बाइबल किसने लिखी: परमेश्वर का वचन कैसे आया और क्या यह भरोसेमंद है
परिचय
होस्टल के कमरे में रात के ग्यारह बजे थे। एक दोस्त ने मेज़ पर रखी बाइबल उठाई, पन्ने पलटे और हँसकर कहा, "यार, यह किताब भी तो आदमियों ने ही लिखी है। फिर तुम इसे परमेश्वर का वचन क्यों कहते हो?" सवाल में कोई कड़वाहट नहीं थी, बस एक सीधी-सी उलझन थी। और सच कहें तो वह उलझन हम सबके भीतर कभी न कभी सिर उठाती है, खासकर तब जब ज़िंदगी कठिन हो और हमें यह जानना ज़रूरी हो जाए कि जिस किताब पर हम अपना पूरा भरोसा टिका रहे हैं, वह टिकने लायक है भी या नहीं।
यह पन्ना उसी सवाल के लिए है। आप यहाँ जानेंगे कि बाइबल असल में किसने लिखी, वह कैसे लिखी गई, किन हाथों और किन आँसुओं से होकर आई, क्यों चालीस से ज़्यादा लेखकों की यह लाइब्रेरी एक ही आवाज़ में बोलती है, और सबसे बढ़कर, क्यों आप इस पर अपना जीवन टिका सकते हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर उत्तर दो अधूरे सिरों पर अटक जाते हैं: या तो "बाइबल परमेश्वर ने लिखी" या "बाइबल इंसानों ने लिखी।" यह पन्ना तीसरा रास्ता नहीं, बल्कि पूरा सच सामने रखता है, और वह सच मसीह के देहधारण जैसा है। जैसे यीशु मसीह पूरी तरह परमेश्वर हैं और पूरी तरह मनुष्य, वैसे ही पवित्रशास्त्र पूरी तरह परमेश्वर का वचन है और पूरी तरह मनुष्यों की भाषा, संस्कृति, व्यक्तित्व और आँसुओं में लिखा गया है। बाइबल आसमान से तैयार हालत में नहीं गिरी; वह इतिहास के भीतर, जीते-जागते लोगों के ज़रिए आई। इसी दोहरी सच्चाई को समझ लेना इस पूरे सवाल की चाबी है, और यही इस पन्ने की धुरी रहेगी।
बाइबल अपने लेखकत्व के बारे में क्या कहती है?
सबसे पहले पवित्रशास्त्र को खुद अपनी बात कहने दीजिए। पौलुस ने अपने आत्मिक पुत्र तीमुथियुस को लिखा, "हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है" (2 तीमुथियुस 3:16)। मूल यूनानी में जो शब्द "प्रेरणा" के लिए इस्तेमाल हुआ है, उसका शाब्दिक अर्थ है "परमेश्वर की फूँक से निकला हुआ।" यानी पवित्रशास्त्र परमेश्वर की साँस है, ठीक वैसे ही जैसे आदम की मिट्टी में परमेश्वर ने अपनी फूँक भरी और वह जीवित प्राणी बन गया। शब्द काग़ज़ पर हैं, पर उनमें परमेश्वर की साँस है।
पर यह फूँक मनुष्यों तक पहुँची कैसे? पतरस इसका उत्तर देते हैं: "क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे" (2 पतरस 1:21)। ध्यान दीजिए, यहाँ दोनों बातें एक ही वाक्य में हैं। बोले मनुष्य, पर उभारा पवित्र आत्मा ने। जिस यूनानी शब्द का अनुवाद "उभारे जाकर" हुआ है, वह नाव के पाल में हवा भरने के लिए इस्तेमाल होता था। मल्लाह नाव में बैठा है, उसके हाथ पतवार पर हैं, उसकी आँखें खुली हैं, पर नाव को आगे ले जाने वाली ताक़त हवा है। यही पवित्रशास्त्र का लेखकत्व है।
लेखक इंसान थे, पर हवा परमेश्वर की थी।
