बीतती है। मलाकी 2 में परमेश्वर उन पुरुषों को डाँटते हैं जो अपनी जवानी की पत्नी से विश्वासघात कर रहे थे, और याद दिलाते हैं कि वे स्वयं उस वाचा के साक्षी थे। यानी हर विवाह में एक तीसरा मौजूद है, और वह चुप नहीं है।
हर विवाह के पीछे एक साक्षी खड़ा है, परमेश्वर स्वयं।
नया नियम इस धागे को मसीह तक ले आता है। यीशु ने अपना पहला चिह्न काना के एक विवाह में दिखाया, जहाँ दाखरस ख़त्म हो गया था और उन्होंने पानी को उत्तम दाखरस में बदल दिया। जहाँ आनंद चुक जाता है, वहाँ वे नया आनंद भरते हैं। उन्होंने अपने आपको दूल्हा कहा और स्वर्ग के राज्य को एक विवाह-भोज की तरह वर्णित किया। और पौलुस उत्पत्ति 2:24 को उद्धृत करने के बाद वह बात कहता है जो इस पूरे पृष्ठ की जड़ है: "यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ" (इफिसियों 5:32)। यानी परमेश्वर ने विवाह पहले इसलिए बनाया कि वह सुसमाचार की एक जीती-जागती तस्वीर बने। आपका घर एक मंच है, जिस पर रोज़ यह नाटक खेला जाता है कि मसीह अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम करते हैं।
और कहानी का अंत भी एक शादी ही है: "मेम्ने का विवाह आ पहुँचा, और उसकी पत्नी ने अपने आपको तैयार कर लिया है" (प्रकाशितवाक्य 19:7)। बाइबल एक बाग़ में एक विवाह से शुरू होती है और एक नगर में एक विवाह-भोज पर ख़त्म होती है। बीच का सारा इतिहास इसी प्रेम की कहानी है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: "अधीन रहना" का मतलब है कि पति मालिक है। इफिसियों 5 को अक्सर आधे से पढ़ा जाता है। उस पूरे हिस्से की शुरुआत इस आज्ञा से होती है कि मसीह के भय से एक-दूसरे के अधीन रहो, और फिर पत्नी से तीन पंक्तियाँ कही जाती हैं जबकि पति से नौ। पति को आदेश मिलता है हुकूमत चलाने का नहीं, बल्कि अपने आपको दे देने का: "जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आपको उसके लिये दे दिया" (इफिसियों 5:25)। मसीह ने कलीसिया पर चिल्लाकर नहीं, अपना खून देकर अगुवाई की। जो पति इस पद से अपने अधिकार साबित करता है, उसने उसी पद को तोड़ दिया है। और 1 पतरस 3:7 साफ़ कहता है कि पति-पत्नी "जीवन के वरदान के वारिस" हैं, यानी परमेश्वर के सामने बराबर। भूमिकाएँ अलग हैं, मूल्य नहीं।
दूसरी भ्रांति: विवाह मुझे ख़ुश करने के लिए है। आज की सोच कहती है कि कहीं कोई "सही इंसान" है, और जब मिल जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा; अगर नहीं मिला तो शायद ग़लत इंसान से शादी हो गई। बाइबल इस तलाश को ही पलट देती है। वाचा का सवाल यह नहीं है कि मुझे सही व्यक्ति मिला या नहीं, बल्कि यह कि क्या मैं सही व्यक्ति बन रहा हूँ। ख़ुशी विवाह का सुंदर फल है, पर उसका उद्देश्य बड़ा है: एक-दूसरे को मसीह के समान बनते देखना और दुनिया को उनका प्रेम दिखाना। वाचा वह है जो भावना के ख़त्म होने पर भी खड़ी रहती है।