इसीलिए बाइबल में लेखकों की अपनी आवाज़ साफ़ सुनाई देती है। यशायाह का हिन्दी में कहें तो राजसी गद्य-काव्य है, आमोस की भाषा एक चरवाहे की खुरदरी सीधी बात है। लूका एक वैद्य की सावधानी से तथ्य जुटाते हैं और लिखते हैं कि उन्होंने सब बातों का ठीक-ठीक पता लगाकर क्रमानुसार लिखा ताकि पढ़ने वाला निश्चय कर सके। पौलुस के पत्रों में उनका तेज़ दिमाग़, उनका टूटा हुआ दिल और कभी-कभी उनकी झुँझलाहट तक दिखती है। दाऊद के भजनों में उनकी रातों की सिसकियाँ हैं। परमेश्वर ने इन व्यक्तित्वों को मिटाया नहीं, उन्हें इस्तेमाल किया।
और फिर भी यह संग्रह अपने बारे में दावा करता है कि यह परमेश्वर का अपना वचन है। यीशु ने पिता से प्रार्थना करते हुए कहा, "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17)। उन्होंने यह नहीं कहा कि वचन में सत्य है, बल्कि यह कि वचन सत्य है। यशायाह उसकी टिकाऊपन की गवाही देते हैं: "घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा" (यशायाह 40:8)। साम्राज्य उठे और गिरे, भाषाएँ मरीं, पाण्डुलिपियाँ जलाई गईं, पर वचन खड़ा रहा।
यह वचन सिर्फ़ जानकारी नहीं देता, यह काम करता है। "क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गाँठ गाँठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है" (इब्रानियों 4:12)। गौर कीजिए कि यहाँ पढ़ने वाला वचन की जाँच नहीं करता, वचन पढ़ने वाले की जाँच करता है। और जब वही वचन अँधेरे में हमारे कदमों के नीचे आता है, तो भजनकार की गवाही हमारी बन जाती है: "तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है" (भजन संहिता 119:105)। दीपक पूरी घाटी रोशन नहीं करता, बस अगला कदम दिखाता है। परमेश्वर का वचन अक्सर ऐसे ही काम करता है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
परमेश्वर के लिखित वचन की कहानी सीनै पहाड़ से शुरू होती है, जहाँ परमेश्वर स्वयं पत्थर की पटियाओं पर अपनी आज्ञाएँ उकेरते हैं। वहीं से एक सिलसिला चलता है: मूसा यहोवा के सब वचन लिख लेते हैं, और वह पुस्तक वाचा के सन्दूक के पास रखी जाती है। यहोशू से कहा जाता है कि व्यवस्था की पुस्तक उसके मुँह से कभी न हटे। राजाओं को आदेश है कि वे अपने लिए व्यवस्था की नकल उतारें। योशिय्याह के दिनों में भवन की मरम्मत करते हुए खोई हुई पुस्तक मिलती है और पूरा देश काँप उठता है। यिर्मयाह बोलते हैं और बारूक लिखते हैं; राजा यहोयाकीम उस चर्मपत्र को चाकू से काटकर आग में डालता है, और परमेश्वर कहते हैं कि इसे फिर लिखो। काग़ज़ जल सकता है, वचन नहीं।
पुराने नियम की उनतालीस पुस्तकें लगभग एक हज़ार वर्षों में, मुख्यतः इब्रानी भाषा में और कुछ हिस्सों में अरामी भाषा में लिखी गईं। लेखक भिन्न-भिन्न थे: एक राजकुमार जो चरवाहा बना, एक राजा, एक याजक, एक राजदरबार का अधिकारी, एक अंजीर तोड़ने वाला किसान। फिर चार सौ वर्षों की वह खामोशी आती है जिसमें कोई नया भविष्यद्वक्ता नहीं बोलता।
और फिर वचन चुप नहीं रहता, वह देह धारण कर लेता है। "और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया" (यूहन्ना 1:14)। यहाँ हमारी पूरी बात का केंद्र है। जो परमेश्वर युगों तक भविष्यद्वक्ताओं के मुँह और लेखनी से बोलते रहे, वे अंत में अपने पुत्र में बोले। और यीशु ने लिखे हुए वचन को कभी छोटा नहीं किया; उन्होंने कहा, "क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा" (मत्ती 5:18)। जी उठने के बाद इम्माऊस के रास्ते पर उन्होंने "मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से, अपने विषय में लिखी हुई बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया" (लूका 24:27)। यानी पूरी बाइबल का असली विषय मसीह हैं।
नया नियम इसी गवाही से निकला। प्रेरितों ने वही लिखा जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना था, और पवित्र आत्मा ने जिसकी याद उन्हें दिलाई। पौलुस थिस्सलुनीके के विश्वासियों की सराहना करते हैं कि उन्होंने प्रेरितों के संदेश को मनुष्यों का नहीं, परमेश्वर का वचन समझकर ग्रहण किया। पतरस पौलुस के पत्रों को "पवित्रशास्त्र" की श्रेणी में गिनते हैं (2 पतरस 3:16)। और पूरी बाइबल की आख़िरी पुस्तक अपनी अंतिम चेतावनी इसी वचन की हिफ़ाज़त के लिए देती है: "मैं हर एक को जो इस पुस्तक की भविष्यद्वाणी की बातें सुनता है, गवाही देता हूँ: यदि कोई मनुष्य इन बातों में कुछ बढ़ाए तो परमेश्वर उन विपत्तियों को जो इस पुस्तक में लिखी हैं, उस पर बढ़ाएगा" (प्रकाशितवाक्य 22:18)। यही चेतावनी व्यवस्थाविवरण 4:2 में भी है और नीतिवचन 30:6 में भी। शुरू से आख़िर तक परमेश्वर अपने वचन पर पहरा देते हैं।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: परमेश्वर ने लेखकों को श्रुतलेख लिखवाया, वे बस कलम थे। यह सुनने में बहुत भक्तिपूर्ण लगता है, पर यह बाइबल की अपनी गवाही के खिलाफ़ है। अगर लेखक सिर्फ़ टाइपराइटर होते, तो लूका को "सब बातों का ठीक-ठीक पता लगाने" की ज़रूरत क्यों पड़ती? पौलुस त्रोआस में छूटे अपने बाहरी वस्त्र और चर्मपत्रों का ज़िक्र क्यों करते? दाऊद के भजनों में उनका अपना अपराधबोध क्यों टपकता? परमेश्वर ने इन लोगों को खाली बर्तन की तरह नहीं, तैयार किए हुए बर्तन की तरह इस्तेमाल किया। उनकी पूरी ज़िंदगी, उनकी पढ़ाई, उनका दर्द, सब पवित्र आत्मा के हाथ में औज़ार बना। और फिर भी जो निकला, वह शत-प्रतिशत परमेश्वर की बात थी। यही देहधारण जैसा चमत्कार है: पूरी तरह दैवी, पूरी तरह मानवीय, और कहीं कोई समझौता नहीं।
दूसरी भ्रांति: चूँकि इंसानों ने लिखी, इसलिए इसमें इंसानी गलतियाँ ज़रूर होंगी। यह तर्क मानता है कि परमेश्वर कमज़ोर साधनों से सिद्ध काम नहीं करवा सकते। पर वही परमेश्वर जिसने एक कुँवारी के गर्भ में बिना पाप के पुत्र को जन्म दिया, एक पापी मनुष्य की लेखनी से बिना भूल के वचन लिखवा सकते हैं। ध्यान रखिए, निर्दोषता का दावा मूल लेखों के बारे में है, किसी प्रिंटिंग प्रेस की किसी ख़ास छपाई के बारे में नहीं। और जहाँ हमें नकल करने वालों की छोटी-मोटी भिन्नताएँ मिलती हैं, वहाँ पाण्डुलिपियों की भारी संख्या हमें मूल पाठ तक पहुँचने में मदद करती है, न कि हमसे उसे छीनती है।
तीसरी भ्रांति: कलीसिया ने तय किया कि बाइबल में क्या होगा, इसलिए यह मनुष्यों का बनाया हुआ संग्रह है। सच इसका उल्टा है। कलीसिया ने पुस्तकों को अधिकार दिया नहीं, उनके अधिकार को पहचाना। जैसे कोई समिति यह तय नहीं करती कि सूरज रोशनी देगा या नहीं, वह बस उसे देखती है। जिन पुस्तकों को परमेश्वर के लोगों ने सदियों तक पहले ही परमेश्वर के वचन के रूप में पढ़ा, सुना और उन पर जान दी, कार्थेज जैसी सभाओं ने चौथी सदी में बस उस पहचान को लिखित रूप में दर्ज किया।