तीसरी भ्रांति: अविवाहित व्यक्ति अधूरा है। हमारे समाज में यह दबाव बहुत भारी है, ख़ासकर बहनों पर। पर जो व्यक्ति इस धरती पर सबसे पूर्ण था, यीशु मसीह, वे अविवाहित थे। पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 7 में अविवाहित जीवन को एक वरदान कहा, क्योंकि वह बिना बँटे हुए मन से प्रभु की सेवा कर सकता है। नीतिवचन 18:22 विवाह को परमेश्वर का अनुग्रह कहता है, पर यह कहीं नहीं कहता कि इसके बिना जीवन व्यर्थ है। और मत्ती 22 में यीशु बताते हैं कि पुनरुत्थान में लोग न ब्याह करेंगे न ब्याहे जाएँगे। यानी विवाह अनंत नहीं है; मसीह के साथ का रिश्ता अनंत है।
चौथी भ्रांति: प्रेम एक एहसास है, और जब वह चला जाए तो रिश्ता ख़त्म। अगर प्रेम केवल एहसास होता, तो उसकी आज्ञा देना बेतुका होता। पर पौलुस आज्ञा देता है, और प्रेम का जो वर्णन वह देता है वह पूरा का पूरा क्रिया-रूप में है: "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं" (1 कुरिन्थियों 13:4)। धीरज रखना, कृपा करना, डाह न करना, ये सब चुनाव हैं। शादी की सालगिरह पर यह अध्याय पढ़ना आसान है; मंगलवार की रात झगड़े के बाद इसे जीना कठिन है। पर वहीं इसकी परीक्षा होती है।
आज इसे जीवन में उतारना
शुरुआत वहीं से कीजिए जहाँ उत्पत्ति 2:24 शुरू होता है: छोड़ने से। बहुत से भारतीय घरों में झगड़े की जड़ यह नहीं है कि पति-पत्नी एक-दूसरे से प्रेम नहीं करते, बल्कि यह कि उनके बीच की बात कभी उनके बीच नहीं रहती। माता-पिता का आदर करना आज्ञा है, पर अपने जीवनसाथी के बारे में शिकायत मायके या ससुराल में ले जाना वाचा को कमज़ोर करता है। तय कीजिए कि आपके घर के फ़ैसले आप दोनों साथ बैठकर करेंगे, और एक-दूसरे की इज़्ज़त किसी और के सामने कभी कम नहीं होने देंगे।
फिर पैसे को देखिए। "एक तन" का मतलब "मेरी कमाई" और "तेरी कमाई" नहीं हो सकता। महीने में एक बार साथ बैठकर आमदनी, ख़र्च, क़र्ज़ और दान पर खुलकर बात कीजिए। जहाँ पैसे की बात छिपाई जाती है, वहाँ भरोसा धीरे-धीरे सड़ता है।
झगड़े का एक नियम बना लीजिए। 1 कुरिन्थियों 13:5 कहता है कि प्रेम "अनुचित व्यवहार नहीं करता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता।" "बुरा नहीं मानता" का अर्थ है हिसाब की किताब न रखना। पुरानी ग़लतियों की सूची हर झगड़े में निकालना वाचा के ख़िलाफ़ है। तय कीजिए कि सूरज डूबने से पहले माफ़ी माँगी जाएगी, चाहे पूरा मामला उसी रात सुलझे या नहीं।
शरीर और समय को भी वाचा के भीतर लाइए। इब्रानियों 13:4 केवल व्यभिचार से रोकता नहीं, बल्कि विवाह के भीतर की निकटता को पवित्र कहकर उसका आदर करने को कहता है। पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 7 में साफ़ कहा कि पति-पत्नी एक-दूसरे से लंबे समय तक अलग न रहें, सिवाय आपसी सहमति और प्रार्थना के लिए। मोबाइल, काम और थकान आज सबसे आम तीसरा व्यक्ति बन चुके हैं। हफ़्ते में एक शाम ऐसी रखिए जिसमें फ़ोन बंद हो और सिर्फ़ आप दोनों हों।
और सबसे व्यावहारिक बात: साथ प्रार्थना कीजिए। 1 पतरस 3:7 प्रार्थना और वैवाहिक व्यवहार को सीधे जोड़ता है। दिन में पाँच मिनट, हाथ पकड़कर, एक-दूसरे के लिए नाम लेकर प्रार्थना करना किसी भी सलाह से ज़्यादा बदलाव लाता है, क्योंकि वहाँ दोनों एक साथ घुटनों पर आते हैं, और घुटनों पर अहंकार ज़्यादा देर टिक नहीं पाता।