चौथी भ्रांति: बाइबल इतनी बार अनुवादित और नकल हुई कि अब मूल बात बची ही नहीं। 1947 में मृत सागर के पास मिली कुमरान की पाण्डुलिपियों ने यशायाह की पूरी पुस्तक की ऐसी प्रति दी जो उस समय तक उपलब्ध प्रतियों से लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी, और पाठ लगभग ज्यों का त्यों निकला। नए नियम की यूनानी पाण्डुलिपियाँ पाँच हज़ार से ज़्यादा हैं, जो प्राचीन संसार के किसी भी दूसरे ग्रंथ से कहीं अधिक है। यशायाह 40:8 केवल एक धार्मिक भावना नहीं, एक ऐतिहासिक तथ्य भी है।
आज इसे जीवन में उतारना
अगर बाइबल दो आवाज़ों वाली किताब है, परमेश्वर की और मनुष्य की, तो इसका असर आपके रोज़ के पढ़ने पर सीधा पड़ता है। पहली बात, आप इसे पढ़ते समय दोनों सवाल पूछ सकते हैं। एक, यह लेखक किन लोगों से, किन हालात में बात कर रहा है? दो, इस हिस्से के ज़रिए परमेश्वर मुझसे क्या कह रहे हैं? पहला सवाल आपको गलत अर्थ निकालने से बचाता है, दूसरा आपको ठंडे अध्ययन से बचाता है। बहुत से लोग या तो इतिहास में डूबकर परमेश्वर की आवाज़ खो देते हैं, या भावना में डूबकर पाठ का असली अर्थ। दोनों पंख चाहिए।
दूसरी बात, जब सुबह आपके पास बीस मिनट हों और सिर में ऑफ़िस की चिंता घूम रही हो, तो याद रखिए कि आप मरी हुई स्याही नहीं पढ़ रहे। इब्रानियों 4:12 के अनुसार वचन जीवित है और वह आपके मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है। इसलिए पढ़ने से पहले दो वाक्य की प्रार्थना कीजिए: "प्रभु, आज अपने वचन से मुझे बोलिए, और मुझे सुनने का मन दीजिए।" यह छोटी आदत पढ़ाई को मुलाक़ात में बदल देती है।
तीसरी बात, दीपक की तरह इस्तेमाल कीजिए। भजन संहिता 119:105 पूरे रास्ते की रोशनी का वादा नहीं करता, बस पाँव के नीचे की। जब नौकरी बदलने का फ़ैसला सामने हो, जब रिश्ते में माफ़ करना असंभव लगे, जब पैसों का हिसाब न बैठ रहा हो, तो बाइबल से भविष्य का नक्शा मत माँगिए; अगला सही कदम माँगिए। वह आपको हमेशा मिलेगा।
चौथी बात, याद कीजिए और गुनगुनाइए। जिन लोगों ने ये पुस्तकें लिखीं, उनमें से अधिकतर ने इन्हें ज़ोर से पढ़े जाने के लिए लिखा था। मोबाइल पर पढ़ना ठीक है, पर कुछ पद ज़बानी याद कर लेना आपको उन क्षणों के लिए तैयार करता है जब फ़ोन हाथ में नहीं होगा: अस्पताल का गलियारा, परीक्षा का कमरा, अकेली रात।
और आख़िर में, वचन को अकेले मत पढ़िए। पवित्र आत्मा ने इसे समुदाय के भीतर दिया और समुदाय के भीतर ही यह सबसे अच्छा खुलता है। परिवार के साथ एक अध्याय, कलीसिया में एक छोटा समूह, किसी के साथ हफ़्ते में एक फ़ोन कॉल जिसमें आप बताएँ कि इस हफ़्ते परमेश्वर ने क्या दिखाया।
दर्पण
अब सीधे आपसे। आप शायद इस पन्ने पर इसलिए आए थे कि किसी ने आपकी बाइबल पर सवाल उठाया था, और आप एक अच्छा जवाब ढूँढ़ रहे थे। जवाब आपको मिल गया है। पर ईमानदारी से बताइए, आपकी असली समस्या जवाब की कमी है या भूख की कमी?