दर्पण
अब आपसे बात। आप शायद उस कुर्सी पर बैठे हैं जहाँ से आपके घर का वह कमरा दिखता है जिसमें पिछली बार आवाज़ ऊँची हुई थी। आप जानते हैं कि आपने क्या कहा था, और यह भी कि आपने माफ़ी नहीं माँगी।
ईमानदारी से पूछिए: पिछले महीने आपने अपने जीवनसाथी के लिए ऐसा क्या किया जिसकी कोई कीमत चुकानी पड़ी हो? मसीह का प्रेम इफिसियों 5:25 में एक ही तरीक़े से नापा गया है, "अपने आपको उसके लिये दे दिया।" अगर आपका सारा प्रेम सुविधाजनक है, तो वह शायद प्रेम नहीं, बस शिष्टाचार है।
कुछ पाठकों के लिए यह पृष्ठ चुभ रहा होगा, क्योंकि आपके घर में शब्दों से चोट लगती है, या ठंडी चुप्पी से। आपसे यह नहीं कहा जा रहा कि सब कुछ सह लीजिए और चुप रहिए। परमेश्वर उत्पीड़न को कभी पवित्र नहीं कहते, और सुरक्षा माँगना पाप नहीं है। पर यह ज़रूर कहा जा रहा है कि आपके हिस्से का आज्ञापालन किसी और के बदलने पर निर्भर नहीं है।
कुछ और लोगों के लिए यह पृष्ठ राहत की तरह आएगा। आप सालों से सोचते रहे कि शायद आपने ग़लत इंसान से शादी कर ली। आज सुनिए: जिसे परमेश्वर ने जोड़ा, वहाँ "ग़लत इंसान" का सवाल पीछे छूट जाता है, और "वफ़ादार इंसान" का सवाल सामने आ जाता है।
और अगर आप अविवाहित हैं, तो यह सब आपके लिए भी है। जिस प्रेम की ये पंक्तियाँ वर्णन करती हैं, उसका असली स्रोत आपके पास पहले से है। आप अधूरे नहीं हैं। आपकी पहचान किसी अंगूठी से नहीं, मसीह के क्रूस से तय हुई है।
आपकी वाचा वहीं से शुरू होती है जहाँ आप हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चे विवाह के बारे में हमारे प्रवचनों से नहीं, हमारे रसोईघर से सीखते हैं। वे देखते हैं कि पापा मम्मी से कैसे बात करते हैं, और झगड़े के बाद क्या होता है। इसलिए बच्चों को यह विषय समझाने का सबसे मज़बूत तरीक़ा यही है कि उन्हें माफ़ी माँगते और माफ़ करते हुए देखने दिया जाए।
शब्दों में समझाते समय बात सरल रखिए। छोटे बच्चों से कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने चाहा कि कोई अकेला न रहे, इसलिए उन्होंने परिवार बनाया; शादी का मतलब है एक पक्का वादा, जो तब भी नहीं टूटता जब लोग थक जाएँ या नाराज़ हो जाएँ। थोड़े बड़े बच्चों को उत्पत्ति 2 की कहानी और मत्ती 19:6 का वह वाक्य बताया जा सकता है कि जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे, और समझाया जा सकता है कि वादा निभाना प्रेम का सबसे बड़ा सबूत है। किशोरों के साथ और गहरी बात हो सकती है: प्रेम और आकर्षण का फ़र्क़, शरीर का आदर, और इफिसियों 5 की वह तस्वीर कि विवाह मसीह और कलीसिया की ओर इशारा करता है।
अगर आपके घर में तनाव है या विवाह टूट चुका है, तो बच्चों से झूठ मत बोलिए, पर उन्हें यह ज़रूर बताइए कि परमेश्वर का प्रेम कभी नहीं टूटता।
फेथ.नेटवर्क पर इसी विषय की अलग-अलग उम्र के अनुसार तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वही पढ़िए और साथ बैठकर बात कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाइबल के अनुसार विवाह का असली उद्देश्य क्या है?