कई लोग बाइबल की भरोसेमंदता पर बहस जीत लेते हैं और उसी बाइबल को महीनों नहीं खोलते। आपके फ़ोन का स्क्रीन टाइम आपको बता देगा कि आपके दिन का असली अधिकार किसके हाथ में है। रील देखने के लिए चालीस मिनट हैं, वचन के लिए चार भी नहीं। यह ज्ञान की समस्या नहीं, प्रेम की समस्या है।
और शायद आपके पीछे हटने की वजह कुछ और है। शायद आप जानते हैं कि अगर आपने इस किताब को सचमुच परमेश्वर का वचन मान लिया, तो आपको अपने पैसों के बारे में कुछ बदलना पड़ेगा। अपने ऑफ़िस की उस फ़ाइल के बारे में, जिसमें आँकड़े थोड़े ठीक कर दिए गए हैं। अपने फ़ोन में छिपे उन ऐप्स के बारे में। अपने ससुराल वालों के प्रति उस कड़वाहट के बारे में जिसे आपने "मेरा हक़ है" कहकर पाल रखा है। वचन दोधारी तलवार है और हम सब सहज रूप से तलवार से दूरी बनाते हैं।
पर सुनिए: यह तलवार मारने के लिए नहीं, चंगा करने के लिए चीरती है। जो परमेश्वर अपना वचन देते हैं, वे वही परमेश्वर हैं जिन्होंने अपना पुत्र दिया। आपकी ज़िंदगी के जिस हिस्से को वचन छूता है, वही हिस्सा अनुग्रह के सबसे नज़दीक है।
तो इस पन्ने को बंद करने से पहले बाइबल खोलिए। एक अध्याय। आज। बहस बाद में जीत लेंगे।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को यह समझाना मुश्किल नहीं, बस एक अच्छी तस्वीर चाहिए। आप कह सकते हैं: सोचो तुम्हारे पापा दूर शहर में काम करते हैं और वे तुम्हें चिट्ठी भेजना चाहते हैं। वे अपनी बात बोलते हैं और तुम्हारा बड़ा भाई उसे लिखता है। चिट्ठी पर हैंडराइटिंग भाई की है, पर बातें पापा की हैं। बाइबल भी कुछ ऐसी ही है, पर उससे भी ख़ास। परमेश्वर ने बहुत सारे लोगों से, बहुत सालों तक, अपनी बातें लिखवाईं। कोई चरवाहा था, कोई राजा, कोई मछुआरा, कोई डॉक्टर। हर एक ने अपनी ही भाषा में, अपने ही तरीक़े से लिखा, पर परमेश्वर ने उनके दिल में अपनी बात डाली, इसलिए जो लिखा गया वह परमेश्वर की ही बात है। और सबसे बड़ी बात यह है कि पूरी बाइबल एक ही व्यक्ति के बारे में है, यीशु मसीह के बारे में, जो हमें बचाने आए।
बड़े बच्चों को यह भी बताया जा सकता है कि बाइबल एक किताब नहीं, छियासठ किताबों की लाइब्रेरी है, और उसमें कहानियाँ, गीत, चिट्ठियाँ और भविष्य की बातें, सब शामिल हैं।
हमारी वेबसाइट पर इस विषय की अलग-अलग उम्र के हिसाब से समझाइशें उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह साल), स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए (सात से बारह साल) और किशोरों के लिए (बारह साल से ऊपर), जिनमें सवाल-जवाब और बातचीत शुरू करने के तरीक़े भी दिए गए हैं। घर की उम्र के हिसाब से सही संस्करण चुनिए और बच्चों के सवालों से घबराइए मत; उनके सवाल अक्सर हमारी अपनी समझ को गहरा करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाइबल किसने लिखी थी?
बाइबल को लगभग चालीस अलग-अलग मनुष्यों ने लिखा, जिनमें मूसा, दाऊद, सुलैमान, यशायाह, यिर्मयाह, दानिय्येल, मत्ती, मरकुस, लूका, यूहन्ना, पौलुस और पतरस जैसे नाम शामिल हैं। वे अलग-अलग पेशों, वर्गों और देशों से थे और उन्होंने लगभग पंद्रह सौ वर्षों के दौरान लिखा। पर उनके पीछे एक ही लेखक हैं, परमेश्वर स्वयं, क्योंकि 2 तीमुथियुस 3:16 के अनुसार हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है। इसलिए सही उत्तर यह है: बाइबल परमेश्वर ने मनुष्यों के द्वारा लिखी।
क्या परमेश्वर ने लेखकों को शब्द-ब-शब्द लिखवाया?
कुछ जगहों पर हाँ, जैसे दस आज्ञाएँ या वे भविष्यद्वाणियाँ जो "यहोवा यों कहता है" से शुरू होती हैं। पर आमतौर पर परमेश्वर ने लेखकों के व्यक्तित्व को मिटाया नहीं। 2 पतरस 1:21 कहता है कि भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर बोलते थे, यानी नाव के पाल में हवा की तरह आत्मा ने उन्हें चलाया, जबकि उनके अपने हाथ पतवार पर थे। इसीलिए हम लूका की सावधान भाषा और आमोस की खुरदरी भाषा में अंतर साफ़ महसूस करते हैं, और फिर भी दोनों परमेश्वर का वचन हैं।
बाइबल लिखने में कुल कितना समय लगा?
मोटे तौर पर पंद्रह सौ वर्ष। पुराने नियम का लेखन मूसा के समय से शुरू होकर बंधुआई के बाद के भविष्यद्वक्ताओं तक चला, और फिर लगभग चार सौ वर्षों की चुप्पी के बाद नया नियम पहली सदी में, कुछ ही दशकों के भीतर लिखा गया। यह लंबा फैलाव ही एक बड़ा प्रमाण है: इतने लंबे अरसे में, इतने अलग लेखकों के बीच, जिनमें से अधिकतर कभी एक-दूसरे से मिले तक नहीं, एक ही उद्धार की कहानी इतनी मेल खाती हुई चलती है कि संयोग का तर्क टिकता नहीं।
बाइबल किन भाषाओं में लिखी गई थी?
पुराना नियम मुख्यतः इब्रानी भाषा में लिखा गया, और उसके कुछ हिस्से, जैसे दानिय्येल और एज्रा के कुछ अध्याय, अरामी भाषा में हैं, जो उस दौर की आम बोलचाल की भाषा थी। नया नियम उस समय की सामान्य यूनानी भाषा में लिखा गया, जिसे कोइने यूनानी कहते हैं, यानी बाज़ार और आम आदमी की भाषा, न कि दार्शनिकों की ऊँची भाषा। यह खुद एक संदेश है: परमेश्वर ने अपनी बात उस भाषा में रखी जिसे साधारण लोग पढ़ और समझ सकें।
क्या मूसा ने सचमुच पहली पाँच पुस्तकें लिखीं?
बाइबल खुद बार-बार इन पुस्तकों को मूसा से जोड़ती है, और यीशु ने भी उन्हें "मूसा की व्यवस्था" कहा। निर्गमन में साफ़ लिखा है कि मूसा ने यहोवा के सब वचन लिख दिए। इसका यह मतलब नहीं कि हर एक पंक्ति उन्हीं की कलम से निकली; उदाहरण के लिए मूसा की मृत्यु का विवरण स्पष्ट रूप से किसी और ने जोड़ा, और बाद में नकल करने वालों ने कुछ जगह के नाम अद्यतन किए। मूल रचना और अधिकार मूसा का है, और यही बाइबल तथा मसीह की गवाही है।
सुसमाचार की चारों पुस्तकें किसने लिखीं?