बाइबल के अनुसार विवाह का उद्देश्य केवल साथ, संतान या सामाजिक व्यवस्था नहीं है, हालाँकि ये सब इसमें शामिल हैं। उत्पत्ति 2:18 बताता है कि परमेश्वर ने अकेलेपन का उत्तर देने के लिए साथी बनाया, और इफिसियों 5:32 बताता है कि यह पूरा रिश्ता मसीह और कलीसिया की ओर इशारा करने वाला एक चिह्न है। इसलिए विवाह का सबसे गहरा मक़सद यह है कि दो लोग एक-दूसरे के साथ वफ़ादार रहते हुए परमेश्वर के वाचा-प्रेम को दुनिया के सामने दिखाएँ और उस प्रक्रिया में मसीह के समान बनते जाएँ।
क्या बाइबल तलाक की अनुमति देती है?
बाइबल तलाक को कहीं भी सामान्य या आसान नहीं बताती; मत्ती 19:6 कहता है कि जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे, और मलाकी 2 में परमेश्वर विश्वासघात से घृणा प्रकट करते हैं। फिर भी यीशु ने व्यभिचार की स्थिति में छूट का उल्लेख किया, और पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 7 में उस स्थिति की बात की जहाँ अविश्वासी साथी स्वयं छोड़कर चला जाए। ये अपवाद आज्ञा नहीं, बल्कि टूटी हुई दुनिया में दी गई करुणा हैं। जहाँ हिंसा या ख़तरा हो, वहाँ सुरक्षा और कलीसिया की सहायता तुरंत लेनी चाहिए।
इफिसियों 5 में पत्नी के "अधीन रहने" का क्या मतलब है?
इसका मतलब गुलामी, चुप्पी या अपनी राय खो देना नहीं है। यह हिस्सा इस आज्ञा से शुरू होता है कि मसीह के भय से एक-दूसरे के अधीन रहो, यानी नम्रता दोनों के लिए है। पत्नी से कहा गया अधीन रहना एक स्वेच्छा से चुना गया आदर है, जो उस पति के प्रति दिखाया जाता है जिसे इफिसियों 5:25 के अनुसार अपनी जान देने की हद तक प्रेम करने को कहा गया है। जहाँ पति मसीह जैसा त्याग दिखाता है, वहाँ यह आदर बोझ नहीं, सुरक्षा बन जाता है।
क्या कोई मसीही किसी अविश्वासी से विवाह कर सकता है?
नया नियम इस बारे में सावधान करता है। पौलुस 2 कुरिन्थियों 6 में अविश्वासियों के साथ असमान जुए में जुतने से मना करता है, और 1 कुरिन्थियों 7 में कहता है कि विवाह "केवल प्रभु में" हो। इसका कारण पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि व्यावहारिक सच्चाई है: जब दो लोग एक तन होते हैं पर उनकी आत्मा दो दिशाओं में चलती है, तो हर बड़ा फ़ैसला, बच्चों की परवरिश से लेकर प्रार्थना तक, खिंचाव बन जाता है। जो पहले से ऐसे विवाह में हैं, उनके लिए 1 पतरस 3 में धीरज, आदर और पवित्र जीवन के द्वारा गवाही देने की सलाह दी गई है।
बाइबल माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह के बारे में क्या कहती है?