पहली सदी से ही कलीसिया की एकमत गवाही यह रही है कि मत्ती का सुसमाचार प्रेरित मत्ती ने, मरकुस का सुसमाचार पतरस के साथी यूहन्ना मरकुस ने, लूका का सुसमाचार पौलुस के साथी वैद्य लूका ने और यूहन्ना का सुसमाचार प्रेरित यूहन्ना ने लिखा। दिलचस्प बात यह है कि अगर ये नाम बाद में गढ़े जाते, तो कोई मरकुस और लूका जैसे कम प्रसिद्ध नामों को न चुनता। यही उनकी सच्चाई का संकेत है। चारों मिलकर यीशु मसीह की एक ही कहानी चार कोणों से सुनाते हैं।
यह कैसे तय हुआ कि कौन सी पुस्तकें बाइबल में होंगी?
किसी समिति ने बैठकर पुस्तकों को अधिकार नहीं दिया; कलीसिया ने उस अधिकार को पहचाना जो पहले से मौजूद था। जाँच के मुख्य आधार थे: क्या पुस्तक किसी भविष्यद्वक्ता या प्रेरित से जुड़ी है, क्या उसकी शिक्षा बाकी पवित्रशास्त्र से मेल खाती है, और क्या परमेश्वर के लोगों ने व्यापक रूप से उसे वचन के रूप में ग्रहण किया है। चौथी सदी की सभाओं ने, जैसे कार्थेज की सभा, बस उस सर्वसम्मत पहचान को औपचारिक रूप से दर्ज किया जो कलीसिया में पहले से चली आ रही थी।
क्या बाइबल समय के साथ बदल दी गई है?
हमारे पास नए नियम की पाँच हज़ार से अधिक यूनानी पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनमें कुछ मूल लेखन के सौ वर्षों के भीतर की हैं, और पुराने नियम के लिए मृत सागर की पाण्डुलिपियाँ, जो 1947 में मिलीं और पहले से ज्ञात प्रतियों से लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी हैं। तुलना करने पर पाठ चकित कर देने वाली हद तक एक जैसा निकलता है; जो छोटे अंतर हैं, वे वर्तनी या शब्दक्रम के हैं और किसी भी मुख्य सिद्धांत को नहीं छूते। यशायाह 40:8 का वादा इतिहास में परखा जा चुका है।
प्रकाशितवाक्य 22:18 का क्या अर्थ है, क्या इसके बाद परमेश्वर कुछ नहीं बोलते?
यह पद सीधे तौर पर प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की बात कर रहा है और उसके पाठ के साथ छेड़छाड़ करने वालों को चेतावनी देता है। पर यही चेतावनी व्यवस्थाविवरण 4:2 और नीतिवचन 30:6 में भी मिलती है, इसलिए यह परमेश्वर के वचन के प्रति उनके रवैये का एक स्थायी नमूना है। चूँकि प्रकाशितवाक्य बाइबल की अंतिम पुस्तक है, कलीसिया ने इसे पूरे पवित्रशास्त्र की मुहर के रूप में भी समझा है: मसीह में परमेश्वर ने अपना अंतिम और पूर्ण वचन कह दिया है।
कैथोलिक बाइबल में ज़्यादा पुस्तकें क्यों हैं?
कैथोलिक बाइबल में कुछ अतिरिक्त पुस्तकें शामिल हैं जिन्हें अपोक्रिफ़ा या द्वितीयनियमित पुस्तकें कहा जाता है, जैसे तोबित और मक्काबियों की पुस्तकें। ये पुस्तकें इब्रानी पुराने नियम का हिस्सा कभी नहीं रहीं, यहूदी समुदाय ने इन्हें पवित्रशास्त्र में नहीं गिना, और नए नियम में इनसे कोई प्रमाण-उद्धरण नहीं दिया गया। प्रोटेस्टेंट कलीसियाएँ इन्हें ऐतिहासिक रूप से उपयोगी मानती हैं पर सिद्धांत की नींव नहीं। यह अंतर अनुवाद का नहीं, बल्कि इस सवाल का है कि कैनन में कौन सी पुस्तकें गिनी जाएँ।
क्या अनुवाद में परमेश्वर का वचन कमज़ोर पड़ जाता है?