बाइबल किसी एक सामाजिक पद्धति को आज्ञा नहीं देती। इसहाक का विवाह उत्पत्ति 24 में परिवार के द्वारा तय हुआ और प्रार्थना से निर्देशित था, जबकि याकूब ने स्वयं राहेल को चुना। इसलिए परिवार की भागीदारी ग़लत नहीं है, बल्कि अक्सर ज्ञान का स्रोत होती है। शर्त यह है कि दोनों की सहमति हो, डर या दबाव न हो, दहेज जैसी अन्यायपूर्ण माँगें न हों, और विश्वास में एकता मुख्य कसौटी रहे। परमेश्वर का अनुग्रह, जिसकी बात नीतिवचन 18:22 करता है, किसी भी तरीक़े से आने वाले विवाह में मिल सकता है।
क्या बाइबल में बहुविवाह की अनुमति है?
बाइबल कई बहुविवाही व्यक्तियों का वर्णन करती है, पर वर्णन करना अनुमोदन करना नहीं होता। उत्पत्ति 2:24 का नमूना एक पुरुष और एक स्त्री का है, और यीशु ने मत्ती 19:4-6 में इसी शुरुआती नमूने की ओर लौटकर कहा कि "वे अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं।" हर बहुविवाही कहानी, चाहे अब्राहम की हो, याकूब की या दाऊद की, जलन, परिवार में फूट और दुख पर जाकर ख़त्म होती है। नया नियम अगुवों के लिए स्पष्ट रूप से "एक ही पत्नी का पति" होने की शर्त रखता है।
विवाह से पहले शारीरिक संबंध के बारे में बाइबल क्या कहती है?
इब्रानियों 13:4 कहता है, "विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निष्कलंक रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा।" बाइबल शरीर को बुरा नहीं मानती; वह शारीरिक मिलन को इतना अर्थपूर्ण मानती है कि उसे वाचा के भीतर रखती है, क्योंकि वह "एक तन" होने का चिह्न है। वाचा के बाहर यह चिह्न वही कहता है जो हक़ीक़त में हुआ नहीं। जो इस सीमा को पहले तोड़ चुके हैं, उनके लिए मसीह में पूरी क्षमा उपलब्ध है, और नई शुरुआत संभव है।
अगर संतान न हो तो क्या विवाह अधूरा है?
नहीं। बाइबल में संतान एक आशीष है, पर विवाह की वैधता या पूर्णता संतान पर निर्भर नहीं है। उत्पत्ति 2:18 में साथी देने का कारण अकेलापन था, संतान नहीं। हन्ना, सारा और इलीशिबा की कहानियाँ दिखाती हैं कि परमेश्वर निसंतान दंपतियों के दुख को जानते हैं और उनके साथ कोमलता से पेश आते हैं। समाज के तानों के बीच यह याद रखना ज़रूरी है कि आपकी पहचान माता-पिता होने से नहीं, मसीह में होने से बनती है। कई निसंतान दंपति गोद लेने और सेवकाई के द्वारा अनगिनत लोगों के लिए आशीष बने हैं।
1 पतरस 3:7 में पत्नी को "निर्बल पात्र" कहने का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री बुद्धि, चरित्र या आत्मिकता में कमज़ोर है। उसी पद में पतरस दोनों को "जीवन के वरदान के वारिस" कहकर पूरी बराबरी घोषित करता है। "पात्र" शब्द एक क़ीमती बर्तन की तस्वीर देता है, जिसे लापरवाही से नहीं, सँभालकर रखा जाता है। मुख्य बात शारीरिक शक्ति के अंतर की है, और संदेश पति के लिए है: अपनी ताक़त का इस्तेमाल दबाने के लिए नहीं, रक्षा और आदर के लिए करो। और चेतावनी बहुत गंभीर है, कि ऐसा न करने पर प्रार्थनाएँ रुक जाती हैं।
क्या स्वर्ग में भी पति-पत्नी का रिश्ता बना रहेगा?
यीशु ने मत्ती 22 में कहा कि पुनरुत्थान में लोग न ब्याह करेंगे और न ब्याहे जाएँगे, बल्कि स्वर्ग के दूतों के समान होंगे। इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ प्रेम कम होगा; बल्कि वहाँ वह असलियत होगी जिसकी ओर विवाह इशारा करता था। प्रकाशितवाक्य 19:7 के अनुसार अंतिम विवाह मेम्ने का विवाह है, जहाँ मसीह और उनकी कलीसिया सदा के लिए एक होंगे। इसलिए विवाह एक अस्थायी चिह्न है और मसीह के साथ का रिश्ता स्थायी। यह सोच आपके आज के विवाह को छोटा नहीं, बल्कि और अर्थपूर्ण बनाती है।
जब प्रेम का एहसास ख़त्म हो जाए तो क्या करें?
पहले यह समझिए कि 1 कुरिन्थियों 13:4-7 में प्रेम का वर्णन भावनाओं से नहीं, कामों से किया गया है: धीरज, कृपा, डाह न करना, अपनी भलाई न खोजना, बुरा न मानना। इसलिए जब एहसास ठंडा पड़े, तो काम शुरू कीजिए, भावना अक्सर बाद में लौट आती है। साथ प्रार्थना कीजिए, पुरानी बातों की माफ़ी माँगिए, एक-दूसरे के लिए समय अलग रखिए, और ज़रूरत हो तो कलीसिया के परिपक्व दंपति या परामर्शदाता से मदद लीजिए। जो परमेश्वर पानी को दाखरस में बदल सकते हैं, वे ठंडे रिश्ते में भी नया स्वाद भर सकते हैं।
क्या तलाक के बाद दोबारा विवाह करना पाप है?
यह प्रश्न ईमानदार कलीसियाओं में भी बहस का विषय रहा है, इसलिए यहाँ नम्रता ज़रूरी है। अधिकांश विश्वासी मानते हैं कि जहाँ तलाक व्यभिचार के कारण हुआ हो, या जहाँ अविश्वासी साथी ने स्वयं छोड़ दिया हो, वहाँ पुनर्विवाह की स्वतंत्रता है, क्योंकि मत्ती 19 और 1 कुरिन्थियों 7 में ये स्थितियाँ दी गई हैं। जहाँ टूटन की ज़िम्मेदारी अपनी रही हो, वहाँ पहला कदम पश्चाताप और यथासंभव मेल-मिलाप है। किसी भी स्थिति में निर्णय अकेले नहीं, बल्कि परिपक्व आत्मिक अगुवों की सलाह और प्रार्थना के साथ लेना बुद्धिमानी है।
अंत में
अगर इस पूरे पृष्ठ से आपको केवल एक बात याद रहे, तो यह याद रखिए: आपका विवाह एक अनुबंध नहीं, एक वाचा है, और वह वाचा अपने से बड़ी किसी चीज़ की ओर इशारा करती है। उत्पत्ति 2:24 में परमेश्वर ने उसे गढ़ा, मत्ती 19:6 में यीशु ने उस पर मुहर लगाई, इफिसियों 5:25 में उसका नाप क्रूस ठहराया गया, और प्रकाशितवाक्य 19 में वह मेम्ने के विवाह-भोज में जाकर पूरी होती है। इसीलिए पति-पत्नी के रिश्ते की सबसे गहरी मरम्मत सलाह से नहीं, अनुग्रह से होती है। जिसने स्वयं क्षमा पाई है, वही क्षमा दे सकता है; जिसने अपने लिए दी गई जान देखी है, वही अपनी सुविधा छोड़ सकता है।
आगे पढ़ने के लिए इफिसियों 5 को पूरे अध्याय के रूप में धीरे-धीरे पढ़िए, फिर 1 कुरिन्थियों 13 को अपने जीवनसाथी का नाम रखकर एक बार पढ़िए, और देखिए कहाँ चुभता है। वहीं से प्रार्थना शुरू कीजिए। परमेश्वर उस प्रार्थना के बहुत क़रीब हैं, क्योंकि आपकी वाचा में वे केवल दर्शक नहीं, साक्षी हैं।