नहीं। पिन्तेकुस्त के दिन से ही परमेश्वर ने दिखा दिया कि वे हर भाषा में बोलना चाहते हैं। अनुवाद मूल इब्रानी और यूनानी पाठ से किए जाते हैं, और आज हिंदी में कई भरोसेमंद अनुवाद मौजूद हैं, जिनमें पुराना ओ.वी. संस्करण अपनी गरिमा के लिए और नए संस्करण अपनी सरलता के लिए जाने जाते हैं। सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि गहरे अध्ययन के लिए एक शब्दशः अनुवाद रखें और रोज़ाना पढ़ने के लिए एक सरल अनुवाद, और जहाँ कोई पद उलझाए वहाँ दोनों की तुलना करें।
अगर बाइबल मनुष्यों ने लिखी, तो मैं कैसे भरोसा करूँ कि उसमें गलतियाँ नहीं?
भरोसा अंततः लेखकों की योग्यता पर नहीं, परमेश्वर के चरित्र पर टिका है। वही परमेश्वर जो झूठ नहीं बोल सकते, उन्होंने अपनी आत्मा से इन लेखकों को इस तरह चलाया कि जो लिखा गया वह ठीक वही था जो वे कहलवाना चाहते थे। इसके साथ बाहरी प्रमाण भी हैं: पूरी हुई भविष्यद्वाणियाँ, पुरातत्व की खोजें, पाण्डुलिपियों की भरमार और सबसे बढ़कर मसीह का जी उठना। पर सबसे ठोस प्रमाण तब मिलता है जब आप खुद पढ़ते हैं और पाते हैं कि किताब आपको पढ़ने लगी है।
बाइबल पढ़ना कहाँ से शुरू करूँ?
अगर आप पहली बार शुरू कर रहे हैं, तो उत्पत्ति से सीधे आगे बढ़ने की कोशिश मत कीजिए, क्योंकि लैव्यव्यवस्था तक पहुँचते-पहुँचते अधिकतर लोग रुक जाते हैं। यूहन्ना के सुसमाचार से शुरू कीजिए, क्योंकि वहाँ मसीह सबसे साफ़ दिखाई देते हैं, फिर प्रेरितों के काम, फिर भजन संहिता के कुछ हिस्से और उत्पत्ति के पहले बारह अध्याय। रोज़ थोड़ा पढ़िए, एक पद चुनिए और दिनभर उस पर सोचिए। याद रखिए, भजन संहिता 119:105 पूरी घाटी की नहीं, अगले कदम की रोशनी का वादा करता है।
अंत में
"बाइबल किसने लिखी" का उत्तर दो हिस्सों में बँटा नहीं, एक ही सच्चाई में जुड़ा हुआ है। चरवाहों, राजाओं, मछुआरों और एक वैद्य ने अपनी स्याही में, अपनी भाषा में, अपने आँसुओं के साथ लिखा; और उन सबके भीतर और ऊपर परमेश्वर की साँस थी। यही कारण है कि यह पुस्तक एक साथ इतनी मानवीय लगती है कि हम उसमें अपना चेहरा पहचान लेते हैं, और इतनी दैवी कि वह हमें हमारी जगह से उठा देती है। जैसे वचन एक दिन देह बनकर हमारे बीच आया, वैसे ही वचन हर पीढ़ी तक मनुष्यों के शब्दों में आया, ताकि कोई इसे दूर की चीज़ न समझे।
अब सवाल जानकारी का नहीं रह जाता। घास सूख जाती है और फूल मुर्झा जाता है, पर हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा। आपके पास आज वही वचन है, आपकी मेज़ पर या आपके फ़ोन में। अगला कदम सरल है: उसे खोलिए, यूहन्ना के सुसमाचार से शुरू कीजिए, और पढ़ने से पहले यह प्रार्थना कीजिए कि जिन्होंने इसे लिखवाया, वे ही इसे आपके लिए खोलें।
